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रविवार, 9 अगस्त 2026

ग्रहों की बाल्यादि अवस्थाएँ — पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

Vedic Astro Care
ग्रहों की बाल्यादि अवस्थाएँ — पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
वैदिक ज्योतिष में ग्रह की राशि में स्थित अंशात्मक स्थिति से उसकी कार्यक्षमता और फल देने की परिपक्वता जानने की एक महत्वपूर्ण पद्धति है—बालादि अवस्था। महर्षि पराशर ने इसे ग्रहों की पाँच अवस्थाओं के रूप में बताया है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय 45 में इसका वर्णन मिलता है। �
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१. पाँच बाल्यादि अवस्थाएँ
क्रमशः पाँच अवस्थाएँ हैं—
बाल अवस्था (Bāla)
कुमार अवस्था (Kumāra)
युवा अवस्था (Yuva)
वृद्ध अवस्था (Vṛddha)
मृत अवस्था (Mṛta)
शास्त्रीय कथन का सार है—
बाल-कुमार-युव-वृद्ध-मृताः अवस्थाः
अर्थात् ग्रह बालक, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत—इन पाँच अवस्थाओं में स्थित माना जाता है। �
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२. अंशों के अनुसार अवस्था निर्धारण
राशि को 30° माना जाता है और उसे पाँच समान भागों में बाँटा जाता है।
प्रत्येक अवस्था = 6°
लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण नियम है—
विषम राशियों में क्रम सीधा
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ
इनमें क्रम होगा:
बाल → कुमार → युवा → वृद्ध → मृत
ग्रह का अंश
अवस्था
0°–6°
बाल
6°–12°
कुमार
12°–18°
युवा
18°–24°
वृद्ध
24°–30°
मृत
सम राशियों में क्रम उल्टा
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
इनमें क्रम उलट जाता है:
मृत → वृद्ध → युवा → कुमार → बाल
ग्रह का अंश
अवस्था
0°–6°
मृत
6°–12°
वृद्ध
12°–18°
युवा
18°–24°
कुमार
24°–30°
बाल
यह मूल नियम पराशरी परंपरा में स्पष्ट रूप से दिया गया है। �
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३. इसे याद रखने की सरल विधि
विषम राशि
0  — 6 — 12 — 18 — 24 — 30
बाल | कुमार | युवा | वृद्ध | मृत
सम राशि
0  — 6 — 12 — 18 — 24 — 30
मृत | वृद्ध | युवा | कुमार | बाल
अर्थात् मध्य के 12°–18° हमेशा युवा रहेंगे, जबकि दोनों सिरों पर अवस्थाएँ उलट जाती हैं।
४. बाल्यादि अवस्था का शास्त्रीय फल
महर्षि पराशर ने इन पाँच अवस्थाओं में ग्रह द्वारा दिए जाने वाले फल की मात्रा भी बताई है।
अवस्था
फल देने की क्षमता
बाल
¼
कुमार
½
युवा
पूर्ण
वृद्ध
नगण्य
मृत
शून्य
अर्थात् पराशरी नियम के अनुसार—
बाल = 25%
कुमार = 50%
युवा = 100%
वृद्ध = अत्यल्प/नगण्य
मृत = फलहीन
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: इसे ग्रह के सम्पूर्ण अस्तित्व के नष्ट होने के अर्थ में नहीं लेना चाहिए। यह मुख्यतः उस ग्रह के फल को प्रकट करने की क्षमता का आकलन है। स्वयं पराशर ने परिणामों को क्रमशः एक-चतुर्थांश, आधा, पूर्ण, नगण्य और शून्य बताया है। �
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५. प्रत्येक अवस्था का ज्योतिषीय अर्थ
① बाल अवस्था
ग्रह बालक के समान माना जाता है।
फल: ¼
ग्रह के पास क्षमता तो है, लेकिन उसका फल पूरी परिपक्वता से प्रकट नहीं होता।
उदाहरण के लिए यदि पंचमेश बाल अवस्था में हो तो—
शिक्षा में आरंभिक प्रयास अधिक हो सकते हैं।
बुद्धि या सृजनात्मकता का विकास क्रमशः हो सकता है।
संतान संबंधी विषयों में परिपक्वता देर से आ सकती है।
लेकिन केवल बाल अवस्था देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। ग्रह की राशि, भाव, स्वामित्व, दृष्टि, युति, नवांश और दशा भी देखनी होगी।
② कुमार अवस्था
ग्रह बाल्यावस्था से आगे बढ़ चुका है।
फल: ½
यह ग्रह के फल देने की मध्यम क्षमता दर्शाती है।
ग्रह अपनी कारकत्व शक्ति को बाल अवस्था से अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है, लेकिन अभी पूर्ण परिपक्वता नहीं होती।
③ युवा अवस्था
यह पाँचों में सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है।
फल: पूर्ण
12°–18° के मध्य ग्रह युवा अवस्था में आता है—चाहे राशि विषम हो या सम।
अर्थात् युवा अवस्था का क्षेत्र दोनों प्रकार की राशियों में 12° से 18° ही है।
यह ग्रह की फल-प्रद क्षमता की दृष्टि से सर्वोत्तम बालादि अवस्था मानी जाती है। �
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उदाहरण:
गुरु 15° सिंह
सिंह विषम राशि है और 15° युवा क्षेत्र में है।
अतः—
गुरु = युवा अवस्था
और गुरु अपने कारकत्व एवं भावाधिपत्य के फल को पूर्ण क्षमता से व्यक्त करने की स्थिति में माना जाएगा।
④ वृद्ध अवस्था
ग्रह वृद्धावस्था में पहुँच चुका है।
फल: नगण्य
ग्रह के फल में कमजोरी, मंदता, विलम्ब या कम अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
परंतु वृद्ध = खराब ग्रह ऐसा सीधा नियम नहीं है।
यदि वही ग्रह उच्च, स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण, शुभ भावस्थ, शुभ दृष्ट या वर्गों में बलवान है तो अन्य बल उसके परिणाम को काफी सुधार सकते हैं।
⑤ मृत अवस्था
यह बाल्यादि अवस्थाओं में सबसे कमजोर अवस्था है।
फल: शून्य
पराशरी सूत्र में मृत अवस्था के फल को nil अर्थात् शून्य बताया गया है। �
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लेकिन व्यवहारिक कुंडली-विचार में इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि ग्रह हर परिस्थिति में बिल्कुल कोई फल नहीं देगा।
बल्कि इसे ग्रह की फल-अभिव्यक्ति की अत्यंत न्यून क्षमता के रूप में अन्य योगों और बलों के साथ देखना अधिक उचित है।
६. उदाहरणों से समझिए
उदाहरण 1 — मंगल 4° मेष
मेष = विषम राशि
4° = 0°–6°
अतः:
मंगल = बाल अवस्था
फल क्षमता ≈ ¼
उदाहरण 2 — गुरु 9° सिंह
सिंह = विषम राशि
9° = 6°–12°
अतः:
गुरु = कुमार अवस्था
फल क्षमता ≈ ½
उदाहरण 3 — शुक्र 15° तुला
तुला = विषम राशि
15° = 12°–18°
अतः:
शुक्र = युवा अवस्था
फल क्षमता = पूर्ण
यहाँ ध्यान दें कि शुक्र तुला में स्वक्षेत्री भी है। इसलिए युवा अवस्था के साथ स्वक्षेत्री स्थिति भी ग्रह को मजबूत करती है।
उदाहरण 4 — शनि 21° धनु
धनु = विषम राशि
21° = 18°–24°
अतः:
शनि = वृद्ध अवस्था
उदाहरण 5 — बुध 27° मकर
मकर = सम राशि।
सम राशि में क्रम उल्टा है:
24°–30° = बाल
अतः:
बुध = बाल अवस्था
यही कारण है कि केवल "27° ग्रह बहुत आगे है इसलिए वृद्ध होगा" ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
उदाहरण 6 — गुरु 3° वृषभ
वृषभ = सम राशि।
सम राशि में 0°–6° = मृत
अतः:
गुरु = मृत अवस्था
७. एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम
बाल्यादि अवस्था ग्रह के अंश से निर्धारित होती है, न कि ग्रह के भाव से।
अर्थात् यदि गुरु—
लग्न में 15° हो,
पंचम भाव में 15° हो,
दशम भाव में 15° हो,
तो राशि के विषम/सम होने के अनुसार उसकी बालादि अवस्था निर्धारित होगी।
भाव अवस्था बदलने का आधार नहीं है।
८. राशि विषम या सम कैसे पहचानें?
विषम राशियाँ
मेष
मिथुन
सिंह
तुला
धनु
कुम्भ
इनमें:
बाल → कुमार → युवा → वृद्ध → मृत
सम राशियाँ
वृषभ
कर्क
कन्या
वृश्चिक
मकर
मीन
इनमें:
मृत → वृद्ध → युवा → कुमार → बाल
९. बाल्यादि अवस्था और ग्रह का वास्तविक बल
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण ज्योतिषीय अंतर समझना आवश्यक है।
बाल्यादि अवस्था = षड्बल नहीं है।
इसे सीधे षड्बल का कोई अंग नहीं मानना चाहिए।
उदाहरण के लिए—
गुरु उच्च राशि में हो लेकिन बालादि अवस्था में मृत हो, तो दो अलग बातें होंगी:
उच्च राशि से गुरु को उच्चत्व/स्थानगत बल प्राप्त है।
बालादि अवस्था से उसकी फल-अभिव्यक्ति की अवस्था कमजोर मानी जाएगी।
इसलिए कुंडली में किसी एक अवस्था को देखकर अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
१०. बाल्यादि अवस्था बनाम जाग्रतादि अवस्था
पराशर ने ग्रहों की एक दूसरी अवस्था भी बताई है—जाग्रतादि अवस्था।
इसमें तीन अवस्थाएँ हैं:
जाग्रत
स्वप्न
सुषुप्ति
नियम:
उच्च या स्वक्षेत्र → जाग्रत
मित्र या सम राशि → स्वप्न
शत्रु या नीच राशि → सुषुप्ति
पराशरी वर्णन में जाग्रत ग्रह से पूर्ण, स्वप्न से मध्यम और सुषुप्ति से न्यून/निष्फल परिणाम का सिद्धांत दिया गया है। 


आपके क्रम के अनुसार ग्रहावस्थाओं में २. जाग्रतादि अवस्था और ३. दीप्तादि अवस्था का शास्त्रीय आधार मुख्यतः बृहत्पाराशर होराशास्त्र, ग्रहावस्थाध्याय, अध्याय ४५ में मिलता है। मूल श्लोकों के आधार पर दोनों को अलग-अलग समझना आवश्यक है, क्योंकि दोनों की गणना-पद्धति और फल-विचार अलग हैं। �
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२. जाग्रतादि अवस्था — त्रिविध अवस्था
जाग्रतादि अवस्था ग्रह की फल देने की सक्रियता अथवा निष्क्रियता को बताती है। इसके तीन भेद हैं—
जाग्रत अवस्था
स्वप्न अवस्था
सुषुप्त अवस्था
बृहत्पाराशर होराशास्त्र में इसका मूल आधार ग्रह की राशिगत स्थिति और राशिस्वामी से संबंध है। �
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मूल श्लोक
स्वभोच्चयोः समसुहृद्भयोः शत्रुभनीचयोः ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या अवस्था नामदृक्फलाः ॥५॥
अर्थात्—
स्वराशि अथवा उच्च राशि में ग्रह → जाग्रत
सम अथवा मित्र राशि में ग्रह → स्वप्न
शत्रु अथवा नीच राशि में ग्रह → सुषुप्त
इसके फल का अगला श्लोक अत्यन्त स्पष्ट है—
जागरे च फलं पूर्णं स्वप्ने मध्यफलं तथा ।
सुषुप्तौ तु फलं शून्यं विज्ञेयं द्विजसत्तम ॥६॥ �
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फल का सिद्धान्त
अवस्था
ग्रह की कार्यक्षमता
फल
जाग्रत
अत्यन्त सक्रिय
पूर्ण फल
स्वप्न
मध्यम सक्रिय
मध्यम फल
सुषुप्त
निष्क्रिय/अप्रकट
शून्य अथवा अत्यल्प फल
यहाँ “शून्य फल” का अर्थ यह नहीं कि ग्रह जन्मकुण्डली में बिल्कुल कोई फल नहीं देगा। इसका तात्पर्य यह है कि उस ग्रह के जिस फल का विचार किया जा रहा है, उसे प्रकट करने की उसकी क्षमता अत्यन्त क्षीण है। अन्य बलों और योगों से परिणाम बदल सकता है।
२.१ जाग्रत अवस्था
जब ग्रह—
अपनी स्वराशि में हो, अथवा
अपनी उच्च राशि में हो,
तो वह जाग्रत माना जाता है। �
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फल
ग्रह जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, उससे संबंधित फल को प्रकट करने की क्षमता बढ़ जाती है।
उदाहरण के लिए—
गुरु उच्च होकर जाग्रत हो और पंचम भाव से संबंधित हो तो—
शिक्षा
ज्ञान
संतान
मंत्रविद्या
बुद्धि
पूर्वपुण्य
से संबंधित फल को प्रकट करने की शक्ति अत्यधिक बढ़ सकती है।
लेकिन केवल जाग्रत देखकर अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए। गुरु शुभ है या अशुभ फलदाता, यह उसकी भावेशता, भावस्थिति, दृष्टि, युति, षड्बल और अन्य योगों से निर्धारित होगा।
२.२ स्वप्न अवस्था
जब ग्रह—
मित्र राशि, अथवा
सम राशि
में स्थित हो, तो स्वप्न अवस्था मानी जाती है। �
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ग्रह पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता, लेकिन उसकी फलप्रद क्षमता जाग्रत ग्रह से कम होती है।
इसलिए—
जाग्रत = फल का पूर्ण प्राकट्य
स्वप्न = फल का आंशिक/मध्यम प्राकट्य
मानना चाहिए।
उदाहरण—
यदि दशमेश मित्र राशि में हो तो कर्मक्षेत्र संबंधी योग मौजूद होने पर फल मिल सकता है, लेकिन उसी ग्रह के स्वराशि/उच्च स्थिति वाले जाग्रत होने की तुलना में फल की शक्ति कम हो सकती है।
२.३ सुषुप्त अवस्था
जब ग्रह—
शत्रु राशि, अथवा
नीच राशि
में हो, तो सुषुप्त अवस्था कही जाती है। �
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यह ग्रह की फलप्रद क्षमता का सबसे कमजोर स्तर है।
उदाहरण—
यदि पंचमेश नीच राशि में हो और अन्य किसी प्रकार से बलवान न हो, तो शिक्षा, बुद्धि, संतान आदि पंचमभावीय विषयों में ग्रह के स्वाभाविक फल के प्राकट्य में बाधा आ सकती है।
परन्तु यहाँ भी केवल सुषुप्त अवस्था देखकर संतान या शिक्षा का निषेध नहीं करना चाहिए। नीचभंग, शुभदृष्टि, वर्गबल, षड्बल, योगकारकत्व आदि परिणाम को बदल सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी
कई आधुनिक ज्योतिष-पद्धतियों में जाग्रतादि अवस्था को राशि के १०-१० अंशों के तीन भागों से निर्धारित किया जाता है—
विषम राशि में ०–१०° जाग्रत, १०–२०° स्वप्न, २०–३०° सुषुप्त
सम राशि में इसका क्रम उल्टा।
ऐसी पद्धति प्रचलित है। �
Sanskrit Bhasi
लेकिन बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय ४५ के उपर्युक्त श्लोक ५–६ में जाग्रतादि अवस्था का प्रत्यक्ष आधार उच्च/स्व, मित्र/सम, शत्रु/नीच राशि दिया गया है; वहाँ १०-१० अंश का विभाजन नहीं बताया गया। �
विकिस्रोत
इसलिए यदि आपका उद्देश्य “पूर्ण शास्त्रीय पाराशरी विश्लेषण” है, तो दोनों प्रणालियों को मिलाकर नहीं देखना चाहिए। किस ग्रन्थ की पद्धति अपनाई जा रही है, यह पहले निश्चित करना चाहिए।
३. दीप्तादि अवस्था — नवधा अवस्था
अब आती है दीप्तादि अवस्था, जो जाग्रतादि से अधिक विस्तृत है।
इसके नौ भेद हैं—
दीप्त
स्वस्थ
प्रमुदित
शान्त
दीन
दुःखित
विकल
खल
कोपी
बृहत्पाराशर होराशास्त्र का मूल श्लोक है—
दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽथ दुःखितः ।
विकलश्च खलः कोऽपीत्यवस्था नवधाऽपराः ॥७॥ �
विकिस्रोत
यह अवस्था मुख्यतः ग्रह की राशिगत गरिमा, मैत्री तथा पीड़ित अवस्था को दर्शाती है।
३.१ दीप्त अवस्था
स्वोच्चस्थः खेचरो दीप्तः
जो ग्रह उच्च राशि में स्थित हो, वह दीप्त कहलाता है। �
विकिस्रोत
दीप्त = प्रकाशमान, अत्यन्त समर्थ।
उच्च ग्रह अपनी स्वाभाविक शक्ति को बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है।
उदाहरण—
सूर्य — मेष
चन्द्र — वृषभ
मंगल — मकर
बुध — कन्या
गुरु — कर्क
शुक्र — मीन
शनि — तुला
इन राशियों में संबंधित ग्रह दीप्त माना जाता है।
३.२ स्वस्थ अवस्था
स्वर्क्षे स्वस्थः
जो ग्रह अपनी स्वराशि में हो, वह स्वस्थ कहलाता है। �
विकिस्रोत
अर्थात् ग्रह अपने ही क्षेत्र में स्थित है।
उदाहरण—
सूर्य सिंह में
चन्द्र कर्क में
मंगल मेष/वृश्चिक में
बुध मिथुन/कन्या में
गुरु धनु/मीन में
शुक्र वृषभ/तुला में
शनि मकर/कुम्भ में
स्वस्थ ग्रह अपने कारकत्व और भावगत अधिकार को अपेक्षाकृत समर्थ रूप से व्यक्त करता है।
३.३ प्रमुदित अवस्था
अधिमित्रभे मुदितः
अर्थात् ग्रह अधिमित्र/अतिमित्र की राशि में स्थित हो तो प्रमुदित कहा जाता है। �
विकिस्रोत
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है—
प्रमुदित और शान्त में अन्तर है।
अतिमित्र राशि → प्रमुदित
मित्र राशि → शान्त
अर्थात् ग्रह अपने अत्यन्त अनुकूल वातावरण में प्रसन्न होकर कार्य करता है।
३.४ शान्त अवस्था
मित्रभे शान्तः
मित्र ग्रह की राशि में स्थित ग्रह शान्त कहलाता है। �
विकिस्रोत
यह स्थिति शुभ है, लेकिन प्रमुदित अथवा स्वस्थ की तुलना में कम प्रभावी मानी जाती है।
३.५ दीन अवस्था
समभे दीन उच्यते
सम अर्थात् तटस्थ ग्रह की राशि में ग्रह स्थित हो तो दीन कहलाता है। �
विकिस्रोत
यहाँ “दीन” शब्द को देखकर ग्रह को पूर्णतः अशुभ नहीं मानना चाहिए।
इसका आशय है कि ग्रह को न तो विशेष सहयोग मिल रहा है और न विशेष विरोध।
३.६ दुःखित अवस्था
शत्रुभे दुःखितः प्रोक्तः
शत्रु ग्रह की राशि में स्थित ग्रह दुःखित कहलाता है। �
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यह ग्रह की अभिव्यक्ति में तनाव उत्पन्न करता है।
उदाहरणतः यदि कोई ग्रह अपने शत्रु की राशि में हो तो उसके कारकत्व को सहज रूप से व्यक्त करने में संघर्ष हो सकता है।
३.७ विकल अवस्था
विकलः पापसंयुतः
पापग्रह से संयुक्त ग्रह विकल कहा गया है। �
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यहाँ युति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
अर्थात् किसी ग्रह का केवल शत्रु राशि में होना दुःखित अवस्था का कारण है, जबकि पापग्रह के साथ युति विकल अवस्था का कारण बनती है।
उदाहरण—
बुध के साथ मंगल/शनि/राहु जैसी पापप्रवृत्त ग्रह-युति होने पर बुध की विकल अवस्था का विचार किया जा सकता है।
३.८ खल अवस्था
खलः खलगृहे ज्ञेयः
पापग्रह की राशि में स्थित ग्रह खल कहलाता है। �
विकिस्रोत
यहाँ “खल” का अर्थ ग्रह के चरित्र को “दुष्ट व्यक्ति” बना देना नहीं है। यह अशुभ/पापग्रह के क्षेत्र में ग्रह की स्थिति का तकनीकी नाम है।
३.९ कोपी अवस्था
कोपी स्यादर्कसंयुतः
सूर्य के साथ संयुक्त ग्रह कोपी कहलाता है। �
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यह विशेष रूप से सूर्य-संयोग से उत्पन्न पीड़ा/अस्त स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
इसलिए सूर्य के अत्यन्त निकट ग्रह के फल-विचार में अस्त/मौढ्य को भी स्वतंत्र रूप से देखना आवश्यक है।
दीप्तादि नौ अवस्थाओं का संक्षिप्त क्रम
क्रम
अवस्था
शास्त्रीय स्थिति
दीप्त
उच्च राशि
स्वस्थ
स्वराशि
प्रमुदित
अतिमित्र राशि
शान्त
मित्र राशि
दीन
सम राशि
दुःखित
शत्रु राशि
विकल
पापग्रह से युति
खल
पापग्रह की राशि
कोपी
सूर्य से युति
यह क्रम सीधे पाराशरी श्लोक ७–९ से प्राप्त होता है। �
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जाग्रतादि और दीप्तादि में मूल अन्तर
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
जाग्रतादि बताती है—
ग्रह अपने फल को कितनी सक्रियता से प्रकट कर सकता है।
जाग्रत → पूर्ण
स्वप्न → मध्यम
सुषुप्त → शून्य/अत्यल्प
दीप्तादि बताती है—
ग्रह किस प्रकार की राशिगत परिस्थिति और मानसिक/कार्यात्मक स्थिति में फल दे रहा है।
दीप्त → अत्यन्त समर्थ
स्वस्थ → स्वक्षेत्रस्थ
प्रमुदित → अत्यन्त अनुकूल
शान्त → अनुकूल
दीन → तटस्थ
दुःखित → प्रतिकूल
विकल → पापयुति से विचलित
खल → पापक्षेत्रस्थ
कोपी → सूर्यसंयुक्त
इसलिए दोनों को एक ही अवस्था का दोहराव नहीं समझना चाहिए।
एक ग्रह की दोनों अवस्थाएँ एक साथ कैसे हो सकती हैं?
यही इस विषय का अत्यन्त महत्वपूर्ण उन्नत सिद्धान्त है।
मान लीजिए मंगल मेष राशि में है।
मेष मंगल की स्वराशि है → जाग्रत
मेष मंगल की स्वराशि है → स्वस्थ
अर्थात् एक ही ग्रह के लिए—
जाग्रतादि = जाग्रत
दीप्तादि = स्वस्थ
दोनों अलग-अलग आयाम बता रहे हैं।
दूसरा उदाहरण—
मंगल मकर में:
मकर मंगल की उच्च राशि → जाग्रत
उच्च राशि → दीप्त
अतः—
जाग्रत + दीप्त
यह ग्रह अत्यन्त प्रभावशाली स्थिति में माना जाएगा, यद्यपि अंतिम फलादेश भावेशत्व और अन्य योगों पर निर्भर करेगा।
तीसरे उदाहरण से अंतर और स्पष्ट करें
मान लीजिए कोई ग्रह मित्र राशि में है और उसी ग्रह की पापग्रह से युति भी है।
तब—
जाग्रतादि → स्वप्न
दीप्तादि → शान्त + विकल
अर्थात् ग्रह को मित्र राशि का सहयोग प्राप्त है, लेकिन पापयुति से वह विक्षुब्ध भी है।
यही कारण है कि केवल एक अवस्था देखकर फलादेश करना शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा होगा।
फलादेश में प्रयोग की सही पद्धति
किसी ग्रह का फल निर्धारित करते समय क्रम इस प्रकार रखना अधिक उचित है—
१. ग्रह का स्वभाव
२. भावेशत्व
३. भावस्थिति
४. राशि एवं राशिस्वामी
५. उच्च/नीच/स्व/मित्र/शत्रु स्थिति
६. जाग्रतादि अवस्था
७. दीप्तादि अवस्था
८. षड्बल
९. दृष्टि एवं युति
१०. वर्गबल/षोडशवर्ग
११. योग
१२. दशा-अन्तर्दशा
१३. गोचर
इसका कारण स्वयं पाराशर आगे कहते हैं—
यादृशो जन्मकाले यः खेटो यद्भावगो भवेत् ।
तादृशं तस्य भावस्य फलमुह्यं द्विजोत्तम ॥१०॥
अर्थात् जन्मकाल में ग्रह जिस प्रकार की स्थिति में जिस भाव में स्थित है, उसी के अनुरूप उस भाव का फल विचारना चाहिए। �
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अत्यन्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष
जाग्रतादि = ग्रह की फलप्रवर्तन क्षमता।
दीप्तादि = ग्रह की स्थिति/अनुकूलता एवं पीड़ा की अवस्था।
इसलिए—
जाग्रत ग्रह हमेशा शुभ हो, ऐसा नहीं।
उदाहरण के लिए कोई पापग्रह अपने उच्च स्थान में हो तो वह जाग्रत और दीप्त हो सकता है। इससे उसकी शक्ति बढ़ती है; लेकिन वह शक्ति जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, उसके अनुसार फल देगी।
इसी प्रकार—
सुषुप्त ग्रह का फल पूर्णतः समाप्त हो गया, ऐसा भी नहीं।
अन्य बल, शुभ दृष्टि, योग, भावेशत्व, वर्गस्थिति और दशा उसके फल को पुनः सक्रिय कर सकते हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—बृहत्पाराशर होराशास्त्र के इन श्लोकों में दीप्तादि नौ अवस्थाओं को कोई निश्चित “१००%, ८०%, ६०%...” फलांश नहीं दिया गया है। इसलिए ऐसी निश्चित प्रतिशत-सारणी को सीधे पाराशर का शास्त्रीय सिद्धान्त कहना उचित नहीं होगा। मूल श्लोक अवस्थाओं की संज्ञा और उनकी उत्पत्ति बताते हैं। �
विकिस्रोत +1
स्रोत-आधार: बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय ४५, श्लोक ५–१०। �
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यदि आप चाहें तो अगला भाग “४. बालादि अवस्था — ५” का इसी स्तर पर मूल संस्कृत श्लोक, गणना-विधि, विषम/सम राशि का नियम, फल, उदाहरण और जाग्रतादि + दीप्तादि + बालादि तीनों अवस्थाओं के संयुक्त फल सहित किया जा सकता है।

षड्बल के छः मुख्य बल

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षड्बल के छः मुख्य बलों के अंतर्गत आने वाले सभी उपबलों के नाम इस प्रकार हैं। 
पाराशरी परंपरा में विशेष रूप से स्थान बल के 5 और काल बल के 9 अंग माने जाते हैं। 

१. स्थान बल — ५ उपबल

उच्च बल — Uccha Bala
सप्तवर्गज बल — Saptavargaja Bala
ओज-युग्म राशि-अंश बल — Ojha-Yugma Bala
केन्द्रादि बल — Kendradi Bala
द्रेष्काण बल — Drekkana Bala

२. दिग्बल — कोई पृथक उपबल नहीं
दिग्बल स्वयं एक स्वतंत्र बल है। ग्रह की दिशात्मक स्थिति के अनुसार इसकी गणना होती है।

३. काल बल — ९ उपबल
पाराशरी षड्बल-गणना में कालबल के अंतर्गत ये अंग आते हैं—
नाथोन्नत बल — Natonnata Bala
पक्ष बल — Paksha Bala
त्रिभाग बल — Tribhaga Bala
वर्ष बल — Varsha/Abda Bala
मास बल — Masa Bala
वार बल — Vara/Dina Bala
होरा बल — Hora Bala
अयन बल — Ayana Bala
युद्ध बल — Yuddha Bala
ध्यान दें कि वर्ष–मास–वार–होरा को कई ग्रंथ/सॉफ्टवेयर एक संयुक्त खंड Abda-Masa-Dina-Hora Bala के रूप में भी प्रदर्शित करते हैं; इसलिए अलग-अलग पुस्तकों में उपबलों की सूची 6, 8 या 9 शीर्षकों में दिखाई दे सकती है। पाराशरी गणना में युद्धबल को कालबल के योग में शामिल किया जाता है। 

४. चेष्टा बल — कोई पृथक उपबल नहीं
चेष्टा बल ग्रह की गति, वक्रीत्व तथा गति की अवस्था के आधार पर निर्धारित होता है।

५. नैसर्गिक बल — कोई पृथक उपबल नहीं
नैसर्गिक बल ग्रह की स्वाभाविक शक्ति है। सात ग्रहों के लिए इसका स्थिर मान निर्धारित है।

६. दृग्बल — कोई पृथक उपबल नहीं
दृग्बल अन्य ग्रहों से प्राप्त शुभ अथवा अशुभ दृष्टि के आधार पर निर्धारित होता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

दिग्बल (Dig Bala) का पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

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दिग्बल (Dig Bala) का पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
दिग्बल षड्बल (षट्बल) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। "दिक्" अर्थात् दिशा और "बल" अर्थात् शक्ति। अतः किसी ग्रह को जिस दिशा में सर्वाधिक सामर्थ्य प्राप्त होती है, वही उसका दिग्बल कहलाती है।
दिग्बल यह बताता है कि ग्रह जिस भाव (दिशा) में स्थित है, वहाँ वह अपनी प्राकृतिक शक्तियों को कितनी प्रभावी ढंग से व्यक्त कर सकता है।
शास्त्रीय आधार
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने षड्बल के अंतर्गत दिग्बल का वर्णन किया है।
सार रूप में ग्रहों के दिग्बल का सिद्धांत इस प्रकार है—
लग्ने बुधगुरू बलिनौ।
चतुर्थे शशिशुक्रौ।
सप्तमे शनिः।
दशमे रविभौमौ।
अर्थात्—
बुध और गुरु — लग्न (पूर्व दिशा) में पूर्ण दिग्बली होते हैं।
चन्द्र और शुक्र — चतुर्थ भाव (उत्तर दिशा) में पूर्ण दिग्बली होते हैं।
शनि — सप्तम भाव (पश्चिम दिशा) में पूर्ण दिग्बली होता है।
सूर्य और मंगल — दशम भाव (दक्षिण दिशा) में पूर्ण दिग्बली होते हैं।
ग्रहों का दिग्बल
ग्रह
पूर्ण दिग्बल
दिशा
सूर्य
दशम भाव
दक्षिण
मंगल
दशम भाव
दक्षिण
गुरु
लग्न
पूर्व
बुध
लग्न
पूर्व
चन्द्र
चतुर्थ भाव
उत्तर
शुक्र
चतुर्थ भाव
उत्तर
शनि
सप्तम भाव
पश्चिम
दिग्बल का तात्त्विक कारण
1. सूर्य और मंगल – दशम भाव
दशम भाव कर्म, अधिकार, शासन, प्रतिष्ठा और नेतृत्व का भाव है।
सूर्य राजा है तथा मंगल सेनापति। दोनों कर्मक्षेत्र में अपनी सर्वोच्च क्षमता दिखाते हैं, इसलिए दशम भाव में पूर्ण दिग्बली होते हैं।
2. चन्द्र और शुक्र – चतुर्थ भाव
चतुर्थ भाव सुख, माता, गृह, शांति और भावनाओं का प्रतिनिधि है।
चन्द्र मन का तथा शुक्र सुख एवं सौन्दर्य का कारक है। अतः दोनों इस भाव में अत्यंत स्वाभाविक शक्ति प्राप्त करते हैं।
3. गुरु और बुध – लग्न
लग्न बुद्धि, व्यक्तित्व और जीवन का मूल केन्द्र है।
गुरु ज्ञान का तथा बुध विवेक एवं तर्क का ग्रह है। इसलिए लग्न में इनकी अभिव्यक्ति सर्वाधिक प्रभावी होती है।
4. शनि – सप्तम भाव
सप्तम भाव समाज, जनसंपर्क और व्यवहार का भाव है।
शनि जनसामान्य, श्रम, धैर्य और व्यवहारिक जीवन का ग्रह है। इसलिए सप्तम भाव में उसका प्रभाव सर्वाधिक माना गया है।
दिग्बल का अधिकतम मान
पूर्ण दिग्बल होने पर ग्रह को 60 षष्ट्यांश (Virupa) प्राप्त होते हैं।
विपरीत भाव में वही ग्रह 0 षष्ट्यांश का दिग्बल प्राप्त करता है।
बीच के स्थानों में दिग्बल क्रमशः बढ़ता या घटता है।
विपरीत भाव
ग्रह
पूर्ण दिग्बल
शून्य दिग्बल
सूर्य
दशम
चतुर्थ
मंगल
दशम
चतुर्थ
चन्द्र
चतुर्थ
दशम
शुक्र
चतुर्थ
दशम
गुरु
लग्न
सप्तम
बुध
लग्न
सप्तम
शनि
सप्तम
लग्न
दिग्बल कैसे निकाला जाता है?
यदि ग्रह अपने पूर्ण दिग्बल वाले बिंदु पर हो तो 60 षष्ट्यांश प्राप्त करता है।
उससे 180° दूर होने पर 0 षष्ट्यांश मिलता है।
बीच में ग्रह की कोणीय दूरी के अनुसार दिग्बल समानुपातिक रूप से निकाला जाता है।
उदाहरण 1
मान लीजिए—
सूर्य दशम भाव में है।
फल—
पूर्ण दिग्बल (60)
प्रशासनिक क्षमता
नेतृत्व
उच्च पद
शासन में सफलता
उदाहरण 2
सूर्य चतुर्थ भाव में है।
फल—
दिग्बल शून्य
अधिकार व्यक्त करने में कठिनाई
प्रतिष्ठा में विलंब
कर्मक्षेत्र में संघर्ष
(यदि उच्च, स्वराशि या शुभ दृष्टि हो तो यह कमजोरी काफी हद तक संतुलित हो सकती है।)
उदाहरण 3
गुरु लग्न में
फल—
ज्ञान
नैतिकता
सम्मान
प्रभावशाली व्यक्तित्व
उत्तम निर्णय क्षमता
उदाहरण 4
शनि सप्तम भाव में
फल—
धैर्य
संगठन क्षमता
जनसमर्थन
दीर्घकालिक सफलता
अनुशासन
दिग्बल का फल
दिग्बली ग्रह—
अपने कारकत्व को अधिक प्रभावी बनाता है।
शुभ ग्रह हो तो शुभ फल बढ़ते हैं।
पाप ग्रह हो तो अपनी प्रकृति के अनुसार प्रबल परिणाम देता है।
दशा एवं गोचर में अधिक प्रभावशाली रहता है।
क्या दिग्बली ग्रह सदैव शुभ होता है?
नहीं।
दिग्बल केवल ग्रह की शक्ति बताता है, शुभता नहीं।
उदाहरण—
दिग्बली शनि यदि षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव का स्वामी होकर अशुभ योग बना रहा हो, तो वह अपने अशुभ परिणाम भी अधिक प्रभाव से दे सकता है।
इसी प्रकार दिग्बली मंगल यदि मारक या पापयोगकारक हो, तो उसके परिणाम भी प्रबल हो सकते हैं।
अतः दिग्बल का मूल्यांकन हमेशा इन कारकों के साथ करना चाहिए—
नैसर्गिक शुभ/पाप स्वभाव
भावाधिपत्य
उच्च-नीच
स्वराशि/मित्र-शत्रु राशि
दृष्टियाँ
युति
वक्री या अस्त अवस्था
अन्य षड्बल (स्थानबल, कालबल, चेष्टाबल, नैसर्गिक बल, दृक्बल आदि)
व्यावहारिक उदाहरण
यदि किसी कुंडली में—
सूर्य दशम भाव में,
मंगल दशम में,
गुरु लग्न में,
चन्द्र चतुर्थ में,
शनि सप्तम में हो,
तो लगभग सभी ग्रह अपनी-अपनी दिशा में अत्यंत शक्तिशाली होंगे। ऐसी कुंडली में व्यक्ति का व्यक्तित्व, कर्म, नेतृत्व, ज्ञान, मानसिक स्थिरता तथा सामाजिक प्रभाव सामान्यतः अधिक मजबूत दिखाई देता है। अंतिम फलादेश के लिए राशि, दृष्टि, युति, भावाधिपत्य तथा सम्पूर्ण षड्बल का संयुक्त विचार आवश्यक है।
निष्कर्ष
दिग्बल ग्रह की दिशागत शक्ति का मापक है। यह बताता है कि कोई ग्रह किस दिशा या भाव में अपनी प्राकृतिक शक्ति का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है। षड्बल के विश्लेषण में दिग्बल का विशेष महत्व है, क्योंकि ग्रह का वास्तविक प्रभाव केवल उसकी राशि या भावस्थिति से नहीं, बल्कि उसकी दिशात्मक शक्ति से भी निर्धारित होता है। इसलिए किसी भी कुंडली का शास्त्रीय फलादेश करते समय दिग्बल का विचार अवश्य करना चाहिए।

षष्ट्यांश (Ṣaṣṭyāṁśa) क्या होता है? — उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या

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षष्ट्यांश (Ṣaṣṭyāṁśa) क्या होता है? — उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या
षष्ट्यांश का शाब्दिक अर्थ है "साठवाँ भाग"।
संस्कृत में—
षष्टि = 60
अंश = भाग
अर्थात् किसी पूर्ण मान (Full Value) को 60 समान भागों में बाँटा जाए, तो प्रत्येक भाग एक षष्ट्यांश कहलाता है।
1. ज्योतिष में षष्ट्यांश का प्रयोग
वैदिक ज्योतिष में "षष्ट्यांश" शब्द दो अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त होता है, जिन्हें अलग-अलग समझना आवश्यक है।
(क) बल (Shadbala) मापने की इकाई
षड्बल में ग्रहों की शक्ति षष्ट्यांश (Virupa) में मापी जाती है।
यह उसी प्रकार है जैसे—
दूरी → किलोमीटर में
वजन → किलोग्राम में
समय → घंटे में
ग्रहबल → षष्ट्यांश में
अर्थात यहाँ षष्ट्यांश माप की इकाई है।
(ख) षष्ट्यांश वर्ग (D-60)
वर्ग कुण्डलियों में एक राशि (30°) को 60 समान भागों में विभाजित किया जाता है।
तब—
30° ÷ 60 = 0°30′ (30 आर्क-मिनट)
अर्थात प्रत्येक भाग 30 मिनट (0°30′) का होता है।
इसे षष्ट्यांश वर्ग (D-60) कहते हैं।
यह जन्म के सूक्ष्म कर्मफल के विश्लेषण में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
षड्बल में षष्ट्यांश कैसे समझें?
मान लीजिए—
सूर्य का केन्द्रादि बल = 60 षष्ट्यांश
इसका अर्थ यह नहीं है कि सूर्य 60 डिग्री का हो गया।
इसका अर्थ केवल इतना है कि
सूर्य ने केन्द्रादि बल में पूर्ण अंक (Maximum Score) प्राप्त किए हैं।
इसे परीक्षा के उदाहरण से समझिए।
यदि परीक्षा 60 अंकों की हो—
छात्र A = 60/60
छात्र B = 30/60
छात्र C = 15/60
तो स्पष्ट है—
A सबसे अधिक सक्षम
B मध्यम
C अपेक्षाकृत कम
ठीक इसी प्रकार—
केन्द्र = 60
पाणफर = 30
अपोक्लिम = 15
उदाहरण 1
बृहस्पति दशम भाव में है।
दशम = केन्द्र
अतः
केन्द्रादि बल = 60 षष्ट्यांश
अर्थ
बृहस्पति ने केन्द्रादि बल में पूर्ण अंक प्राप्त किए।
उदाहरण 2
शुक्र पंचम भाव में है।
पंचम = पाणफर
अतः
केन्द्रादि बल = 30 षष्ट्यांश
अर्थ
शुक्र को आधा बल प्राप्त हुआ।
उदाहरण 3
मंगल नवम भाव में है।
नवम = अपोक्लिम
अतः
केन्द्रादि बल = 15 षष्ट्यांश
अर्थ
मंगल को केन्द्रादि बल का केवल एक-चौथाई भाग प्राप्त हुआ।
क्या 60 षष्ट्यांश = 60 डिग्री?
नहीं।
यह सबसे सामान्य भ्रम है।
डिग्री (°) ग्रह की स्थिति बताती है।
षष्ट्यांश (Virupa) ग्रह की शक्ति का माप बताता है।
दोनों का आपस में कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
शास्त्रीय दृष्टि
बृहत्पाराशर होराशास्त्र में ग्रहबल की गणना रूप (Rūpa) और विरूप (Virūpa) के आधार पर की गई है।
यहाँ—
1 रूप = 60 विरूप (षष्ट्यांश)
इसलिए यदि किसी ग्रह का कुल बल 360 विरूप है, तो उसे
360 ÷ 60 = 6 रूप
कहा जाएगा।
सरल उपमा
कल्पना कीजिए कि किसी ग्रह की शक्ति मापने के लिए 60 अंकों का पैमाना बनाया गया है।
60 = पूर्ण शक्ति
45 = अच्छी शक्ति
30 = मध्यम शक्ति
15 = कम शक्ति
0 = शक्ति नहीं
यहाँ "षष्ट्यांश" उसी अंक (Score) की तरह कार्य करता है।
निष्कर्ष
षष्ट्यांश का अर्थ हर जगह एक जैसा नहीं होता। षड्बल में यह ग्रहबल की माप की इकाई (Virūpa) है, जबकि षष्ट्यांश वर्ग (D-60) में यह एक राशि के 60 समान भागों में से एक भाग (0°30′) है। इसलिए किसी भी ज्योतिषीय ग्रंथ का अध्ययन करते समय यह अवश्य देखें कि "षष्ट्यांश" शब्द बल की इकाई के रूप में प्रयुक्त हुआ है या वर्ग कुण्डली (D-60) के संदर्भ में।

केन्द्रादि बल (Kendrādi Bala) – पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

Vedic Astro Care
केन्द्रादि बल (Kendrādi Bala) – पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
केन्द्रादि बल षड्बल (Shadbala) का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह स्थान बल (Sthāna Bala) के अंतर्गत आता है। इस बल से यह ज्ञात किया जाता है कि कोई ग्रह जन्मकुण्डली में केन्द्र, पाणफर अथवा अपोक्लिम भाव में स्थित होने के कारण कितना बल प्राप्त कर रहा है।
केन्द्रादि बल क्या है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मकुण्डली के सभी 12 भाव समान शक्ति वाले नहीं होते।
केन्द्र (1, 4, 7, 10) – सर्वाधिक शक्तिशाली
पाणफर (2, 5, 8, 11) – मध्यम शक्ति
अपोक्लिम (3, 6, 9, 12) – अपेक्षाकृत कम शक्ति
ग्रह जिस प्रकार के भाव में स्थित होता है, उसी के अनुसार उसे केन्द्रादि बल प्राप्त होता है।
तीन प्रकार के भाव
1. केन्द्र भाव (Kendra)
प्रथम
चतुर्थ
सप्तम
दशम
इन भावों को विष्णु स्थान भी कहा गया है।
फल
ग्रह अत्यन्त प्रभावशाली होता है।
अपने कारकत्व को पूर्ण शक्ति से व्यक्त करता है।
जीवन में सक्रियता, स्थिरता एवं सफलता देता है।
केन्द्र में ग्रह का बल = 60 षष्ट्यांश (Virupa)
2. पाणफर भाव (Panaphara)
द्वितीय
पंचम
अष्टम
एकादश
ये केन्द्र के बाद आने वाले भाव हैं।
फल
ग्रह मध्यम शक्ति से कार्य करता है।
फल देता है, परन्तु पूर्ण सामर्थ्य से नहीं।
पाणफर में ग्रह का बल = 30 षष्ट्यांश
3. अपोक्लिम भाव (Apoklima)
तृतीय
षष्ठ
नवम
द्वादश
ये केन्द्र से दूर स्थित भाव हैं।
फल
ग्रह की बाहरी अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत कम होती है।
फल मिलने में विलम्ब, प्रयास या अप्रत्यक्ष परिणाम मिल सकते हैं।
अपोक्लिम में ग्रह का बल = 15 षष्ट्यांश
केन्द्रादि बल की सारणी
भाव
वर्ग
बल
1
केन्द्र
60
4
केन्द्र
60
7
केन्द्र
60
10
केन्द्र
60
2
पाणफर
30
5
पाणफर
30
8
पाणफर
30
11
पाणफर
30
3
अपोक्लिम
15
6
अपोक्लिम
15
9
अपोक्लिम
15
12
अपोक्लिम
15
उदाहरण 1
यदि बृहस्पति दशम भाव में स्थित है—
दशम = केन्द्र
केन्द्रादि बल = 60
अर्थात बृहस्पति अत्यन्त शक्तिशाली माना जाएगा।
उदाहरण 2
यदि शुक्र पंचम भाव में स्थित है—
पंचम = पाणफर
केन्द्रादि बल = 30
शुक्र मध्यम शक्ति से फल देगा।
उदाहरण 3
यदि मंगल नवम भाव में स्थित है—
नवम = अपोक्लिम
केन्द्रादि बल = 15
मंगल अपेक्षाकृत कम केन्द्रादि बल प्राप्त करेगा।
केन्द्रादि बल का फलादेश में महत्व
ग्रह की कार्यक्षमता का आकलन करता है।
ग्रह अपने शुभ या अशुभ फल कितनी दृढ़ता से देगा, इसका संकेत मिलता है।
उच्च, स्वगृही या मित्र राशि में स्थित ग्रह यदि केन्द्र में हो, तो उसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
यदि ग्रह नीच राशि में हो, पर केन्द्र में स्थित हो, तो उसकी प्रभावशीलता कुछ सीमा तक बनी रहती है।
दशा और गोचर के फल की तीव्रता समझने में यह बल सहायक होता है।
अन्य बलों के साथ संयुक्त विचार
केवल केन्द्रादि बल देखकर किसी ग्रह का अंतिम निर्णय नहीं किया जाता। इसके साथ निम्न बलों का भी विचार आवश्यक है—
उच्च बल (Uccha Bala)
सप्तवर्गज बल (Saptavargaja Bala)
ओजयुग्म राशि बल (Ojayugma Bala)
द्रेष्काण बल (Drekkana Bala)
दिग्बल (Dig Bala)
काल बल (Kala Bala)
चेष्टा बल (Cheshta Bala)
नैसर्गिक बल (Naisargika Bala)
दृक् बल (Drik Bala)
निष्कर्ष
केन्द्रादि बल ग्रह की भावगत स्थिति पर आधारित एक स्थिर बल है। केन्द्र में स्थित ग्रह 60 षष्ट्यांश, पाणफर में 30 षष्ट्यांश तथा अपोक्लिम में 15 षष्ट्यांश का बल प्राप्त करता है। यह बल बताता है कि ग्रह अपनी ऊर्जा और कारकत्व को जीवन में कितनी प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करेगा। किसी भी ग्रह की वास्तविक शक्ति का निर्णय करते समय इसे अन्य सभी षड्बलों और ग्रह की राशि, दृष्टि, युति तथा वर्ग कुण्डलियों के साथ मिलाकर देखना चाहिए।

रविवार, 2 अगस्त 2026

त्रिस्कन्ध ज्योतिष क्या है? (पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण)

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त्रिस्कन्ध ज्योतिष क्या है? (पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण)
त्रिस्कन्ध ज्योतिष (Triskandha Jyotiṣa) वैदिक ज्योतिष का वह पारंपरिक वर्गीकरण है जिसमें सम्पूर्ण ज्योतिषशास्त्र को तीन मुख्य स्कन्धों (भागों) में विभाजित किया गया है। ये तीन स्कन्ध हैं—
सिद्धान्त (गणित)
संहिता
होरा
इन्हीं तीनों के कारण इसे त्रिस्कन्ध ज्योतिष कहा जाता है।
प्राचीन आचार्यों ने स्पष्ट कहा है कि इन तीनों का सम्यक् ज्ञान रखने वाला विद्वान ही पूर्ण अर्थ में ज्योतिषाचार्य कहलाने का अधिकारी होता है।
शास्त्रीय प्रमाण
बृहत्संहिता के प्रारम्भ में आचार्य वराहमिहिर ने ज्योतिष को तीन भागों में विभाजित किया है—
ज्योतिःशास्त्रमनेकभेदविषयं स्कन्धत्रयाधिष्ठितम्।
अर्थात्—
ज्योतिषशास्त्र अनेक विषयों वाला है और तीन स्कन्धों पर आधारित है।
1. सिद्धान्त स्कन्ध (गणित ज्योतिष)
इसे गणित ज्योतिष भी कहा जाता है।
यह सम्पूर्ण ज्योतिष का आधार है। यदि ग्रहों की सही स्थिति ही ज्ञात न हो तो आगे का फलादेश भी शुद्ध नहीं होगा।
इसमें क्या पढ़ाया जाता है?
ग्रहों की गति
सूर्य एवं चन्द्र की स्थिति
ग्रहों के देशान्तर (Longitude)
नक्षत्र
तिथि
योग
करण
ग्रहण
अयनांश
सूर्योदय एवं सूर्यास्त
चन्द्र उदय-अस्त
पंचांग निर्माण
ग्रहों का वक्री एवं मार्गी होना
ग्रहों की युति
ग्रहों का उदय-अस्त
ग्रहों की गति का गणित
प्रमुख ग्रन्थ
सूर्य सिद्धान्त
आर्यभटीय
सिद्धान्त शिरोमणि
उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति का जन्म—
15 अगस्त
सुबह 8:25
दिल्ली
अब उस समय
सूर्य कहाँ था?
चन्द्र किस राशि में था?
लग्न क्या था?
राहु कहाँ था?
इन सबकी गणना सिद्धान्त स्कन्ध करता है।
2. संहिता स्कन्ध
यह विश्व, राष्ट्र और समाज से सम्बन्धित घटनाओं का अध्ययन करता है।
इसे आधुनिक भाषा में मण्डेन ज्योतिष (Mundane Astrology) कहा जा सकता है।
इसमें क्या देखा जाता है?
वर्षा होगी या नहीं
अकाल
भूकम्प
महामारी
तूफान
युद्ध
राजा अथवा सरकार
राष्ट्र की उन्नति
कृषि
व्यापार
धूमकेतु
उल्का
वास्तु
शकुन-अपशकुन
प्रमुख ग्रन्थ
बृहत्संहिता
मयमतम्
उदाहरण
यदि किसी वर्ष सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, उस समय की वर्ष-प्रवेश कुण्डली बनाकर देखा जाता है—
वर्षा कैसी होगी?
कृषि कैसी होगी?
देश की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी?
महामारी की सम्भावना है या नहीं?
यह सब संहिता स्कन्ध का विषय है।
3. होरा स्कन्ध
यह सबसे अधिक प्रचलित शाखा है।
यह व्यक्ति विशेष के जीवन का फलादेश करती है।
इसमें क्या देखा जाता है?
जन्मकुण्डली
विवाह
नौकरी
व्यवसाय
संतान
शिक्षा
स्वास्थ्य
आयु
विदेश योग
राजयोग
धनयोग
दशा
गोचर
प्रश्न कुण्डली
मुहूर्त
प्रमुख ग्रन्थ
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र
बृहत्जातक
फलदीपिका
जातक पारिजात
उदाहरण
किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में—
लग्न सिंह है।
दशम भाव में मंगल है।
नवम भाव में गुरु है।
अब प्रश्न है—
नौकरी मिलेगी या व्यवसाय?
विवाह कब होगा?
संतान कब होगी?
धन कितना होगा?
इन सबका उत्तर होरा स्कन्ध देता है।
तीनों स्कन्धों का परस्पर सम्बन्ध
मान लीजिए किसी बालक का जन्म हुआ।
प्रथम चरण – सिद्धान्त
जन्म समय से ग्रहों की गणना होगी।
लग्न निकलेगा।
नवांश बनेगा।
ग्रहों की डिग्रियाँ ज्ञात होंगी।
द्वितीय चरण – होरा
उसी कुण्डली से बताया जाएगा—
शिक्षा
विवाह
व्यवसाय
स्वास्थ्य
आयु
दशा
गोचर
तृतीय चरण – संहिता
अब यदि उसी वर्ष पूरे देश की स्थिति देखनी हो—
वर्षा
कृषि
महामारी
अर्थव्यवस्था
शासन
तो संहिता का प्रयोग होगा।
एक सरल उदाहरण
मान लीजिए 1 जनवरी 2027 को सुबह 10 बजे एक बालक का जन्म हुआ।
सिद्धान्त कहेगा:
लग्न क्या है?
ग्रह किस राशि में हैं?
ग्रहों की डिग्री क्या है?
होरा कहेगा:
बालक का स्वभाव कैसा होगा?
शिक्षा कैसी होगी?
विवाह कब होगा?
धन और व्यवसाय कैसे रहेंगे?
संहिता कहेगी:
उस वर्ष देश में वर्षा कैसी होगी?
कृषि और अर्थव्यवस्था का क्या प्रभाव रहेगा?
प्राकृतिक घटनाओं का क्या संकेत है?
तीनों स्कन्धों का तुलनात्मक सार
स्कन्ध
मुख्य विषय
उपयोग
सिद्धान्त
गणित एवं खगोल
ग्रहों की सही स्थिति, पंचांग, ग्रह-गणना
संहिता
राष्ट्र, समाज, प्रकृति
वर्षा, युद्ध, राजनीति, कृषि, वास्तु, शकुन
होरा
व्यक्ति विशेष
जन्मकुण्डली, दशा, गोचर, विवाह, व्यवसाय, स्वास्थ्य
क्या केवल होरा जानना पर्याप्त है?
नहीं। यदि किसी ज्योतिषी को केवल होरा का ज्ञान हो, परन्तु ग्रहों की गणना (सिद्धान्त) का ज्ञान न हो, तो वह गणना की शुद्धता पर निर्भर रहेगा। इसी प्रकार, यदि संहिता का ज्ञान न हो, तो वह सामाजिक, राष्ट्रीय और प्राकृतिक घटनाओं का सम्यक् विश्लेषण नहीं कर सकेगा। इसलिए प्राचीन परम्परा में तीनों स्कन्धों का अध्ययन आवश्यक माना गया है।
निष्कर्ष
त्रिस्कन्ध ज्योतिष वैदिक ज्योतिष की मूल संरचना है। सिद्धान्त ग्रहों की शुद्ध गणना का विज्ञान है, संहिता राष्ट्र, समाज और प्रकृति से सम्बन्धित घटनाओं का विवेचन करती है, तथा होरा व्यक्ति के जीवन का फलादेश करती है। ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सिद्धान्त के बिना होरा की नींव कमजोर होती है, और संहिता के बिना ज्योतिष का व्यापक सामाजिक एवं वैश्विक पक्ष अधूरा रह जाता है। अतः जो विद्वान इन तीनों स्कन्धों का समन्वित अध्ययन करता है, वही शास्त्रीय परम्परा के अनुसार पूर्ण ज्योतिषविद् माना जाता है।

ओज-युग्म राशि बल (Ojayugma Rāśi Bala) – पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

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ओज-युग्म राशि बल (Ojayugma Rāśi Bala) – पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
ओज-युग्म राशि बल षड्बल (षड्बल) का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह स्थान बल (Sthāna Bala) के अंतर्गत आने वाले पाँच उपबलों में से एक है।
स्थान बल के पाँच अंग हैं—
उच्च बल (Uccha Bala)
सप्तवर्गज बल (Saptavargaja Bala)
ओज-युग्म राशि बल (Ojayugma Rāśi Bala)
केन्द्रादि बल (Kendrādi Bala)
द्रेष्काण बल (Drekkana Bala)
ओज-युग्म राशि बल क्या है?
'ओज' का अर्थ है विषम (Odd) तथा 'युग्म' का अर्थ है सम (Even)।
यह बल इस सिद्धांत पर आधारित है कि—
पुरुष ग्रह विषम राशियों में अधिक सहज और शक्तिशाली माने जाते हैं।
स्त्री ग्रह सम राशियों में अधिक अनुकूल और बलवान माने जाते हैं।
अर्थात ग्रह यदि अपनी प्रकृति के अनुरूप राशि में स्थित हो तो उसे ओज-युग्म राशि बल प्राप्त होता है।
शास्त्रीय आधार
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में स्थान बल के अंतर्गत इसका वर्णन मिलता है।
पराशर सिद्धान्त के अनुसार ग्रह की प्रकृति तथा राशि की प्रकृति में सामंजस्य होने पर ग्रह को अतिरिक्त बल प्राप्त होता है।
विषम (ओज) राशियाँ
विषम राशियाँ 6 होती हैं—
मेष
मिथुन
सिंह
तुला
धनु
कुम्भ
इनका क्रम
1, 3, 5, 7, 9, 11
सम (युग्म) राशियाँ
सम राशियाँ भी 6 होती हैं—
वृषभ
कर्क
कन्या
वृश्चिक
मकर
मीन
इनका क्रम
2, 4, 6, 8, 10, 12
कौन से ग्रह किस राशि में बलवान?
पुरुष ग्रह
सूर्य
मंगल
गुरु
यदि ये ग्रह विषम राशि में हों तो बल प्राप्त करते हैं।
स्त्री ग्रह
चन्द्र
शुक्र
यदि ये सम राशि में हों तो बल प्राप्त करते हैं।
बुध
बुध नपुंसक ग्रह माना गया है। अधिकांश आधुनिक ज्योतिषीय गणनाओं (जैसे जगन्नाथ होरा आदि) में बुध को सम तथा विषम दोनों प्रकार की राशियों में यह बल प्राप्त माना जाता है, इसलिए उसे इस उपबल में पूर्ण अंक मिलते हैं।
शनि
शनि नपुंसक ग्रह है। परंपराओं में मतभेद मिलता है, किंतु प्रचलित पाराशरी गणना (जैसे जगन्नाथ होरा) में शनि को विषम राशि में ओज-युग्म राशि बल दिया जाता है।
नवांश का भी महत्व
ओज-युग्म राशि बल केवल जन्म राशि (राशि कुण्डली) से नहीं देखा जाता।
बल की गणना में—
राशि (D1)
नवांश (D9)
दोनों का विचार किया जाता है।
यदि ग्रह दोनों में अनुकूल स्थिति में हो तो पूर्ण बल प्राप्त करता है।
कितने षष्ट्यांश मिलते हैं?
अधिकतम बल
30 षष्ट्यांश
प्राप्त होता है।
सामान्यतः—
राशि में अनुकूल स्थिति → 15 षष्ट्यांश
नवांश में अनुकूल स्थिति → 15 षष्ट्यांश
दोनों मिलाकर
30 षष्ट्यांश
उदाहरण 1
सूर्य सिंह राशि में है।
सिंह विषम राशि है।
सूर्य पुरुष ग्रह है।
अतः
राशि से 15 षष्ट्यांश।
यदि नवांश भी विषम हो—
कुल
30 षष्ट्यांश।
उदाहरण 2
शुक्र कन्या राशि में है।
कन्या सम राशि है।
शुक्र स्त्री ग्रह है।
राशि से 15 षष्ट्यांश।
यदि नवांश भी सम हो
30 षष्ट्यांश।
उदाहरण 3
चन्द्र मेष राशि में है।
मेष विषम राशि है।
चन्द्र स्त्री ग्रह है।
राशि से
0
यदि नवांश भी विषम है
कुल
0
यदि नवांश सम है
15
उदाहरण 4
मंगल मकर राशि में है।
मकर सम राशि है।
मंगल पुरुष ग्रह है।
राशि से
0
यदि नवांश विषम हो
15
यदि नवांश भी सम हो
0
गणना सारणी
ग्रह
अनुकूल राशि
राशि से बल
नवांश से बल
अधिकतम
सूर्य
विषम
15
15
30
चन्द्र
सम
15
15
30
मंगल
विषम
15
15
30
बुध
दोनों
15
15
30
गुरु
विषम
15
15
30
शुक्र
सम
15
15
30
शनि*
विषम (प्रचलित गणना)
15
15
30
इसका फल क्या होता है?
यदि ग्रह को ओज-युग्म राशि बल प्राप्त हो—
ग्रह अपनी स्वाभाविक प्रकृति को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है।
ग्रह के शुभ फल देने की क्षमता बढ़ती है।
ग्रह की स्थिति अधिक स्थिर और स्वाभाविक मानी जाती है।
ग्रह संबंधित भावों के फल अपेक्षाकृत बेहतर देता है।
ग्रह की दशा एवं गोचर में उसके परिणाम अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
यदि बल न मिले—
ग्रह का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता, परंतु उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत कम सहज हो सकती है।
अन्य बल (उच्च बल, सप्तवर्गज बल, दृष्टि, युति, दिग्बल आदि) ग्रह की वास्तविक शक्ति को बढ़ा या घटा सकते हैं।
महत्वपूर्ण बातें
केवल ओज-युग्म राशि बल देखकर ग्रह को शक्तिशाली या निर्बल नहीं कहा जा सकता।
यह स्थान बल का केवल एक उपभाग है।
ग्रह की वास्तविक शक्ति का निर्णय संपूर्ण षड्बल, उच्च-नीच स्थिति, स्वगृह, मित्र-शत्रु राशि, दृष्टि, युति, वक्रीत्व, अस्त, वर्गबल आदि सभी कारकों को साथ लेकर किया जाता है।
व्यावहारिक ज्योतिष में इस बल का उपयोग ग्रह की सूक्ष्म शक्ति के आकलन में किया जाता है, न कि अकेले फलादेश के आधार के रूप में।

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  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer