॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
चतुर्विंशांश (D24) वर्ग कुण्डली का पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
पाराशरी वैदिक ज्योतिष के अनुसार कक्षा में अध्यापन हेतु विस्तृत अध्ययन सामग्री
मुख्य विषय: चतुर्विंशांश की परिभाषा, निर्माण-विधि, ग्रहों की स्थापना, लग्न-निर्धारण, शिक्षा, विद्या, बुद्धि, शास्त्राध्ययन, उच्च शिक्षा, विद्या में सफलता तथा फलादेश की क्रमबद्ध पद्धति।
अध्याय 1 — चतुर्विंशांश (D24) वर्ग कुण्डली का परिचय
1.1 चतुर्विंशांश क्या है?
पाराशरी वैदिक ज्योतिष में जन्मकुण्डली के सूक्ष्म अध्ययन के लिए षोडशवर्ग अर्थात् सोलह प्रमुख वर्ग कुण्डलियों का वर्णन मिलता है।
इन्हीं षोडशवर्गों में चतुर्विंशांश एक महत्त्वपूर्ण वर्ग है।
इसे निम्नलिखित नामों से जाना जाता है—
चतुर्विंशांश कुण्डली
सिद्धांश कुण्डली
D24 वर्ग कुण्डली
विद्या एवं शिक्षा सम्बन्धी वर्ग कुण्डली
चतुर्विंशांश का शाब्दिक अर्थ है—किसी राशि का चौबीसवाँ भाग।
प्रत्येक राशि का विस्तार 30° होता है।
जब किसी राशि के 30° को 24 समान भागों में विभाजित किया जाता है, तब प्रत्येक भाग को चतुर्विंशांश कहते हैं।
गणितीय सूत्र
30° ÷ 24 = 1°15′
अर्थात्—
एक चतुर्विंशांश = 1°15′ = 75 कला।
इस प्रकार प्रत्येक राशि में 24 चतुर्विंशांश होते हैं।
संपूर्ण राशिचक्र में—
12 × 24 = 288 चतुर्विंशांश खण्ड होते हैं।
1.2 चतुर्विंशांश का मुख्य उद्देश्य
ज्योतिषीय परम्परा में चतुर्विंशांश का प्रमुख सम्बन्ध विद्या और अध्ययन से माना जाता है।
इसके माध्यम से परम्परागत रूप से निम्न विषयों का अध्ययन किया जाता है—
जातक की शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति।
अध्ययन में रुचि एवं एकाग्रता।
विद्या प्राप्ति की क्षमता।
प्रारम्भिक एवं उच्च शिक्षा की सम्भावनाएँ।
शिक्षा में बाधाएँ तथा व्यवधान।
शास्त्रों के अध्ययन की प्रवृत्ति।
गुरु एवं शिक्षकों से सम्बन्ध।
विद्या द्वारा प्रतिष्ठा प्राप्ति।
शोध एवं गहन अध्ययन की प्रवृत्ति।
आध्यात्मिक एवं पारम्परिक विद्याओं के अध्ययन की रुचि।
महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त: D24 का उपयोग ज्योतिषीय परम्परा के अन्तर्गत शिक्षा सम्बन्धी संकेतों की व्याख्या के लिए किया जाता है। इसे किसी व्यक्ति की वास्तविक बुद्धिमत्ता, शैक्षिक सफलता अथवा भविष्य का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मापक नहीं समझना चाहिए।
अध्याय 2 — चतुर्विंशांश लग्न और ग्रह रखने का शास्त्रीय आधार नियम
विषम राशियों के चतुर्विंशांशों की गणना सिंह राशि से तथा सम राशियों के चतुर्विंशांशों की गणना कर्क राशि से आरम्भ होती है।
अध्याय 3 — चतुर्विंशांश कुण्डली बनाने की सम्पूर्ण विधि
3.1 प्रथम चरण — राशि के 24 भाग करना
प्रत्येक राशि 30° की होती है।
इसे 24 बराबर भागों में विभाजित करेंगे।
प्रत्येक भाग 1°15′ का होगा।
चतुर्विंशांश के सभी 24 अंश
क्रमांक
अंश सीमा
1
0°00′ से 1°15′
2
1°15′ से 2°30′
3
2°30′ से 3°45′
4
3°45′ से 5°00′
5
5°00′ से 6°15′
6
6°15′ से 7°30′
7
7°30′ से 8°45′
8
8°45′ से 10°00′
9
10°00′ से 11°15′
10
11°15′ से 12°30′
11
12°30′ से 13°45′
12
13°45′ से 15°00′
13
15°00′ से 16°15′
14
16°15′ से 17°30′
15
17°30′ से 18°45′
16
18°45′ से 20°00′
17
20°00′ से 21°15′
18
21°15′ से 22°30′
19
22°30′ से 23°45′
20
23°45′ से 25°00′
21
25°00′ से 26°15′
22
26°15′ से 27°30′
23
27°30′ से 28°45′
24
28°45′ से 30°00′
नोट: किसी खण्ड के अन्तिम अंश पर पहुँचने से अगला खण्ड प्रारम्भ माना जाता है। उदाहरणार्थ, ठीक 1°15′ दूसरे चतुर्विंशांश में आएगा।
अध्याय 4 — विषम एवं सम राशियों के अनुसार ग्रहों की स्थापना
चतुर्विंशांश निर्माण का यह सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
4.1 विषम राशियाँ
राशिचक्र की विषम राशियाँ हैं—
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ
इन राशियों में ग्रह जिस चतुर्विंशांश खण्ड में स्थित होगा, उसकी गणना सिंह राशि से प्रारम्भ की जाएगी।
4.2 सम राशियाँ
राशिचक्र की सम राशियाँ हैं—
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
इन राशियों के लिए चतुर्विंशांश की गणना कर्क राशि से प्रारम्भ होती है।
विशेष ध्यान
चतुर्विंशांश की इस पाराशरी गणना में आरम्भिक राशि का निर्णय जन्मकुंडली में स्थित राशियों के विषम अथवा सम होने से होता है।
अध्याय 5 — ग्रहों को D24 में स्थापित करने के उदाहरण
अब हम वास्तविक गणना के माध्यम से ग्रहों की स्थापना समझेंगे।
उदाहरण 1 — सूर्य मेष राशि में 10°20′ पर है
प्रश्न: सूर्य D24 में किस राशि में जाएगा?
चरण 1 — राशि की पहचान
सूर्य मेष राशि में है।
मेष विषम राशि है।
अतः गणना सिंह राशि से प्रारम्भ होगी।
चरण 2 — चतुर्विंशांश क्रम निकालना
एक चतुर्विंशांश = 1°15′
सूर्य की स्थिति = 10°20′
10°20′ = 620 कला।
एक चतुर्विंशांश = 75 कला।
620 ÷ 75 = 8, शेष 20।
अतः सूर्य नौवें चतुर्विंशांश में स्थित है।
चरण 3 — सिंह से नौवीं राशि गिनना
सिंह
कन्या
तुला
वृश्चिक
धनु
मकर
कुम्भ
मीन
मेष
निष्कर्ष: सूर्य D24 में मेष राशि में स्थित होगा।
उदाहरण 2 — चन्द्रमा वृषभ राशि में 18°40′ पर है
वृषभ सम राशि है।
इसलिए गणना कर्क राशि से होगी।
18°40′ = 1120 कला।
1120 ÷ 75 = 14, शेष 70।
अतः चन्द्रमा पन्द्रहवें चतुर्विंशांश में स्थित है।
सम राशियों की सारणी के अनुसार पन्द्रहवाँ चतुर्विंशांश कन्या राशि का होता है।
निष्कर्ष: चन्द्रमा D24 में कन्या राशि में स्थित होगा।
उदाहरण 3 — बृहस्पति धनु राशि में 22°10′ पर है
धनु विषम राशि है।
अतः गणना सिंह से प्रारम्भ होगी।
22°10′ = 1330 कला।
1330 ÷ 75 = 17, शेष 55।
अतः बृहस्पति अठारहवें चतुर्विंशांश में है।
विषम राशियों की सारणी में अठारहवाँ चतुर्विंशांश मकर राशि का है।
निष्कर्ष: बृहस्पति D24 में मकर राशि में स्थित होगा।
ध्यान रहे कि यहाँ बृहस्पति की D24 राशि मकर होने से उसकी वर्गगत नीचस्थिति का विचार किया जा सकता है, लेकिन केवल इसी आधार पर जातक को शिक्षा में असफल घोषित नहीं करना चाहिए।
इसके लिए बृहस्पति की जन्मकुण्डलीगत स्थिति, D24 में भावाधिपत्य, दृष्टि, युति तथा अन्य ग्रहों का विचार आवश्यक होगा।
अध्याय 6 — चतुर्विंशांश लग्न कैसे निर्धारित करें?
D24 का लग्न निकालने की विधि भी ग्रहों की गणना जैसी ही है।
जन्मकुण्डली के लग्न का राशि-अंश लेकर उसी चतुर्विंशांश गणना-विधि से D24 लग्न निर्धारित किया जाता है।
अध्याय 7 — D24 में बारह भावों का फलादेश
यहाँ प्रत्येक भाव का अध्ययन शिक्षा और विद्या के विशेष सन्दर्भ में किया जाएगा।
इन अर्थों को पाराशरी भावार्थों का शिक्षा-विषयक अनुप्रयोग समझना चाहिए। प्रत्येक भाव के नीचे दिए गए सभी विशिष्ट अर्थ स्वतंत्र शास्त्रीय सूत्र नहीं हैं।
7.1 प्रथम भाव — विद्या प्राप्त करने की मूल प्रवृत्ति
चतुर्विंशांश का प्रथम भाव अध्ययन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
यह परम्परागत व्याख्या में निम्न विषयों का संकेतक माना जाता है—
शिक्षा के प्रति व्यक्तिगत रुचि।
अध्ययन करने की प्रवृत्ति।
विद्या के प्रति समर्पण।
आत्मप्रयास।
ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा।
शैक्षिक व्यक्तित्व।
फलादेश
यदि D24 लग्नेश शुभ स्थिति में हो तथा बृहस्पति या बुध से अनुकूल सम्बन्ध बनाए, तो अध्ययन के प्रति अच्छी प्रवृत्ति का संकेत माना जाता है।
यदि लग्नेश निर्बल अथवा अत्यधिक पीड़ित हो, तो शिक्षा के प्रति रुचि बनाए रखने में कठिनाइयों की सम्भावना पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन अन्तिम निर्णय जन्मकुण्डली के सहयोग से ही करना चाहिए।
7.2 द्वितीय भाव — अर्जित ज्ञान और वाणी
द्वितीय भाव का सम्बन्ध सामान्यतः वाणी, स्मृति, संस्कार तथा संचित संसाधनों से माना जाता है।
D24 में इसे निम्न विषयों से जोड़ा जा सकता है—
कण्ठस्थ विद्या।
शास्त्रीय पाठ।
भाषा का ज्ञान।
वाणी द्वारा ज्ञान की अभिव्यक्ति।
अर्जित ज्ञान का संचय।
उदाहरण
यदि द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो और बुध से सम्बन्ध बनाए, तो भाषा, लेखन तथा मौखिक अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अनुकूल संकेत माने जा सकते हैं।
यदि बृहस्पति का सहयोग भी प्राप्त हो, तो शास्त्रीय ज्ञान के अध्ययन की प्रवृत्ति का विचार किया जा सकता है।
7.3 तृतीय भाव — अध्ययन में परिश्रम
तृतीय भाव पराक्रम, अभ्यास और स्वप्रयास का भाव है।
D24 में यह निम्न विषयों के लिए देखा जा सकता है—
नियमित अध्ययन।
बार-बार अभ्यास।
लेखन एवं प्रस्तुतीकरण।
स्वाध्याय।
कठिन विषयों को सीखने के लिए प्रयत्न।
यदि तृतीय भाव और उसका स्वामी अनुकूल हों, तो निरन्तर अभ्यास से ज्ञान अर्जित करने की प्रवृत्ति का संकेत माना जाता है।
7.4 चतुर्थ भाव — औपचारिक शिक्षा
D24 में चतुर्थ भाव शिक्षा सम्बन्धी विश्लेषण का एक प्रमुख भाव है।
चतुर्थ भाव सामान्यतः सुख, आधार, मातृभाव और शिक्षा से सम्बन्धित माना जाता है।
D24 में इसका विशेष अध्ययन किया जाता है।
इसके माध्यम से निम्न विषय देखे जा सकते हैं—
विद्यालयी शिक्षा।
औपचारिक अध्ययन।
शिक्षा का वातावरण।
अध्ययन में मानसिक स्थिरता।
घर-परिवार से शैक्षिक सहयोग।
शुभ स्थिति
यदि चतुर्थेश बलवान हो तथा बुध, बृहस्पति या अन्य अनुकूल ग्रहों से सम्बन्ध रखता हो, तो औपचारिक शिक्षा के लिए शुभ संकेत माने जा सकते हैं।
प्रतिकूल स्थिति
यदि चतुर्थेश पीड़ित हो, तो शिक्षा में व्यवधान, अध्ययन-परिस्थितियों में परिवर्तन अथवा मानसिक अस्थिरता जैसे विषयों की जाँच की जा सकती है।
विशेष नियम: चतुर्थ भाव के आधार पर शिक्षा में बाधा का निर्णय करते समय D1 के चतुर्थ भाव, चतुर्थेश और दशा का परीक्षण आवश्यक है।
7.5 पंचम भाव — बुद्धि, ग्रहणशक्ति और विद्या
पंचम भाव बुद्धि, विवेक, मन्त्र और पूर्वपुण्य से सम्बन्धित प्रमुख भाव है।
चतुर्विंशांश में पंचम भाव का विशेष महत्त्व माना जाता है।
इसके माध्यम से अध्ययन किया जा सकता है—
विषय को समझने की प्रवृत्ति।
अध्ययन में रुचि।
विश्लेषणात्मक क्षमता।
शास्त्रीय अध्ययन।
मन्त्रविद्या के प्रति आकर्षण।
ज्ञान का रचनात्मक उपयोग।
पंचमेश की स्थिति
यदि पंचमेश स्वक्षेत्री, उच्चस्थ अथवा शुभ ग्रहों से सम्बद्ध हो, तो विद्या-अध्ययन में अनुकूल संकेत माने जाते हैं।
यदि पंचमेश बृहस्पति से सम्बन्ध बनाए, तो धर्मशास्त्र, दर्शन अथवा पारम्परिक विद्याओं की ओर रुचि का संकेत माना जा सकता है।
यदि बुध से सम्बन्ध बनाए, तो भाषा, गणना, तर्क और विश्लेषण के अध्ययन की प्रवृत्ति पर विचार किया जा सकता है।
7.6 षष्ठ भाव — अध्ययन में संघर्ष और प्रतियोगिता
षष्ठ भाव का सम्बन्ध संघर्ष, ऋण, रोग, शत्रु और प्रतिस्पर्धा से माना जाता है।
D24 में इसका उपयोग शिक्षा सम्बन्धी चुनौतियों के अध्ययन में किया जा सकता है।
उदाहरण—
प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव।
अध्ययन में बाधाएँ।
अत्यधिक परिश्रम की आवश्यकता।
शिक्षा के दौरान संघर्ष।
अनुशासन बनाए रखने की चुनौती।
विशेष विचार
षष्ठ भाव में पापग्रह होने को स्वतः अशुभ नहीं मानना चाहिए।
उपचय भाव होने के कारण कुछ परिस्थितियों में यह प्रतियोगिता, संघर्षशीलता तथा परिश्रम की क्षमता का संकेत भी दे सकता है।
इसलिए ग्रह की स्थिति, स्वामित्व और दशा का संयुक्त परीक्षण करना चाहिए।
7.7 सप्तम भाव — ज्ञान का व्यवहारिक उपयोग
सप्तम भाव का सामान्य सम्बन्ध साझेदारी, व्यवहार और सार्वजनिक सम्पर्क से है।
D24 में इसका व्याख्यात्मक उपयोग निम्न विषयों के लिए किया जा सकता है—
अध्ययन का व्यवहारिक प्रयोग।
दूसरों के साथ अध्ययन।
शैक्षिक सहयोग।
संवाद के माध्यम से सीखना।
ज्ञान का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण।
यह ध्यान रखना चाहिए कि ये सप्तम भाव के सामान्य अर्थों से निकाले गए अनुप्रयोग हैं, न कि D24 के लिए कोई स्वतंत्र निश्चित शास्त्रीय नियम।
7.8 अष्टम भाव — गूढ़ विद्या और अनुसंधान
अष्टम भाव का सम्बन्ध गूढ़ विषयों, रहस्य, परिवर्तन तथा गहन अनुसन्धान से जोड़ा जाता है।
D24 में इसका अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
इसके माध्यम से निम्न प्रवृत्तियों पर विचार किया जाता है—
गूढ़ शास्त्रों का अध्ययन।
रहस्यात्मक विषयों में रुचि।
गहन शोध।
प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन।
गूढ़ दर्शन।
ज्योतिष एवं तन्त्रशास्त्र जैसी पारम्परिक विद्याओं में रुचि।
उदाहरण
यदि अष्टमेश और पंचमेश में अनुकूल सम्बन्ध हो तथा बृहस्पति या बुध सहयोग करें, तो गूढ़ विषयों के अध्ययन में रुचि का संकेत माना जा सकता है।
महत्त्वपूर्ण: अष्टम भाव की प्रबलता मात्र से किसी व्यक्ति को ज्योतिषी, तान्त्रिक या शोधकर्ता घोषित नहीं किया जा सकता।
7.9 नवम भाव — उच्च विद्या, गुरु और शास्त्र
चतुर्विंशांश में नवम भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
नवम भाव धर्म, गुरु, भाग्य, उच्च ज्ञान और शास्त्रीय परम्परा से सम्बन्धित है।
D24 में इसका अध्ययन निम्न विषयों के लिए किया जाता है—
उच्च शिक्षा।
गुरु से विद्या प्राप्ति।
वेद-वेदाङ्ग अध्ययन।
धर्मशास्त्र।
दर्शनशास्त्र।
आध्यात्मिक अध्ययन।
पारम्परिक ज्ञान।
दीर्घकालीन शास्त्राध्ययन।
नवमेश की शुभ स्थिति
यदि नवमेश बलवान हो तथा बृहस्पति से अनुकूल सम्बन्ध रखता हो, तो गुरु-कृपा, उच्च अध्ययन और शास्त्रों के प्रति रुचि का संकेत माना जा सकता है।
यदि पंचमेश और नवमेश में शुभ सम्बन्ध हो, तो ज्ञानार्जन के लिए विशेष अनुकूलता मानी जाती है।
7.10 दशम भाव — विद्या का कर्म में प्रयोग
दशम भाव कर्म, प्रतिष्ठा और सामाजिक भूमिका से सम्बन्धित है।
D24 में इसका अध्ययन यह समझने के लिए किया जा सकता है कि अर्जित विद्या का उपयोग किस प्रकार के कर्म में हो सकता है।
उदाहरण—
अध्यापन।
शैक्षिक संस्थाओं से सम्बन्ध।
विद्या के आधार पर प्रतिष्ठा।
शोधकार्य।
ज्ञान का व्यावसायिक प्रयोग।
किन्तु आजीविका का अन्तिम निर्णय केवल D24 से नहीं करना चाहिए।
इसके लिए जन्मकुण्डली तथा दशमांश (D10) का अध्ययन भी आवश्यक है।
7.11 एकादश भाव — विद्या से उपलब्धियाँ
एकादश भाव लाभ, इच्छापूर्ति और उपलब्धियों से सम्बन्धित है।
D24 में इसका प्रयोग निम्न विषयों के अध्ययन के लिए किया जा सकता है—
शैक्षिक उपलब्धियाँ।
अध्ययन से प्राप्त लाभ।
शैक्षिक लक्ष्यों की पूर्ति।
ज्ञान से प्रतिष्ठा।
विद्वानों का सहयोग।
यदि एकादशेश का सम्बन्ध पंचमेश या नवमेश से हो, तो शिक्षा सम्बन्धी उपलब्धियों के अनुकूल संकेत माने जा सकते हैं।
7.12 द्वादश भाव — त्याग, एकान्त अध्ययन और व्यय
द्वादश भाव का सम्बन्ध व्यय, त्याग, एकान्त, विदेश तथा मोक्ष से माना जाता है।
D24 में निम्न विषयों पर विचार किया जा सकता है—
शिक्षा पर व्यय।
एकान्त में अध्ययन।
आश्रम या आवासीय शिक्षा।
विदेश में अध्ययन की सम्भावना।
आध्यात्मिक अध्ययन।
अध्ययन के लिए त्याग।
द्वादश भाव को केवल शिक्षा की हानि का भाव नहीं समझना चाहिए।
यदि इसका पंचम अथवा नवम भाव से अनुकूल सम्बन्ध हो, तो एकान्त साधना, आश्रमीय शिक्षा या गम्भीर आध्यात्मिक अध्ययन की प्रवृत्ति का संकेत भी माना जा सकता है।
अध्याय 8 — D24 में ग्रहों का विशेष महत्त्व
अब हम समझेंगे कि चतुर्विंशांश में प्रत्येक ग्रह की भूमिका क्या है।
8.1 सूर्य — आत्मबोध, अधिकार और प्रतिष्ठा
सूर्य का सम्बन्ध आत्मबल, नेतृत्व, अधिकार और प्रतिष्ठा से माना जाता है।
D24 में सूर्य का अध्ययन निम्न विषयों के लिए किया जा सकता है—
ज्ञान के माध्यम से प्रतिष्ठा।
अध्ययन में आत्मविश्वास।
नेतृत्वपूर्ण शैक्षिक भूमिका।
प्रशासनिक विषयों के अध्ययन में रुचि।
यदि सूर्य बलवान होकर नवम या दशम भाव से सम्बन्ध रखे, तो शिक्षा के माध्यम से प्रतिष्ठा प्राप्त करने की सम्भावना पर विचार किया जा सकता है।
8.2 चन्द्रमा — मन और अध्ययन की एकाग्रता
चन्द्रमा मन का प्रमुख कारक है।
इसलिए शिक्षा के विश्लेषण में चन्द्रमा का महत्त्व है।
D24 में चन्द्रमा के माध्यम से निम्न विषय देखे जाते हैं—
अध्ययन में मानसिक रुचि।
मन की स्थिरता।
अध्ययन के प्रति भावनात्मक लगाव।
कल्पनाशीलता।
ग्रहणशीलता।
यदि चन्द्रमा शुभ सम्बन्धों में हो, तो अध्ययन के लिए अनुकूल मानसिक प्रवृत्ति का संकेत माना जाता है।
चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति को मानसिक रोग या बौद्धिक अक्षमता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
8.3 मंगल — तर्क, साहस और तकनीकी अध्ययन
मंगल साहस, ऊर्जा, क्रियाशीलता और तकनीकी कौशल का प्रतीक माना जाता है।
D24 में मंगल का सम्बन्ध निम्न विषयों से जोड़ा जा सकता है—
तकनीकी अध्ययन।
अभियान्त्रिकी।
गणितीय समस्याओं का समाधान।
प्रतियोगिता।
प्रयोगात्मक शिक्षा।
यदि मंगल का बुध से अनुकूल सम्बन्ध हो, तो तकनीकी एवं गणनात्मक विषयों में रुचि का संकेत माना जा सकता है।
8.4 बुध — बुद्धि, गणना और विश्लेषण
D24 के अध्ययन में बुध एक प्रमुख ग्रह है।
बुध का सम्बन्ध बुद्धि, भाषा, गणित, तर्क, लेखन तथा विश्लेषण से माना जाता है।
इसके माध्यम से निम्न विषयों पर विचार किया जाता है—
गणितीय अध्ययन।
भाषा एवं व्याकरण।
तर्कशास्त्र।
लेखन।
विश्लेषणात्मक अध्ययन।
गणनात्मक विद्याएँ।
वाणिज्यिक शिक्षा।
बुध की शुभ स्थिति
यदि बुध स्वक्षेत्री, उच्चस्थ या शुभ ग्रहों से सम्बद्ध हो, तो अध्ययन में तर्कपूर्ण दृष्टिकोण और विश्लेषणात्मक रुचि के अनुकूल संकेत माने जा सकते हैं।
बुध की प्रतिकूल स्थिति
यदि बुध पीड़ित हो, तो अध्ययन में एकाग्रता, अभिव्यक्ति अथवा विषय की समझ से सम्बन्धित कठिनाइयों की सम्भावना पर विचार किया जा सकता है।
किन्तु इससे किसी प्रकार की बौद्धिक कमी का निश्चित निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
8.5 बृहस्पति — ज्ञान, गुरु और शास्त्र
चतुर्विंशांश में बृहस्पति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञानकारक ग्रह है।
बृहस्पति का सम्बन्ध निम्न विषयों से माना जाता है—
उच्च ज्ञान।
गुरु।
वेद।
धर्मशास्त्र।
दर्शन।
अध्यापन।
नैतिक विवेक।
पारम्परिक विद्या।
शुभ बृहस्पति
यदि बृहस्पति बलवान होकर पंचम या नवम भाव से सम्बन्ध रखे, तो उच्च अध्ययन, गुरु-सहयोग तथा शास्त्राध्ययन के लिए अनुकूल संकेत माने जा सकते हैं।
यदि बृहस्पति का बुध से अनुकूल सम्बन्ध हो, तो ज्ञान और तर्क के समन्वय की प्रवृत्ति का विचार किया जा सकता है।
8.6 शुक्र — कला, सौन्दर्य और सृजनात्मक शिक्षा
शुक्र का सम्बन्ध कला, सौन्दर्य, संगीत तथा सृजनात्मक अभिव्यक्ति से माना जाता है।
D24 में शुक्र निम्न विषयों की ओर रुचि का संकेत दे सकता है—
संगीत।
साहित्य।
चित्रकला।
सौन्दर्यशास्त्र।
नाट्यकला।
रचनात्मक अध्ययन।
यदि शुक्र पंचम भाव या पंचमेश से सम्बन्ध बनाए, तो कलात्मक अध्ययन के प्रति रुचि का संकेत माना जा सकता है।
8.7 शनि — अनुशासन और दीर्घकालीन अध्ययन
शनि का सम्बन्ध परिश्रम, धैर्य, अनुशासन और दीर्घकालीन प्रयास से है।
D24 में शनि का विशेष उपयोग अध्ययन की निरन्तरता समझने के लिए किया जा सकता है।
अनुकूल स्थिति
नियमित अध्ययन।
गम्भीर शोध।
कठिन विषयों का धैर्यपूर्वक अध्ययन।
दीर्घकालीन शैक्षिक प्रयास।
प्रतिकूल स्थिति
अध्ययन में विलम्ब।
अतिरिक्त परिश्रम।
शिक्षा सम्बन्धी जिम्मेदारियों का दबाव।
शैक्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति में कठिनाई।
विशेष नियम: शनि की स्थिति देखकर शिक्षा में विलम्ब का निर्णय स्वतः नहीं करना चाहिए। इसके लिए सम्बन्धित भावों और दशाओं का समर्थन आवश्यक है।
8.8 राहु — नवीन एवं अपरम्परागत विषय
आधुनिक ज्योतिषीय व्याख्याओं में राहु को नवीनता, अपरम्परागत रुचियों तथा असामान्य विषयों से जोड़ा जाता है।
D24 में राहु के माध्यम से निम्न विषयों पर विचार किया जा सकता है—
आधुनिक तकनीक।
अपरम्परागत शिक्षा।
विदेशी ज्ञान-परम्पराएँ।
नवीन अनुसंधान।
तकनीकी नवाचार।
ये आधुनिक व्याख्यात्मक सम्बन्ध हैं; इन्हें प्राचीन पाराशरी ग्रन्थ का प्रत्यक्ष कथन नहीं समझना चाहिए।
8.9 केतु — सूक्ष्म चिन्तन और आध्यात्मिक विद्या
केतु को परम्परागत रूप से वैराग्य, सूक्ष्मता और मोक्षाभिमुख प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है।
D24 में इसका अध्ययन निम्न विषयों के लिए किया जा सकता है—
आध्यात्मिक अध्ययन।
गूढ़ दर्शन।
मन्त्रशास्त्र।
ध्यान सम्बन्धी ग्रन्थ।
वैराग्यप्रधान ज्ञान।
रहस्यात्मक विषयों में रुचि।
यदि केतु का सम्बन्ध बृहस्पति, पंचम भाव या नवम भाव से हो, तो पारम्परिक व्याख्या में आध्यात्मिक अध्ययन की प्रवृत्ति का विचार किया जा सकता है।
अध्याय 9 — शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों का निर्धारण
यह अध्याय कक्षा में फलादेश सिखाने के लिए विशेष उपयोगी है।
सबसे पहले एक मूल सिद्धान्त समझें।
किसी एक ग्रह से शिक्षा का निश्चित विषय निर्धारित नहीं किया जा सकता।
इसके लिए निम्न सभी बातों का संयुक्त अध्ययन आवश्यक है—
जन्मकुण्डली का पंचम भाव।
जन्मकुण्डली का नवम भाव।
D24 का लग्न।
D24 का पंचम भाव।
D24 का नवम भाव।
बुध और बृहस्पति की स्थिति।
सम्बन्धित भावेशों के पारस्परिक सम्बन्ध।
दशा एवं अन्तर्दशा।
विषयों के परम्परागत ग्रह-संकेत
शिक्षा का क्षेत्र
प्रमुख ग्रह-संकेत
गणित - बुध, मंगल
भाषा एवं व्याकरण - बुध, बृहस्पति
साहित्य - बुध, शुक्र
दर्शनशास्त्र - बृहस्पति, बुध
धर्मशास्त्र - बृहस्पति, सूर्य
वैदिक अध्ययन - बृहस्पति, सूर्य, केतु
ज्योतिषशास्त्र - बुध, बृहस्पति, केतु
अभियान्त्रिकी - मंगल, बुध, शनि
चिकित्सा सम्बन्धी अध्ययन - सूर्य, मंगल, बुध
संगीत एवं कला - शुक्र, चन्द्रमा
न्याय एवं विधि - बृहस्पति, शनि, बुध
प्रशासन - सूर्य, बृहस्पति
अनुसन्धान - बुध, शनि, अष्टम भाव
आधुनिक तकनीकी अध्ययन - बुध, मंगल, राहु
यह सारणी शिक्षण हेतु ग्रहों के प्रतीकात्मक सम्बन्ध दर्शाती है। इसे विषय निर्धारण की निश्चित अथवा वैज्ञानिक विधि नहीं मानना चाहिए।
अध्याय 10 — D24 में शिक्षा सम्बन्धी योगों का विश्लेषण
10.1 लग्नेश एवं पंचमेश का सम्बन्ध
यदि D24 लग्नेश और पंचमेश में अनुकूल सम्बन्ध हो, तो विद्या के प्रति व्यक्तिगत रुचि और अध्ययन के लिए प्रयास का संकेत माना जा सकता है।
उदाहरण—
लग्नेश पंचम भाव में हो।
पंचमेश लग्न में हो।
दोनों की युति हो।
दोनों में परस्पर दृष्टि हो।
परन्तु दृष्टि का निर्णय पाराशरी ग्रहदृष्टि के वास्तविक नियमों से ही किया जाना चाहिए।
10.2 पंचमेश एवं नवमेश का सम्बन्ध
पंचम भाव बुद्धि और विद्या से सम्बन्धित है।
नवम भाव गुरु और उच्च ज्ञान से सम्बन्धित है।
यदि इनके स्वामियों में अनुकूल सम्बन्ध हो, तो उच्च अध्ययन और ज्ञानार्जन के लिए शुभ संकेत माने जा सकते हैं।
उदाहरण
मान लीजिए D24 में—
पंचमेश और नवमेश एक ही शुभ भाव में स्थित हैं।
बृहस्पति भी उनसे अनुकूल सम्बन्ध रखता है।
ऐसी स्थिति में पारम्परिक व्याख्या के अनुसार उच्च शिक्षा तथा शास्त्राध्ययन की अनुकूलता का विचार किया जा सकता है।
10.3 बुध-बृहस्पति सम्बन्ध
बुध तर्क और विश्लेषण का प्रतीक है।
बृहस्पति ज्ञान और विवेक का प्रतीक है।
दोनों के अनुकूल सम्बन्ध को अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।
विशेषकर—
शास्त्रीय अध्ययन।
दर्शन।
भाषा।
व्याकरण।
अध्यापन।
तर्कपूर्ण अनुसन्धान।
किन्तु दोनों ग्रहों की युति मात्र से किसी विशिष्ट शैक्षिक उपलब्धि की गारंटी नहीं होती।
10.4 चतुर्थेश और नवमेश का सम्बन्ध
चतुर्थ भाव औपचारिक शिक्षा से सम्बन्धित है।
नवम भाव उच्च शिक्षा से सम्बन्धित है।
यदि दोनों भावेश अनुकूल सम्बन्ध बनाएँ, तो विद्यालयी शिक्षा से उच्च अध्ययन तक निरन्तरता का संकेत माना जा सकता है।
10.5 शिक्षा में बाधा के संकेत
D24 में शिक्षा सम्बन्धी बाधाओं की सम्भावना पर विचार करते समय निम्न बातों को देखा जा सकता है—
लग्नेश की निर्बलता।
चतुर्थेश की पीड़ा।
पंचमेश की प्रतिकूल स्थिति।
नवमेश का अशुभ सम्बन्ध।
बुध की पीड़ा।
बृहस्पति की निर्बलता।
सम्बन्धित दशाओं में प्रतिकूल ग्रहों का प्रभाव।
लेकिन इनमें से कोई एक स्थिति अपने आप में शिक्षा-हानि का निश्चित योग नहीं है।
अध्याय 11 — D24 में उच्च शिक्षा का विश्लेषण कैसे करें?
उच्च शिक्षा के लिए केवल नवम भाव देखना पर्याप्त नहीं है।
एक क्रमबद्ध पद्धति अपनानी चाहिए।
प्रथम चरण — जन्मकुण्डली का परीक्षण
D1 में देखें—
पंचम भाव।
पंचमेश।
नवम भाव।
नवमेश।
बुध।
बृहस्पति।
द्वितीय चरण — D24 लग्न का परीक्षण
देखें—
D24 लग्न किस राशि का है?
लग्नेश कहाँ स्थित है?
लग्नेश बलवान है या निर्बल?
लग्न पर किन ग्रहों की दृष्टि है?
तृतीय चरण — D24 पंचम भाव
परीक्षण करें—
पंचम भाव में कौन-से ग्रह हैं?
पंचमेश कहाँ है?
पंचमेश की स्थिति कैसी है?
बुध और बृहस्पति का सम्बन्ध है या नहीं?
चतुर्थ चरण — D24 नवम भाव
विशेष रूप से देखें—
नवमेश की स्थिति।
नवम भाव पर शुभ अथवा अशुभ प्रभाव।
पंचमेश-नवमेश सम्बन्ध।
बृहस्पति का योगदान।
पंचम चरण — दशा का परीक्षण
शिक्षा सम्बन्धी घटना के समय कौन-सी महादशा और अन्तर्दशा चल रही है?
सम्बन्धित दशानाथों का D1 तथा D24 के शैक्षिक भावों से क्या सम्बन्ध है?
निष्कर्ष
इन सभी संकेतों का संयुक्त परीक्षण करके उच्च शिक्षा सम्बन्धी पारम्परिक फलादेश तैयार किया जाता है।
अध्याय 12 — शिक्षा में व्यवधान, विलम्ब एवं पुनः अध्ययन
किसी जातक की शिक्षा में व्यवधान होने के अनेक वास्तविक कारण हो सकते हैं।
ज्योतिषीय परम्परा में ऐसे विषयों का अध्ययन करते समय निम्न स्थितियों की जाँच की जाती है।
12.1 शिक्षा में व्यवधान
D24 के चतुर्थेश, पंचमेश और नवमेश की प्रतिकूल स्थिति शिक्षा में कठिनाइयों का संकेत मानी जा सकती है।
12.2 शिक्षा में विलम्ब
शनि का सम्बन्ध शिक्षा के प्रमुख भावों से हो तो कुछ परिस्थितियों में अध्ययन की धीमी गति अथवा दीर्घकालीन प्रयास का संकेत माना जाता है।
परन्तु यही शनि धैर्य और गहन अध्ययन का संकेत भी दे सकता है।
12.3 शिक्षा छोड़कर पुनः आरम्भ करना
ऐसी सम्भावना का विचार करने के लिए—
चतुर्थ भाव।
पंचम भाव।
नवम भाव।
अष्टम भाव।
सम्बन्धित दशाएँ।
इन सबका संयुक्त परीक्षण किया जा सकता है।
12.4 विषय परिवर्तन
शिक्षा के विषय में परिवर्तन का अध्ययन करते समय पंचमेश, नवमेश, बुध तथा सम्बन्धित दशाओं का परीक्षण किया जा सकता है।
किन्तु केवल राहु, केतु या अष्टम भाव के प्रभाव से विषय परिवर्तन का निश्चित निर्णय करना उचित नहीं है।
अध्याय 13 — D24 और अन्य वर्ग कुण्डलियों का सम्बन्ध
D24 को जन्मकुण्डली से अलग करके नहीं देखना चाहिए।
13.1 D1 — जन्मकुण्डली
D1 मूल आधार है।
यह सम्पूर्ण जीवन के व्यापक संकेत प्रदान करती है।
13.2 D9 — नवांश
नवांश ग्रहों की वर्गगत स्थिति, धर्म तथा जीवन के अन्य सूक्ष्म विषयों के अध्ययन में प्रयुक्त होता है।
D24 में किसी ग्रह की स्थिति का अध्ययन करते समय उसकी D1 और D9 स्थितियाँ भी सहायक हो सकती हैं।
13.3 D10 — दशमांश
D10 का मुख्य सम्बन्ध कर्म और आजीविका से है।
यदि प्रश्न हो—
जातक शिक्षा प्राप्त करके किस क्षेत्र में कार्य करेगा?
तो D24 और D10 का संयुक्त अध्ययन उपयोगी माना जाता है।
13.4 D20 — विंशांश
D20 का प्रमुख सम्बन्ध उपासना और आध्यात्मिक साधना से है।
यदि प्रश्न हो—
जातक वेद, उपनिषद्, मन्त्रशास्त्र या आध्यात्मिक विद्याओं का अध्ययन करेगा अथवा साधना के मार्ग पर आगे बढ़ेगा?
तो D24 में विद्या-अध्ययन के संकेत तथा D20 में उपासना-साधना के संकेतों का अलग-अलग परीक्षण किया जा सकता है।
इस प्रकार—
D24 = विद्या और अध्ययन का वर्ग।
D20 = उपासना और साधना का वर्ग।
दोनों के प्रयोजन एक-दूसरे से सम्बन्धित हो सकते हैं, किन्तु समान नहीं हैं।
अध्याय 14 — सम्पूर्ण उदाहरण द्वारा D24 का फलादेश
अब एक काल्पनिक कुण्डली लेकर विश्लेषण की पद्धति समझते हैं।
मान लीजिए D24 में निम्न ग्रहस्थितियाँ हैं।
काल्पनिक चतुर्विंशांश कुण्डली
यह उदाहरण केवल शिक्षण के उद्देश्य से बनाया गया है। इसे किसी वास्तविक जन्मकुण्डली की गणना नहीं समझना चाहिए।
14.1 प्रथम चरण — लग्न का विश्लेषण
लग्न मिथुन है।
मिथुन का स्वामी बुध है।
बुध कन्या राशि में स्थित है।
कन्या बुध की स्व एवं उच्च राशि है।
अतः इस उदाहरण में D24 लग्नेश बुध को राशिगत बल प्राप्त है।
व्याख्या: अध्ययन, भाषा, गणना और विश्लेषण से सम्बन्धित अनुकूल संकेत माने जा सकते हैं।
14.2 द्वितीय चरण — चतुर्थ भाव
मिथुन लग्न से चतुर्थ भाव कन्या राशि है।
चतुर्थ भाव में बुध स्थित है।
बुध यहाँ स्वक्षेत्री एवं उच्चस्थ है।
इस स्थिति को औपचारिक शिक्षा तथा अध्ययन में अनुकूलता का संकेत माना जा सकता है।
इसके अतिरिक्त बुध लग्नेश और चतुर्थेश दोनों है।
इसलिए लग्न और शिक्षा सम्बन्धी चतुर्थ भाव का सीधा सम्बन्ध बनता है।
14.3 तृतीय चरण — पंचम भाव
मिथुन लग्न से पंचम भाव तुला है।
पंचम भाव में शुक्र स्थित है।
शुक्र तुला राशि का स्वामी है।
अतः पंचमेश पंचम भाव में स्वक्षेत्री है।
यह विद्या, रचनात्मकता तथा कलात्मक विषयों के अध्ययन के लिए अनुकूल संकेत माना जा सकता है।
14.4 चतुर्थ चरण — नवम भाव
मिथुन लग्न से नवम भाव कुम्भ है।
कुम्भ का स्वामी शनि है।
शनि नवम भाव में स्वक्षेत्री स्थित है।
यह उच्च अध्ययन में धैर्य, अनुशासन और दीर्घकालीन परिश्रम की प्रवृत्ति का संकेत माना जा सकता है।
यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि मिथुन लग्न में शनि अष्टम और नवम दोनों भावों का स्वामी है।
अतः शनि का फलादेश करते समय उसके दोनों भावाधिपत्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
14.5 पंचम चरण — बृहस्पति का परीक्षण
बृहस्पति धनु राशि में सप्तम भाव में स्थित है।
धनु बृहस्पति की स्वराशि है।
अतः बृहस्पति को राशिगत बल प्राप्त है।
बृहस्पति की पाराशरी ग्रहदृष्टियाँ—
पंचम दृष्टि से मेष।
सप्तम दृष्टि से मिथुन।
नवम दृष्टि से सिंह।
इस प्रकार बृहस्पति की सप्तम दृष्टि D24 लग्न मिथुन पर पड़ती है।
यह लग्न को ज्ञानकारक बृहस्पति का सहयोग प्रदान करने वाला अनुकूल संकेत माना जा सकता है।
14.6 षष्ठ चरण — ग्रहों का संयुक्त परीक्षण
अब प्रमुख स्थितियाँ एक साथ देखें—
लग्नेश बुध स्व एवं उच्च राशि में है।
चतुर्थेश बुध चतुर्थ भाव में है।
पंचमेश शुक्र पंचम भाव में स्वक्षेत्री है।
नवमेश शनि नवम भाव में स्वक्षेत्री है।
बृहस्पति स्वराशि में स्थित होकर लग्न को देख रहा है।
इन स्थितियों से पारम्परिक व्याख्या में शिक्षा और अध्ययन के लिए अनेक अनुकूल संकेत प्राप्त होते हैं।
सम्भावित फलादेश
ऐसी काल्पनिक D24 कुण्डली में—
अध्ययन के प्रति रुचि।
भाषा और विश्लेषणात्मक विषयों की ओर झुकाव।
औपचारिक शिक्षा में अनुकूलता।
दीर्घकालीन अध्ययन की प्रवृत्ति।
कला एवं साहित्य सम्बन्धी रुचि।
गुरु एवं ज्ञान के प्रति सम्मान।
जैसे संकेतों पर विचार किया जा सकता है।
किन्तु वास्तविक फलादेश के लिए D1, जन्मसमय, ग्रहों के अंश, दशाएँ तथा जीवन-परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक होगा।
अध्याय 15 — D24 में ग्रहबल का परीक्षण
चतुर्विंशांश में ग्रहों के फलादेश से पहले उनके बल का विचार करना चाहिए।
15.1 स्वक्षेत्री ग्रह
यदि कोई ग्रह D24 में अपनी राशि में स्थित है, तो उसे उस वर्ग में राशिगत बल प्राप्त माना जा सकता है।
उदाहरण—
बुध कन्या में।
बृहस्पति धनु में।
शुक्र तुला में।
15.2 उच्चस्थ ग्रह
यदि ग्रह D24 में अपनी उच्च राशि में स्थित हो, तो वह वर्गगत उच्चस्थिति प्राप्त करता है।
उदाहरण—
सूर्य मेष में।
चन्द्रमा वृषभ में।
मंगल मकर में।
बुध कन्या में।
बृहस्पति कर्क में।
शुक्र मीन में।
शनि तुला में।
15.3 नीचस्थ ग्रह
यदि ग्रह D24 में अपनी नीच राशि में हो, तो उस वर्ग में उसकी नीचस्थिति का विचार किया जाता है।
लेकिन केवल वर्गगत नीचस्थिति से ग्रह को पूर्णतः निष्फल नहीं मानना चाहिए।
15.4 शुभ दृष्टि
ग्रह पर बृहस्पति अथवा अन्य अनुकूल ग्रहों की दृष्टि हो, तो उसे फलादेश में ध्यान में रखा जा सकता है।
15.5 भावाधिपत्य
ग्रह किस भाव का स्वामी है?
यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
उदाहरण—
मिथुन D24 लग्न में बुध प्रथम और चतुर्थ भाव का स्वामी होता है।
इसलिए बुध की स्थिति शिक्षा के विश्लेषण में विशेष महत्त्व रख सकती है।
अध्याय 16 — D24 में दशा और अन्तर्दशा का प्रयोग
किसी शैक्षिक घटना का समय निर्धारित करने के लिए केवल वर्ग कुण्डली पर्याप्त नहीं है।
पाराशरी ज्योतिष में विंशोत्तरी दशा एक प्रमुख दशा-पद्धति है।
अध्ययन की पद्धति
सबसे पहले जन्मकुण्डली में चल रही महादशा देखें।
इसके बाद अन्तर्दशा देखें।
फिर परीक्षण करें—
दशानाथ का D1 में भावाधिपत्य।
दशानाथ की D1 में स्थिति।
दशानाथ का D24 में स्थान।
दशानाथ का D24 के चतुर्थ, पंचम या नवम भाव से सम्बन्ध।
दशानाथ का बुध एवं बृहस्पति से सम्बन्ध।
उदाहरण
मान लीजिए किसी जातक की बुध महादशा चल रही है।
D1 में बुध शिक्षा सम्बन्धी भावों से अनुकूल सम्बन्ध रखता है।
D24 में बुध लग्नेश और चतुर्थेश होकर बलवान है।
तो पारम्परिक ज्योतिषीय पद्धति में उस अवधि को अध्ययन सम्बन्धी गतिविधियों के लिए अनुकूल माना जा सकता है।
लेकिन वास्तविक शैक्षिक परिणामों के लिए व्यक्ति के प्रयास, अवसर, संसाधन और परिस्थितियाँ भी निर्णायक महत्त्व रखती हैं।
अध्याय 17 — D24 की गणना में होने वाली प्रमुख गलतियाँ
गलती 1 — प्रत्येक राशि से उसी राशि की गणना प्रारम्भ करना
यह पाराशरी चतुर्विंशांश की बताई गई गणना-पद्धति के अनुसार गलत है।
सही नियम—
विषम राशि से ग्रह होने पर सिंह से गणना।
सम राशि से ग्रह होने पर कर्क से गणना।
गलती 2 — चतुर्विंशांश को 1°30′ मान लेना
यह गलत है।
सही माप = 1°15′।
गलती 3 — जन्मकुण्डली के लग्न को ही D24 लग्न मान लेना
यह आवश्यक नहीं है।
D24 लग्न का निर्धारण जन्मलग्न के वास्तविक अंश से किया जाता है।
गलती 4 — केवल बुध देखकर शिक्षा का निर्णय करना
यह अपूर्ण पद्धति है।
बुध के साथ बृहस्पति, चतुर्थ भाव, पंचम भाव, नवम भाव और सम्बन्धित भावेशों का भी विचार करना चाहिए।
गलती 5 — केवल D24 से शिक्षा का अन्तिम निर्णय करना
D24 एक सहायक वर्ग कुण्डली है।
जन्मकुण्डली को प्राथमिक आधार रखना चाहिए।
गलती 6 — जन्मसमय की शुद्धता की उपेक्षा करना
चतुर्विंशांश का प्रत्येक खण्ड केवल 1°15′ का है।
अतः लग्न की गणना में छोटी त्रुटि भी D24 लग्न बदल सकती है।
ग्रहों के अंश यदि किसी खण्ड की सीमा के अत्यन्त समीप हों, तो गणना की शुद्धता और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
अध्याय 18 — D24 फलादेश की क्रमबद्ध सम्पूर्ण पद्धति
कक्षा में विद्यार्थियों को निम्न क्रम सिखाया जा सकता है।
अध्याय 19 — विद्यार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1 — क्या D24 केवल विद्यालयी शिक्षा के लिए है?
नहीं।
इसका प्रमुख सम्बन्ध विद्या से है। इसलिए पारम्परिक व्याख्या में विद्यालयी शिक्षा के साथ उच्च अध्ययन, शास्त्राध्ययन, स्वाध्याय तथा ज्ञानार्जन की प्रवृत्तियों का भी विचार किया जाता है।
प्रश्न 2 — क्या D24 से यह निश्चित किया जा सकता है कि जातक डॉक्टर या अभियन्ता बनेगा?
नहीं।
ग्रहों से विषयगत रुचियों के पारम्परिक संकेत निकाले जा सकते हैं, लेकिन किसी विशिष्ट शैक्षिक उपाधि अथवा व्यवसाय का निश्चित निर्णय केवल D24 से नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 3 — D24 में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रह कौन हैं?
शिक्षा के सामान्य विचार में बुध और बृहस्पति विशेष महत्त्व रखते हैं।
इसके अतिरिक्त लग्नेश, चतुर्थेश, पंचमेश तथा नवमेश का अध्ययन आवश्यक है।
प्रश्न 4 — क्या D24 में उच्चस्थ ग्रह सदैव शुभ फल देता है?
नहीं।
ग्रह का भावाधिपत्य, स्थान, दृष्टि, युति तथा जन्मकुण्डलीगत स्थिति भी देखनी चाहिए।
प्रश्न 5 — क्या D24 में नीचस्थ बुध होने से जातक की बुद्धि कम होगी?
नहीं।
ऐसा निष्कर्ष उचित नहीं है।
ग्रह की वर्गगत नीचस्थिति किसी व्यक्ति की वास्तविक बुद्धिमत्ता अथवा सीखने की क्षमता का विश्वसनीय मापक नहीं है।
प्रश्न 6 — क्या D24 में राहु उच्च शिक्षा दिलाता है?
राहु को कुछ आधुनिक व्याख्याओं में अपरम्परागत अध्ययन और नवीन तकनीकी विषयों से जोड़ा जाता है।
लेकिन राहु की उपस्थिति मात्र से उच्च शिक्षा का निश्चित फल नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न 7 — क्या D24 से वैदिक ज्योतिष, कर्मकाण्ड और धर्मशास्त्र के अध्ययन की प्रवृत्ति देखी जा सकती है?
पारम्परिक व्याख्या में इन विषयों के लिए विशेष रूप से—
पंचम भाव।
नवम भाव।
बुध।
बृहस्पति।
सूर्य।
केतु।
अष्टम भाव।
इनके सम्बन्धों का अध्ययन किया जा सकता है।
किन्तु किसी व्यक्ति की वास्तविक योग्यता का निर्धारण उसके अध्ययन, अभ्यास, गुरु-मार्गदर्शन और प्राप्त ज्ञान से ही किया जाना चाहिए।
अध्याय 20 — चतुर्विंशांश के विशेष शास्त्रीय एवं व्यावहारिक सिद्धान्त
अन्त में कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बातें समझनी आवश्यक हैं।
सिद्धान्त 1 — D24 का मूल विषय विद्या है
इसलिए इसका प्रयोग मुख्यतः शिक्षा और ज्ञानार्जन के प्रश्नों में किया जाता है।
सिद्धान्त 2 — D1 मूल आधार है
वर्ग कुण्डली जन्मकुण्डली के अध्ययन को सूक्ष्म बनाती है।
जन्मकुण्डली की उपेक्षा करके केवल D24 से निर्णय नहीं करना चाहिए।
सिद्धान्त 3 — वर्ग में ग्रह का बल महत्त्वपूर्ण है
स्वराशि, उच्चराशि, मित्रराशि, भावाधिपत्य तथा ग्रहसम्बन्धों का परीक्षण करना चाहिए।
सिद्धान्त 4 — सभी ग्रहों का संयुक्त विचार आवश्यक है
केवल बुध अथवा बृहस्पति की स्थिति देखकर सम्पूर्ण शैक्षिक फलादेश नहीं करना चाहिए।
सिद्धान्त 5 — शिक्षा में सफलता केवल ग्रहों पर निर्भर नहीं है
वास्तविक जीवन में शिक्षा की सफलता व्यक्ति के परिश्रम, अवसर, पारिवारिक सहयोग, आर्थिक परिस्थितियों, शिक्षण की गुणवत्ता और अनेक अन्य कारकों से प्रभावित होती है।
सिद्धान्त 6 — गणना और फलादेश में अन्तर है
D24 की राशि-गणना एक निश्चित गणितीय प्रक्रिया है।
किन्तु उससे निकाला गया ज्योतिषीय फलादेश परम्परागत व्याख्या है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं।
अध्याय 21 — कक्षा में याद रखने योग्य मुख्य सूत्र
सूत्र 1
चतुर्विंशांश = राशि का चौबीसवाँ भाग।
सूत्र 2
एक चतुर्विंशांश = 1°15′।
सूत्र 3
विषम राशि में ग्रह हो तो सिंह से गणना।
सूत्र 4
सम राशि में ग्रह हो तो कर्क से गणना।
सूत्र 5
D24 लग्न का निर्धारण जन्मलग्न के अंश से होगा।
सूत्र 6
D24 में चतुर्थ भाव औपचारिक शिक्षा का प्रमुख संकेतक है।
सूत्र 7
पंचम भाव विद्या, बुद्धि और अध्ययन की प्रवृत्ति से सम्बन्धित है।
सूत्र 8
नवम भाव उच्च ज्ञान, गुरु और शास्त्राध्ययन से सम्बन्धित है।
सूत्र 9
बुध तर्क, भाषा और गणना का प्रमुख कारक है।
सूत्र 10
बृहस्पति ज्ञान, गुरु और शास्त्र का प्रमुख कारक है।
सूत्र 11
D24 का फलादेश जन्मकुण्डली और सम्बन्धित दशाओं के साथ करना चाहिए।
सूत्र 12
एक ग्रह, एक भाव अथवा एक योग से शिक्षा का निश्चित निर्णय नहीं करना चाहिए।
॥ समापन ॥
चतुर्विंशांश अर्थात् सिद्धांश, पाराशरी षोडशवर्ग परम्परा में विद्या सम्बन्धी अध्ययन का महत्त्वपूर्ण वर्ग माना जाता है।
इसकी गणना का मूल आधार प्रत्येक राशि को 24 समान भागों में विभाजित करना है।
विषम राशियों के लिए सिंह तथा सम राशियों के लिए कर्क से चतुर्विंशांश राशियों की गणना की जाती है।
फलादेश में लग्न, लग्नेश, चतुर्थ भाव, पंचम भाव, नवम भाव, बुध तथा बृहस्पति का विशेष अध्ययन किया जाता है।
शास्त्रीय अध्ययन के लिए एक आवश्यक सावधानी: इस पाठ में चतुर्विंशांश की मूल गणना-विधि और पारम्परिक भाव-ग्रह कारकत्वों के आधार पर विकसित फलादेश-पद्धति, दोनों का समावेश किया गया है। सभी आधुनिक विषयगत व्याख्याओं को महर्षि पराशर के प्रत्यक्ष वचन के रूप में नहीं लेना चाहिए। मूल संस्कृत पाठ के उद्धरण के लिए ग्रन्थ का अध्याय, श्लोक और पाठान्तर अलग से सत्यापित करना आवश्यक है।
अगले गहन अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण विषय
चतुर्विंशांश (D24) के 24 अधिदेवता, उनके शास्त्रीय नाम, विषम एवं सम राशियों में उनका क्रम तथा प्रत्येक अधिदेवता के आधार पर ग्रहों के फलादेश की पद्धति।
यह विषय D24 की केवल राशि-आधारित गणना से आगे बढ़कर उसके पारम्परिक देवता-विचार का अध्ययन करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।