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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

D9 नवांश कुंडली — कक्षा हेतु क्रमबद्ध अध्ययन

Vedic Astro Care
D9 नवांश कुंडली — कक्षा हेतु क्रमबद्ध अध्ययन
1. D9 चार्ट क्या होता है?
D9 = नवांश = राशि का नौवाँ विभाजन।
एक राशि का विस्तार:
30°
अतः,
30° ÷ 9 = 3°20′
इसलिए प्रत्येक राशि को 3°20′ के 9 भागों में विभाजित किया जाता है। इन प्रत्येक भाग को एक नवांश कहते हैं।
अर्थात्:
1 नवांश = 3°20′
और सम्पूर्ण राशि में:
9 नवांश × 3°20′ = 30°
पूरी 360° राशि-मंडल में:
12 राशियाँ × 9 नवांश = 108 नवांश
इसलिए D9 को नवांश कुंडली कहा जाता है।

2. D9 को नवांश क्यों कहते हैं?
संस्कृत में—
नव = 9
इसलिए राशि के नौवें विभाजन को नवांश कहा गया।
पाराशरी वर्ग-विभाजन में D9 अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वर्ग कुंडलियों का उद्देश्य जन्मकुंडली में दिखाई देने वाले विषयों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर समझना है।
विशेष रूप से D9 का प्रयोग:
विवाह
जीवनसाथी
वैवाहिक जीवन
धर्म एवं जीवन-मूल्य
भाग्य की परिपक्वता
ग्रहों की सूक्ष्म शक्ति
ग्रह की वास्तविक सामर्थ्य
ग्रह के फल की पुष्टि
आदि के लिए किया जाता है।
लेकिन विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही यह बात स्पष्ट कर दें:
D9 केवल विवाह की कुंडली नहीं है।

3. एक राशि में नवांश कैसे बनाए जाते हैं?
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है।
मान लीजिए किसी ग्रह की स्थिति है:
मेष 10°15′
सबसे पहले देखें कि वह मेष राशि के किस नवांश में है।
मेष राशि के नवांश:

प्रथम से नवें नवांश तक प्रत्येक नवांश की अंश सीमा
प्रथम नवांश - 0°00′ – 3°20′
दूसरा नवांश - 3°20′ – 6°40′
तीसरा नवांश - 6°40′ – 10°00′
चौथा नवांश - 10°00′ – 13°20′
पांचवां नवांश - 13°20′ – 16°40′
छठा नवांश - 16°40′ – 20°00′
सातवां नवांश - 20°00′ – 23°20′
आठवां नवांश - 23°20′ – 26°40′
नवां नवांश - 26°40′ – 30°00′

10°15′, 10°00′ से 13°20′ के बीच है।
अतः यह चतुर्थ नवांश है।
अब प्रश्न है—
चतुर्थ नवांश किस राशि का होगा?
इसके लिए नवांश राशि निर्धारण का नियम समझना आवश्यक है।

4. नवांश राशि निर्धारित करने का मुख्य नियम
राशियों को तीन प्रकार में बाँटा जाता है:
चर राशि - मेष, कर्क, तुला, मकर
स्थिर राशि - वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ
द्विस्वभाव राशि - मिथुन, कन्या, धनु, मीन

अब D9 में नवांश राशि निकालने का पाराशरी नियम:

चर राशि - 
चर राशि में, लग्न कुंडली में जिस राशि में ग्रह हो उसी राशि से नवांश भावों की गिनती शुरू होती है, 
उदाहरण:
मेष → मेष से प्रारंभ
नवांश क्रम:
मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु

स्थिर राशि - 
स्थिर राशि में, लग्न कुंडली में जिस स्थिर राशि में ग्रह हो उस राशि से गिनकर, ठीक नवम राशि से नवांश क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
वृषभ
वृषभ से नवम राशि:
वृषभ(1), मिथुन(2), कर्क(3), सिंह(4), कन्या(5), तुला(6), वृश्चिक(7), धनु(8), मकर(9)
अतः वृषभ के नवांश:
मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या

द्विस्वभाव राशि -
द्विस्वभाव राशि में, जिस राशि में ग्रह लग्न कुंडली में हो, उस राशि से ठीक पांचवीं राशि से गणना क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
मिथुन
मिथुन से पंचम राशि:
मिथुन(1), कर्क(2), सिंह(3), कन्या(4), तुला(5)
अतः मिथुन के नवांश:
तुला → वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन

5. पूरी नवांश राशि-तालिका

जन्म राशि - मेष - चर
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - वृषभ - स्थिर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - मिथुन - द्विस्वभाव
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - कर्क - चर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - सिंह - स्थिर
धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह
जन्म राशि - कन्या - द्विस्वभाव
मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक
जन्म राशि - तुला - चर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - वृश्चिक - स्थिर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - धनु - द्विस्वभाव
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - मकर - चर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - कुंभ - स्थिर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - मीन - द्विस्वभाव
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन

यहाँ एक रोचक बात विद्यार्थियों को बताई जा सकती है:
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में नवांश क्रम अलग प्रारंभ-बिंदु से चलता है, लेकिन प्रत्येक राशि में क्रम लगातार राशिचक्र के अनुसार आगे बढ़ता है।

6. उदाहरण से D9 बनाना
मान लीजिए:
गुरु = वृषभ 14°20′
पहले देखें:
वृषभ के नवांश:
0°–3°20′ → मकर
3°20′–6°40′ → कुंभ
6°40′–10° → मीन
10°–13°20′ → मेष
13°20′–16°40′ → वृषभ
गुरु 14°20′ पर है।
अतः गुरु पंचम नवांश में है।
वृषभ का पंचम नवांश = वृषभ
इसलिए:
D1 में गुरु = वृषभ
और
D9 में गुरु = वृषभ
इस स्थिति को आगे चलकर वर्गोत्तम की चर्चा में जोड़ा जा सकता है।

7. दूसरा उदाहरण — द्विस्वभाव राशि
मान लीजिए:
शुक्र = मिथुन 8°00′
मिथुन के नवांश:
तुला = 0°–3°20′
वृश्चिक = 3°20′–6°40′
धनु = 6°40′–10°
शुक्र 8° पर है।
अतः शुक्र तीसरे नवांश में है।
मिथुन का तीसरा नवांश = धनु
इसलिए:
D9 में शुक्र धनु राशि में होगा।

8. D9 में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
D9 का लग्न निकालने का तरीका भी ग्रहों जैसा ही है।
सबसे पहले D1 में लग्न की सटीक अंश स्थिति चाहिए।
मान लीजिए:
लग्न = सिंह 18°25′
सिंह के नवांश:
धनु — 0°–3°20′
मकर — 3°20′–6°40′
कुंभ — 6°40′–10°
मीन — 10°–13°20′
मेष — 13°20′–16°40′
वृषभ — 16°40′–20°
18°25′ छठे नवांश में है।
सिंह का छठा नवांश = वृषभ
अतः:
D9 लग्न = वृषभ
यही नवांश कुंडली का प्रथम भाव/लग्न बन जाएगा।
इसके बाद अन्य सभी ग्रहों को उनके-अपने नवांश राशियों में रखा जाता है।

9. D9 कुंडली बनाने की पूरी प्रक्रिया
कक्षा में विद्यार्थियों को यह 6 चरणों में सिखाएँ:
चरण 1
D1 कुंडली से ग्रहों की सटीक राशि और अंश लिखें।
चरण 2
प्रत्येक राशि के 30° को 9 भागों में बाँटें।
प्रत्येक भाग = 3°20′
चरण 3
ग्रह किस नवांश क्रमांक में है, यह निर्धारित करें।
चरण 4
राशि के चर/स्थिर/द्विस्वभाव होने के अनुसार नवांश की प्रारंभिक राशि निर्धारित करें।
चरण 5
उस क्रमांक की नवांश राशि ग्रह को दें।
चरण 6
इसी प्रक्रिया से लग्न सहित सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु के D9 स्थान निर्धारित करें।

11. D9 क्यों देखा जाता है?
अब फलित ज्योतिष का मुख्य भाग।
D9 को मुख्यतः निम्न विषयों के लिए देखा जाता है:
1. विवाह
विवाह की गुणवत्ता
वैवाहिक संबंध
जीवनसाथी का स्वभाव
वैवाहिक स्थिरता
विवाह के बाद जीवन में परिवर्तन

2. ग्रह की शक्ति
कई बार D1 में ग्रह अच्छी स्थिति में दिखाई देता है लेकिन D9 में कमजोर होता है।
या D1 में सामान्य दिखाई देने वाला ग्रह D9 में अत्यंत अच्छी स्थिति प्राप्त करता है।
इसलिए D9 ग्रह की सूक्ष्म स्थिति को समझने में सहायता करता है।

3. धर्म
D9 का संबंध धर्म, जीवन के सिद्धांतों और व्यक्ति की आंतरिक परिपक्वता से भी जोड़ा जाता है।

4. भाग्य की परिपक्वता
विशेष रूप से गुरु, नवम भाव, नवमेश और संबंधित ग्रहों को D1 के साथ D9 में देखने से व्यक्ति के जीवन में धर्म एवं भाग्य के विकास को समझने में सहायता मिलती है।

12. क्या D9 अकेले देखकर फलादेश किया जा सकता है?
नहीं।
यह विद्यार्थियों को बहुत स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।
सही क्रम:
D1 → D9 → अन्य आवश्यक वर्ग → दशा → गोचर
D9, D1 का विकल्प नहीं है।
पहले D1 में योग और स्थिति देखें।
फिर D9 से उसकी पुष्टि, सूक्ष्म शक्ति और परिपक्व फल को समझें।

13. D1 और D9 का संबंध
इसे कक्षा में इस प्रकार समझाएँ:
D1 = जीवन का मुख्य आधार
D9 = उस आधार की सूक्ष्म गुणवत्ता और परिपक्वता
उदाहरण के लिए यदि D1 में शुक्र मजबूत है, तो विवाह एवं संबंधों के विषय में शुभ संकेत मिल सकते हैं।
लेकिन यदि D9 में शुक्र अत्यंत पीड़ित हो तो उस शुभता को बिना जाँच के पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसी प्रकार:
D1 में ग्रह मध्यम हो लेकिन D9 में स्वक्षेत्री/उच्च/मित्र राशि में हो, तो ग्रह के फल में आंतरिक मजबूती दिखाई दे सकती है।
लेकिन दोनों कुंडलियों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है।

14. D9 में सबसे पहले क्या देखें?
कक्षा में फलित की यह क्रम व्यवस्था रखें:
पहला — D9 लग्न
देखें:
D9 लग्न कौन-सी राशि है?
लग्नेश कहाँ है?
लग्न पर कौन से ग्रह दृष्टि डाल रहे हैं?
लग्न में कौन से ग्रह हैं?
लग्नेश की D9 स्थिति कैसी है?

दूसरा — D9 का लग्नेश
लग्नेश की:
राशि, भाव, उच्च/नीच, स्वक्षेत्र, मित्र/शत्रु राशि, युति, 
दृष्टि, षड्बल आदि देखें।

तीसरा — D9 का सप्तम भाव
विवाह के लिए: - सप्तम राशि, सप्तमेश, सप्तम भाव में ग्रह, सप्तमेश की शक्ति, शुक्र, गुरु, D1 का सप्तम भाव एवं सप्तमेश, सबको मिलाकर देखें।

15. विवाह के लिए D9 कैसे पढ़ें?
एक व्यवस्थित सूत्र विद्यार्थियों को दें:
D1 सप्तम भाव → D1 सप्तमेश → शुक्र → गुरु → D9 लग्न → D9 सप्तम भाव → D9 सप्तमेश → D9 शुक्र → D9 गुरु → दशा
फिर आवश्यकता के अनुसार:
उपपद लग्न, नवम भाव, द्वितीय भाव तथा अन्य संबंधित संकेतक भी देखें।
इससे विद्यार्थी केवल “D9 का सातवाँ भाव देखकर विवाह बता देना” जैसी गलती नहीं करेंगे।

16. D9 में शुक्र का महत्व
विवाह के संदर्भ में शुक्र अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है।
देखें:
D1 में शुक्र, D9 में शुक्र, शुक्र का D9 भाव, शुक्र की राशि, 
शुक्र की शक्ति, शुक्र पर पाप/शुभ प्रभाव, शुक्र का संबंध सप्तमेश से, शुक्र का संबंध लग्नेश से। 
पुरुष की कुंडली में परंपरागत रूप से शुक्र को पत्नी/विवाह का प्रमुख कारक माना जाता है।
स्त्री की कुंडली में गुरु का भी विशेष महत्त्व माना जाता है।
लेकिन आधुनिक फलित में केवल लिंग आधारित एक ग्रह पर निर्भर न रहकर सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, गुरु और संपूर्ण योग-संबंध देखना अधिक उचित है।

17. D9 में वर्गोत्तम क्या होता है?
यह D9 पढ़ाते समय अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
यदि D1 में ग्रह जिस राशि में है, D9 में भी उसी राशि में स्थित हो जाए तो वह ग्रह: वर्गोत्तम कहलाता है।
उदाहरण:
D1 में: सूर्य = मेष और D9 में भी: सूर्य = मेष
तो सूर्य वर्गोत्तम हुआ।
वर्गोत्तम को ग्रह की स्थिति की विशेष दृढ़ता के संकेत के रूप में देखा जाता है।
लेकिन:
वर्गोत्तम = हर परिस्थिति में शुभ होगा ऐसा कहना सही नहीं है।
ग्रह की प्राकृतिक प्रकृति, भावाधिपत्य, भावस्थिति, दृष्टि, युति और संपूर्ण कुंडली देखना आवश्यक है।

18. D9 में उच्च और नीच ग्रह
यदि कोई ग्रह D9 में उच्च राशि में हो तो उसकी सूक्ष्म शक्ति का शुभ संकेत मिल सकता है।
यदि नीच राशि में हो तो ग्रह के फल में कमजोरी का संकेत मिल सकता है।
लेकिन फिर वही नियम:
केवल D9 की एक स्थिति देखकर अंतिम फल नहीं।
D1 + D9 + दशा + संबंधित भाव = समग्र फल।

19. D9 में भावों का अर्थ
D9 में भी 12 भाव होते हैं।
संक्षेप में:
भाव
मुख्य विषय
1
स्वयं, व्यक्तित्व, जीवन-दृष्टि
2
परिवार, वाणी, विवाह के बाद परिवार
3
प्रयास, साहस, संचार
4
सुख, गृहस्थ सुख, मानसिक शांति
5
बुद्धि, संस्कार, प्रेम, संतान
6
संघर्ष, ऋण, रोग, विवाद
7
विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी
8
वैवाहिक गहराई, परिवर्तन, संयुक्त विषय
9
धर्म, भाग्य, गुरु, सिद्धांत
10
कर्म, उत्तरदायित्व, कार्य
11
लाभ, इच्छापूर्ति, सामाजिक संबंध
12
व्यय, त्याग, शयन, निजी जीवन

20. D9 फलित का स्वर्णिम नियम
विद्यार्थियों को यह सूत्र लिखवा दें:
“नवांश को जन्मकुंडली से अलग करके नहीं, बल्कि जन्मकुंडली के साथ पढ़ना चाहिए।”
और दूसरा:
“D1 घटना का आधार बताता है, D9 उस घटना की सूक्ष्म गुणवत्ता और ग्रह की शक्ति को समझने में सहायता करता है।”

21. D9 फलादेश की आदर्श क्रम-पद्धति
किसी भी कुंडली में D9 पढ़ते समय:
① D1 लग्न और लग्नेश
② D1 संबंधित भाव
③ संबंधित भावेश
④ कारक ग्रह
⑤ D9 लग्न
⑥ D9 लग्नेश
⑦ D9 संबंधित भाव
⑧ D9 संबंधित भावेश
⑨ संबंधित कारक ग्रह की D9 स्थिति
⑩ वर्गोत्तम/उच्च/नीच/स्वक्षेत्र आदि
⑪ D1 और D9 के बीच सामंजस्य
⑫ दशा
⑬ गोचर
इस क्रम से फलादेश करने पर विश्लेषण अधिक व्यवस्थित होगा।

22. विद्यार्थियों को होने वाली सामान्य गलतियाँ
गलती 1
D9 को केवल विवाह की कुंडली मानना।
गलती 2
D9 देखकर अकेले फलादेश करना।
गलती 3
ग्रह का नवांश निकालते समय 3°20′ की सीमा गलत लगाना।
गलती 4
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के प्रारंभिक नवांश को भूल जाना।
गलती 5
D1 और D9 के संबंध को न देखना।
गलती 6
सिर्फ उच्च/नीच देखकर फलादेश कर देना।
गलती 7
वर्गोत्तम को स्वतः पूर्ण शुभ मान लेना।
गलती 8
दशा को छोड़ देना।

23. कक्षा में अभ्यास के लिए सरल उदाहरण
विद्यार्थियों को ये तीन ग्रह देकर नवांश निकलवाएँ:
सूर्य — मेष 12°15′
मेष का:
0–3°20′ मेष
3°20′–6°40′ वृषभ
6°40′–10° मिथुन
10°–13°20′ कर्क
अतः सूर्य का D9:
कर्क

दूसरा:
चंद्र — वृषभ 15°00′
वृषभ का पाँचवाँ नवांश:
वृषभ
अतः:
D9 चंद्र = वृषभ

तीसरा:
मंगल — मिथुन 22°00′
मिथुन:
1 तुला
2 वृश्चिक
3 धनु
4 मकर
5 कुंभ
6 मीन
7 मेष
20°00′–23°20′ = सातवाँ नवांश
अतः:
D9 मंगल = मेष

इस प्रकार विद्यार्थियों को पहले स्वयं गणना करवाएँ, फिर उत्तर बताएं।

सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
D9 अर्थात नवांश को समझने के लिए विद्यार्थियों को चार बातें बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए:
1. 30° ÷ 9 = 3°20′
2. प्रत्येक ग्रह की D9 राशि उसके D1 के सटीक अंश से निर्धारित होती है।
3. नवांश राशि का प्रारंभ चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के नियम से निर्धारित होता है।
4. फलादेश में D1 और D9 को साथ पढ़ना चाहिए; D9 अकेले अंतिम निर्णय का आधार नहीं है।

यदि आप इसे आगे उच्च स्तर की पाराशरी कक्षा के रूप में पढ़ाना चाहते हैं, तो अगला चरण होना चाहिए—�⁠“D9 के 108 नवांश, नवांश गणना की गणितीय विधि, D9 में ग्रहों की शक्ति, वर्गोत्तम, पुष्कर नवांश, वेशी/वोशी आदि योगों से संबंध, D1+D9 संयुक्त फलादेश तथा विवाह के 5–6 वास्तविक उदाहरणों पर पूर्ण केस-स्टडी”।

रविवार, 6 सितंबर 2026

D7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?

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कक्षा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पाराशरी ज्योतिष के आधार पर सप्तमांश (D-7) चार्ट का यह एक विस्तृत और स्टेप-बाय-स्टेप (Step-by-Step) पाठ है। इसे आप अपनी कक्षा में एक रूपरेखा (Framework) की तरह उपयोग कर सकते हैं।

विषय: सप्तमांश चार्ट (D-7) का पूर्ण विश्लेषण

1. D-7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?
​परिभाषा: वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली (D-1) के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए 16 वर्गीय कुंडलियों (षोडश वर्ग) का निर्माण किया जाता है। इनमें से 7वीं वर्गीय कुंडली को 'सप्तमांश' या D-7 चार्ट कहा जाता है।
​गणितीय आधार: एक राशि 30 डिग्री (अंश) की होती है। जब हम एक राशि को 7 बराबर भागों में बाँटते हैं, तो एक भाग 4 अंश, 17 कला और 8.5 विकला (4^\circ 17' 8.5'') का होता है। इसी एक भाग को 'सप्तमांश' कहते हैं।
​सरल शब्दों में: जन्म कुंडली के ग्रहों की डिग्री को 7 भागों में बाँटकर जो नई कुंडली बनती है, वह D-7 है।

2. D-7 चार्ट बनता कैसे है और ग्रहों को रखने का नियम क्या है?
​D-7 चार्ट बनाने के लिए महर्षि पाराशर ने विषम (Odd) और सम (Even) राशियों के लिए अलग-अलग नियम बताए हैं।
डिग्री का विभाजन (7 भाग):


ग्रहों को स्थापित करने के नियम:
विषम राशि नियम - (1, 3, 5, 7, 9, 11 - मेष, मिथुन, सिंह आदि): यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में विषम राशि में है, तो D-7 में उसकी गिनती उसी राशि से शुरू करनी है जिस राशि में वह ग्रह लग्न कुंडली में उपस्थित है। फिर देखना यह है कि वह ग्रह कितने डिग्री का है। उसी आधार पर सप्तांश के जिस भाग में वह अंश पड़ेंगे उसी भाव में वह ग्रह सप्तांश कुंडली में रखा जाएगा। 

सम राशि नियम - (2, 4, 6, 8, 10, 12 - वृषभ, कर्क, कन्या आदि): यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में सम राशि में है, तो D-7 में उसकी गिनती उस राशि से, जिस राशि में वह ग्रह लग्न कुंडली में है, उससे सातवीं जो राशि पड़ेगी, उस से शुरू करनी है। फिर देखना यह है कि वह ग्रह कितने डिग्री का है। उसी आधार पर सप्तांश के जिस भाग में वह अंश पड़ेंगे उसी भाव में वह ग्रह सप्तांश कुंडली में रखा जाएगा। 

उदाहरण से समझें:
​उदाहरण 1 (विषम राशि): मान लीजिए सूर्य जन्म कुंडली (D-1) में मेष राशि (विषम) में 10 डिग्री पर है।
​10 डिग्री तीसरे सप्तमांश (8° 34' से 12° 51') में आता है।
​चूँकि मेष विषम राशि है, हम गिनती मेष से ही शुरू करेंगे: 1. मेष, 2. वृषभ, 3. मिथुन।
​निष्कर्ष: D-7 चार्ट में सूर्य मिथुन (3 नंबर) राशि में बैठेगा।

​उदाहरण 2 (सम राशि): मान लीजिए चंद्रमा जन्म कुंडली में वृषभ राशि (सम) में 15° पर है।
​15° चौथे सप्तमांश (12° 51' से 17° 8') में आता है।
​वृषभ सम राशि है, इसलिए गिनती वृषभ से 7वीं राशि यानी वृश्चिक से शुरू होगी।
​वृश्चिक से 4 गिनें: 1. वृश्चिक, 2. धनु, 3. मकर, 4. कुंभ।
​निष्कर्ष: D-7 चार्ट में चंद्रमा कुंभ (11 नंबर) राशि में बैठेगा।

3. D-7 चार्ट क्यों देखा जाता है?
​कक्षा में छात्रों को यह स्पष्ट करें कि D-1 का 5वाँ भाव जो बताता है, D-7 उसकी सूक्ष्म 'X-Ray' रिपोर्ट है।
​संतान सुख (Progeny): व्यक्ति को जीवन में संतान का सुख है या नहीं? संतान उत्पत्ति में कोई बाधा तो नहीं?
​संतान का भविष्य और स्वास्थ्य: बच्चों का स्वास्थ्य, उनका करियर और माता-पिता के साथ उनके संबंध कैसे रहेंगे।
​रचनात्मकता (Creativity): सिर्फ जैविक संतान ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के 'ब्रेन चाइल्ड' यानी उसकी रचनात्मक कृतियाँ, किताबें, या प्रोजेक्ट्स भी D-7 से देखे जाते हैं।
​वंश वृद्धि: परिवार का नाम आगे चलेगा या नहीं।

4. D-7 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​लग्न का निर्धारण बिल्कुल ग्रहों की तरह ही होता है।
​जन्म कुंडली (D-1) में लग्न की जो सटीक डिग्री (अंश और कला) है, उसे नोट करें।
​देखें कि जन्म कुंडली का लग्न सम राशि में है या विषम राशि में।
​उसी 'सम-विषम' नियम (जो ऊपर ग्रहों के लिए बताया गया है) का पालन करते हुए सप्तमांश की गिनती करें।
​जो राशि प्राप्त होगी, वही D-7 चार्ट का लग्न (Ascendant) बन जाएगी और उसी के आधार पर बाकी 12 भावों का निर्माण होगा।

5. D7 चार्ट का फलादेश कैसे करें? (विस्तृत नियम)
​D7 चार्ट का फलित करते समय नीचे दिए गए मुख्य कारकों और नियमों का अध्ययन अनिवार्य है:

​A. मुख्य भावों की भूमिका
​1st House (D7 का लग्न): जातक की स्वयं की क्षमता और संतानोत्पत्ति की शारीरिक क्षमता/सृजन शक्ति।

​5th House: प्रथम संतान, प्राथमिक शिक्षा, मेधा शक्ति।

​7th House: द्वितीय संतान (5th से 3rd भाव), जीवनसाथी का सहयोग संतान प्राप्ति में।

​9th House: तृतीय संतान (7th से 3rd भाव), संतान का भाग्य और उच्च संस्कार।

​6th, 8th, 12th House: संतान प्राप्ति में बाधा, बीमारी, कष्ट या दूरी।

B. मुख्य कारक ग्रह (Significators)
​गुरु (Jupiter): संतान का प्राकृतिक कारक (Natural Significator)।
​शुक्र व मंगल: गर्भाधान और सृजन शक्ति (Spur/Ovum dynamics) के कारक।

C. चरणबद्ध फलादेश नियम (Step-by-Step Analysis Rules)

​D1 और D7 का समन्वय (Cross-Verification):
​सबसे पहले D1 के 5वें भाव, पंचमेश और गुरु की स्थिति देखें।
​यदि D1 में संतान योग कमजोर है लेकिन D7 में 1st, 5th और 9th भाव मजबूत हैं, तो उपचार और समय के साथ संतान सुख अवश्य मिलता है।

​D7 लग्न और लग्नेश की स्थिति:
​D7 का लग्नेश बलि होकर शुभ भावों (1, 4, 5, 7, 9, 10) में हो, तो संतान सुख सुलभ होता है।
​यदि D7 लग्नेश 6, 8, या 12वें भाव में अस्त, नीच या राहु-केतु अक्ष पर हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या चिंताएं आती हैं।

5वें भाव और पंचमेश का विश्लेषण:
​D7 के 5वें भाव पर शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र, शुभ बुध, चंद्र) की दृष्टि या उपस्थिति शुभ संतान देती है।

​पाप ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल, सूर्य) का प्रभाव विलंब, गर्भपात (Miscarriage), या शल्य चिकित्सा (C-section) का कारण बनता है।

संतान के लिंग (Gender Prediction) के सामान्य संकेत:
पुरुष संतान: 5वें भाव/पंचमेश पर पुरुष राशियों (1, 3, 5, 7, 9, 11) या पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) का प्रभाव।

स्त्री संतान: 5वें भाव/पंचमेश पर स्त्री राशियों (2, 4, 6, 8, 10, 12) या स्त्री ग्रहों (शुक्र, चंद्र) का प्रभाव।
​(नोट: वर्तमान युग में लिंग निर्णय से अधिक ध्यान संतान के स्वास्थ्य एवं समृद्धि पर देना चाहिए।)

दशा और गोचर का उपयोग:
​संतान प्राप्ति सदैव D1 या D7 के पंचमेश, लग्नेश, या गुरु की महादशा/अंतरदशा में होती है।
​गोचर में गुरु का प्रभाव D1 या D7 के 5वें भाव या 5वेंेश पर होना संतान आगमन का समय तय करता है।

क्लास के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र (Pro Tip):
विद्यार्थियों को बताएं कि कभी भी D-7 को स्वतंत्र रूप से (अकेले) नहीं देखना चाहिए। हमेशा पहले D-1 (लग्न कुंडली) में संतान का प्रॉमिस चेक करें, उसके बाद सूक्ष्मता के लिए D-7 पर जाएँ। यदि D-1 में ही बीज नहीं है, तो D-7 फसल नहीं दे सकता।






​1. D7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में सप्तमांश (D7) महर्षि पाराशर द्वारा वर्णित 16 वर्ग कुंडलियों (षोडशवर्ग) में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।

2. D7 चार्ट कैसे बनता है और ग्रहों को रखने का नियम (उदाहरण सहित)
​सप्तमांश कुंडली बनाने का नियम सम (Even) और विषम (Odd) राशियों पर आधारित होता है।
​(A) राशि विभाजन तालिका (Degree Brackets)

D4 चार्ट (चतुर्थांश) का पूर्ण विश्लेषण

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d4 चार्ट (चतुर्थांश कुंडली / Chaturthamsa Chart) वैदिक ज्योतिष का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग चार्ट (Divisional Chart) है। यह मुख्य रूप से व्यक्ति की अचल संपत्ति, वाहन, घरेलू सुख, माता के सुख और भाग्य के निर्माण का सूक्ष्म विश्लेषण करने के लिए उपयोग किया जाता है।
​कक्षा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसका क्रमबद्ध और व्यावहारिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
​1. D4 चार्ट (चतुर्थांश) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में महर्षि पराशर ने लग्न कुंडली के 12 भावों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए 16 प्रकार के वर्ग चार्ट (षोडशवर्ग) बताए हैं।
​D4 का अर्थ है — जन्म राशि (30°) को 4 बराबर भागों में बांटना।
​प्रत्येक भाग (चतुर्थांश) 7° 30' (7 डिग्री 30 मिनट) का होता है।
​लग्न कुंडली का चतुर्थ भाव (4th House) अचल संपत्ति, माता और सुख का होता है। D4 चार्ट उसी चतुर्थ भाव का विस्तृत और गहराई से अध्ययन करने के लिए बनाया गया माइक्रोस्कोपिक व्यू है।
​2. D4 चार्ट बनता कैसे है? (गणितीय और तकनीकी विधि)
​एक राशि 30° की होती है। इसे 4 बराबर भागों में विभाजित करने पर प्रत्येक भाग का मान निम्न प्रकार होता है:

D4 में ग्रहों और लग्न को स्थापित करने का नियम:
​प्रथम भाग (0° - 7° 30'): ग्रह/लग्न उसी राशि में रहेगा जिसमें वह लग्न कुंडली में है।
​द्वितीय भाग (7° 30' - 15°): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 4th राशि (चतुर्थ राशि) में जाएगा।
​तृतीय भाग (15° - 22° 30'): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 7th राशि (सप्तम राशि) में जाएगा।
​चतुर्थ भाग (22° 30' - 30°): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 10th राशि (दशम राशि) में जाएगा।
​याद रखने की ट्रिक (कक्षा के लिए): 1 - 4 - 7 - 10 का नियम (केन्द्र भावों का अनुक्रम)।

​3. D4 चार्ट क्यों देखा जाता है? (महत्व और उपयोगिता)
​लग्न कुंडली से चतुर्थ भाव की सामान्य जानकारी मिलती है, लेकिन सटीक फलादेश के लिए D4 चार्ट देखा जाता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
​अचल संपत्ति (Real Estate): भूमि, मकान, प्लॉट, दुकान या भवन का निर्माण होगा या नहीं।
​वाहन सुख (Vehicles): व्यक्ति के पास अपने वाहन होंगे या नहीं, और वाहनों का सुख कैसा रहेगा।
​अचानक मिला भाग्य/पैतृक संपत्ति (Inheritance): वसीयत या गड़ा हुआ धन मिलने के योग।
​माता का स्वास्थ्य और सुख: माता के साथ संबंध और उनका जीवन।
​स्थायी निवास/स्थानान्तरण (Relocation): व्यक्ति अपने जन्मस्थान पर घर बनाएगा या विदेश/दूसरे शहर में संपत्ति खरीदेगा।
​मानसिक शांति और घरेलू वातावरण: घर का माहौल सौहार्दपूर्ण रहेगा या क्लेशयुक्त।

​4. D4 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​D4 चार्ट का लग्न निर्धारित करने के लिए लग्न कुंडली के लग्न की सटीक डिग्री देखी जाती है।
​उदाहरण द्वारा समझें:
​मान लीजिए लग्न कुंडली में मेष राशि (Aries) का लग्न 18° 45' पर है।
​डिग्री चेक करें: 18° 45' तीसरे भाग (15^\circ \text{ से } 22^\circ 30') में आता है।
​नियम लागू करें: नियम के अनुसार, तीसरा भाग 7th राशि को दर्शाता है।
​गणना करें: मेष (1) से 7वीं राशि कौन-सी होगी? तुला राशि (Libra - 7)।
​परिणाम: D4 चार्ट में तुला राशि का लग्न बनेगा और तुला से ही 12 भावों की गिनती होगी।
​(इसी प्रकार सभी 9 ग्रहों की डिग्री देखकर D4 चार्ट के 12 भावों में उन्हें बैठाया जाता है।)

​5. D4 चार्ट का फलादेश कैसे किया जाता है? (स्टेप-बाय-स्टेप फलादेश नियम)
​कक्षा में विद्यार्थियों को फलादेश सिखाते समय निम्नलिखित 5 चरणों का पालन कराएं:

कक्षा में पढ़ाने के लिए मुख्य "थम्ब रूल्स" (Key Takeaways):
​6th, 8th, 12th House का प्रभाव: D4 में चतुर्थ भाव पर 6ठे भाव के स्वामी का प्रभाव हो तो संपत्ति के लिए लोन (ऋण) लेना पड़ता है या कोर्ट केस होता है। 8वें भाव का प्रभाव हो तो पैतृक संपत्ति में अड़चनें आती हैं। 12वें भाव का प्रभाव जन्मस्थान से दूर घर बनने का संकेत देता है।
​राहु-केतु का प्रभाव: D4 के चतुर्थ भाव में राहु या शनि हो तो घर में वास्तु दोष या घरेलू अशांति रहती है।

​1. D3 चार्ट (द्रेष्काण कुंडली) क्या होता है?

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 ​1. D3 चार्ट (द्रेष्काण कुंडली) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में महर्षि पराशर द्वारा 16 प्रकार की सूक्ष्म कुंडलियों (षोडशवर्ग) का उल्लेख किया गया है, जिनमें से D3 या द्रेष्काण कुंडली (Drekkana Chart) अति महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।
​अर्थ: 'द्रेष्काण' शब्द संस्कृत के 'त्रि-अंश' (तीन भाग) से बना है। जब किसी एक राशि (30°) को 3 बराबर भागों में बांटा जाता है, तो प्रत्येक भाग 10^\circ का होता है। इसे ही एक 'द्रेष्काण' कहते हैं।
​मुख्य विचार: D3 कुंडली मूल रूप से व्यक्ति के अनुज/अग्रज (भाई-बहन), पराक्रम, साहस, ऊर्जा, तीसरे भाव से जुड़े विषय तथा शारीरिक बल एवं अंगों के विभाजन को देखने के लिए प्रयोग की जाती है।

2. D1 (लग्न कुंडली) से D3 चार्ट बनता कैसे है?
​किसी राशि का मान (30°) होता है। इसे तीन बराबर भागों में बांटने का नियम निम्नलिखित है:
नियम याद रखने की ट्रिक (1-5-9 सूत्र):
D3 चार्ट पूर्णतः त्रिकोण सिद्धांत (1, 5, 9) पर आधारित है। पहला भाग स्वयं वही राशि, दूसरा भाग उसी तत्व की अगली राशि (5वीं), और तीसरा भाग उसी तत्व की तीसरी राशि (9वीं) होती है।

3. D3 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​D3 चार्ट का लग्न निकालने के लिए हमें D1 (लग्न कुंडली) के लग्न के अंश (Ascendant Degree) और उसकी राशि को देखना होता है।
​लग्न निर्धारण प्रक्रिया:
​D1 में लग्न राशि और उसके सटीक अंश नोट करें।
​देखें कि अंश 
0°-10°, 
10° -20°, 
या 20°-(30°) में से किस वर्ग में आते हैं।
​उपर्युक्त 1-5-9 नियम लागू करके D3 का लग्न तय करें।
​उदाहरण:
​मान लीजिए D1 में लग्न मिथुन (3) है और लग्न के अंश 14° हैं।
​14° द्वितीय द्रेष्काण (10°-20°) में आता है।
​मिथुन से 5वीं राशि = तुला (7)।
​अतः, D3 कुंडली का लग्न तुला (7) बनेगा।

4. D3 चार्ट में ग्रहों को रखने का सही नियम (उदाहरण सहित)
​ग्रहों को D3 में स्थापित करने के लिए भी वही 1-5-9 का नियम लागू होता है जो लग्न निर्धारण के लिए प्रयोग किया जाता है।
​नियम विस्तार:
​यदि ग्रह 0^\circ - 10^\circ के बीच है: ग्रह D3 में उसी राशि में रहेगा जिसमें वह D1 में है।
​यदि ग्रह 10^\circ1' - 20^\circ के बीच है: ग्रह D3 में अपनी D1 राशि से 5वीं राशि में जाएगा।
​यदि ग्रह 20^\circ1' - (30°) के बीच है: ग्रह D3 में अपनी D1 राशि से 9वीं राशि में जाएगा।

व्यावहारिक उदाहरण (D1 से D3 में परिवर्तन):
​मान लीजिए किसी जातक की D1 कुंडली और ग्रहों के अंश इस प्रकार हैं:
D3 का जो लग्न निकला है, उसमें राशियों को क्रमानुसार 1 से 12 भावों में लिखकर उपर्युक्त गणना के आधार पर ग्रहों को D3 के संबंधित भावों/राशियों में स्थापित कर दिया जाता है।

5. D3 चार्ट क्यों देखा जाता है?
​पाराशरी सिद्धांत के अनुसार D1 शरीर है, तो वर्ग कुंडलियां उस शरीर के विशिष्ट अंग व विषय हैं। D3 मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से देखा जाता है:
​भाई-बहनों का विचार (Siblings): छोटे व बड़े भाई-बहनों का सुख, उनका स्वभाव, संबंध तथा उनके जीवन की स्थिति।
​पराक्रम व साहस (Courage & Effort): जातक का आत्मबल, मेहनत करने की क्षमता और रिस्क लेने की प्रवृत्ति।
​शारीरिक अंग व स्वास्थ्य (Medical Astrology): D3 चार्ट से शरीर के मुख्य भागों का क्षय या रोग (जैसे- सिर, छाती, हाथ, फेफड़े) देखा जाता है।
​आयु और मृत्यु का सूक्ष्म विचार: ३रा और ८वां भाव आयु से संबंधित हैं; द्रेष्काण से '22वां द्रेष्काण' निकालकर मृत्यु के कारण व समय का विचार किया जाता है।
​यात्राएं (Short Travels): छोटी दूरी की यात्राएं और उनसे मिलने वाला लाभ/हानि।

6. D3 चार्ट का फलादेश (Analysis) कैसे किया जाता है?
​D3 चार्ट का सटीक विश्लेषण करने के लिए कक्षा में विद्यार्थियों को निम्नलिखित 5-चरणीय नियम सिखाएं:
​चरण 1: D3 के लग्न व लग्नेश की स्थिति
​D3 का लग्न मजबूत होना चाहिए। यदि D3 लग्नेश शुभ भावों (1, 4, 5, 7, 9, 10) में उच्च या मित्र राशि में स्थित है, तो जातक पराक्रमी होगा और उसे भाई-बहनों का सहयोग मिलेगा।
​यदि D3 लग्नेश 6, 8, या 12वें भाव में हो या पापक्रांत हो, तो पराक्रम में कमी या भाई-बहनों से मतभेद रहते हैं।
​चरण 2: तीसरे भाव (3rd House) और उसके स्वामी का विश्लेषण
​D3 का तीसरा भाव भाई-बहन और साहस का मुख्य केंद्र है।
​यदि 3रे भाव में शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध) हों, तो भाई-बहनों से संबंध मधुर होते हैं।
​यदि 3रे भाव में क्रूर/पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु) हों, तो जातक स्वयं बहुत साहसी होता है, परंतु भाई-बहनों के साथ तनाव या दूरी संभव है।
​चरण 3: कारक ग्रह 'मंगल' की स्थिति
​तीसरे भाव और D3 चार्ट का प्राकृतिक कारक मंगल (Mars) है।
​D3 में मंगल की स्थिति (बली/निर्बली) यह तय करती है कि जातक का वास्तविक पराक्रम और ऊर्जा का स्तर कैसा रहेगा।
​चरण 4: D1 और D3 का तुलनात्मक अध्ययन (Cross Verification)
​नियम: यदि D1 में 3रा भाव पीड़ित है, लेकिन D3 कुंडली अत्यंत मजबूत और शुभ स्थिति में है, तो अंतिम परिणाम अनुकूल प्राप्त होंगे। D3, D1 के वादों (Promises) की पुष्टि करता है।
​चरण 5: 22वें द्रेष्काण का सावधानीपूर्वक अवलोकन
​D1 के लग्न के अंशों के आधार पर जो 22वां द्रेष्काण (D1 के 8वें भाव का द्रेष्काण) बनता है, उसका स्वामी 'छिद्र ग्रह' या बाधक ग्रह कहलाता है। उसकी दशा-अंतरदशा में स्वास्थ्य और कष्टों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

D2 होरा वर्ग कुंडली विश्लेषण

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2. D2 होरा का शास्त्रीय आधार
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के षोडशवर्ग अध्याय में होरा के लिए स्पष्ट नियम दिया गया है।
मुख्य श्लोक का अंश है:
सूर्येन्द्वोर्विषमे राशौ समे तद्विपरीतकम् ॥
अर्थात विषम राशियों में सूर्य और चन्द्र की होरा का क्रम एक प्रकार से तथा सम राशियों में उसका विपरीत क्रम होता है। अगले श्लोक में सूर्य और चन्द्र होरा के अधिपत्य का उल्लेख है। 

प्रश्न - यदि केवल लग्न कुंडली उपलब्ध हो तो लग्न कुंडली से d2 चार्ट अर्थात होरा कुंडली कैसे बनाएं? लग्न कुंडली से होरा कुंडली का विश्लेषण कैसे करें, उदाहरण सहित समझाएं

यदि केवल D1 अर्थात जन्म/लग्न कुंडली उपलब्ध हो, तो उससे D2 (होरा) कुंडली बनाई जा सकती है। इसके लिए अलग जन्म-समय की आवश्यकता नहीं होती; D1 में प्रत्येक ग्रह की राशि में स्थिति के अंश (degree) देखकर उसे होरा में स्थान दिया जाता है।
1. D2 होरा कुंडली क्या है?
D1 = राशि/लग्न कुंडली
D2 = होरा कुंडली
राशि के 30° को दो समान भागों में बाँटने पर:
प्रथम होरा = 0°00′ से 15°00′
द्वितीय होरा = 15°00′ से 30°00′
इस प्रकार प्रत्येक राशि के भीतर दो होरे होते हैं।
परंपरागत पराशरी होरा-विभाजन में:
विषम राशियाँ
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ
0°–15° → सूर्य की होरा
15°–30° → चन्द्र की होरा
सम राशियाँ
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
0°–15° → चन्द्र की होरा
15°–30° → सूर्य की होरा
इसे विद्यार्थी इस सरल सूत्र से याद कर सकते हैं:
विषम राशि — पहले सूर्य, फिर चन्द्र।
सम राशि — पहले चन्द्र, फिर सूर्य।

2. D1 से D2 बनाने की पूरी विधि
हर ग्रह के लिए केवल दो बातें देखनी हैं:
(1) ग्रह किस राशि में है?
(2) उस राशि में कितने अंश पर है?
फिर निर्धारित करें कि वह 0°–15° में है या 15°–30° में।
उदाहरण
मान लीजिए:
अब एक-एक करके देखें।
सूर्य — मेष 10°
मेष विषम राशि है।
10° प्रथम अर्ध में है।
विषम राशि का प्रथम होरा = सूर्य।
अतः सूर्य सूर्य-होरा में।

चन्द्र — वृषभ 20°
वृषभ सम राशि है।
20° द्वितीय अर्ध में है।
सम राशि का द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः चन्द्र सूर्य-होरा में।

मंगल — मिथुन 8°
मिथुन विषम राशि है।
8° प्रथम अर्ध में है।
प्रथम होरा = सूर्य।
अतः मंगल सूर्य-होरा में।

बुध — कर्क 25°
कर्क सम राशि है।
25° द्वितीय अर्ध में है।
द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः बुध सूर्य-होरा में।

गुरु — सिंह 12°
सिंह विषम राशि है।
12° प्रथम अर्ध में है।
प्रथम होरा = सूर्य।
अतः गुरु सूर्य-होरा में।

शुक्र — कन्या 18°
कन्या सम राशि है।
18° द्वितीय अर्ध में है।
द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः शुक्र सूर्य-होरा में।

शनि — मकर 7°
मकर सम राशि है।
7° प्रथम अर्ध में है।
सम राशि का प्रथम होरा = चन्द्र।
अतः शनि चन्द्र-होरा में।

राहु — तुला 22°
तुला विषम राशि है।
22° द्वितीय अर्ध में है।
विषम राशि का द्वितीय होरा = चन्द्र।
अतः राहु चन्द्र-होरा में।

3. लेकिन D2 कुंडली में ग्रह किस राशि में रखेंगे?
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।
पराशरी D2 में ग्रहों को सामान्यतः दो राशियों—सिंह और कर्क—में ही रखा जाता है।
सूर्य-होरा → सिंह
चन्द्र-होरा → कर्क
इसलिए ऊपर के उदाहरण में:
4. D2 लग्न कैसे निकालेंगे?
यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है।
केवल ग्रहों की D2 स्थिति निकालना पर्याप्त नहीं है। D2 लग्न भी निकालना होता है।
D1 लग्न की राशि और उसके अंश देखें।
( एस्ट्रोसेज सॉफ्टवेयर में लग्न के अंश स्पष्ट रूप से लिखे होते हैं )
उदाहरण:
मान लें D1 में:
लग्न = मेष 18°20′
मेष विषम राशि है।
18°20′ → द्वितीय होरा।
विषम राशि का द्वितीय होरा = चन्द्र होरा।
इसलिए D2 में लग्न कर्क होगा।
अर्थात:
D1 लग्न = मेष 18°20′
द्वितीय होरा
चन्द्र होरा
D2 लग्न = कर्क

5. एक पूरा उदाहरण
मान लें D1 में निम्न स्थिति है:
लग्न — मेष 18°20′
सूर्य — मेष 10°
चन्द्र — वृषभ 20°
मंगल — मिथुन 8°
बुध — कर्क 25°
गुरु — सिंह 12°
शुक्र — कन्या 18°
शनि — मकर 7°
राहु — तुला 22°
अब D2:
लग्न:
मेष 18°20′ → चन्द्र होरा → कर्क लग्न
सूर्य:
मेष 10° → सूर्य होरा → सिंह
चन्द्र:
वृषभ 20° → सूर्य होरा → सिंह
मंगल:
मिथुन 8° → सूर्य होरा → सिंह
बुध:
कर्क 25° → सूर्य होरा → सिंह
गुरु:
सिंह 12° → सूर्य होरा → सिंह
शुक्र:
कन्या 18° → सूर्य होरा → सिंह
शनि:
मकर 7° → चन्द्र होरा → कर्क
राहु:
तुला 22° → चन्द्र होरा → कर्क
तो D2 में बहुत सारे ग्रह सिंह में और कुछ ग्रह कर्क में आ गए।
यही D2 की विशेषता है—इसमें ग्रहों का वितरण केवल कर्क और सिंह के बीच दिखाई देता है।

6. D2 का मुख्य विषय क्या है?
D2 को मुख्यतः धन, संपत्ति, आर्थिक स्थिति और धन-संचय की क्षमता के अध्ययन में उपयोग किया जाता है।
विशेष रूप से देखा जाता है:-
◆ धन प्राप्ति की क्षमता
◆ धन का संचय
◆ आर्थिक स्थिरता
◆ पारिवारिक धन
◆ भौतिक समृद्धि
◆ धन के प्रति दृष्टिकोण
◆ आय को संपत्ति में बदलने की क्षमता
◆ आर्थिक उतार-चढ़ाव
◆ धन के उपयोग और संरक्षण की प्रवृत्ति
लेकिन एक विद्यार्थी को यह बात विशेष रूप से समझानी चाहिए:
D2 अकेले देखकर किसी व्यक्ति की पूरी आर्थिक स्थिति का निर्णय नहीं करना चाहिए।
D2 को D1 के साथ मिलाकर देखना अधिक उचित है।

7. D2 में सूर्य और चन्द्र का महत्व
चूँकि D2 मुख्यतः सूर्य-होरा और चन्द्र-होरा से बनता है, इसलिए सूर्य और चन्द्र के प्रतीकात्मक अर्थ महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सूर्य-होरा
सूर्य का संबंध माना जाता है:
● अधिकार
● आत्मबल
● नेतृत्व
● प्रतिष्ठा
● शासन
● स्वतंत्र आर्थिक क्षमता
● अपनी योग्यता से अर्जित धन
इसलिए D2 में सूर्य-होरा की प्रधानता होने पर व्यक्ति में स्वावलंबन और अपने प्रयास से आर्थिक स्थिति बनाने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है—लेकिन अंतिम निर्णय D1 के धन भावों से ही करना चाहिए।

चन्द्र-होरा
चन्द्र का संबंध माना जाता है:
● प्रवाह
● पोषण
● परिवार
● जनता
● परिवर्तनशीलता
● तरल संसाधन
● संरक्षण
अतः चन्द्र-होरा की प्रधानता में धन की प्राप्ति और उपयोग में प्रवाह/परिवर्तनशीलता का संकेत देखा जा सकता है।

8. D2 में सबसे पहले क्या देखें?
विद्यार्थियों को मैं यह क्रम सिखाने की सलाह दूँगा:
पहला — D2 लग्न देखें:
D2 लग्न कर्क है या सिंह?
लग्न में कौन-कौन से ग्रह हैं?
लग्नेश की स्थिति कैसी है?
D2 लग्न पर शुभ/पाप प्रभाव क्या है?
दूसरा — सूर्य और चन्द्र
D2 में:
सूर्य कहाँ है?
चन्द्र कहाँ है?
दोनों में कौन अधिक प्रभावशाली है?
सूर्य/चन्द्र पर शुभ या अशुभ प्रभाव है?
तीसरा — कर्क और सिंह का बल
क्योंकि D2 की संरचना ही मुख्यतः इन दोनों राशियों पर आधारित है, इसलिए:
कर्क = चन्द्र पक्ष
सिंह = सूर्य पक्ष
इन दोनों की स्थिति को ध्यान से देखें।
चौथा — ग्रहों की संख्या
कितने ग्रह:
सूर्य-होरा में हैं?
चन्द्र-होरा में हैं?
लेकिन केवल संख्या देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
ग्रहों की प्रकृति और D1 में उनकी वास्तविक स्थिति भी देखनी होगी।

9. उदाहरण से D2 का विश्लेषण
ऊपर के उदाहरण में:
D2 लग्न = कर्क
और:
सिंह में: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र
कर्क में: शनि, राहु
यहाँ सूर्य-होरा अत्यधिक प्रधान है।
इससे प्रथम स्तर पर यह संकेत मिल सकता है कि जातक के आर्थिक विषयों में:
स्वप्रयास
अधिकार
नेतृत्व
अपनी योग्यता
प्रतिष्ठा
कार्यक्षमता
का महत्व अधिक हो सकता है।
लेकिन दूसरी ओर कर्क में शनि और राहु होने से आर्थिक मामलों में कुछ प्रकार की रुकावट, विलंब, अस्थिरता अथवा जटिलता के संकेत हो सकते हैं।
परंतु यह अंतिम फलादेश नहीं है।
अब D1 देखना आवश्यक होगा।

10. D1 से D2 का संबंध कैसे जोड़ें?
मान लें D1 में:
द्वितीय भावेश मजबूत है।
एकादश भावेश मजबूत है।
गुरु शुभ स्थिति में है।
पंचम और नवम भाव से धन भावों का संबंध है।
और D2 में भी सूर्य/चन्द्र पक्ष बलवान है।
तब D1 + D2 मिलकर आर्थिक क्षमता के पक्ष में अधिक मजबूत संकेत देंगे।

इसके विपरीत:
यदि D1 में:
द्वितीय भाव पीड़ित
द्वितीयेश निर्बल
एकादश भाव पीड़ित
एकादशेश निर्बल
और D2 में भी पाप प्रभाव अधिक हो, तो आर्थिक संघर्ष की संभावना अधिक गंभीरता से देखी जाएगी।

11. एक बहुत महत्वपूर्ण नियम
D1 बताता है कि धन का योग कहाँ और किस प्रकार बन रहा है।
D2 बताता है कि उस धन-संबंधी विषय की सूक्ष्म शक्ति और आर्थिक प्रकृति कैसी है।
इसे विद्यार्थी इस प्रकार याद कर सकते हैं:
D1 = धन का मूल आधार
D2 = धन की सूक्ष्म शक्ति/आर्थिक स्वरूप
लेकिन D2 को स्वतंत्र रूप से फलित करना उचित नहीं है।

12. D2 में ग्रहों के फल को कैसे समझें?
उदाहरण के लिए यदि D2 में सूर्य-होरा में:
गुरु है → आर्थिक विषयों में गुरु के कारकत्व का सहयोग देखा जा सकता है।
बुध है → व्यापार, गणना, वाणिज्य, लेखन, बुद्धि, संचार आदि के माध्यम से आर्थिक संबंधों की संभावना देखी जा सकती है।
शुक्र है → सुख-सुविधा, कला, सौंदर्य, विलास, वाहन आदि से संबंधित आर्थिक विषयों का संकेत मिल सकता है।
शनि है → श्रम, सेवा, उद्योग, दीर्घकालीन प्रयास, विलंब आदि से धन संबंधी संकेत देखे जा सकते हैं।
लेकिन इन ग्रहों का फल D1 में उनके स्वामित्व, स्थिति, युति, दृष्टि, दशा और बल से संशोधित होगा।

13. राहु-केतु को लेकर सावधानी
D2 की गणना की अलग-अलग परंपराएँ मिलती हैं, विशेषतः सूक्ष्म-वर्ग कुंडलियों में।
इसलिए विद्यार्थियों को पहले यह निश्चित करना चाहिए कि वे किस परंपरा की D2 पद्धति पढ़ रहे हैं।
पराशरी/राशि-आधारित होरा में मुख्य गणना सूर्य और चन्द्र होरा के आधार पर की जाती है और D2 का मूल ढाँचा सिंह-कर्क पर आधारित माना जाता है।

14. D2 बनाने का सबसे आसान सूत्र
इसे कक्षा में बोर्ड पर इस तरह लिख सकते हैं:
राशि के 30° ÷ 2 = 15°
फिर:
विषम राशि
0°–15° = सूर्य → सिंह
15°–30° = चन्द्र → कर्क
सम राशि
0°–15° = चन्द्र → कर्क
15°–30° = सूर्य → सिंह
बस।

15. विद्यार्थियों के लिए अभ्यास
उन्हें यह अभ्यास दें:
मान लें:
लग्न — कन्या 13°
सूर्य — मिथुन 21°
चन्द्र — मकर 8°
मंगल — वृश्चिक 17°
बुध — तुला 4°
गुरु — धनु 27°
शुक्र — वृषभ 11°
शनि — कुंभ 19°
अब प्रत्येक के सामने लिखें:
राशि → विषम/सम → अंश → प्रथम/द्वितीय होरा → सूर्य/चन्द्र होरा → D2 राशि
इस अभ्यास से D2 बनाना पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।

एक पंक्ति में पूरा नियम
D1 में ग्रह जिस राशि में जितने अंश पर है, उस राशि के पहले 15° या बाद के 15° का निर्धारण करें; राशि विषम हो तो पहले सूर्य और बाद में चन्द्र, तथा राशि सम हो तो पहले चन्द्र और बाद में सूर्य; सूर्य होरा को सिंह और चन्द्र होरा को कर्क में रखकर D2 तैयार करें।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

27 नक्षत्र विश्लेषण

Vedic Astro Care
✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।

✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...

"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां
 ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।
 द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥" 
                 (दुण्डिराज )

✓•जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।

 ✓•दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है। 

✓•२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।

✓•१. अश्विनीनक्षत्र...
 इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है। 

इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।

✓•२. भरणी नक्षत्र...
 इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।

✓•३. कृत्तिका नक्षत्र...
यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।

 सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।

✓•४. रोहिणी नक्षत्र...
इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।

✓•५. मृगशिरा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है। 

इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।

✓•६. आर्द्रा नक्षत्र...
यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।

इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।

✓•७. पुनर्व नक्षत्र...
यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।

 नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।

 चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।

✓•८. पुष्य नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।

✓•९. आश्लेषा यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।

✓•१०. मघा नक्षत्र...
यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।

✓•११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...
शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।

✓•१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है। 

इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।

✓•१३. हस्त नक्षत्र ...
यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है। 

✓•१४. चित्रा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।

 इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।

 इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।

✓•१५. स्वानी नक्षत्र...
राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।

✓•१६. विशाखा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में  ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।

 शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।

 मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।

✓•१७. अनुराधा नक्षत्र...
वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है। 

इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।

✓•१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....
 यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है। 

इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।

✓•१९ मूल नक्षत्र...
 इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।

 इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।

✓•२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...
 यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।

✓•२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...
सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।

 इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।

✓•२२. श्रवण नक्षत्र....
 इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ये विद्वान् होकर भी दुःखी होते हैं।

✓•२३. धनिष्ठा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का पूर्वार्ध मकर राशि में २३° २०' से लेकर ३०° तक तथा उत्तरार्ध कुम्भराशि में से ६° ४०' पर्यन्त फैला है। नक्षत्र स्वामी मंगल है। घुटना और उसके नीचे का भाग इसके प्रभाव क्षेत्र ० में है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर घुटने में व्रण बोट होने से लंगड़पन होता है। पूर्वार्धजात जातक अधिकांशतः अदूरदर्शी, उन्नति में व्यवधानपाने वाले शोचनीय आर्थिक स्थिति में रहने वाले श्रम एवं संघर्ष से उन्नति को प्राप्त होने वाले, स्त्री प्रेमी, क्रोधी, अभिमानी, लोहकर्मी, वाहन चालक, चालाक, घोर स्वार्थी, अवीर्यवान्, अपशब्दों का प्रयोग करने वाले, असंयत तथा पशुपालक होते हैं। उत्तरार्धजात जातक शीघ्रकोपी, शीघ्र उतेजित होने वाले वादविवाद करने वाले झगड़ालू, कार्य तत्पर, वैज्ञानिक मस्तिष्क, अनुसंधित्सु तकनीकी कार्यों में निपुण, परिश्रमी तथा तीव्र स्वरोच्चार करने वाले होते हैं। ये हृष्टपुष्ट, अध्यवसायी, व्यस्त मनोवृत्ति तथा गम्भीर होते हैं। अपने को धनी दिखाने की चेष्टा में ये दान भी देते हैं।

✓•२४. शतभिषा नक्षत्र ...
इसका स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुम्भराशि में ६° ४०' से लेकर २०° पर्यन्त व्याप्त है। घुटने तथा ऐड़ी के बीच के भाग पर इसका प्रभाव आँका जाता है। इसके दूषित होने पर टाँगों में दर्द या टाँग की क्षति होती है। टोंग की पेशियाँ अशक्त वा ढीली पड़ जाती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर शनि और राहु का मिश्र प्रभाव होता है। ऐसे जातक अच्छी सूझबूझवाले तेजतर्रार मौलिक विचारधारा के धैर्यवान, अध्यवसायी, अतिवादी, उप, आलसी, अकर्मण्य, तंद्रिल, आरामपसन्द, सुस्त, ऐकान्तिक, प्राचीनता के पोषक, कूटनीतिज्ञ, छिद्रान्वेषी, भुलक्कड़, तृष्णालु होते हैं। अधिकतर ये सेवाकर्मी बिना सोचविचार के कार्य में जुट जाने वाले तथा मशीनी एवं तकनीकी कार्यों में रुचि लेने वाले होते हैं। ये प्रकृतितः उच्चविचार वाले, साधुसेवी, कट्टरपंथी, अहंकारी, हठी तथा अद्भुतकल्पनाशील होते हैं।

✓•२५. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र...
इसनक्षत्र के प्रथम तीन चरण कुम्भराशि में २०° से ३०° पर्यन्त तथा शेष चौथा चरण मीन राशि में ०° से ३°२०' पर्यन्त व्याप्त रहता है। इस नक्षत्र का अधिपति गुरु है। टाँग का निचला भाग, टखने है एवं ऐड़ी का ऊपरी भाग इस के प्रभाव में रहते हैं। इसके दूषित होने पर रखने की हड्डी में मोच, सूजन तथा गतिविक्षेप होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक शनि और गुरु के प्रभाव में रहते हैं। प्रथमतीन चरणों के अन्तर्गत जन्मने वाले अधिकांश लोग ईश्वरभक्त, स्त्रियों से संकोच करने वाले, आराम पसन्द, पूजापाठ में लीन रहने वाले होते हैं। ये अनायास सफलता प्राप्त करते हैं, वृद्धावस्था में अकस्मात् धन प्राप्त करते हैं। ये यात्राप्रिय, कवि, लेखक विधिज्ञ एवं सतर्क होते हैं। शिक्षण कार्य में विशेष रुचि होती है। ये मानवतापूर्ण व्यवहार करते हैं, आशावान् दार्शनिक ज्योतिषी वैयाकरण निस्स्वार्थी उदात्त हृदय शास्त्री एवं अनुशासित होते हैं। इस नक्षत्र पर बुरा प्रभाव होने पर ये नास्तिक, वेश्यागामी अशान्त एवं क्रूर जीवन जीते हैं। इस नक्षत्र के चौथे चरण में पैदा होने वाले दया की मूर्ति, महादानी, करुणासागर, ज्ञानी, सत्यव्रती, प्रियदर्शी, विनम्र, शुद्धात्मा तथा शान्तचित्त होते हैं। ये आजीविका के लिये सम्मानप्रद व्यवसाय का चयन करते हैं।

✓•२६. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। इसका अधिकार पाँव के ऊपरी भाग पर है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर नक्षत्रस्वामी शनि से संबंधित शारीरिक विकृतियाँ प्रकट होती हैं। सन्धिवात, स्नायुदौर्बल्य, उदरवायु कोप, आंत्रच्युति, सूखारोग, शीत, नर्सों का उभरना तथा पाँव में चोट लगती है। 

इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक शनि और गुरु के मिश्र गुणों से बने हुए होते हैं। अधिकांश जातक प्रसन्नचित्त, उन्नति के पथ पर अग्रसर होने वाले, स्त्रियों द्वारा मान पाने वाले, अकस्मात् हानि उठाने वाले, शत्रुओं से घिरे हुए, दैनन्दिन कार्यो में तन्द्रालु, विद्याव्यसनी, उच्चाचार युक्त एवं समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। ये दृढ़ चरित्र, उदार, मुक्तहस्त, सुरूप, निरपेक्ष चिन्तक, दीनसेवी होते हैं। धर्मशास्त्र के ज्ञाता, अर्थ सञ्चय में कुशल, बलिष्ठ और मध्यम काय होते हैं। पुरातात्विक खोजों में ये विशेषरुचि रखते हैं। ये शिथिल कर्मी तथा अभियन्त्रविद् होते हैं।

✓•२७. रेवती नक्षत्र...
 यह बुध का नक्षत्र है। मीनराशि में १६° ४०' से लेकर ३०° तक यह फैला है। इसका प्रभाव क्षेत्र पादतल, पादांगुलियाँ, पादांगुष्ठ एवं ऍड़ी का अधोभाग है। यह विकृत वा दूषित होने पर पादतल में बेवाई पैदा करता है, काँटे गड़ते हैं, पैर समाट होता है, जातक तेज दौड़ नहीं पाता। पाँव फूलता है, पाँव टेढ़ा होता है।

  इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक बुध एवं गुरु के मिश्र प्रभाव के कारण सात्विक वृत्ति के होते हैं। सरल स्वभाव, विद्यावान् गुणवान् धनवान् चरित्रवान् तथा द्युतिमान् होते हैं। ये द्विस्वभावी द्वैधी वा संशयी होते हैं। इनमें आध्यात्मिक शक्ति का एकाएक वा शीघ्र प्रस्फुटन होता है। ये चतुरता निकालने वाले, परिपक्व विचार वाले, निर्णय लेने के पूर्व बारम्बार सोचने वाले, तथा शुभेच्छु होते हैं। स्वामीभक्त, राष्ट्र भक्त निर्लज्ज तथा पूर्वानुमान में कुशल होते हैं। लेखन क्रीडन प्रकाशन अध्यापन में इनकी वृत्ति सहज होती है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

अथ गण्ड नक्षत्राणि

Vedic Astro Care
★★★अथ गण्ड नक्षत्राणि★★★

 √●  गण्ड नक्षत्र संख्या में ६ हैं। गण्ड मात्र ३ हैं। 

√★१. अश्विनी (मेष राशि का प्रारंभ विन्दु)।
√★ २. रेवती (मीन राशि का अंतिम भाग)।
√★ ३. आश्लेषा (कर्क राशि का अंतिम छोर । 
√★४. मघा (सिंह राशि का आरंभ विन्दु) ।
√★ ५. ज्येष्ठा (वृश्चिक राशि का अंतिम खण्ड)।
√★ ६. मूल (धनु राशि का आद्य विन्दु)।

√●● गण्ड का अर्थ है- दोष, छिद्र, धब्बा, दरार, द्वार, संधि, ग्रंथि, गाँठ, व्यथ, फोड़ा, पिटकी, गड्ढा, मडार, अन्धकूप ।

√● जीवन में ३ गण्ड हैं-युवान, प्रौढ और जीर्ण। जब युवावस्था का आगमन होता है तो कुमार के मुख पर दाढ़ी और मूंछ के कोमल रोम खिलने लगते हैं। गुह्यास्थान में भी ऐसा होता है। शिश्न में उत्तेजना विकसित होती है। इस परिवर्तन से कुमार का चित्त क्षुब्ध हो उठता है। कुमारी में भी ऐसा होता है। उसमें वक्षांकुर फूटते हैं, आर्तव का होना देखा जाता है, लज्जा और संकोच आता है। कुमारी का मन डाँवाडोल होता है। ऐसी दशा में कुमार/कुमारी का सम्हलना वा सम्हालना कठिन होता है। यह प्रथमगंड है। ज युवावस्था का अन्त होता है, प्रौढ़वस्था का आगमन होता है तो केश कृष्ण से श्वेत होना प्रारंभ होते हैं। पुरुष की भोग क्षमता शिथिल होती है। स्त्री के कुच लटकने लगते हैं। इसमें स्त्री पुरुष दोनों चिंतित होते. हैं। यह दूसरा गण्ड है। जब प्रौढ़ावस्था का अन्त तथा जरा का आगम होता है तो चेहरे पर झुर्रियाँ प्रकट होती हैं। सौन्दर्य नष्ट होता है। यह तीसरा गण्ड है।

 √●मैं दो गण्ड देख चुका हूँ। तीसरा झेलना बाकी है। प्रथम की अपेक्षा दूसरा और दूसरे की अपेक्षा तीसरा अधिक कष्टकारी होता है। यह शारीरिक परिवर्तन देहासक्त व्यक्ति को व्यथित करता है। ऐसा कौन है जिसकी देह में आसक्ति न हो ? किसी को बहुत, किसी को कम, दैहिक लगाव होता है। पर, होता है।

  √◆अश्विनी और रेवती का स्पर्श प्रथम गण्ड है। यह कम कष्टकारी है। आश्लेषा और मघा का स्पर्श द्वितीय गण्ड है। यह पूर्वापेक्षा अधिक कष्टद है। ज्येष्ठा और मूल का संस्पर्श तृतीय गण्ड है। यह सर्वाधिक कष्टप्रद है। युवा, प्रौढ तथा जरा- यही तीन गण्ड हैं। चन्द्रमा जब इनमें होता है तो मन को पीडा पहुँचती है। चन्द्रमा तो मन ही है। मन सूक्ष्म है। देह स्थूल है। मन का कष्ट देह के कष्ट से अधिक घातक होता है। देह का घाव ठीक हो जाता है पर, मन का घाव नहीं (कठिनता से) ठीक होता। इसलिये जातक के जन्म समय गण्ड का विचार लग्न से न करके चन्द्र से किये जाने की आर्य परम्परा है। मैं इसका पोषक हूँ। 

√●●इस काया में भी ३ गण्ड हैं।
 √★१. कण्ठ मीव क्षेत्र । 
√★२. कटिश्रोणि क्षेत्र।
 √★३. घुटना।

 √●गर्दन की पीड़ा की अपेक्षा कमर की पीड़ा अधिक खलती है। कटि पीडा की अपेक्षा घुटने का दर्द बहुत कष्ट देता है। गर्दन के दर्द में विशेष कष्ट नहीं होता। कमर दर्द में उठना बैठना कठिन होता है। किन्तु घुटने के दर्द में न चलने फिरने से सारी क्रियाएं ठप्प पड़ जाती हैं। यहाँ भी तीसरा गण्ड अतिकष्टकारक है। सब से अधिक कष्ट तीसरे गण्ड में होता है, इसलिये इसे गण्डमूल कहते हैं। इस कड़ी में पड़ने वाले अंतिम नक्षत्र का नाम 'मूल' इसी लिये पड़ा है। यह कष्ट का घर है।

 √●वैसे तो गण्ड कई प्रकार के होते हैं...

√●१. रात्रि और दिन का गण्ड-संध्या (सायं वा प्रातः) । प्रातः की अपेक्षा सायं का गण्ड कष्ट प्रद होता है। इसकी संख्या २ है । 

√●२. तिथि गण्ड-जब एक तिथि का अंत और दूसरी तिथि का प्रारंभ होता है तो यह होता है। इसकी कुल संख्या १५ है।

 √●३. राशि गण्ड- जब एक राशि का अंत एवं दूसरी का प्रारंभ होता है तो यह गण्ड होता है। यह संख्या में १२ है। 

√●४. नक्षत्र गण्ड- जब एक नक्षत्र का चौथा चरण दूसरे नक्षत्र के प्रथम चरण के साथ होता है तो यह गण्ड माना जाता है। यह संख्या में २७ है।

 √●इन चार प्रकार के गण्डों में राशि एवं नक्षत्र के समवेत गण्ड को प्रमुखता दी गई है। राशि के १२ गण्डों तथा नक्षत्र के २७ गण्डों का समवेत मेल केवल तीन स्थानों पर होता है। इसमें राशि के साथ-साथ नक्षत्र का आद्यन्त आवश्यक है। केवल एकोत्पन्न गण्ड नगण्य है। अधिक स्पष्टता के साथ,

√● १. अश्विनी का प्रथम चरण + रेवती का चतुर्थ चरण ।

[मेष राशि ०° में से ३° २०' तक + मीन राशि में २६° ४०' के बाद ३०° तक]

√● २. आश्लेषा का चतुर्थ चरण + मघा का प्रथम चरण । 
【 कर्कराशि में २६° ४० के बाद ३०° तक + सिंह राशि ०° में से ३०° २०' तक]

 √●३. ज्येष्ठाका चतुर्थ चरण + मूल का प्रथम चरण । 

[ वृश्चिक में २६° ४०' के बाद ३०° तक + धनु राशि में ०° से ३°२०' तक]

√● उपर्युक्त इन अंशों में चन्द्रमा के रहने पर मनोघात / मनस्ताप / व्याधि/काय क्लेश/ शरीर क्षति/ देह नाश का संकट उपस्थित होता है।

√●मूल धातु भ्वादिगण उभयपदी मूलति-ते: जड़ जमना, दृढ़ होना, स्थिर होना, चुरादिगण उभयपदी मूलयति-ते: पौधा लगाना, उगाना, पालना अर्थ वाली है। मूल + क= मूल का अर्थ है-जड़, किसी वस्तु का सबसे नीचे का छोर, आधार, किसी भी वस्तु का किनारा जिसके सहारे वह किसी दूसरी वस्तु से जड़ी हो, आरंभ, नींव, स्रोत, उत्पत्ति स्थान, किसी वस्तु का तल या पैर, उद्गम बिन्दु वा स्रोत ।

√●इस प्रकार, गण्ड मूल= दुःखद विन्दु, पीडा स्थान, क्लेशद्वार, व्याधिजड़, आधिस्थल, संकट क्षेत्र, कष्टस्थली, तापछिद्र, भयदेश, विपत्ति पाद, विषाधार, उपप्लवारंभ।

√●गण्डमूल को तरह अभुक्त मूल शब्द का प्रयोग भूषियों ने किया है भुक्त (भुज् + क्त) = खाया हुआ प्रयुक्त, अधिकृत अधिकार में लिया गया, नियंत्रित । अतः, अभुक्त जिस पर अनियंत्रण हो, अधिकार वा वश न हो न चले। भूषियों ने कहा है अभुक्त मूल में पैदा होने वाला जातक अनिष्टकर होता है।

 √●गण्डमूल पद के स्थान पर पूर्वपद गण्ड का लोप कर केवल मूल कहा जाता है। अतः जहाँ मूल शब्द इस सन्दर्भ मे आये, वहाँ उसे गण्ड मूल समझा जाये। अषियों ने मूल के विषय में जो कहा है, उन्हीं के वाक्यों से आगे बढ़ता हूँ। 

√●१. वशिष्ठ मुनि कहते हैं...
 "भुजङ्गपौरन्दरपौष्णमानां तदप्रभानां च यदन्तरालम् ।
 अभुक्तमूलं प्रहरप्रमाणं त्यजेत्सुतं तत्र भवां सुताञ्च ॥"

[ श्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्र का अंतिम भाग तथा इनसे आगे वाले नक्षत्र मघा, मूल, अश्विनी) का आदि का भाग- ये आदि और अन्त के दोनों भाग मिल कर एक प्रहर (साढ़े सात घटी वा ३ घंटे) का काल अभुक्त मूल होता है। इसमें पैदा होने वाले बालक का त्याग करना चाहिये ।]

√● २. शौनक मुनि कहते हैं...

 "भुजङ्गपित्र्योरथ चेन्द्रमूलपौष्णाश्वयोश्चापि यदन्तरालम् । 
अभुक्तमूलं प्रहरप्रमाणं तदुत्थवालं न विलोकयेत् पिता ॥"

 [ श्लेषा ममा, ज्येष्ठा-मूल, रेवती- अश्विनी नक्षत्रों के बीच का एक प्रहर (३ घंटे) का समय अभुक्तमूल संज्ञा वाला होता है। इसमें पैदा हुए बालक का मुख पिता को नहीं देखना चाहिये।]

√●३. पितामह ब्रह्मा जी कहते हैं...

 "सार्पेन्द्रपोष्णधिष्ण्यान्ते षोडशांशा भसन्धयः । 
तदग्रिमेष्वादिमाश्च पापा गण्डान्त संज्ञकाः ॥"

[ श्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्रों के अन्तिम सोलहवें भाग तथा मघा, मूल, अश्विनी नक्षत्रों के आदि के सोलहवें भाग की संज्ञा गण्डान्त है। इस गण्डान्त संज्ञक भाग में उत्पन्न जातक शुभकारी नहीं होता ।]

१/१६ भाग = ४ घटी।

√●बालक को त्याग देने का अर्थ है, उसमें आसक्ति का सर्वथा अभाव होना। शाब्दिक अर्थ पाठा नहीं है।

√● ४. श्रीपति कहते हैं ...

"पौष्णाश्विन्यो: सार्पपित्रर्क्षयोश्च यवच्च मूलज्येष्ठयोरस्तरालम् । 
उभं गण्डस्याच्चतुर्नाहिक हि यात्रा जन्मदाह कालेष्वनिष्ठम् ॥"
           (रत्नमाला)
 【 रेवती और अश्विनी के बीच की ४ घटी (रेवती के अन्त की २ घटी तथा अश्विनी के आदि की २ घटी) की गण्डान्त संज्ञा होती है। इसी प्रकार, आश्लेष के अन्त की दो घटी व मघा के आदि की दो घटी तथा ज्येष्ठा के अन्त को २ घटी व मूल के आदि की २ घटी अर्थात् उक्त नक्षत्रों के मध्य की ४ घटी की गण्डान्त संज्ञा होती है। यह गण्डान्त काल यात्रा, जन्म और विवाह में अशुभफल देने वाला होता है। 】

√●५. नारद जी कहते हैं...

 "कुलीरसिंहयोः कौत्येचापयोमनमेषयोः । गण्डान्तमन्तरालं स्याद्घटिकार्धं मृतिप्रदम् ॥"

 [ कर्क राशि की अन्तिम आधी घटी व सिंह राशि के प्रारंभ की आधी घटी की तथा वृश्चिक के अन्त की आधी घटी व धनु के प्रारंभ की आधी घटी को एवं मीन के अन्त की आधी घटी व मेष के प्रारंभ की आधी घटी को गणडान्त संज्ञा होती है। यह समय जन्मादि में मृत्युदेने वाला होता है । 

√●६. कश्यप जी भी यही कहते हैं...

 "सिंह कर्कटयोश्वापकीयोमनमेषयोः । गण्डान्तमन्तरालं तन्नाडिका निधनप्रदा ।।"

[सिंह-कर्कट, धनु-वृश्चिक, मीन-मेष के मध्य की एक घटी (प्रत्येक के अन्त आदि को आधी घटी) की  गण्डान्त संज्ञा होती है। यह काल मृत्युद है।

√●●गण्डान्त के फल के विषय में नारद जी का वचन है...

 "दिवाजातस्तु पितरं रात्री च जननी तथा।
 सन्ध्ययोर्निहन्यात्मानं नास्ति गण्डे निरामयः।।"

यदि दिन में गण्डान्त हो तो पिता का, रात्रि में हो तो माता का और दोनों सन्ध्याओं में हो तो अपना स्वयं का नाश होता है। गण्ड में निरोगता नहीं रहती (यदि जीवित बचा तो)।

 √●पुनः नारद जी कहते हैं ...
"वत्सरात् पितरं हन्ति मातरं तु त्रिवर्षतः ।" 

इस गण्डान्त में उत्पन्न बालक वर्ष के भीतर पिता का नाश करता है तथा तीन वर्ष के अन्दर माता का।

√● जैसे राशि नक्षत्र का गण्ड चन्द्रमा की स्थिति से विचारा जाता है, उसी प्रकार तिथि गण्ड का विचार भी नारद वाक्य से करना चाहिये।

"पूर्णानन्दाख्ययोस्तिथ्योः सन्धिर्नाडीद्वयं सदा ।
 गण्डान्तं मृत्युदं जन्मयात्रोद्वाहवतादिषु।।"
             ( नारद )

 पूर्णातिथियों (५ पंचमी, १० दशमी, १५ पूर्णिमा / अमावस्या ३०) की अन्त वाली १ घटी तथा नन्दा तिथियों (१ प्रतिपदा, ६ षष्ठी, ११ एकादशी) की आदि की १ घटी की गण्डान्त संज्ञा होती है। इसको तिथि गण्डान्त कहते हैं। यह तिथि संज्ञक गण्डान्त जन्म, यात्रा, विवाह, व्रतबन्ध, उपनयनादि में मृत्युप्रद होता है।

√●तिथि गण्ड
नन्दातिथि....६....११...की अंतिम १
 घटी

√●पूर्णातिथि....(३०)१५...५....१०....की आरंभिक १ घटी।

√●वशिष्ठ के मत से लग्न गण्डान्त का भी विचार करना चाहिये ...

"लग्नान्तरालं घटिकार्धमेतत् कुलीरहयोरलिचापयोश्च ।
 मीनाजयोः सर्वगुणान्निहन्ति लोभो तथा सर्वगुणान्तरस्य ॥"

 कर्क- सिंह, वृश्चिक- धनु, मीन-मेष लग्नों के बीच की आधी-आधी घटी व्यक्ति के समस्त गुणों का नाश करती है।

√●●लग्नगण्ड.....
कर्क.... वृश्चिक.... मीन....लग्नों की अंतिम १/२ घटि।

√●●सिंह....धनु....मेष लग्नों की आद्य १/२ घटि।

√●इसी प्रकार, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का १ घटी काल दिवारात्रि गण्ड कहा जाता है। इसे समय गण्ड वा होरा गण्ड भी कहते हैं।

 √●सान्ध्यगण्ड ...
सूर्योदय (प्रात), सूर्यास्त (सायं) के पूर्व की १ घटी सूर्योदय प्रात) सूर्यास्त (सायं) के पश्चात् को १ घटी इस गण्ड में भगवत् भजन / गायत्री जप/ नाम जप प्रशस्त है। इसके करने से विवाहादि शुभकमों में यह काल अमृततुल्य शुभ हो जाता है। गोधूलि (सायंकाल) विवाह में वरेण्य है।

 √●जहाँ पर ये चारों गण्ड एक साथ उपस्थित हों, वहीं अनिष्ट के सिवा और कुछ नहीं है। इसमें जन्मने वाला यदि मरा नहीं तो जीवन भर आधिव्याधि से मस्त रहेगा। इसमें यात्रा करने वाले को चोरों से भय होता है। इसमें व्रतबन्ध करने वाले का श्रेयपथ भ्रष्ट होता है। इसमें विवाह करने वाले का दाम्पत्य ध्वस्त हो जाता है। गण्डान्त दोष की शांति के अनेक उपाय आचार्यों ने बताये हैं। ये उपाय समय सापेक्ष होने से सम्प्रति अयुक्त हैं। दान, जप, हवन, ब्राह्मण भोजन से लाभ होता है। गण्ड क्या है ? 

"अश्विनीमघमूलानां तित्रो गण्डाद्यनाडिकाः । 
अन्त्ये पौष्णोरगेन्द्राणां पञ्चैव यवना जगुः ॥"
                (दीपिका ६/५)

 अश्विनी, मघा, मूल नक्षत्र के प्रथम ३ दण्ड गण्ड कहे गये हैं। रेवती, आश्लेषा, ज्येष्ठा नक्षत्र के अंतिम ५ दण्ड गण्ड कहे गये हैं। इस कथन से स्पष्ट है-राश्यन्त का गण्ड, राश्यारंभ के गण्ड की तुलना में अधिक बड़ा है। एक ५ दण्ड/ घटी का है तो दूसरा मात्र ३ घटी का गण्ड तीन हैं। मूल और ज्येष्ठा नक्षत्र में जो गण्ड होता है, उसको दिवा गण्ड कहते हैं। मघा और आश्लेषण नक्षत्र के गण्ड को निशागण्ड कहते हैं। रेवती और अश्विनी नक्षत्र के गण्ड को सन्ध्या गण्ड कहते हैं। ऐसा कहा गया है...

"मूलेन्द्रयोर्दिवागण्डो निशायां पितृसर्पयोः।
सन्ध्याद्वये तु विज्ञेयो रेवती तुरमर्षयोः।।"
                  (दीपिका ६/६ )

√●●अथगण्डरिष्ट फलम्...

 "संध्यारात्रिदिवा भागे गण्डयोगोद्भवः शिशुः ।
 आत्मानं मातरं तातं विनिहन्ति यथाक्रमम् ॥"
              (दीपिका ६/७ )

√● १. सन्ध्यागण्ड (रेवती + अश्विनी) में स्वयं का नाश होता है।
 
√●२. निशा गण्ड (मघा + आश्लेषा) में शिशु की माता का नाश होता है। 

√●३. दिवा गण्ड (मूल + ज्येष्ठा) में शिशु के पिता का नाश होता है।

 √●●आगे गण्ड शांति का उपाय कहते हैं...

 १. "कांस्य पात्रं धृतैः पूर्ण गण्डदोषोपशान्तये । 
दद्यात्धेनुं सुवर्ण च ग्रहांश्चापि प्रपूजयेत् ॥"
            (शुद्धदीपिका ६/१० )

 घी से भरा हुआ काँसे का पात्र, दूध देने वाली सवत्सा गाय, स्वर्ण (धन दक्षिणादि) का दान गण्डशांति के लिये (सुपात्र को) करना चाहिये। इसके अतिरिक्त, नवग्रहों का पूजन यथविधि करना चाहिये।

√● २. "गोमूत्र गोमयं क्षीरं दधिसर्फि कुशोदकम्। 
पञ्चगव्यमिदं कुंभे क्षिपेद् मन्त्रवितम्॥ 
धूप दीप नैवेद्यं कुंभोपरिप्रस्थापयेत् । 
विष्णु सहस्रनाममंत्रेण बालकं स्नापयेत्ततः ॥
 पितृयुक्तं दिवाजात मातृयुक्तं च रात्रिजम् ।
 स्नापयेत् पितृमातृम्यां सन्ध्ययोरुभयोरपि ॥" 
             (शौनक श्रीवासः)

 पञ्चगव्य (गाय का गोबर, मूत्र, दूध, दही, घी) को कुशयुक्त जल के साथ मन्त्रोच्चारपूर्वक कुंभ में रखना चाहिये। धूप दीप नैवेद्य को कुंभ पर रख कर विष्णु सहस्रनाम मंत्र के द्वारा जातक को नहलाना चाहिये। दिवागण्ड में उत्पन्न शिशु को पिता के साथ निशागण्ड में उत्पन्न हुए शिशु को माता के साथ तथा सान्ध्यगण्ड में जन्मे शिशु को माता पिता दोनों के साथ स्नान कराना चाहिये। 

√•३. सूतक निवृत्ति वा आगामी जन्म नक्षत्र की प्रतीक्षा किये बिना आगे लिखे मंत्रों से गण्डशांति करना चाहिये...

√●● अथदेवास्तुतिः ....

"योऽसौ वज्रधरो देवो महेन्द्रो गजवाहनः।
 मूलजात शिशोर्दोष मातापित्रोर्व्यपोहतु ।।१ ॥

योऽसौ शक्तिधरो देवो हुतभुमेषवाहनः ।
 यः सप्तजिह्वदेवोग्निमूलदोषं व्यपोहतु ॥ २ ॥ 

योऽसौ दण्डधरो देवो धर्मो महिषवाहनः । मूलजात शिशोर्दोषं व्यपोहतु यमो मम ॥ ३ ॥ 

योऽसौ खड्गधरो देवो निरृतिर्राक्षसाधिपतिः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं गण्डान्तसम्भवम् ॥ ४ ॥

 योऽसौ पाशधरो देवो वरुणश्च जलेश्वरः । नक्रवाहः प्रचेताहो मूलोत्थाघं व्यपोहतु ॥ ५ ॥ 

योऽसौ देवो जगत्प्राणो मारुतो मृगवाहनः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोषं बालस्य शांतिदः ॥ ६ ॥ 

योऽसौ निधिपतिर्देवो खड्गभृन्नरवाहनः । मातापित्रोः शिशोश्चैव मूलदोषं व्यपोहतु ॥ ७ ॥

 योऽसौ पशुपतिर्देवः पिनाकी वृषवाहनः । आश्लेषामूलगण्डान्तं दोषमाशु
 व्यपोहतु ॥ ८ ॥ 

विध्नेशः क्षेत्रपो दुर्गा लोकपाला नवग्रहाः । सर्वदोष प्रशमनं सर्वे कुर्वन्ति शान्तिदाः ॥ ९ ॥ 

त्रैलोक्ये यानि भूतानि चराणि स्थावराणि च । ब्रह्मार्क विष्णु युक्तानि तानि दोषं दहन्तु मे (ते) ॥ १० ॥"
               ( वशिष्ठ संहिता।)

√●●●अथगण्डान्तदोषापवादः 

√★१. यदि जन्म के समय चन्द्रमापूर्ण बली हो तो नक्षत्र व तिथि गण्डान्तदोष नहीं होता। यदि गुरु बलवान होतो भी गण्डान्तदोष नहीं होता।

 "नक्षत्रतिथिगण्डानां नास्तीन्दौ बलभाजिनि ।
 तथैव लग्नगण्डान्तं नास्तिजीवे बलान्विते ॥"
               ( पितामह ब्रह्मा)

 √●२. यदि जातक का जन्म अभिजित मुहूर्त में हो तो समस्त गण्डान्तों के दोष का विनाश उसी प्रकार होता है जैसे बहेलिया पक्षियों के समुदाय की तरह समस्त हिरनों का नाश करता है।

 "गण्डान्तदोषमखिलं मुहूर्तोऽभिजिताह्वयः । हन्ति तद्वन्मृगव्याधः पक्षिसङ्घमिवाखिलम् ॥"
                    ( वशिष्ठ )

√●●अथ सर्वगण्डान्तफलम् ...

√★१. जब जन्म में चारों गण्डान्त (लग्न गण्ड, राशि गण्ड, तिथि गण्ड, सान्ध्य गण्ड) हों तो जातक तुरन्तमरे/ कुटुम्ब की हानि करे। यदि किसी प्रकार जीवे तो नीच की सेवा करे और अनेक दुःख भोगे । 

√★२. लग्नगण्डान्त में पिता को अरिष्ट, राशिगण्डान्त में स्वयं को अरिष्ट, तिथि गण्डान्त में ज्येष्ठभ्राता को अरिष्ट, सान्ध्य गण्डान्त में माता को अरिष्ट होता है।

 √★गण्डान्त दोष की निवृत्ति हेतु शांति उपाय करना शास्त्र का निर्देश है। लाभ होता है। मन्द प्रारब्ध तीव्र प्रयत्न से, तीव्र प्रारब्ध तीव्रतर प्रयत्न से तीव्रतर प्रारब्ध तीव्रतम प्रयत्न से कटता है। पर, तीव्रतम प्रारब्ध अकाट्य है। इसे भोगना ही है।

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  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer