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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

D-3 क्यों कहा जाता है? षोडशवर्ग क्या है

Vedic Astro Care
D-3 क्यों कहा जाता है?
वैदिक ज्योतिष में D का अर्थ है Division (विभाजन) या Divisional Chart (वर्ग कुंडली) और 3 उस विभाजन की संख्या को दर्शाता है।
अर्थात् D-3 = तीसरी विभाजित (वर्ग) कुंडली।
D का अर्थ
D = Divisional Chart (वर्ग कुंडली)
राशि कुंडली (D-1) को विभिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग भागों में विभाजित किया जाता है। इन विभाजनों से बनने वाली कुंडलियों को Divisional Charts या वर्ग कुंडलियाँ कहा जाता है।
3 का अर्थ
3 = राशि का तीन भागों में विभाजन
प्रत्येक राशि 30° की होती है। जब इसे 3 बराबर भागों (10° + 10° + 10°) में बाँटा जाता है, तो जो वर्ग कुंडली बनती है उसे D-3 (द्रेष्काण / Drekkana) कहते हैं।
अन्य D चार्ट भी इसी सिद्धांत पर आधारित हैं
D संख्या
नाम
प्रत्येक राशि का विभाजन
मुख्य विषय
D-1
राशि
1 भाग
सम्पूर्ण जीवन
D-2
होरा
2 भाग
धन
D-3
द्रेष्काण
3 भाग
पराक्रम, भाई-बहन
D-4
चतुर्थांश
4 भाग
संपत्ति
D-7
सप्तमांश
7 भाग
संतान
D-9
नवांश
9 भाग
धर्म, विवाह
D-10
दशमांश
10 भाग
कर्म, व्यवसाय
D-12
द्वादशांश
12 भाग
माता-पिता
D-16
षोडशांश
16 भाग
वाहन, सुख
D-20
विंशांश
20 भाग
आध्यात्मिकता
D-24
चतुर्विंशांश
24 भाग
शिक्षा
D-27
सप्तविंशांश
27 भाग
शक्ति
D-30
त्रिंशांश
30 भाग
दोष, कष्ट
D-40
खवेदांश
40 भाग
शुभ-अशुभ संस्कार
D-45
अक्षवेदांश
45 भाग
चरित्र
D-60
षष्ट्यांश
60 भाग
पूर्वजन्म कर्म
सार
D = Divisional (वर्ग) Chart
संख्या = प्रत्येक राशि के विभाजनों की संख्या
D-3 = प्रत्येक 30° राशि को 3 भागों (10°-10°-10°) में बाँटकर बनने वाली वर्ग कुंडली, जिसे द्रेष्काण (Drekkana) कहा जाता है।
इसी प्रकार D-9 का अर्थ है 30° राशि को 9 भागों में विभाजित कर बनी नवांश कुंडली, D-10 का अर्थ है 10 भागों में विभाजित कर बनी दशमांश कुंडली, और इसी क्रम से अन्य सभी वर्ग कुंडलियाँ निर्मित होती हैं।

द्रेष्काण (Drekkana / D-3) क्या है? — पूर्ण विश्लेषण

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द्रेष्काण (Drekkana / D-3) क्या है? — पूर्ण विश्लेषण
द्रेष्काण (द्रेक्काण, Drekkana या D-3) वैदिक ज्योतिष के षोडशवर्ग (16 Vargas) में तीसरा महत्वपूर्ण वर्ग है। इसका मुख्य उद्देश्य पराक्रम, साहस, छोटे भाई-बहन, पुरुषार्थ, संघर्ष करने की क्षमता, सहयोगियों तथा जीवन में प्रयासों से मिलने वाली सफलता का सूक्ष्म अध्ययन करना है।
"द्रेष्काण" शब्द का अर्थ है राशि का तीसरा भाग।
एक राशि = 30°
30° ÷ 3 = 10°
अतः प्रत्येक राशि के तीन द्रेष्काण होते हैं और प्रत्येक द्रेष्काण 10° का होता है।
इस प्रकार सम्पूर्ण राशिचक्र में 36 द्रेष्काण होते हैं।
द्रेष्काण का विभाजन
प्रत्येक राशि को तीन भागों में बाँटा जाता है—
अंश
द्रेष्काण
स्वामी
0°–10°
प्रथम द्रेष्काण
उसी राशि का स्वामी
10°–20°
द्वितीय द्रेष्काण
राशि से पाँचवीं राशि का स्वामी
20°–30°
तृतीय द्रेष्काण
राशि से नौवीं राशि का स्वामी
उदाहरण
यदि ग्रह मेष राशि में है—
0°–10° → मेष द्रेष्काण (मंगल)
10°–20° → सिंह द्रेष्काण (सूर्य)
20°–30° → धनु द्रेष्काण (गुरु)
द्रेष्काण कुंडली (D-3) किन विषयों को दर्शाती है?
1. पराक्रम एवं साहस
व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में कितना साहसी रहेगा, जोखिम उठाने की क्षमता, आत्मबल और संघर्षशीलता।
2. छोटे भाई-बहन
छोटे भाई-बहनों का सुख-दुःख
उनके साथ संबंध
सहयोग या विरोध
उनकी उन्नति
3. पुरुषार्थ
भाग्य की अपेक्षा अपने प्रयासों से सफलता प्राप्त करने की क्षमता।
4. प्रतियोगिता
प्रतियोगी परीक्षाएँ, खेल, सेना, पुलिस, प्रशासन, व्यवसाय आदि में संघर्ष क्षमता।
5. सहयोगी एवं मित्र
जीवन में मिलने वाले सहयोगी, सहकर्मी एवं साथियों का व्यवहार।
6. शारीरिक बल
विशेष रूप से भुजाओं, कंधों, साहस तथा कार्यक्षमता का संकेत।
द्रेष्काण में मुख्य विचार
1. D-3 लग्न
मजबूत लग्न → साहसी, आत्मविश्वासी, सफल।
कमजोर लग्न → भय, अस्थिरता, संघर्ष में कमजोरी।
2. लग्नेश
D-3 का सबसे महत्वपूर्ण ग्रह।
यदि—
उच्च
स्वराशि
मूलत्रिकोण
केन्द्र/त्रिकोण
शुभ दृष्ट
तो व्यक्ति अत्यन्त पराक्रमी होता है।
यदि—
नीच
अस्त
पापदृष्ट
षष्ठ, अष्टम, द्वादश
तो साहस में कमी आती है।
3. तृतीय भाव
द्रेष्काण में तृतीय भाव अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है।
यह बताता है—
साहस
छोटे भाई
परिश्रम
संघर्ष
लेखन क्षमता
संचार कौशल
4. तृतीयेश
तृतीय भाव का स्वामी जितना बलवान होगा, व्यक्ति उतना ही कर्मशील होगा।
5. मंगल
द्रेष्काण का प्राकृतिक कारक ग्रह मंगल है।
मंगल यदि शुभ हो—
वीरता
नेतृत्व
आत्मविश्वास
सफलता
यदि पीड़ित हो—
झगड़े
दुर्घटना
भाई से विवाद
क्रोध
ग्रहों के द्रेष्काण फल
☀ सूर्य
नेतृत्व
सम्मान
प्रशासन
पिता से प्रेरणा
अधिकार
पीड़ित होने पर
अहंकार
भाई से मतभेद
🌙 चन्द्र
मानसिक साहस
संवेदनशीलता
परिवार का सहयोग
पीड़ित होने पर
भय
अस्थिर मन
♂ मंगल
सर्वोत्तम पराक्रम
सेना
पुलिस
खेल
इंजीनियरिंग
पीड़ित मंगल
झगड़ा
चोट
दुर्घटना
☿ बुध
लेखन
पत्रकारिता
भाषण
व्यापार
बुद्धिमानी
♃ गुरु
धर्म
नीति
न्याय
सलाहकार
आध्यात्मिक साहस
♀ शुक्र
कला
संगीत
सौंदर्य
सामाजिक प्रतिष्ठा
♄ शनि
धैर्य
कठिन परिश्रम
विलम्ब के बाद सफलता
पीड़ित
निराशा
भाई से दूरी
☊ राहु
असाधारण साहस
विदेशी क्षेत्र
तकनीकी कार्य
पीड़ित
जोखिम
विवाद
☋ केतु
आध्यात्मिक बल
वैराग्य
रहस्य
पीड़ित
अलगाव
भाई से दूरी
भाई-बहनों का विचार
D-3 में देखा जाता है—
तृतीय भाव
तृतीयेश
मंगल
एकादश भाव (बड़े भाई-बहन के लिए सहायक विचार)
यदि ये शुभ हों—
भाई सहयोगी होंगे।
संयुक्त परिवार में लाभ।
पारिवारिक सहयोग मिलेगा।
यदि पीड़ित हों—
दूरी
विवाद
अलगाव
भाई को कष्ट
सफलता के संकेत
यदि D-3 में—
लग्न बलवान
लग्नेश मजबूत
मंगल बलवान
तृतीयेश शुभ
केन्द्र-त्रिकोण मजबूत
तो व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से सफलता प्राप्त करता है।
किन व्यवसायों में विशेष उपयोग
सेना
पुलिस
प्रशासन
खेल
व्यवसाय
राजनीति
पत्रकारिता
मीडिया
लेखन
रक्षा सेवाएँ
साहसिक कार्य
उद्यमिता
द्रेष्काण का अन्य वर्गों से संबंध
D-1 (राशि) → जीवन का मूल स्वरूप
D-3 (द्रेष्काण) → साहस, पराक्रम, भाई-बहन, पुरुषार्थ
D-9 (नवांश) → धर्म, विवाह, ग्रहबल
D-10 (दशमांश) → कर्म एवं व्यवसाय
D-12 (द्वादशांश) → माता-पिता
D-24 (चतुर्विंशांश) → शिक्षा
D-30 (त्रिंशांश) → दोष, कष्ट एवं अशुभ फल
द्रेष्काण विश्लेषण के मुख्य नियम
D-3 को हमेशा D-1 (राशि कुंडली) के साथ मिलाकर देखें।
केवल D-3 के आधार पर अंतिम निष्कर्ष न निकालें।
तृतीय भाव, तृतीयेश और मंगल का संयुक्त अध्ययन करें।
D-3 लग्न और लग्नेश की शक्ति पर विशेष ध्यान दें।
ग्रहों की उच्च-नीच, स्वराशि, दृष्टि, युति, षड्बल एवं वर्गबल का समग्र विचार करें।
दशा–अन्तर्दशा और गोचर के साथ D-3 के संकेतों का समन्वय करने पर अधिक सटीक फलादेश प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
द्रेष्काण (D-3) वैदिक ज्योतिष की एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली है, जो व्यक्ति के साहस, पराक्रम, आत्मबल, छोटे भाई-बहनों से संबंध, संघर्ष क्षमता, प्रतिस्पर्धा में सफलता और पुरुषार्थ से प्राप्त उपलब्धियों का सूक्ष्म विश्लेषण प्रदान करती है। यदि D-3 में लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश और मंगल सबल हों, तो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अपने प्रयासों से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने में सक्षम होता है। वहीं इन कारकों की दुर्बलता संघर्ष, आत्मविश्वास की कमी, भाई-बहनों से मतभेद या प्रयासों में बाधाओं का संकेत दे सकती है। अतः किसी भी गंभीर ज्योतिषीय विश्लेषण में द्रेष्काण कुंडली का अध्ययन अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

सोमवार, 27 जुलाई 2026

5. नैसर्गिक बल (Naisargika Bala) — सम्पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

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5. नैसर्गिक बल (Naisargika Bala) — सम्पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
नैसर्गिक बल (Naisargika Bala) षड्बल (Shadbala) का पाँचवाँ प्रमुख बल है। यह ग्रह का जन्मजात (Inherent) या स्वाभाविक बल है। यह ऐसा बल है जो ग्रह को उसकी अपनी प्राकृतिक शक्ति के कारण प्राप्त होता है। यह किसी जातक की जन्मतिथि, समय, स्थान, राशि, भाव, दृष्टि या युति से नहीं बदलता।
अर्थात् सूर्य जहाँ भी हो, उसका नैसर्गिक बल सदैव 60 षष्ट्यांश ही रहेगा। इसी प्रकार शनि का नैसर्गिक बल सदैव 9 षष्ट्यांश रहेगा।
शास्त्रीय आधार
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के नैसर्गिक बल का वर्णन किया गया है। यह ग्रहों की प्राकृतिक तेजस्विता, प्रभाव एवं सामर्थ्य का सूचक माना गया है।
यह बल ग्रह की स्वाभाविक शक्ति को दर्शाता है, न कि उसकी कुण्डली में वास्तविक कार्यक्षमता को।
नैसर्गिक बल का अर्थ
जैसे संसार में—
सूर्य स्वभाव से सबसे अधिक तेजस्वी है।
चन्द्र सूर्य से कम किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली है।
शुक्र आकर्षण और सौन्दर्य का कारक है।
गुरु ज्ञान का कारक है।
बुध बुद्धि का कारक है।
मंगल साहस का कारक है।
शनि धीमा एवं संयमी ग्रह है।
इसी स्वाभाविक प्रभाव को संख्यात्मक रूप में नैसर्गिक बल कहा जाता है।
ग्रहों का नैसर्गिक बल
ग्रह
नैसर्गिक बल (षष्ट्यांश)
सूर्य
60
चन्द्र
51
शुक्र
43
गुरु
34
बुध
26
मंगल
17
शनि
9
अधिक नैसर्गिक बल का क्या अर्थ है?
जिस ग्रह का नैसर्गिक बल अधिक होता है—
उसका प्राकृतिक प्रभाव अधिक होता है।
वह अपनी प्रकृति को अधिक प्रबलता से व्यक्त करता है।
उसकी ऊर्जा अधिक प्रभावशाली होती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि वह हर कुण्डली में शुभ फल ही देगा।
यदि ऐसा ग्रह पापी, नीच या अत्यन्त पीड़ित हो तो वह अपनी शक्ति से अशुभ फल भी अधिक दे सकता है।
नैसर्गिक बल कैसे देखते हैं?
इसे देखने के लिए किसी गणना की आवश्यकता नहीं होती।
हर ग्रह का निश्चित मान होता है।
उदाहरण—
यदि किसी जातक की कुण्डली में
सूर्य मेष में हो
या तुला में हो
प्रथम भाव में हो
अष्टम भाव में हो
उच्च हो
नीच हो
हर स्थिति में उसका नैसर्गिक बल 60 ही रहेगा।
इसी प्रकार
यदि शनि
उच्च हो
स्वराशि में हो
नीच हो
तो भी उसका नैसर्गिक बल 9 ही रहेगा।
उदाहरण 1
मान लीजिए—
सूर्य तुला राशि में नीच का है।
स्थान बल कम हो सकता है।
उच्च बल नहीं मिलेगा।
दिग्बल भी कम हो सकता है।
किन्तु
नैसर्गिक बल = 60 ही रहेगा।
उदाहरण 2
शनि तुला राशि में उच्च का है।
उच्च बल अधिक मिलेगा।
स्थान बल अच्छा होगा।
किन्तु
नैसर्गिक बल केवल 9 ही रहेगा।
अर्थात् शनि का स्वभाव जन्म से जितना है, उतना ही रहेगा।
उदाहरण 3
गुरु कर्क में उच्च का है।
उच्च बल उत्कृष्ट।
स्थान बल अच्छा।
दिग्बल भी सम्भव।
किन्तु
नैसर्गिक बल = 34 ही रहेगा।
उदाहरण 4
शुक्र कन्या में नीच का है।
नीच होने से ग्रह दुर्बल हो सकता है।
किन्तु
उसका नैसर्गिक बल 43 षष्ट्यांश ही रहेगा।
इसका वास्तविक अर्थ
कल्पना कीजिए—
सात व्यक्तियों की जन्मजात शारीरिक क्षमता अलग-अलग है।
एक व्यक्ति जन्म से ही अत्यन्त शक्तिशाली है।
दूसरा सामान्य है।
तीसरा कमजोर है।
अब यदि शक्तिशाली व्यक्ति बीमार हो जाए तो उसकी वर्तमान शक्ति कम हो सकती है, परन्तु उसकी मूल क्षमता बनी रहती है।
ठीक यही स्थिति ग्रहों की है।
नैसर्गिक बल = जन्मजात क्षमता
अन्य बल = वर्तमान परिस्थिति
क्या केवल नैसर्गिक बल से फलादेश किया जा सकता है?
नहीं।
यदि केवल नैसर्गिक बल देखें तो
सूर्य सबसे श्रेष्ठ होना चाहिए।
शनि सबसे कमजोर।
किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं होता।
यदि शनि
उच्च का हो,
स्वराशि में हो,
दिग्बली हो,
वक्री होकर चेष्टा बल प्राप्त करे,
शुभ दृष्टि प्राप्त हो,
तो वह अत्यन्त प्रभावशाली फल दे सकता है।
दूसरी ओर सूर्य
नीच,
अस्त,
पाप दृष्ट,
निर्बल
हो तो अपेक्षित फल नहीं देगा।
इसलिए नैसर्गिक बल को अन्य पाँच बलों के साथ मिलाकर देखा जाता है।
नैसर्गिक बल का प्रयोग कहाँ होता है?
षड्बल (Shadbala) की गणना में।
ग्रहों की मूल शक्ति जानने में।
ग्रहों की तुलनात्मक क्षमता समझने में।
ग्रह की स्वाभाविक प्रभावशीलता का आकलन करने में।
समग्र ग्रहबल (Total Planetary Strength) का एक स्थिर घटक मानने में।
नैसर्गिक बल बनाम वास्तविक ग्रहबल
नैसर्गिक बल
वास्तविक ग्रहबल
स्थिर रहता है
बदलता रहता है
जन्मजात शक्ति
परिस्थितिजन्य शक्ति
गणना नहीं करनी पड़ती
गणना करनी पड़ती है
ग्रह विशेष पर निर्भर
राशि, भाव, दृष्टि, युति, उच्च-नीच आदि पर निर्भर
सदैव समान
प्रत्येक कुण्डली में अलग
महत्वपूर्ण बातें
नैसर्गिक बल ग्रह की स्वाभाविक शक्ति है।
इसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।
सभी कुण्डलियों में समान रहता है।
यह केवल षड्बल का एक भाग है।
फलादेश में इसे स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल और दृष्टि/दृक् बल के साथ मिलाकर ही देखना चाहिए।
अधिक नैसर्गिक बल वाला ग्रह यदि शुभ स्थिति में हो तो अत्यन्त प्रभावशाली शुभ फल देता है, और यदि अत्यन्त पीड़ित हो तो अपनी प्रबल प्राकृतिक शक्ति के कारण अशुभ प्रभाव भी अधिक प्रकट कर सकता है।
निष्कर्ष
नैसर्गिक बल ग्रह की जन्मजात, स्थायी और अपरिवर्तनीय शक्ति है। यह ग्रह के प्राकृतिक तेज, प्रभाव और सामर्थ्य का सूचक है। इसकी गणना नहीं की जाती, क्योंकि प्रत्येक ग्रह के लिए इसका मान शास्त्रों में पूर्वनिर्धारित है। किन्तु किसी ग्रह की वास्तविक फलदायक क्षमता का निर्णय केवल नैसर्गिक बल से नहीं, बल्कि षड्बल के अन्य पाँच घटकों तथा ग्रह की राशि, भाव, दृष्टि, युति, उच्च-नीच, अस्त, वक्री आदि स्थितियों के समन्वित अध्ययन से किया जाता है।

6. दृक् बल (Drik Bala / दृष्टि बल) — सम्पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण

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6. दृक् बल (Drik Bala / दृष्टि बल) — सम्पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
दृक् बल (Drik Bala) षड्बल (Shadbala) का छठा और अंतिम बल है। इसे दृष्टि बल भी कहा जाता है। यह बताता है कि किसी ग्रह पर अन्य ग्रहों की दृष्टियों (Aspects) का क्या प्रभाव पड़ रहा है।
सरल शब्दों में—
किसी ग्रह को शुभ ग्रह जितनी अधिक शुभ दृष्टि देंगे, उसका दृक् बल उतना ही बढ़ेगा।
और जितनी अधिक पाप ग्रहों की अशुभ दृष्टि होगी, उसका दृक् बल उतना ही घटेगा।
अर्थात् दृक् बल ग्रह के बाहरी सहयोग या विरोध को दर्शाता है।
शास्त्रीय आधार
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार ग्रह अकेले फल नहीं देते, बल्कि अन्य ग्रहों के साथ उनके संबंध (दृष्टि, युति आदि) भी उनके फल को प्रभावित करते हैं।
दृक् बल इन्हीं दृष्टियों के प्रभाव का परिमाण है।
दृक् बल क्या होता है?
कल्पना कीजिए कि एक विद्यार्थी पढ़ाई में अच्छा है।
यदि—
अच्छे शिक्षक उसका मार्गदर्शन करें,
माता-पिता सहयोग करें,
अच्छे मित्र हों,
तो उसकी सफलता की संभावना बढ़ जाती है।
यदि—
बुरी संगति हो,
विरोध करने वाले लोग हों,
तो उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
इसी प्रकार ग्रहों पर भी अन्य ग्रहों की दृष्टियाँ पड़ती हैं।
शुभ दृष्टि = सहयोग
अशुभ दृष्टि = बाधा
इन्हीं का योग दृक् बल कहलाता है।
किन ग्रहों को शुभ माना जाता है?
सामान्यतः
शुभ ग्रह
गुरु
शुक्र
शुभ बुध (जब पाप ग्रहों से दूषित न हो)
शुक्ल पक्ष का बलवान चन्द्र
इनकी दृष्टियाँ ग्रह का दृक् बल बढ़ाती हैं।
किन ग्रहों को पाप ग्रह माना जाता है?
सामान्यतः
सूर्य
मंगल
शनि
राहु
केतु
कृष्ण पक्ष का निर्बल चन्द्र
पाप बुध (यदि पाप ग्रहों से युक्त हो)
इनकी दृष्टियाँ ग्रह का दृक् बल घटाती हैं।
दृक् बल कैसे देखते हैं?
क्रम इस प्रकार है—
चरण 1
जिस ग्रह का दृक् बल देखना हो, उसे चुनें।
मान लीजिए—
बुध
चरण 2
देखिए उस बुध पर कौन-कौन से ग्रह दृष्टि डाल रहे हैं।
उदाहरण—
गुरु की दृष्टि
शुक्र की दृष्टि
मंगल की दृष्टि
शनि की दृष्टि
चरण 3
अब शुभ और अशुभ दृष्टियों का प्रभाव जोड़ते हैं।
यदि शुभ दृष्टियाँ अधिक हैं
→ दृक् बल बढ़ेगा।
यदि पाप दृष्टियाँ अधिक हैं
→ दृक् बल घटेगा।
उदाहरण 1
मान लीजिए
बुध पर
गुरु की सप्तम दृष्टि
शुक्र की दृष्टि
दोनों पड़ रही हैं।
यह अत्यन्त शुभ स्थिति है।
फल
बुद्धि बढ़ेगी।
शिक्षा अच्छी होगी।
व्यापार सफल होगा।
निर्णय क्षमता बढ़ेगी।
दृक् बल अच्छा होगा।
उदाहरण 2
बुध पर
मंगल की चतुर्थ दृष्टि
शनि की दशम दृष्टि
दोनों पड़ रही हैं।
फल
मानसिक तनाव
निर्णय में विलम्ब
वाणी में कठोरता
व्यापारिक संघर्ष
दृक् बल कम हो जाएगा।
उदाहरण 3
गुरु पर
शुक्र की दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि
फल
ज्ञान
धर्म
सम्मान
सदाचार
और अधिक बढ़ेंगे।
उदाहरण 4
गुरु पर
शनि
मंगल
राहु
तीनों की दृष्टि हो।
फल
ज्ञान होने पर भी बाधाएँ
गुरुजनों से मतभेद
निर्णय में भ्रम
धार्मिक जीवन में उतार-चढ़ाव
दृक् बल कम होगा।
उदाहरण 5
सूर्य पर केवल गुरु की दृष्टि हो।
फल
पिता का सहयोग
सरकारी सफलता
नेतृत्व क्षमता
सम्मान
दृक् बल बढ़ेगा।
उदाहरण 6
सूर्य पर
शनि
राहु
मंगल
तीनों की दृष्टि हो।
फल
पिता से मतभेद
सरकारी कार्यों में बाधा
आत्मविश्वास में कमी
प्रतिष्ठा पर प्रभाव
दृक् बल घट जाएगा।
क्या सभी दृष्टियाँ समान होती हैं?
नहीं।
दृक् बल निकालते समय केवल यह नहीं देखा जाता कि दृष्टि है या नहीं, बल्कि—
दृष्टि पूर्ण है या आंशिक?
ग्रह की दृष्टि कितने अंश की है?
ग्रह शुभ है या पाप?
ग्रह स्वयं बलवान है या निर्बल?
इन सभी बातों को ध्यान में रखकर गणना की जाती है।
ग्रहों की विशेष दृष्टियाँ भी प्रभाव डालती हैं
जैसे—
मंगल की 4, 7, 8 दृष्टि
गुरु की 5, 7, 9 दृष्टि
शनि की 3, 7, 10 दृष्टि
ये सभी दृक् बल में सम्मिलित होती हैं।
क्या युति भी देखी जाती है?
दृक् बल मुख्यतः दृष्टियों पर आधारित होता है।
यद्यपि फलादेश करते समय युति और दृष्टि दोनों का संयुक्त प्रभाव देखा जाता है, परन्तु शास्त्रीय षड्बल में दृक् बल का आधार ग्रह-दृष्टियाँ हैं।
दृक् बल का फलादेश में महत्व
यदि ग्रह—
उच्च का है,
स्वराशि में है,
दिग्बली है,
किन्तु उस पर शनि, राहु और मंगल की तीव्र पाप दृष्टि है,
तो ग्रह की वास्तविक फल देने की क्षमता घट सकती है।
दूसरी ओर,
यदि ग्रह सामान्य स्थिति में हो, पर उस पर गुरु और शुक्र जैसी शुभ दृष्टियाँ हों, तो वह अपेक्षा से अधिक अच्छे परिणाम दे सकता है।
दृक् बल कहाँ प्रयोग होता है?
षड्बल की गणना में।
ग्रह की वास्तविक कार्यक्षमता जानने में।
शुभ और अशुभ प्रभावों के मूल्यांकन में।
दशा एवं गोचर के फल का सूक्ष्म विश्लेषण करने में।
ग्रह के सहयोगी एवं विरोधी प्रभावों का आकलन करने में।
दृक् बल बनाम नैसर्गिक बल
नैसर्गिक बल
दृक् बल
जन्मजात शक्ति
अन्य ग्रहों से प्राप्त शक्ति
सदैव स्थिर
प्रत्येक कुण्डली में बदलता है
गणना नहीं करनी पड़ती
दृष्टियों के आधार पर गणना होती है
ग्रह की स्वाभाविक क्षमता
ग्रह को मिलने वाला सहयोग या विरोध
महत्वपूर्ण बातें
दृक् बल षड्बल का अंतिम घटक है।
यह ग्रह पर पड़ने वाली शुभ एवं अशुभ दृष्टियों से निर्धारित होता है।
शुभ दृष्टियाँ दृक् बल बढ़ाती हैं।
पाप दृष्टियाँ दृक् बल घटाती हैं।
ग्रह की पूर्ण एवं विशेष दृष्टियाँ भी इसमें सम्मिलित होती हैं।
किसी ग्रह के अंतिम फल का निर्णय केवल दृक् बल से नहीं, बल्कि स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल और दृक् बल—इन सभी के संयुक्त अध्ययन से किया जाता है।
निष्कर्ष
दृक् बल ग्रह को अन्य ग्रहों से मिलने वाले सहयोग या विरोध का माप है। यह बताता है कि कोई ग्रह अपने स्वाभाविक एवं स्थितिजन्य बल के अतिरिक्त, अन्य ग्रहों की दृष्टियों से कितना समर्थ या प्रभावित हुआ है। यदि किसी ग्रह पर गुरु, शुक्र अथवा अन्य शुभ ग्रहों की दृष्टियाँ हों, तो उसका प्रभाव अधिक संतुलित और फलदायक हो जाता है; जबकि शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रहों की तीव्र दृष्टियाँ उसकी शुभता को कम कर सकती हैं। इसलिए किसी भी ग्रह के वास्तविक फलादेश में दृक् बल का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

चेष्टा बल (Cheṣṭā Bala) — उदाहरण सहित पूर्ण विश्लेषण

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चेष्टा बल (Cheṣṭā Bala) — उदाहरण सहित पूर्ण विश्लेषण

चेष्टा बल (Cheṣṭā Bala) षड्बल (Ṣaḍbala) का तीसरा प्रमुख अंग है। "चेष्टा" का अर्थ है गति, प्रयास या सक्रियता। अतः चेष्टा बल वह शक्ति है जो ग्रह को उसकी गति (Motion) के आधार पर प्राप्त होती है।
जब कोई ग्रह पृथ्वी से देखने पर अपनी सामान्य गति से भिन्न व्यवहार करता है—विशेषकर वक्री (Retrograde), स्थिर (Stationary) या अत्यंत तीव्र दिखाई देता है—तो उसके चेष्टा बल में परिवर्तन होता है।
चेष्टा बल क्यों महत्वपूर्ण है?
आकाश में सभी ग्रह समान गति से नहीं चलते। कभी वे—
तेज चलते हैं,
धीमे चलते हैं,
स्थिर प्रतीत होते हैं,
या वक्री (उल्टी दिशा में चलते हुए प्रतीत) होते हैं।
इन अवस्थाओं के अनुसार ग्रह की प्रभावशीलता बदलती है।
महत्वपूर्ण: चेष्टा बल सूर्य और चन्द्रमा के लिए नहीं निकाला जाता। इसका मुख्य प्रयोग मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के लिए किया जाता है।
वक्री ग्रह और चेष्टा बल
पराशर के अनुसार वक्री ग्रह सामान्यतः अधिक चेष्टा बल प्राप्त करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि वे सदैव शुभ फल देंगे, बल्कि यह कि वे अधिक शक्तिशाली होकर अपने स्वभाव और कारकत्व के फल अधिक प्रभाव से देंगे।
उदाहरण
यदि गुरु—
स्वराशि में हो,
वक्री हो,
केन्द्र में स्थित हो,
तो उसका चेष्टा बल अत्यंत अच्छा होगा और वह ज्ञान, संतान, धर्म तथा भाग्य के फल प्रभावी रूप से देगा।
चेष्टा की आठ अवस्थाएँ
पराशर एवं प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में ग्रहों की गति के आधार पर आठ अवस्थाएँ बताई गई हैं—
अवस्था
अर्थ
वक्र (Vakra)
वक्री गति
अतिवक्र (Ativakra)
अत्यधिक वक्री
विकल (Vikala)
लगभग स्थिर
मन्द (Manda)
धीमी गति
मन्दतर (Mandatara)
अत्यन्त धीमी
सम (Sama)
सामान्य गति
शीघ्र (Śīghra)
तेज गति
अतिशीघ्र (Atiśīghra)
अत्यधिक तेज
इन अवस्थाओं के अनुसार ग्रह को अलग-अलग चेष्टा बल प्राप्त होता है।
सर्वाधिक चेष्टा बल कब मिलता है?
वक्री (Vakra) अवस्था में ग्रह को सर्वाधिक चेष्टा बल प्राप्त होता है।
इस समय ग्रह पृथ्वी के सबसे निकट प्रतीत होता है और उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट माना जाता है।
चेष्टा बल का फल
यदि चेष्टा बल अधिक हो
ग्रह सक्रिय होता है।
अपनी दशा में प्रभावशाली फल देता है।
ग्रह का कारकत्व उभरकर आता है।
शुभ ग्रह अधिक शुभ तथा पाप ग्रह अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
यदि चेष्टा बल कम हो
ग्रह का प्रभाव मंद पड़ जाता है।
फल मिलने में विलम्ब हो सकता है।
कारकत्व कमजोर हो सकता है।
उदाहरण 1 — वक्री गुरु
मान लीजिए—
गुरु धनु राशि में है।
वक्री है।
नवम भाव में है।
फल
उच्च चेष्टा बल
धर्म में रुचि
उच्च शिक्षा
गुरुजन का सहयोग
भाग्य की प्रबलता
दशा में उत्कृष्ट परिणाम
उदाहरण 2 — वक्री शनि
मान लीजिए—
शनि दशम भाव में है।
वक्री है।
फल
अत्यधिक कर्मशीलता
कार्यों में गहराई
विलम्ब के बाद बड़ी सफलता
कठोर परिश्रम
जिम्मेदारी का बोझ
यदि शनि पापग्रस्त हो, तो वही प्रबलता नौकरी में तनाव, देरी या भारी दायित्व के रूप में भी प्रकट हो सकती है।
उदाहरण 3 — बुध सामान्य गति में
यदि बुध—
सामान्य गति में हो,
कन्या राशि में हो,
दशम भाव में हो,
तो उसे चेष्टा बल सामान्य मिलेगा।
फल—
अच्छी बुद्धि
व्यापारिक कौशल
संवाद क्षमता
शिक्षा में सफलता
उदाहरण 4 — शुक्र वक्री
यदि शुक्र—
वृषभ राशि में हो,
वक्री हो,
तो—
कला
संगीत
सौंदर्य
प्रेम
विलासिता
से संबंधित फल अत्यधिक प्रभावी हो सकते हैं। यदि शुक्र पीड़ित हो, तो यही शक्ति संबंधों में जटिलता या भोग-विलास की अधिक प्रवृत्ति भी दे सकती है।
चेष्टा बल और वक्री ग्रह
एक सामान्य भ्रम यह है कि वक्री ग्रह अशुभ होता है।
यह शास्त्रीय रूप से सही नहीं है।
सही सिद्धांत यह है—
वक्री ग्रह = अधिक चेष्टा बल
अधिक चेष्टा बल = अधिक प्रभाव
वह प्रभाव शुभ होगा या अशुभ, यह ग्रह की—
राशि,
भाव,
दृष्टि,
युति,
नवांश,
षड्बल,
दशा
पर निर्भर करेगा।
चेष्टा बल का फलादेश में महत्व
यदि किसी ग्रह को—
उच्च स्थान बल,
अच्छा काल बल,
अधिक चेष्टा बल,
तीनों प्राप्त हों, तो वह ग्रह अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है और अपनी दशा-अन्तर्दशा में प्रबल परिणाम देता है।
निष्कर्ष
चेष्टा बल ग्रह की गतिशील शक्ति का सूचक है। यह बताता है कि ग्रह जन्म समय पर कितना सक्रिय था। विशेष रूप से मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के लिए इसका अत्यधिक महत्व है। वक्री ग्रहों को सामान्यतः अधिक चेष्टा बल प्राप्त होता है, जिससे वे अपने कारकत्व को अधिक प्रभाव के साथ व्यक्त करते हैं। किन्तु अंतिम फलादेश के लिए चेष्टा बल को स्थान बल, काल बल, दिग्बल, नैसर्गिक बल, दृष्टि बल तथा ग्रह की राशि, भाव, दृष्टि, युति और दशा के साथ समन्वित करके ही देखना चाहिए।

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

ग्रह दृष्टि (Graha Dṛṣṭi)

Vedic Astro Care

अध्याय – ग्रह दृष्टि (Graha Dṛṣṭi)
एकपाद, द्विपाद, त्रिपाद एवं पूर्ण दृष्टि का शास्त्रीय विवेचन
प्रस्तावना
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के फलनिर्णय के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं— ग्रह की स्थिति (स्थिति), ग्रह का बल (बल) तथा ग्रह की दृष्टि (दृष्टि)। यदि किसी ज्योतिषी को ग्रह दृष्टि का यथार्थ ज्ञान न हो, तो वह किसी भी जन्मकुण्डली का सूक्ष्म एवं शास्त्रीय फलादेश नहीं कर सकता।
'दृष्टि' शब्द संस्कृत की "दृश्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है— देखना, अवलोकन करना अथवा अपनी चेतना का किसी वस्तु पर केन्द्रित होना। जैसे मनुष्य जिस वस्तु को देखता है, उससे उसका सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी प्रकार ग्रह भी जिस भाव अथवा ग्रह को देखते हैं, उसे प्रभावित करते हैं। इसीलिए ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होते हैं उसी का फल नहीं देते, बल्कि जिन भावों एवं ग्रहों पर उनकी दृष्टि पड़ती है, उनके फल में भी परिवर्तन कर देते हैं।
अतः किसी भाव का फल केवल उसके स्वामी या उसमें स्थित ग्रहों से ही निर्धारित नहीं होता, बल्कि उस भाव पर पड़ने वाली शुभ अथवा अशुभ दृष्टियों से भी निर्धारित होता है।
दृष्टि का शास्त्रीय सिद्धान्त
प्राचीन आचार्यों ने ग्रह-दृष्टि को अत्यन्त सूक्ष्म विज्ञान माना है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में ग्रह-दृष्टि का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। पराशर मुनि के अनुसार ग्रहों की दृष्टि समान नहीं होती। कुछ दृष्टियाँ पूर्ण प्रभाव वाली होती हैं, जबकि कुछ आंशिक प्रभाव प्रदान करती हैं।
जैसे सूर्य की किरणें प्रातःकाल तिरछी होने के कारण कम ताप देती हैं, मध्याह्न में वही किरणें सीधी पड़ने पर अत्यधिक उष्णता प्रदान करती हैं। ठीक उसी प्रकार ग्रह की पूर्ण दृष्टि सर्वाधिक प्रभाव उत्पन्न करती है, जबकि आंशिक दृष्टियाँ क्रमशः कम प्रभाव प्रदान करती हैं।
क्या ग्रह केवल पूर्ण दृष्टि ही रखते हैं?
अधिकांश विद्यार्थी केवल मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि, गुरु की पंचम एवं नवम दृष्टि तथा शनि की तृतीय एवं दशम दृष्टि तक ही सीमित ज्ञान रखते हैं। परन्तु यह ज्ञान पूर्ण नहीं है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार प्रत्येक ग्रह की चार प्रकार की दृष्टियाँ मानी गई हैं—
एकपाद दृष्टि
द्विपाद दृष्टि
त्रिपाद दृष्टि
पूर्ण दृष्टि
यद्यपि व्यवहारिक फलित में मुख्यतः पूर्ण दृष्टि का ही अधिक प्रयोग किया जाता है, तथापि सूक्ष्म फलादेश में आंशिक दृष्टियों का भी विचार किया जाता है।
एकपाद दृष्टि (¼ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का केवल एक-चतुर्थांश (25%) प्रभाव डालता है, उसे एकपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
तृतीय भाव
दशम भाव
पर एकपाद दृष्टि डालता है।
अर्थात यदि कोई ग्रह लग्न में स्थित हो तो वह तृतीय तथा दशम भाव को लगभग 25% शक्ति से प्रभावित करेगा।
द्विपाद दृष्टि (½ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का अर्ध भाग (50%) प्रदान करता है, उसे द्विपाद दृष्टि कहा जाता है।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
पंचम भाव
नवम भाव
पर द्विपाद दृष्टि रखता है।
यदि गुरु लग्न में स्थित हो तो सामान्य नियम से पंचम एवं नवम पर आधी दृष्टि होनी चाहिए, किन्तु गुरु की विशेष दृष्टि होने से वहाँ पूर्ण प्रभाव उत्पन्न होता है।
त्रिपाद दृष्टि (¾ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का तीन-चतुर्थांश (75%) प्रभाव देता है, उसे त्रिपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्यतः प्रत्येक ग्रह—
चतुर्थ भाव
अष्टम भाव
पर त्रिपाद दृष्टि डालता है।
यदि मंगल इन भावों को देखे तो उसकी विशेष दृष्टि के कारण यह त्रिपाद न रहकर पूर्ण दृष्टि बन जाती है।
पूर्ण दृष्टि (100%)
जिस भाव पर ग्रह अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रभाव डालता है, उसे पूर्ण दृष्टि कहा जाता है।
सभी ग्रह अपने स्थान से सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि सप्तम भाव को ग्रह-दृष्टि का सर्वाधिक प्रभाव प्राप्त होता है।
विशेष पूर्ण दृष्टियाँ
सामान्य नियम से सभी ग्रहों की केवल सप्तम दृष्टि पूर्ण होती है, किन्तु तीन ग्रहों को विशेष दृष्टियाँ प्राप्त हैं।
मंगल की विशेष दृष्टि
मंगल अपने स्थान से—
चतुर्थ
सप्तम
अष्टम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
मंगल अग्नितत्त्व प्रधान ग्रह है। इसलिए जहाँ उसकी दृष्टि पड़ती है वहाँ ऊर्जा, साहस, संघर्ष, पराक्रम तथा कभी-कभी क्रोध एवं दुर्घटना की सम्भावना भी बढ़ जाती है।
गुरु की विशेष दृष्टि
गुरु अपने स्थान से—
पंचम
सप्तम
नवम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
गुरु ज्ञान, धर्म, सद्बुद्धि एवं संरक्षण का कारक ग्रह है। अतः उसकी दृष्टि सामान्यतः जिस भाव पर पड़ती है वहाँ वृद्धि, संरक्षण एवं शुभता प्रदान करती है।
शनि की विशेष दृष्टि
शनि अपने स्थान से—
तृतीय
सप्तम
दशम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
शनि कर्म, अनुशासन, धैर्य, विलम्ब एवं परीक्षा का ग्रह है। इसलिए उसकी दृष्टि जीवन में संघर्ष अवश्य देती है, किन्तु परिश्रम के माध्यम से स्थायी सफलता भी प्रदान करती है।
ग्रहों की दृष्टि सारणी
भाव
सामान्य ग्रह
विशेष ग्रह
तृतीय
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
चतुर्थ
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
पंचम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
सप्तम
पूर्ण
सभी ग्रह
अष्टम
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
नवम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
दशम
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
क्या दृष्टि सदैव शुभ अथवा अशुभ होती है?
यह भी एक सामान्य भ्रान्ति है कि शुभ ग्रह की दृष्टि सदैव शुभ तथा पाप ग्रह की दृष्टि सदैव अशुभ होती है।
वास्तव में दृष्टि का फल निम्न बातों पर निर्भर करता है—
ग्रह का स्वभाव
ग्रह का बल
ग्रह की अवस्था
ग्रह की मित्रता एवं शत्रुता
ग्रह का भावाधिपत्य
दृष्ट भाव का स्वभाव
ग्रह की दशा
योग एवं राजयोग
सम्पूर्ण कुण्डली का सन्तुलन
उदाहरणार्थ—
यदि शनि षष्ठ भाव को देखे तो शत्रुओं पर विजय दिला सकता है।
यदि मंगल तृतीय भाव को देखे तो पराक्रम एवं साहस बढ़ा सकता है।
यदि गुरु अष्टम भाव पर दृष्टि डाले तो आयु की रक्षा तथा गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति करा सकता है।
अतः केवल ग्रह के शुभ या पाप होने से फल का निर्णय नहीं किया जाता।
ग्रह की दृष्टि ग्रहों पर भी पड़ती है
ग्रह केवल भावों को ही नहीं देखते, बल्कि अन्य ग्रहों को भी प्रभावित करते हैं।
यदि गुरु शनि को देखे तो शनि के कठोर स्वभाव में संतुलन आता है।
यदि मंगल चन्द्रमा को देखे तो जातक में शीघ्र क्रोध, मानसिक उत्तेजना अथवा रक्त सम्बन्धी विकारों की सम्भावना बढ़ सकती है।
यदि शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो तो भोग के साथ सदाचार एवं संयम भी उत्पन्न होता है।
दृष्टि और युति में अन्तर
जब दो ग्रह एक ही भाव में स्थित होते हैं तो उसे युति कहते हैं।
जब ग्रह अलग-अलग भावों में स्थित होकर एक-दूसरे को देखते हैं, तो उसे दृष्टि सम्बन्ध कहते हैं।
युति में ग्रहों की शक्तियाँ परस्पर मिश्रित होती हैं, जबकि दृष्टि में दूरस्थ प्रभाव उत्पन्न होता है।
फलित ज्योतिष में दृष्टि का प्रयोग
व्यवहारिक फलित में सामान्यतः—
सप्तम दृष्टि
मंगल की 4 एवं 8 दृष्टि
गुरु की 5 एवं 9 दृष्टि
शनि की 3 एवं 10 दृष्टि
का अधिक प्रयोग किया जाता है।
परन्तु सूक्ष्म अनुसन्धान एवं गहन फलनिर्णय में एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद दृष्टियों का भी विचार करना चाहिए।
उपसंहार
ग्रह-दृष्टि वैदिक ज्योतिष का अत्यन्त गूढ़ एवं वैज्ञानिक विषय है। ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होता है उसी का फल नहीं देता, बल्कि जिन भावों तथा ग्रहों पर उसकी दृष्टि पड़ती है, उनके स्वभाव, शक्ति एवं परिणामों को भी परिवर्तित कर देता है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार सभी ग्रहों की आंशिक दृष्टियाँ (एकपाद, द्विपाद एवं त्रिपाद) तथा पूर्ण दृष्टि होती हैं। मंगल, गुरु एवं शनि को विशेष पूर्ण दृष्टियाँ प्राप्त हैं। एक कुशल ज्योतिषी को ग्रह की स्थिति, बल, दृष्टि, भावाधिपत्य, दशा तथा सम्पूर्ण कुण्डली का समन्वित अध्ययन करके ही फलादेश करना चाहिए। यही शास्त्रीय एवं प्रमाणिक ज्योतिष का आधार है।

27 नक्षत्रों का स्वरूप और फलादेष

Vedic Astro Care
✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।

✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...

"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां
 ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।
 द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥" 
                 (दुण्डिराज )

✓•जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।

 ✓•दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है। 

✓•२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।

✓•१. अश्विनीनक्षत्र...
 इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है। 

इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।

✓•२. भरणी नक्षत्र...
 इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।

✓•३. कृत्तिका नक्षत्र...
यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।

 सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।

✓•४. रोहिणी नक्षत्र...
इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।

✓•५. मृगशिरा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है। 

इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।

✓•६. आर्द्रा नक्षत्र...
यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।

इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।

✓•७. पुनर्व नक्षत्र...
यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।

 नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।

 चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।

✓•८. पुष्य नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।

✓•९. आश्लेषा यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।

✓•१०. मघा नक्षत्र...
यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।

✓•११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...
शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।

✓•१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है। 

इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।

✓•१३. हस्त नक्षत्र ...
यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है। 

✓•१४. चित्रा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।

 इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।

 इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।

✓•१५. स्वानी नक्षत्र...
राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।

✓•१६. विशाखा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में  ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।

 शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।

 मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।

✓•१७. अनुराधा नक्षत्र...
वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है। 

इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।

✓•१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....
 यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है। 

इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।

✓•१९ मूल नक्षत्र...
 इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।

 इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।

✓•२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...
 यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।

✓•२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...
सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।

 इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।

✓•२२. श्रवण नक्षत्र....
 इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ?

23. धनिष्ठा नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी मंगल है। यह नक्षत्र मकर राशि के 23°20′ से कुंभ राशि के 6°40′ तक विस्तृत है। इसका प्रतीक ढोल (मृदंग) है, जो गति, ताल और क्रिया का संकेत देता है। इसके देवता अष्ट वसु हैं।
धनिष्ठा नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 घुटने (Knees)
धनिष्ठा नक्षत्र घुटनों और उनकी गति को नियंत्रित करता है।
दूषित होने पर घुटनों में दर्द, जकड़न, चोट, गठिया, मोच या ऑपरेशन योग बनते हैं। मंगल प्रभाव के कारण अचानक चोट की संभावना रहती है।
इस नक्षत्र के दूषित होने पर रक्त विकार, तेज बुखार, चोट, दुर्घटना, क्रोधजन्य रोग तथा हड्डियों से संबंधित कष्ट होते हैं। मंगल प्रधान होने से कट-फट, शल्य चिकित्सा, रक्तचाप तथा अग्नि से कष्ट की संभावना रहती है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक तेजस्वी, साहसी, कर्मठ, महत्वाकांक्षी और नेतृत्व गुणों से युक्त होते हैं। ये अनुशासनप्रिय होते हैं परंतु कभी-कभी अत्यधिक कठोर और हठी हो जाते हैं। धन कमाने की क्षमता प्रबल होती है, पर खर्च भी शीघ्र कर देते हैं। संगीत, लय, ताल, सेना, पुलिस, प्रशासन, राजनीति तथा तकनीकी क्षेत्र में सफलता पाते हैं। स्त्री जातक प्रभावशाली व स्वाभिमानी होती हैं।

✓ 24. शतभिषा नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुंभ राशि के 6°40′ से 20°00′ तक फैला है। इसका प्रतीक खाली वृत्त (100 चिकित्सक) है। इसके देवता वरुण हैं।
शतभिषा नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 पिंडलियाँ (Calves) व स्नायु तंत्र
शतभिषा नक्षत्र पिंडलियों, नसों और विषैले तत्वों से जुड़ा होता है।
दूषित होने पर वैरिकोज़ वेन्स, नसों में खिंचाव, एलर्जी, विष प्रभाव, स्नायु दुर्बलता और रहस्यमय रोग उत्पन्न होते हैं।
दूषित होने पर यह नक्षत्र रहस्यमय रोग, विष, एलर्जी, त्वचा रोग, मानसिक तनाव, भय, अनिद्रा, नशे की प्रवृत्ति तथा गुप्त रोग देता है। राहु के प्रभाव से भ्रम, भटकाव और असंतुलन देखा जाता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक रहस्यप्रिय, शोधकर्ता, एकांतप्रिय, विचारों में गहराई रखने वाले होते हैं। ये डॉक्टर, वैज्ञानिक, ज्योतिषी, तांत्रिक, रिसर्चर, आईटी और गुप्त विद्या के क्षेत्र में श्रेष्ठ होते हैं। समाज से थोड़े अलग रहते हैं, पर बुद्धि अत्यंत प्रखर होती है। कभी-कभी अविश्वासी और शंकालु स्वभाव के हो जाते हैं।

✓ 25. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी बृहस्पति है। यह कुंभ राशि के 20°00′ से मीन राशि के 3°20′ तक स्थित है। इसका प्रतीक दो मुख वाला व्यक्ति या तलवार है। इसके देवता अज एकपाद हैं।
पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 जांघें (Thighs)
यह नक्षत्र जांघों की शक्ति और सहनशक्ति का कारक है।
दोष होने पर जांघों में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, रक्तचाप असंतुलन और चलने में कठिनाई होती है। उग्र मानसिकता शरीर पर भी प्रभाव डालती है।
दोषयुक्त होने पर मानसिक द्वंद्व, सिरदर्द, रक्तचाप, उग्र विचार, दुर्घटनाएँ और आत्मघाती प्रवृत्ति देखी जाती है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक उग्र, प्रभावशाली, सिद्धांतवादी, स्पष्टवक्ता और क्रांतिकारी विचारों वाले होते हैं। ये सत्य के लिए कठोर निर्णय लेने में नहीं हिचकते। आध्यात्मिकता, दर्शन, राजनीति, धर्म प्रचार और सामाजिक आंदोलन में अग्रणी होते हैं। कभी-कभी अत्यधिक उग्रता इनके संबंधों में बाधा बनती है।

✓ 26. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी भी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि के 3°20′ से 16°40′ तक फैला है। इसका प्रतीक सर्प अथवा समाधि है। देवता अहिर्बुध्न्य हैं।
उत्तराभाद्रपद नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 घुटनों के नीचे का भाग व पैरों की नसें
यह नक्षत्र स्नायु, जलतत्त्व और गुप्त शक्ति से संबंधित है।
दूषित होने पर पैरों में सूजन, सुन्नता, त्वचा रोग, नसों की कमजोरी और लंबे समय तक चलने वाले रोग बनते हैं।
दूषित होने पर यह नक्षत्र उदासी, अवसाद, पैरों के रोग, जल तत्व से कष्ट, त्वचा व स्नायु विकार देता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक गंभीर, स्थिर, धैर्यवान, त्यागी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। ये कम बोलते हैं पर गहन सोच रखते हैं। दीर्घकालिक सफलता पाते हैं और वृद्धावस्था में विशेष सम्मान प्राप्त करते हैं। संत, गुरु, साधक, लेखक और मार्गदर्शक के रूप में श्रेष्ठ होते हैं।

✓ 27. रेवती नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी बुध है। यह मीन राशि के 16°40′ से 30°00′ तक व्याप्त है। इसका प्रतीक मछली है। इसके देवता पूषा हैं।
रेवती नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 पैरों के तलवे (Feet / Soles)
रेवती नक्षत्र पैरों के अंतिम भाग को नियंत्रित करता है।
दोष होने पर पैरों में जलन, घाव, थकान, फंगल इन्फेक्शन, यात्रा से कष्ट तथा दिशा भ्रम होता है। यह जीवन यात्रा के अंतिम चरण का भी सूचक है।
दोषयुक्त होने पर यह नक्षत्र भ्रम, निर्णयहीनता, पैरों के रोग, मानसिक अस्थिरता तथा आर्थिक असंतुलन देता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक दयालु, सौम्य, विनम्र, बुद्धिमान और कलात्मक होते हैं। ये यात्राओं, व्यापार, लेखन, शिक्षा, मीडिया, काउंसलिंग और आध्यात्मिक कार्यों में सफल होते हैं। दूसरों की सहायता करने में आनंद लेते हैं और जीवन के अंतिम चरण में सुख-शांति प्राप्त करते हैं।

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  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer