द्वादशांश — D12 का पूर्ण पाराशरी विश्लेषण।
D12 को द्वादशांश (Dvādaśāṁśa) कहते हैं। पाराशरी परंपरा में यह मुख्यतः माता-पिता, वंश, कुल, पैतृक-मातृक संस्कार तथा उनसे प्राप्त शुभ-अशुभ प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण वर्ग है।
एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रखें—D12 में ग्रहों को चर, स्थिर, द्विस्वभाव, तत्व आदि के आधार पर नहीं रखा जाता; प्रत्येक राशि को 12 समान भागों में बाँटकर राशि-क्रम से द्वादशांश निर्धारित किया जाता है।
1. D12 चार्ट क्या होता है?
D12 को द्वादशांश कहा जाता है।
संस्कृत में:
द्वादश = 12
अंश = भाग
अर्थात किसी राशि को 12 समान भागों में विभाजित करने से द्वादशांश बनता है।
एक राशि का विस्तार 30° होता है।
इस 30° राशि को 12 बराबर भागों में बाँटने पर:
30° ÷ 12 = 2°30′
अर्थात D12 का प्रत्येक द्वादशांश:
2°30′ का होता है।
इसलिए जन्मकुंडली में किसी ग्रह की वास्तविक स्थिति से यह निर्धारित किया जाता है कि वह अपनी राशि के किस 2°30′ के भाग में स्थित है और उस आधार पर D12 में उसकी राशि निर्धारित की जाती है।
2. D12 का मुख्य विषय क्या है?
D12 मुख्य रूप से निम्न विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया जाता है-
माता
पिता
माता-पिता का प्रभाव
माता-पिता से प्राप्त संस्कार
पारिवारिक एवं वंशगत प्रभाव
कुल एवं वंश की परंपरा
पूर्वजों से प्राप्त प्रभाव
माता-पिता की स्थिति से जुड़े संकेत
पारिवारिक गुण और दोष
व्यक्ति के जीवन में माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी है।
D12 को केवल माता-पिता की कुंडली मान लेना उचित नहीं है।
माता के लिए मुख्य जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव और चंद्रमा, तथा पिता के लिए नवम भाव और सूर्य आदि का भी परीक्षण आवश्यक है।
इसलिए D12 को मुख्य जन्मकुंडली के सहयोगी वर्ग के रूप में देखना चाहिए, न कि अकेले निर्णय का आधार बनाना चाहिए।
3. D12 चार्ट कैसे बनता है?
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है।
प्रत्येक राशि 30° की होती है।
इसे 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।
प्रत्येक भाग 2°30′ का होगा।
इस प्रकार द्वादशांश अंश सीमा -
1
0°00′ – 2°30′
2
2°30′ – 5°00′
3
5°00′ – 7°30′
4
7°30′ – 10°00′
5
10°00′ – 12°30′
6
12°30′ – 15°00′
7
15°00′ – 17°30′
8
17°30′ – 20°00′
9
20°00′ – 22°30′
10
22°30′ – 25°00′
11
25°00′ – 27°30′
12
27°30′ – 30°00′
यही D12 के 12 भाग हैं।
4. D12 में ग्रह को किस राशि में रखा जाता है?
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण नियम है।
D12 में किसी ग्रह को रखने के लिए पहले यह देखें कि ग्रह D1 में किस राशि में और कितने अंश पर स्थित है।
इसके बाद यह निर्धारित करें कि वह उस राशि के कौन-से द्वादशांश में है।
फिर उस राशि से राशि-क्रम में आगे बढ़ते हुए उस द्वादशांश के अनुसार D12 राशि निर्धारित की जाती है।
अर्थात D12 का मूल सिद्धांत है:
राशि को 12 बराबर भागों में बाँटना और प्रथम द्वादशांश से राशि-क्रम प्रारंभ करना।
यहाँ:
चर राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं,
स्थिर राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं,
द्विस्वभाव राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं।
इसलिए D12 को D3 या D7 की तरह चर-स्थिर-द्विस्वभाव नियम से नहीं बनाना चाहिए।
5. D12 में राशि-क्रम कैसे चलता है?
D12 में प्रत्येक राशि के 12 द्वादशांश उसी राशि से शुरू होकर क्रमशः 12 राशियों तक जाते हैं।
उदाहरण के लिए मेष राशि के 12 द्वादशांश होंगे:
मेष में ग्रह की स्थिति
D12 राशि
0°00′ – 2°30′
मेष
2°30′ – 5°00′
वृषभ
5°00′ – 7°30′
मिथुन
7°30′ – 10°00′
कर्क
10°00′ – 12°30′
सिंह
12°30′ – 15°00′
कन्या
15°00′ – 17°30′
तुला
17°30′ – 20°00′
वृश्चिक
20°00′ – 22°30′
धनु
22°30′ – 25°00′
मकर
25°00′ – 27°30′
कुंभ
27°30′ – 30°00′
मीन
यह D12 निर्माण का सबसे सरल उदाहरण है।
6. वृषभ राशि में D12 कैसे निकालेंगे?
अब दूसरे उदाहरण से समझते हैं।
वृषभ से राशि-क्रम शुरू होगा:
वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष
इसलिए:
वृषभ में ग्रह की स्थिति
D12 राशि
0°00′ – 2°30′
वृषभ
2°30′ – 5°00′
मिथुन
5°00′ – 7°30′
कर्क
7°30′ – 10°00′
सिंह
10°00′ – 12°30′
कन्या
12°30′ – 15°00′
तुला
15°00′ – 17°30′
वृश्चिक
17°30′ – 20°00′
धनु
20°00′ – 22°30′
मकर
22°30′ – 25°00′
कुंभ
25°00′ – 27°30′
मीन
27°30′ – 30°00′
मेष
7. प्रत्येक राशि के लिए सरल नियम
याद रखने का सबसे आसान नियम है:
जिस राशि में ग्रह स्थित है, उसी राशि से D12 का पहला भाग शुरू होगा।
इसके बाद प्रत्येक 2°30′ पर अगली राशि आएगी।
इसलिए:
मेष → मेष से शुरू
वृषभ → वृषभ से शुरू
मिथुन → मिथुन से शुरू
कर्क → कर्क से शुरू
सिंह → सिंह से शुरू
और इसी प्रकार:
कन्या → कन्या से शुरू
तुला → तुला से शुरू
वृश्चिक → वृश्चिक से शुरू
धनु → धनु से शुरू
मकर → मकर से शुरू
कुंभ → कुंभ से शुरू
मीन → मीन से शुरू
यानी D12 में पहला द्वादशांश हमेशा मूल राशि से प्रारंभ होता है।
8. उदाहरण से ग्रह का D12 निकालना
मान लीजिए:
सूर्य = 18°20′ मेष
अब देखें:
मेष में:
17°30′ से 20°00′
आठवाँ द्वादशांश है।
मेष से आठवीं राशि:
मेष 1
वृषभ 2
मिथुन 3
कर्क 4
सिंह 5
कन्या 6
तुला 7
वृश्चिक 8
अतः:
सूर्य 18°20′ मेष → D12 में वृश्चिक
9. दूसरा उदाहरण
मान लीजिए:
गुरु = 23°10′ सिंह
सिंह में:
22°30′ – 25°00′
दसवाँ द्वादशांश है।
सिंह से दसवीं राशि:
सिंह 1
कन्या 2
तुला 3
वृश्चिक 4
धनु 5
मकर 6
कुंभ 7
मीन 8
मेष 9
वृषभ 10
अतः:
गुरु 23°10′ सिंह → D12 में वृषभ
10. D12 लग्न कैसे निर्धारित होता है?
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
D12 लग्न निकालने के लिए केवल जन्मलग्न की राशि देखना पर्याप्त नहीं है।
हमें जन्मलग्न की वास्तविक डिग्री चाहिए।
उदाहरण:
मान लीजिए जन्मकुंडली में लग्न है:
मिथुन 14°20′
अब मिथुन राशि के भीतर 14°20′ किस द्वादशांश में आता है?
12°30′ – 15°00′
यह छठा द्वादशांश है।
मिथुन से छठी राशि:
मिथुन 1
कर्क 2
सिंह 3
कन्या 4
तुला 5
वृश्चिक 6
इसलिए:
D12 लग्न = वृश्चिक
इस प्रकार D12 की कुंडली में वृश्चिक को प्रथम भाव अर्थात लग्न बनाया जाएगा।
इसके बाद भाव क्रम से:
वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला
होंगे।
11. D12 लग्न निकालते समय एक बहुत महत्वपूर्ण सावधानी
D12 लग्न निकालते समय:
लग्न की डिग्री को सही-सही जानना आवश्यक है।
केवल यह कहना कि:
"जन्मलग्न मिथुन है"
पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि मिथुन के:
0° से 30°
तक अलग-अलग 12 द्वादशांश होंगे और प्रत्येक 2°30′ पर D12 लग्न बदल सकता है।
इसलिए जन्मसमय में थोड़ी त्रुटि होने पर विशेष रूप से D12 लग्न और उसके भावों में परिवर्तन संभव है।
12. D12 में ग्रहों को रखने की पूरी प्रक्रिया
कक्षा में विद्यार्थियों को आप यह प्रक्रिया इस प्रकार समझा सकते हैं:
पहला चरण: D1 में ग्रह की राशि देखें।
दूसरा चरण: ग्रह की डिग्री देखें।
तीसरा चरण: ग्रह किस 2°30′ के खंड में है, यह निर्धारित करें।
चौथा चरण: उस ग्रह की मूल राशि से राशि-क्रम में उतनी राशि गिनें।
पाँचवाँ चरण: प्राप्त राशि को D12 में ग्रह की राशि मानें।
छठा चरण: इसी प्रकार सभी ग्रहों की D12 राशियाँ निकालें।
सातवाँ चरण: जन्मलग्न के लिए भी यही प्रक्रिया करें।
आठवाँ चरण: प्राप्त D12 लग्न को प्रथम भाव बनाकर पूरा D12 भावचक्र तैयार करें।
13. D12 क्यों देखा जाता है?
अब प्रश्न है कि आखिर D12 की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
क्योंकि जन्मकुंडली व्यक्ति के जीवन की व्यापक तस्वीर देती है, जबकि वर्ग कुंडलियाँ जीवन के विशेष क्षेत्रों को अधिक सूक्ष्मता से देखने में सहायता करती हैं।
D12 विशेष रूप से:
माता-पिता और वंशगत प्रभाव
के अध्ययन में उपयोगी है।
उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में माता-पिता से संबंधित संकेत सामान्य रूप से दिखाई दे सकते हैं, लेकिन D12 उन संकेतों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर समझने में सहायता कर सकता है।
14. माता के लिए D12 में क्या देखें?
माता से संबंधित अध्ययन में निम्न बातों को संयुक्त रूप से देखना चाहिए:
D1 में
चतुर्थ भाव
चतुर्थेश
चंद्रमा
चंद्रमा की स्थिति
चतुर्थ भाव पर ग्रहों की दृष्टि
D12 में
D12 लग्न
D12 का चतुर्थ भाव
चतुर्थेश
चंद्रमा
चंद्रमा की स्थिति
शुभ और अशुभ ग्रहों का प्रभाव
इससे माता से संबंधित संकेतों को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिल सकती है।
15. पिता के लिए D12 में क्या देखें?
पिता के अध्ययन में मुख्य रूप से:
D1 में
नवम भाव
नवमेश
सूर्य
सूर्य की स्थिति
नवम भाव पर ग्रहों का प्रभाव
और D12 में:
लग्न
नवम भाव
नवमेश
सूर्य
सूर्य की स्थिति
शुभ-अशुभ प्रभाव
का अध्ययन किया जाता है।
16. क्या केवल D12 देखकर माता-पिता का फलादेश कर सकते हैं?
नहीं।
यह बहुत महत्वपूर्ण नियम है।
किसी भी वर्ग कुंडली को अकेले लेकर अंतिम निर्णय देना उचित नहीं है।
उदाहरण के लिए यदि D12 में कोई ग्रह अशुभ स्थिति में दिखाई दे रहा है, तो तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि माता-पिता के जीवन में निश्चित रूप से कोई बड़ी समस्या होगी।
पहले D1 में संबंधित भाव और ग्रह की स्थिति देखनी चाहिए।
फिर D12 से उस संकेत की पुष्टि या सूक्ष्मता समझनी चाहिए।
17. D12 में ग्रहों का फल कैसे देखें?
अब फलादेश की प्रक्रिया समझते हैं।
किसी ग्रह का फल देखते समय क्रम रखें:
1. D12 लग्न
सबसे पहले D12 का लग्न देखें।
2. D12 लग्नेश
लग्नेश किस राशि में है, किस भाव में है और किन ग्रहों से प्रभावित है।
3. संबंधित भाव
माता के लिए चतुर्थ भाव और पिता के लिए नवम भाव आदि।
4. संबंधित ग्रह
माता के लिए चंद्रमा और पिता के लिए सूर्य के संकेतों को देखें।
5. ग्रहों की शक्ति
ग्रह उच्च, नीच, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री आदि स्थिति में है या नहीं।
6. ग्रहों का संबंध
युति, दृष्टि और अन्य ग्रह संबंध देखें।
7. शुभ-अशुभ प्रभाव
शुभ ग्रहों का प्रभाव और पाप ग्रहों का प्रभाव देखें।
8. D1 से तुलना करें
यही सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
18. D12 में उच्च ग्रह
यदि D12 में संबंधित ग्रह उच्च स्थिति में हो और D1 में भी उसका समर्थन हो, तो उस ग्रह से जुड़े विषयों में सकारात्मक संकेत मजबूत हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए यदि माता से संबंधित अध्ययन में चंद्रमा D12 में अच्छी स्थिति में है और D1 में भी चंद्रमा मजबूत है, तो माता से संबंधित शुभ संकेतों की पुष्टि हो सकती है।
लेकिन केवल D12 के उच्चत्व के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं देना चाहिए।
19. D12 में नीच ग्रह
यदि संबंधित ग्रह D12 में नीच राशि में हो, तो उसके संकेतों में कमजोरी या चुनौती का संकेत मिल सकता है।
लेकिन:
नीच = निश्चित अशुभ फल
ऐसा सरल नियम नहीं है।
नीचभंग, अन्य ग्रहों का प्रभाव, D1 की स्थिति, भावाधिपत्य और ग्रहबल आदि को भी देखना आवश्यक है।
20. D12 में शुभ ग्रह
यदि गुरु, शुक्र, बुध या शुभ स्थिति वाला चंद्रमा संबंधित भावों को प्रभावित करे तो पारंपरिक फलादेश में इसे सामान्यतः सहयोगी संकेत माना जा सकता है।
लेकिन ग्रह की वास्तविक प्रकृति के साथ-साथ:
भावाधिपत्य
स्थिति
युति
दृष्टि
बल
को भी देखना चाहिए।
21. D12 में पाप ग्रह
सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु-केतु जैसे ग्रह यदि संबंधित भावों को प्रभावित करें तो संघर्ष, कठोरता, दूरी, जिम्मेदारी या कठिन अनुभव जैसे संकेतों पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन यहाँ भी केवल "पाप ग्रह = खराब फल" का नियम नहीं लगाना चाहिए।
क्योंकि कोई पाप ग्रह मजबूत होकर किसी भाव को अनुशासन, दृढ़ता या संघर्ष से सफलता प्राप्त करने की क्षमता भी दे सकता है।
22. D12 में भावों का सामान्य महत्व
D12 में भावों को सामान्यतः इस प्रकार समझ सकते हैं:
1 भाव: व्यक्ति और उसका पारिवारिक/वंशगत स्वरूप
2 भाव: परिवार, कुल, पारिवारिक संस्कार और संसाधन
3 भाव: भाई-बहन, पराक्रम, प्रयास एवं पारिवारिक संचार
4 भाव: माता, मातृसुख, घर और मातृ पक्ष
5 भाव: संस्कार, पूर्व पुण्य, परंपरा एवं संतति से जुड़े संकेत
6 भाव: ऋण, रोग, संघर्ष और पारिवारिक विवाद
7 भाव: संबंध, साझेदारी और पारिवारिक संबंधों में परस्परता
8 भाव: वंशगत गहराई, परिवर्तन, विरासत एवं गुप्त प्रभाव
9 भाव: पिता, धर्म, गुरु, भाग्य और पितृ पक्ष
10 भाव: कर्म, प्रतिष्ठा तथा परिवार से प्राप्त कर्म-संस्कार
11 भाव: लाभ, उपलब्धि और पारिवारिक सहयोग
12 भाव: व्यय, दूरी, अलगाव और त्याग
इन अर्थों को D12 के विशिष्ट संदर्भ में समझना चाहिए; इन्हें D1 के भावार्थ का यांत्रिक विकल्प नहीं मानना चाहिए।
23. D12 में लग्नेश का महत्व
D12 का लग्नेश बहुत महत्वपूर्ण है।
देखें:
किस राशि में है?
किस भाव में है?
उच्च/नीच है?
स्वक्षेत्री है?
शुभ ग्रहों से संबंध है?
पाप ग्रहों से पीड़ित है?
D1 में उसकी क्या स्थिति है?
यदि D12 लग्नेश मजबूत हो और D1 भी समर्थन करे तो व्यक्ति के पारिवारिक एवं वंशगत आधार से मिलने वाले सहयोग के संकेत मजबूत हो सकते हैं।
24. D12 में चंद्रमा
D12 में चंद्रमा को विशेष ध्यान से देखना चाहिए क्योंकि चंद्रमा:
माता
मन
मातृभाव
भावनात्मक संस्कार
से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रह है।
देखें:
चंद्रमा किस भाव में है?
किस राशि में है?
किससे युति है?
किसकी दृष्टि है?
D1 में चंद्रमा कैसा है?
इसके बाद माता से संबंधित संकेतों का मूल्यांकन करें।
25. D12 में सूर्य
सूर्य को विशेष रूप से पिता और पितृ प्रभाव के संदर्भ में देखें।
देखें:
सूर्य का D12 भाव
सूर्य की राशि
सूर्य का बल
सूर्य पर शुभ-अशुभ प्रभाव
D1 में सूर्य की स्थिति
D1 के नवम भाव और नवमेश की स्थिति
यदि D1 और D12 दोनों में सूर्य मजबूत संकेत दे रहा है, तो पिता से संबंधित सकारात्मक संकेत अधिक विश्वसनीय माने जा सकते हैं।
26. D12 में राहु-केतु
राहु और केतु के संबंध में भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
इनकी स्थिति:
वंशगत असामान्यता
पारिवारिक दूरी
असामान्य परिस्थितियाँ
अलग प्रकार के पारिवारिक अनुभव
आध्यात्मिक या रहस्यमय वंशगत प्रभाव
जैसे संकेतों की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती है।
लेकिन किसी विशेष घटना का निर्णय केवल राहु-केतु देखकर नहीं किया जाना चाहिए।
27. D1 और D12 का संयुक्त फलादेश
सबसे अच्छा तरीका है:
D1 → मुख्य संकेत
D12 → सूक्ष्म पुष्टि
उदाहरण:
यदि D1 में:
चतुर्थ भाव मजबूत है,
चतुर्थेश मजबूत है,
चंद्रमा शुभ है,
और D12 में भी:
चंद्रमा शुभ है,
चतुर्थ भाव मजबूत है,
तो माता से संबंधित सकारात्मक संकेत अधिक मजबूत माने जा सकते हैं।
इसी प्रकार पिता के लिए:
D1 का नवम भाव + नवमेश + सूर्य
और
D12 का नवम भाव + नवमेश + सूर्य
को मिलाकर देखना चाहिए।
28. D12 में वर्गोत्तम का महत्व
यदि कोई ग्रह D1 और D12 दोनों में एक ही राशि में हो तो वह वर्गोत्तम स्थिति प्राप्त करता है।
उदाहरण:
यदि सूर्य D1 में सिंह राशि में है और D12 में भी सिंह राशि में है, तो सूर्य वर्गोत्तम होगा।
ऐसी स्थिति ग्रह की मूल राशि-संबंधी शक्ति को विशेष महत्व दे सकती है।
लेकिन वर्गोत्तम का अर्थ यह नहीं कि ग्रह हर परिस्थिति में पूर्णतः शुभ फल देगा।
भावाधिपत्य और अन्य कारक भी देखे जाएंगे।
29. D12 में ग्रहों की पुनरावृत्ति
यदि D12 में कई ग्रह एक ही राशि में आ जाएँ तो उस राशि और उसके स्वामी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
उदाहरण:
यदि D12 में सूर्य और गुरु एक राशि में हों, तो उनके बीच युति का प्रभाव देखा जाएगा।
फिर:
राशि स्वामी
भाव
ग्रहबल
D1 स्थिति
को मिलाकर फलादेश किया जाएगा।
30. D12 और दशा
D12 मुख्य रूप से सूक्ष्म पारिवारिक एवं माता-पिता संबंधी संकेतों को समझने के लिए है।
लेकिन किसी घटना का समय निर्धारित करने के लिए केवल D12 पर्याप्त नहीं है।
दशा-अंतर्दशा में संबंधित ग्रह सक्रिय हो और साथ में D1 तथा आवश्यक वर्गकुंडली समर्थन दे रही हो, तब घटना के समय के संबंध में अधिक मजबूत निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
इसलिए:
D12 = विषय की सूक्ष्मता
और
दशा/गोचर = घटना के समय की सहायता
के रूप में समझना अधिक उचित है।
31. D12 के फलादेश में सबसे बड़ी गलती
विद्यार्थियों को विशेष रूप से ये गलतियाँ नहीं करनी चाहिए:
गलती 1: D12 को केवल माता-पिता की कुंडली मान लेना।
गलती 2: केवल D12 देखकर फलादेश कर देना।
गलती 3: D12 निर्माण में चर-स्थिर-द्विस्वभाव का नियम लगाना।
गलती 4: तत्वों के आधार पर ग्रहों को रखना।
गलती 5: ग्रह की राशि देखकर डिग्री की उपेक्षा करना।
गलती 6: D12 में नीच ग्रह को निश्चित अशुभ मानना।
गलती 7: D12 में उच्च ग्रह को निश्चित शुभ मानना।
गलती 8: D1 की पुष्टि के बिना बड़ा निष्कर्ष निकालना।
गलती 9: D12 से सीधे घटना का समय निर्धारित करना।
गलती 10: माता-पिता के संबंध में केवल एक ग्रह देखकर निर्णय देना।
32. D12 निकालने का सबसे आसान गणितीय तरीका
यदि ग्रह की राशि के भीतर स्थिति को कुल डिग्री में लें, तो:
द्वादशांश क्रम = ग्रह की राशि के भीतर डिग्री ÷ 2°30′
से निर्धारित किया जा सकता है।
उदाहरण:
ग्रह:
16°40′
पर है।
16°40′, 15°00′ से 17°30′ के बीच है।
अतः यह:
7वाँ द्वादशांश
है।
अब ग्रह जिस राशि में है, उस राशि से सातवीं राशि गिनकर D12 राशि प्राप्त होगी।
33. कक्षा में विद्यार्थियों को याद कराने का सूत्र
D12 के लिए यह सूत्र याद कराएँ:
30° ÷ 12 = 2°30′
और:
पहला द्वादशांश = मूल राशि
फिर:
हर 2°30′ पर अगली राशि
यानी:
0°00′ से 2°30′ → पहली राशि
2°30′ से 5°00′ → दूसरी राशि
5°00′ से 7°30′ → तीसरी राशि
और इसी प्रकार 12वें भाग तक।
34. D12 का आदर्श फलादेश क्रम
किसी भी कुंडली में D12 का फलादेश करते समय यह क्रम अपनाना बहुत व्यवस्थित रहेगा:
चरण 1
D1 लग्न देखें।
चरण 2
D1 में माता-पिता से संबंधित मुख्य भाव देखें।
चरण 3
D1 में संबंधित ग्रह देखें।
चरण 4
D12 लग्न निर्धारित करें।
चरण 5
D12 लग्नेश देखें।
चरण 6
D12 का चतुर्थ भाव और चंद्रमा देखें।
चरण 7
D12 का नवम भाव और सूर्य देखें।
चरण 8
संबंधित भावेश की स्थिति देखें।
चरण 9
शुभ-अशुभ ग्रहों का प्रभाव देखें।
चरण 10
उच्च, नीच, स्वक्षेत्र, मित्रक्षेत्र आदि देखें।
चरण 11
वर्गोत्तम आदि विशेष स्थितियाँ देखें।
चरण 12
D1 और D12 के संकेतों को मिलाएँ।
चरण 13
दशा और गोचर से घटना की सक्रियता देखें।
चरण 14
तभी अंतिम फलादेश दें।
35. D12 के बारे में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
पूरे अध्याय को यदि पाँच सूत्रों में याद करना हो तो:
सूत्र 1: D12 का नाम द्वादशांश है।
सूत्र 2: प्रत्येक राशि के 30° को 12 भागों में बाँटा जाता है।
सूत्र 3: प्रत्येक द्वादशांश का विस्तार 2°30′ होता है।
सूत्र 4: D12 में प्रथम भाग उसी राशि से प्रारंभ होता है और फिर राशि क्रम चलता है।
सूत्र 5: D12 मुख्यतः माता-पिता, वंश, कुल और पारिवारिक संस्कारों के सूक्ष्म अध्ययन में सहायक है, लेकिन फलादेश D1 और अन्य आवश्यक संकेतों के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए।
एक संपूर्ण उदाहरण
मान लीजिए जन्मकुंडली में:
लग्न = मिथुन 14°20′
सूर्य = सिंह 23°10′
चंद्रमा = वृषभ 16°40′
लग्न
मिथुन 14°20′:
12°30′–15°00′ = छठा द्वादशांश
मिथुन से छठी राशि:
वृश्चिक
अतः:
D12 लग्न = वृश्चिक
सूर्य
सिंह 23°10′:
22°30′–25°00′ = दसवाँ द्वादशांश
सिंह से दसवीं राशि:
वृषभ
अतः:
सूर्य D12 में वृषभ
चंद्रमा
वृषभ 16°40′:
15°00′–17°30′ = सातवाँ द्वादशांश
वृषभ से सातवीं राशि:
वृश्चिक
अतः:
चंद्रमा D12 में वृश्चिक
अब D12 की कुंडली में:
वृश्चिक लग्न
होगा, सूर्य वृषभ में और चंद्रमा वृश्चिक में रखा जाएगा।
इसके बाद D12 के भावों को वृश्चिक से क्रमशः स्थापित करके माता-पिता से संबंधित फलादेश किया जाएगा।
यही D12 निर्माण की मूल पाराशरी पद्धति है।
यदि आप इसे विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए और भी व्यवस्थित बनाना चाहते हैं, तो अगला सबसे उपयोगी चरण होगा �D12 की 12ों राशियों की पूरी तालिका + �12ों भावों का फल + �10–15 वास्तविक गणितीय उदाहरण + �माता और पिता के अलग-अलग फलादेश के उदाहरण।