एकादशी व्रत का उद्यापन :
शास्त्रसम्मत विधि एवं महत्व
समस्त वैष्णव भक्तों का परमप्रिय एकादशी व्रत जहाँ एक कठिन तपस्या है, वहीं उसका उद्यापन व्रत की पूर्णता माना गया है। बिना उद्यापन के किया गया व्रत शास्त्रों के अनुसार पूर्ण फल प्रदान नहीं करता।
एकादशी व्रत का उद्यापन सामान्यतः वर्ष में एक बार किया जाता है। इसके मुख्य अंग हैं—
व्रत, पूजन, जागरण, हवन, दान, ब्राह्मण भोजन एवं पारण।
समय एवं समुचित जानकारी के अभाव में आज बहुत कम लोग पूर्ण विधि-विधान के साथ उद्यापन कर पाते हैं। जबकि प्रत्येक व्रत का उद्यापन अलग-अलग शास्त्रसम्मत विधि से किया जाता है। इसी उद्देश्य से इस लेख के माध्यम से हम एकादशी व्रत के उद्यापन की संपूर्ण शास्त्रीय विधि प्रस्तुत कर रहे हैं।
एकादशी व्रत का उद्यापन कब करना चाहिए?
यदि कोई भगवत भक्त वर्ष भर की 24 एकादशियों का व्रत पूर्ण कर लेता है, तो उसे उद्यापन अवश्य करना चाहिए।
कुछ भक्त केवल कृष्ण पक्ष की 12 एकादशियाँ रखते हैं और उनका उद्यापन करते हैं।
कुछ भक्त केवल शुक्ल पक्ष की 12 एकादशियाँ रखते हैं और उनका उद्यापन करते हैं।
कुछ भक्त दोनों पक्षों की 24 एकादशियों का उद्यापन करते हैं।
👉 जैसी श्रद्धा और इच्छा हो, वैसा करें,
परंतु उद्यापन अवश्य करें — तभी व्रत पूर्ण माना जाता है।
उद्यापन की तिथि
कृष्ण पक्ष के व्रतों का उद्यापन → कृष्ण पक्ष की एकादशी-द्वादशी
शुक्ल पक्ष के व्रतों का उद्यापन → शुक्ल पक्ष की एकादशी-द्वादशी
24 एकादशियों का उद्यापन → किसी भी पक्ष की एकादशी
⚠️ चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक कृष्ण एकादशी तक) में
एकादशी व्रत का उद्यापन नहीं करना चाहिए।
शास्त्रों में एकादशी उद्यापन का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा—
“हे कृपानिधि! एकादशी व्रत का उद्यापन कैसे करना चाहिए?”
तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे पांडवश्रेष्ठ! उद्यापन के बिना कठिन तप से किया गया व्रत भी निष्फल हो जाता है।
विशेषतः मार्गशीर्ष एवं माघ मास की शुक्ल एकादशी उद्यापन हेतु श्रेष्ठ मानी गई है।”
इससे स्पष्ट है कि उद्यापन व्रत का अनिवार्य अंग है।
दान का महत्व
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
समर्थ व्यक्ति यदि हजार स्वर्ण मुद्राएँ दान करे
और असमर्थ व्यक्ति यदि एक कौड़ी भी श्रद्धा से दान करे
👉 दोनों को समान फल प्राप्त होता है।
आज के समय में स्वर्ण मुद्रा संभव नहीं, अतः
व्रती अपनी सामर्थ्य अनुसार धन, अन्न, वस्त्र या उपयोगी वस्तुओं का दान करे।
एकादशी व्रत उद्यापन की विधि
🔸 दशमी तिथि
एक समय भोजन करें
पूजा स्थान एवं मंदिर की सफाई करें
पूजा सामग्री एकत्र करें
किसी योग्य वैदिक कर्मकांडी ब्राह्मण को आमंत्रित करें
रात्रि में दुग्ध-फलाहार लेकर दन्तधावन कर शयन करें
🔸 एकादशी तिथि
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें
पीले वस्त्र धारण करें
पितरों का तर्पण करें
24 प्रकार के नैवेद्य तैयार कराएँ
आचार्य का पूजन कर विधिवत वरण करें
इसके बाद निम्न पूजन विधियाँ सम्पन्न करें—
गणपति पूजन
कलश पूजन
पुण्याहवाचन
नांदीश्राद्ध
मातृका पूजन
नवग्रह पूजन
सर्वतोभद्र मंडल पूजन
भगवान नारायण का पूजन
संध्या समय एकादशी व्रत कथा श्रवण करें और
रात्रि में भगवन्नाम संकीर्तन सहित जागरण करें।
🔸 द्वादशी तिथि
प्रातः पुनः पूजन
यज्ञ वेदी स्थापना
अग्नि स्थापना एवं हवन
12 या 24 ब्राह्मणों का पूजन
पूर्णाहुति
गौदान
ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा
आशीर्वाद प्राप्त कर पारण करें
👉 कुछ भक्त श्रद्धानुसार श्रीमद्भागवत महापुराण कथा भी करवाते हैं — यह श्रेष्ठ है, किंतु अनिवार्य नहीं।
निष्कर्ष
एकादशी व्रत तभी पूर्ण फलदायी होता है जब उसका शास्त्रसम्मत उद्यापन किया जाए।
व्रती को अपनी श्रद्धा, शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उद्यापन अवश्य करना चाहिए।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर
आपके जीवन को मंगलमय बनाने की कामना करता है।
🙏 नमस्कार 🙏
