ग्रहों की बाल्यादि अवस्थाएँ — पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
वैदिक ज्योतिष में ग्रह की राशि में स्थित अंशात्मक स्थिति से उसकी कार्यक्षमता और फल देने की परिपक्वता जानने की एक महत्वपूर्ण पद्धति है—बालादि अवस्था। महर्षि पराशर ने इसे ग्रहों की पाँच अवस्थाओं के रूप में बताया है। बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय 45 में इसका वर्णन मिलता है। �
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१. पाँच बाल्यादि अवस्थाएँ
क्रमशः पाँच अवस्थाएँ हैं—
बाल अवस्था (Bāla)
कुमार अवस्था (Kumāra)
युवा अवस्था (Yuva)
वृद्ध अवस्था (Vṛddha)
मृत अवस्था (Mṛta)
शास्त्रीय कथन का सार है—
बाल-कुमार-युव-वृद्ध-मृताः अवस्थाः
अर्थात् ग्रह बालक, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत—इन पाँच अवस्थाओं में स्थित माना जाता है। �
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२. अंशों के अनुसार अवस्था निर्धारण
राशि को 30° माना जाता है और उसे पाँच समान भागों में बाँटा जाता है।
प्रत्येक अवस्था = 6°
लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण नियम है—
विषम राशियों में क्रम सीधा
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ
इनमें क्रम होगा:
बाल → कुमार → युवा → वृद्ध → मृत
ग्रह का अंश
अवस्था
0°–6°
बाल
6°–12°
कुमार
12°–18°
युवा
18°–24°
वृद्ध
24°–30°
मृत
सम राशियों में क्रम उल्टा
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
इनमें क्रम उलट जाता है:
मृत → वृद्ध → युवा → कुमार → बाल
ग्रह का अंश
अवस्था
0°–6°
मृत
6°–12°
वृद्ध
12°–18°
युवा
18°–24°
कुमार
24°–30°
बाल
यह मूल नियम पराशरी परंपरा में स्पष्ट रूप से दिया गया है। �
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३. इसे याद रखने की सरल विधि
विषम राशि
0 — 6 — 12 — 18 — 24 — 30
बाल | कुमार | युवा | वृद्ध | मृत
सम राशि
0 — 6 — 12 — 18 — 24 — 30
मृत | वृद्ध | युवा | कुमार | बाल
अर्थात् मध्य के 12°–18° हमेशा युवा रहेंगे, जबकि दोनों सिरों पर अवस्थाएँ उलट जाती हैं।
४. बाल्यादि अवस्था का शास्त्रीय फल
महर्षि पराशर ने इन पाँच अवस्थाओं में ग्रह द्वारा दिए जाने वाले फल की मात्रा भी बताई है।
अवस्था
फल देने की क्षमता
बाल
¼
कुमार
½
युवा
पूर्ण
वृद्ध
नगण्य
मृत
शून्य
अर्थात् पराशरी नियम के अनुसार—
बाल = 25%
कुमार = 50%
युवा = 100%
वृद्ध = अत्यल्प/नगण्य
मृत = फलहीन
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: इसे ग्रह के सम्पूर्ण अस्तित्व के नष्ट होने के अर्थ में नहीं लेना चाहिए। यह मुख्यतः उस ग्रह के फल को प्रकट करने की क्षमता का आकलन है। स्वयं पराशर ने परिणामों को क्रमशः एक-चतुर्थांश, आधा, पूर्ण, नगण्य और शून्य बताया है। �
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५. प्रत्येक अवस्था का ज्योतिषीय अर्थ
① बाल अवस्था
ग्रह बालक के समान माना जाता है।
फल: ¼
ग्रह के पास क्षमता तो है, लेकिन उसका फल पूरी परिपक्वता से प्रकट नहीं होता।
उदाहरण के लिए यदि पंचमेश बाल अवस्था में हो तो—
शिक्षा में आरंभिक प्रयास अधिक हो सकते हैं।
बुद्धि या सृजनात्मकता का विकास क्रमशः हो सकता है।
संतान संबंधी विषयों में परिपक्वता देर से आ सकती है।
लेकिन केवल बाल अवस्था देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। ग्रह की राशि, भाव, स्वामित्व, दृष्टि, युति, नवांश और दशा भी देखनी होगी।
② कुमार अवस्था
ग्रह बाल्यावस्था से आगे बढ़ चुका है।
फल: ½
यह ग्रह के फल देने की मध्यम क्षमता दर्शाती है।
ग्रह अपनी कारकत्व शक्ति को बाल अवस्था से अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकता है, लेकिन अभी पूर्ण परिपक्वता नहीं होती।
③ युवा अवस्था
यह पाँचों में सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है।
फल: पूर्ण
12°–18° के मध्य ग्रह युवा अवस्था में आता है—चाहे राशि विषम हो या सम।
अर्थात् युवा अवस्था का क्षेत्र दोनों प्रकार की राशियों में 12° से 18° ही है।
यह ग्रह की फल-प्रद क्षमता की दृष्टि से सर्वोत्तम बालादि अवस्था मानी जाती है। �
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उदाहरण:
गुरु 15° सिंह
सिंह विषम राशि है और 15° युवा क्षेत्र में है।
अतः—
गुरु = युवा अवस्था
और गुरु अपने कारकत्व एवं भावाधिपत्य के फल को पूर्ण क्षमता से व्यक्त करने की स्थिति में माना जाएगा।
④ वृद्ध अवस्था
ग्रह वृद्धावस्था में पहुँच चुका है।
फल: नगण्य
ग्रह के फल में कमजोरी, मंदता, विलम्ब या कम अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
परंतु वृद्ध = खराब ग्रह ऐसा सीधा नियम नहीं है।
यदि वही ग्रह उच्च, स्वक्षेत्री, मूलत्रिकोण, शुभ भावस्थ, शुभ दृष्ट या वर्गों में बलवान है तो अन्य बल उसके परिणाम को काफी सुधार सकते हैं।
⑤ मृत अवस्था
यह बाल्यादि अवस्थाओं में सबसे कमजोर अवस्था है।
फल: शून्य
पराशरी सूत्र में मृत अवस्था के फल को nil अर्थात् शून्य बताया गया है। �
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लेकिन व्यवहारिक कुंडली-विचार में इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि ग्रह हर परिस्थिति में बिल्कुल कोई फल नहीं देगा।
बल्कि इसे ग्रह की फल-अभिव्यक्ति की अत्यंत न्यून क्षमता के रूप में अन्य योगों और बलों के साथ देखना अधिक उचित है।
६. उदाहरणों से समझिए
उदाहरण 1 — मंगल 4° मेष
मेष = विषम राशि
4° = 0°–6°
अतः:
मंगल = बाल अवस्था
फल क्षमता ≈ ¼
उदाहरण 2 — गुरु 9° सिंह
सिंह = विषम राशि
9° = 6°–12°
अतः:
गुरु = कुमार अवस्था
फल क्षमता ≈ ½
उदाहरण 3 — शुक्र 15° तुला
तुला = विषम राशि
15° = 12°–18°
अतः:
शुक्र = युवा अवस्था
फल क्षमता = पूर्ण
यहाँ ध्यान दें कि शुक्र तुला में स्वक्षेत्री भी है। इसलिए युवा अवस्था के साथ स्वक्षेत्री स्थिति भी ग्रह को मजबूत करती है।
उदाहरण 4 — शनि 21° धनु
धनु = विषम राशि
21° = 18°–24°
अतः:
शनि = वृद्ध अवस्था
उदाहरण 5 — बुध 27° मकर
मकर = सम राशि।
सम राशि में क्रम उल्टा है:
24°–30° = बाल
अतः:
बुध = बाल अवस्था
यही कारण है कि केवल "27° ग्रह बहुत आगे है इसलिए वृद्ध होगा" ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
उदाहरण 6 — गुरु 3° वृषभ
वृषभ = सम राशि।
सम राशि में 0°–6° = मृत
अतः:
गुरु = मृत अवस्था
७. एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम
बाल्यादि अवस्था ग्रह के अंश से निर्धारित होती है, न कि ग्रह के भाव से।
अर्थात् यदि गुरु—
लग्न में 15° हो,
पंचम भाव में 15° हो,
दशम भाव में 15° हो,
तो राशि के विषम/सम होने के अनुसार उसकी बालादि अवस्था निर्धारित होगी।
भाव अवस्था बदलने का आधार नहीं है।
८. राशि विषम या सम कैसे पहचानें?
विषम राशियाँ
मेष
मिथुन
सिंह
तुला
धनु
कुम्भ
इनमें:
बाल → कुमार → युवा → वृद्ध → मृत
सम राशियाँ
वृषभ
कर्क
कन्या
वृश्चिक
मकर
मीन
इनमें:
मृत → वृद्ध → युवा → कुमार → बाल
९. बाल्यादि अवस्था और ग्रह का वास्तविक बल
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण ज्योतिषीय अंतर समझना आवश्यक है।
बाल्यादि अवस्था = षड्बल नहीं है।
इसे सीधे षड्बल का कोई अंग नहीं मानना चाहिए।
उदाहरण के लिए—
गुरु उच्च राशि में हो लेकिन बालादि अवस्था में मृत हो, तो दो अलग बातें होंगी:
उच्च राशि से गुरु को उच्चत्व/स्थानगत बल प्राप्त है।
बालादि अवस्था से उसकी फल-अभिव्यक्ति की अवस्था कमजोर मानी जाएगी।
इसलिए कुंडली में किसी एक अवस्था को देखकर अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
१०. बाल्यादि अवस्था बनाम जाग्रतादि अवस्था
पराशर ने ग्रहों की एक दूसरी अवस्था भी बताई है—जाग्रतादि अवस्था।
इसमें तीन अवस्थाएँ हैं:
जाग्रत
स्वप्न
सुषुप्ति
नियम:
उच्च या स्वक्षेत्र → जाग्रत
मित्र या सम राशि → स्वप्न
शत्रु या नीच राशि → सुषुप्ति
पराशरी वर्णन में जाग्रत ग्रह से पूर्ण, स्वप्न से मध्यम और सुषुप्ति से न्यून/निष्फल परिणाम का सिद्धांत दिया गया है।
आपके क्रम के अनुसार ग्रहावस्थाओं में २. जाग्रतादि अवस्था और ३. दीप्तादि अवस्था का शास्त्रीय आधार मुख्यतः बृहत्पाराशर होराशास्त्र, ग्रहावस्थाध्याय, अध्याय ४५ में मिलता है। मूल श्लोकों के आधार पर दोनों को अलग-अलग समझना आवश्यक है, क्योंकि दोनों की गणना-पद्धति और फल-विचार अलग हैं। �
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२. जाग्रतादि अवस्था — त्रिविध अवस्था
जाग्रतादि अवस्था ग्रह की फल देने की सक्रियता अथवा निष्क्रियता को बताती है। इसके तीन भेद हैं—
जाग्रत अवस्था
स्वप्न अवस्था
सुषुप्त अवस्था
बृहत्पाराशर होराशास्त्र में इसका मूल आधार ग्रह की राशिगत स्थिति और राशिस्वामी से संबंध है। �
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मूल श्लोक
स्वभोच्चयोः समसुहृद्भयोः शत्रुभनीचयोः ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या अवस्था नामदृक्फलाः ॥५॥
अर्थात्—
स्वराशि अथवा उच्च राशि में ग्रह → जाग्रत
सम अथवा मित्र राशि में ग्रह → स्वप्न
शत्रु अथवा नीच राशि में ग्रह → सुषुप्त
इसके फल का अगला श्लोक अत्यन्त स्पष्ट है—
जागरे च फलं पूर्णं स्वप्ने मध्यफलं तथा ।
सुषुप्तौ तु फलं शून्यं विज्ञेयं द्विजसत्तम ॥६॥ �
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फल का सिद्धान्त
अवस्था
ग्रह की कार्यक्षमता
फल
जाग्रत
अत्यन्त सक्रिय
पूर्ण फल
स्वप्न
मध्यम सक्रिय
मध्यम फल
सुषुप्त
निष्क्रिय/अप्रकट
शून्य अथवा अत्यल्प फल
यहाँ “शून्य फल” का अर्थ यह नहीं कि ग्रह जन्मकुण्डली में बिल्कुल कोई फल नहीं देगा। इसका तात्पर्य यह है कि उस ग्रह के जिस फल का विचार किया जा रहा है, उसे प्रकट करने की उसकी क्षमता अत्यन्त क्षीण है। अन्य बलों और योगों से परिणाम बदल सकता है।
२.१ जाग्रत अवस्था
जब ग्रह—
अपनी स्वराशि में हो, अथवा
अपनी उच्च राशि में हो,
तो वह जाग्रत माना जाता है। �
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फल
ग्रह जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, उससे संबंधित फल को प्रकट करने की क्षमता बढ़ जाती है।
उदाहरण के लिए—
गुरु उच्च होकर जाग्रत हो और पंचम भाव से संबंधित हो तो—
शिक्षा
ज्ञान
संतान
मंत्रविद्या
बुद्धि
पूर्वपुण्य
से संबंधित फल को प्रकट करने की शक्ति अत्यधिक बढ़ सकती है।
लेकिन केवल जाग्रत देखकर अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए। गुरु शुभ है या अशुभ फलदाता, यह उसकी भावेशता, भावस्थिति, दृष्टि, युति, षड्बल और अन्य योगों से निर्धारित होगा।
२.२ स्वप्न अवस्था
जब ग्रह—
मित्र राशि, अथवा
सम राशि
में स्थित हो, तो स्वप्न अवस्था मानी जाती है। �
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ग्रह पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता, लेकिन उसकी फलप्रद क्षमता जाग्रत ग्रह से कम होती है।
इसलिए—
जाग्रत = फल का पूर्ण प्राकट्य
स्वप्न = फल का आंशिक/मध्यम प्राकट्य
मानना चाहिए।
उदाहरण—
यदि दशमेश मित्र राशि में हो तो कर्मक्षेत्र संबंधी योग मौजूद होने पर फल मिल सकता है, लेकिन उसी ग्रह के स्वराशि/उच्च स्थिति वाले जाग्रत होने की तुलना में फल की शक्ति कम हो सकती है।
२.३ सुषुप्त अवस्था
जब ग्रह—
शत्रु राशि, अथवा
नीच राशि
में हो, तो सुषुप्त अवस्था कही जाती है। �
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यह ग्रह की फलप्रद क्षमता का सबसे कमजोर स्तर है।
उदाहरण—
यदि पंचमेश नीच राशि में हो और अन्य किसी प्रकार से बलवान न हो, तो शिक्षा, बुद्धि, संतान आदि पंचमभावीय विषयों में ग्रह के स्वाभाविक फल के प्राकट्य में बाधा आ सकती है।
परन्तु यहाँ भी केवल सुषुप्त अवस्था देखकर संतान या शिक्षा का निषेध नहीं करना चाहिए। नीचभंग, शुभदृष्टि, वर्गबल, षड्बल, योगकारकत्व आदि परिणाम को बदल सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी
कई आधुनिक ज्योतिष-पद्धतियों में जाग्रतादि अवस्था को राशि के १०-१० अंशों के तीन भागों से निर्धारित किया जाता है—
विषम राशि में ०–१०° जाग्रत, १०–२०° स्वप्न, २०–३०° सुषुप्त
सम राशि में इसका क्रम उल्टा।
ऐसी पद्धति प्रचलित है। �
Sanskrit Bhasi
लेकिन बृहत्पाराशर होराशास्त्र के अध्याय ४५ के उपर्युक्त श्लोक ५–६ में जाग्रतादि अवस्था का प्रत्यक्ष आधार उच्च/स्व, मित्र/सम, शत्रु/नीच राशि दिया गया है; वहाँ १०-१० अंश का विभाजन नहीं बताया गया। �
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इसलिए यदि आपका उद्देश्य “पूर्ण शास्त्रीय पाराशरी विश्लेषण” है, तो दोनों प्रणालियों को मिलाकर नहीं देखना चाहिए। किस ग्रन्थ की पद्धति अपनाई जा रही है, यह पहले निश्चित करना चाहिए।
३. दीप्तादि अवस्था — नवधा अवस्था
अब आती है दीप्तादि अवस्था, जो जाग्रतादि से अधिक विस्तृत है।
इसके नौ भेद हैं—
दीप्त
स्वस्थ
प्रमुदित
शान्त
दीन
दुःखित
विकल
खल
कोपी
बृहत्पाराशर होराशास्त्र का मूल श्लोक है—
दीप्तः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तो दीनोऽथ दुःखितः ।
विकलश्च खलः कोऽपीत्यवस्था नवधाऽपराः ॥७॥ �
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यह अवस्था मुख्यतः ग्रह की राशिगत गरिमा, मैत्री तथा पीड़ित अवस्था को दर्शाती है।
३.१ दीप्त अवस्था
स्वोच्चस्थः खेचरो दीप्तः
जो ग्रह उच्च राशि में स्थित हो, वह दीप्त कहलाता है। �
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दीप्त = प्रकाशमान, अत्यन्त समर्थ।
उच्च ग्रह अपनी स्वाभाविक शक्ति को बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है।
उदाहरण—
सूर्य — मेष
चन्द्र — वृषभ
मंगल — मकर
बुध — कन्या
गुरु — कर्क
शुक्र — मीन
शनि — तुला
इन राशियों में संबंधित ग्रह दीप्त माना जाता है।
३.२ स्वस्थ अवस्था
स्वर्क्षे स्वस्थः
जो ग्रह अपनी स्वराशि में हो, वह स्वस्थ कहलाता है। �
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अर्थात् ग्रह अपने ही क्षेत्र में स्थित है।
उदाहरण—
सूर्य सिंह में
चन्द्र कर्क में
मंगल मेष/वृश्चिक में
बुध मिथुन/कन्या में
गुरु धनु/मीन में
शुक्र वृषभ/तुला में
शनि मकर/कुम्भ में
स्वस्थ ग्रह अपने कारकत्व और भावगत अधिकार को अपेक्षाकृत समर्थ रूप से व्यक्त करता है।
३.३ प्रमुदित अवस्था
अधिमित्रभे मुदितः
अर्थात् ग्रह अधिमित्र/अतिमित्र की राशि में स्थित हो तो प्रमुदित कहा जाता है। �
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यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है—
प्रमुदित और शान्त में अन्तर है।
अतिमित्र राशि → प्रमुदित
मित्र राशि → शान्त
अर्थात् ग्रह अपने अत्यन्त अनुकूल वातावरण में प्रसन्न होकर कार्य करता है।
३.४ शान्त अवस्था
मित्रभे शान्तः
मित्र ग्रह की राशि में स्थित ग्रह शान्त कहलाता है। �
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यह स्थिति शुभ है, लेकिन प्रमुदित अथवा स्वस्थ की तुलना में कम प्रभावी मानी जाती है।
३.५ दीन अवस्था
समभे दीन उच्यते
सम अर्थात् तटस्थ ग्रह की राशि में ग्रह स्थित हो तो दीन कहलाता है। �
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यहाँ “दीन” शब्द को देखकर ग्रह को पूर्णतः अशुभ नहीं मानना चाहिए।
इसका आशय है कि ग्रह को न तो विशेष सहयोग मिल रहा है और न विशेष विरोध।
३.६ दुःखित अवस्था
शत्रुभे दुःखितः प्रोक्तः
शत्रु ग्रह की राशि में स्थित ग्रह दुःखित कहलाता है। �
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यह ग्रह की अभिव्यक्ति में तनाव उत्पन्न करता है।
उदाहरणतः यदि कोई ग्रह अपने शत्रु की राशि में हो तो उसके कारकत्व को सहज रूप से व्यक्त करने में संघर्ष हो सकता है।
३.७ विकल अवस्था
विकलः पापसंयुतः
पापग्रह से संयुक्त ग्रह विकल कहा गया है। �
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यहाँ युति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
अर्थात् किसी ग्रह का केवल शत्रु राशि में होना दुःखित अवस्था का कारण है, जबकि पापग्रह के साथ युति विकल अवस्था का कारण बनती है।
उदाहरण—
बुध के साथ मंगल/शनि/राहु जैसी पापप्रवृत्त ग्रह-युति होने पर बुध की विकल अवस्था का विचार किया जा सकता है।
३.८ खल अवस्था
खलः खलगृहे ज्ञेयः
पापग्रह की राशि में स्थित ग्रह खल कहलाता है। �
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यहाँ “खल” का अर्थ ग्रह के चरित्र को “दुष्ट व्यक्ति” बना देना नहीं है। यह अशुभ/पापग्रह के क्षेत्र में ग्रह की स्थिति का तकनीकी नाम है।
३.९ कोपी अवस्था
कोपी स्यादर्कसंयुतः
सूर्य के साथ संयुक्त ग्रह कोपी कहलाता है। �
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यह विशेष रूप से सूर्य-संयोग से उत्पन्न पीड़ा/अस्त स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
इसलिए सूर्य के अत्यन्त निकट ग्रह के फल-विचार में अस्त/मौढ्य को भी स्वतंत्र रूप से देखना आवश्यक है।
दीप्तादि नौ अवस्थाओं का संक्षिप्त क्रम
क्रम
अवस्था
शास्त्रीय स्थिति
१
दीप्त
उच्च राशि
२
स्वस्थ
स्वराशि
३
प्रमुदित
अतिमित्र राशि
४
शान्त
मित्र राशि
५
दीन
सम राशि
६
दुःखित
शत्रु राशि
७
विकल
पापग्रह से युति
८
खल
पापग्रह की राशि
९
कोपी
सूर्य से युति
यह क्रम सीधे पाराशरी श्लोक ७–९ से प्राप्त होता है। �
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जाग्रतादि और दीप्तादि में मूल अन्तर
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
जाग्रतादि बताती है—
ग्रह अपने फल को कितनी सक्रियता से प्रकट कर सकता है।
जाग्रत → पूर्ण
स्वप्न → मध्यम
सुषुप्त → शून्य/अत्यल्प
दीप्तादि बताती है—
ग्रह किस प्रकार की राशिगत परिस्थिति और मानसिक/कार्यात्मक स्थिति में फल दे रहा है।
दीप्त → अत्यन्त समर्थ
स्वस्थ → स्वक्षेत्रस्थ
प्रमुदित → अत्यन्त अनुकूल
शान्त → अनुकूल
दीन → तटस्थ
दुःखित → प्रतिकूल
विकल → पापयुति से विचलित
खल → पापक्षेत्रस्थ
कोपी → सूर्यसंयुक्त
इसलिए दोनों को एक ही अवस्था का दोहराव नहीं समझना चाहिए।
एक ग्रह की दोनों अवस्थाएँ एक साथ कैसे हो सकती हैं?
यही इस विषय का अत्यन्त महत्वपूर्ण उन्नत सिद्धान्त है।
मान लीजिए मंगल मेष राशि में है।
मेष मंगल की स्वराशि है → जाग्रत
मेष मंगल की स्वराशि है → स्वस्थ
अर्थात् एक ही ग्रह के लिए—
जाग्रतादि = जाग्रत
दीप्तादि = स्वस्थ
दोनों अलग-अलग आयाम बता रहे हैं।
दूसरा उदाहरण—
मंगल मकर में:
मकर मंगल की उच्च राशि → जाग्रत
उच्च राशि → दीप्त
अतः—
जाग्रत + दीप्त
यह ग्रह अत्यन्त प्रभावशाली स्थिति में माना जाएगा, यद्यपि अंतिम फलादेश भावेशत्व और अन्य योगों पर निर्भर करेगा।
तीसरे उदाहरण से अंतर और स्पष्ट करें
मान लीजिए कोई ग्रह मित्र राशि में है और उसी ग्रह की पापग्रह से युति भी है।
तब—
जाग्रतादि → स्वप्न
दीप्तादि → शान्त + विकल
अर्थात् ग्रह को मित्र राशि का सहयोग प्राप्त है, लेकिन पापयुति से वह विक्षुब्ध भी है।
यही कारण है कि केवल एक अवस्था देखकर फलादेश करना शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा होगा।
फलादेश में प्रयोग की सही पद्धति
किसी ग्रह का फल निर्धारित करते समय क्रम इस प्रकार रखना अधिक उचित है—
१. ग्रह का स्वभाव
↓
२. भावेशत्व
↓
३. भावस्थिति
↓
४. राशि एवं राशिस्वामी
↓
५. उच्च/नीच/स्व/मित्र/शत्रु स्थिति
↓
६. जाग्रतादि अवस्था
↓
७. दीप्तादि अवस्था
↓
८. षड्बल
↓
९. दृष्टि एवं युति
↓
१०. वर्गबल/षोडशवर्ग
↓
११. योग
↓
१२. दशा-अन्तर्दशा
↓
१३. गोचर
इसका कारण स्वयं पाराशर आगे कहते हैं—
यादृशो जन्मकाले यः खेटो यद्भावगो भवेत् ।
तादृशं तस्य भावस्य फलमुह्यं द्विजोत्तम ॥१०॥
अर्थात् जन्मकाल में ग्रह जिस प्रकार की स्थिति में जिस भाव में स्थित है, उसी के अनुरूप उस भाव का फल विचारना चाहिए। �
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अत्यन्त महत्वपूर्ण निष्कर्ष
जाग्रतादि = ग्रह की फलप्रवर्तन क्षमता।
दीप्तादि = ग्रह की स्थिति/अनुकूलता एवं पीड़ा की अवस्था।
इसलिए—
जाग्रत ग्रह हमेशा शुभ हो, ऐसा नहीं।
उदाहरण के लिए कोई पापग्रह अपने उच्च स्थान में हो तो वह जाग्रत और दीप्त हो सकता है। इससे उसकी शक्ति बढ़ती है; लेकिन वह शक्ति जिस भाव का स्वामी है और जिस भाव में बैठा है, उसके अनुसार फल देगी।
इसी प्रकार—
सुषुप्त ग्रह का फल पूर्णतः समाप्त हो गया, ऐसा भी नहीं।
अन्य बल, शुभ दृष्टि, योग, भावेशत्व, वर्गस्थिति और दशा उसके फल को पुनः सक्रिय कर सकते हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—बृहत्पाराशर होराशास्त्र के इन श्लोकों में दीप्तादि नौ अवस्थाओं को कोई निश्चित “१००%, ८०%, ६०%...” फलांश नहीं दिया गया है। इसलिए ऐसी निश्चित प्रतिशत-सारणी को सीधे पाराशर का शास्त्रीय सिद्धान्त कहना उचित नहीं होगा। मूल श्लोक अवस्थाओं की संज्ञा और उनकी उत्पत्ति बताते हैं। �
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स्रोत-आधार: बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय ४५, श्लोक ५–१०। �
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यदि आप चाहें तो अगला भाग “४. बालादि अवस्था — ५” का इसी स्तर पर मूल संस्कृत श्लोक, गणना-विधि, विषम/सम राशि का नियम, फल, उदाहरण और जाग्रतादि + दीप्तादि + बालादि तीनों अवस्थाओं के संयुक्त फल सहित किया जा सकता है।