शनिवार, 4 जुलाई 2020

गुरु पूर्णिमा

नमस्कार।
वैदिक एस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
समस्त प्राणियों में मानव को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
क्योंकि सभी प्राणियों में केवल मनुष्य को ही अपने द्वारा किए जा रहे सभी लौकिक कर्मों का ज्ञान होता है। व्यक्ति जो भी कर्म करता है उसे करने से पूर्व विचार कर सकता है, उस कर्म द्वारा होने वाले हानि लाभ का आंकलन कर सकता है। साथ ही किसी भी सांसारिक कर्म को करने की सही विधि का ज्ञान भी किसी शिक्षक के माध्यम से अर्जित कर सकता है। किंतु या "विद्या सा विमुक्तये" इस सूक्ति के अनुसार विद्या वही है, ज्ञान वही है जो मुक्त करे। अब प्रश्न उठता है कि मुक्त होने किससे है? मुक्त वही तो हो सकता है जो बन्धन में पड़ा हो। और बन्धन में कौन है? तो समस्त प्राणि मात्र ही माया के बन्धन में बंधा पड़ा है। अब यह माया क्या है? तो गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में, मैं और मोर तोर तैं माया। अर्थात मैं, मेरा, तेरा यही सब माया है। भौतिक वस्तुओं में मन लगा हुआ हो, ये मेरा घर है, ये मेरी गाड़ी है, ये मेरे कपड़े हैं, आदि आदि। यही माया है। इसी माया के वशीभूत होकर व्यक्ति अपने पंचभौतिक शरीर को ही स्वयं को मान बैठता है। किंतु मैं आत्मा हूँ। यह शरीर मुझे एक साधन स्वरूप प्राप्त हुआ है। शरीर साधन है और आत्मा तत्व। बस यही ज्ञान हो जाना माया के बंधन से मुक्ति है। इस आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के प्रभाव से जब मनुष्य  माया के बंधन से मुक्त हो जाता है तो उसे जीवन के अंतिम क्षणो में , मानव जन्म का परम लाभ, हरि स्मरण हो आता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जन्मलाभः परः पुंसां अन्ते नारायणस्मृति। अर्थात मानव जन्म का परम लाभ ही यह है कि अंत समय में हमें नारायण की स्मृति बनी रहे।
वेदों में वर्णित इस दिव्य ज्ञान को सहज सरल भाषा में पुराणों के माध्यम से जिन्होंने मानव जाति के कल्याण के लिए समस्त मानव जाति पर उपकार करके अट्ठारह पुराणों, के माध्यम से प्रकट किया वास्तव में वही, भगवान के अवतार वेदव्यास जी सभी प्राणियों के सद्गुरु हैं। पौराणिक काल के महान व्यक्तित्व, ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अट्ठारह पुराण जैसे अद्भुत साहित्यों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को हुआ था। अतः इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है
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आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु की विशेष रूप से पूजा की जाती है। साधारण भाषा में गुरु वह व्यक्ति हैं जो ज्ञान की गंगा बहाते हैं और हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।


वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों कालों के ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देख कर यह जान लिया था कि कलियुग में धर्म के प्रति लोगों की रुचि कम हो जाएगी। धर्म में रुचि कम होने के कारण मनुष्य ईश्वर में विश्वास न रखने वाला, कर्तव्य से विमुख और कम आयु वाला हो जाएगा। एक बड़े और सम्पूर्ण वेद का अध्ययन करना उसके बस की बात नहीं होगी। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में बाँट दिया जिससे कि अल्प बुद्धि और अल्प स्मरण शक्ति रखने वाले लोग भी वेदों का अध्ययन करके लाभ उठा सकें।

व्यास जी ने वेदों को अलग-अलग खण्डों में बाँटने के बाद उनका नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद रखा। वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का ज्ञान अपने चार प्रिय शिष्यों को दिया। जिनके द्वारा चारों वेदों का प्रचार प्रसार किया गया।

वेदों में मौजूद ज्ञान अत्यंत रहस्यमयी और मुश्किल होने के कारण ही वेद व्यास जी ने पुराणों की रचना पाँचवे वेद के रूप में की, जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक किस्से-कहानियों के रूप में समझाया गया है। पुराणों का ज्ञान उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को दिया।

व्यास जी के शिष्यों ने अपनी बुद्धि बल के अनुसार उन वेदों को अनेक शाखाओं और उप-शाखाओं में बाँट दिया। महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना भी की थी। वे हमारे आदि-गुरु माने जाते हैं। गुरु पूर्णिमा का यह प्रसिद्ध त्यौहार व्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। हमें अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए।
इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु परिवार में जो भी बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन, आदि को भी गुरु तुल्य समझना चाहिए। गुरु की कृपा से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञान व अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की सम्पूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती है। गुरु से मन्त्र प्राप्त करने के लिए भी यह दिन श्रेष्ठ है।
इस दिन गुरुजनों की यथा संभव सेवा करने का बहुत महत्व है। इसलिए इस पर्व को श्रद्धापूर्वक जरूर मनाना चाहिए।
इस दिन प्रातःकाल स्नान पूजा आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण करें। फिर व्यास जी के चित्र पर सुगन्धित फूल या माला चढ़ाकर अपने गुरु के पास जाना चाहिए। उन्हें ऊँचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर कुछ दक्षिणा यथासामर्थ्य धन के रूप में भेंट करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।


वैदिक एस्ट्रो केयर कामना करता है कि यह गुरु पूर्णिमा हमारे समस्त दर्शकों के लिए अत्यन्त शुभकारी रहे। गुरु पूर्णिमा पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! नमस्कार

https://youtu.be/Q0aeC1be0rs

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Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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