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शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

D12 को द्वादशांशद्वादशांश — D12 का पूर्ण पाराशरी विश्लेषण।

Vedic Astro Care
द्वादशांश — D12 का पूर्ण पाराशरी विश्लेषण। 

D12 को द्वादशांश (Dvādaśāṁśa) कहते हैं। पाराशरी परंपरा में यह मुख्यतः माता-पिता, वंश, कुल, पैतृक-मातृक संस्कार तथा उनसे प्राप्त शुभ-अशुभ प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण वर्ग है।

एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रखें—D12 में ग्रहों को चर, स्थिर, द्विस्वभाव, तत्व आदि के आधार पर नहीं रखा जाता; प्रत्येक राशि को 12 समान भागों में बाँटकर राशि-क्रम से द्वादशांश निर्धारित किया जाता है।

1. D12 चार्ट क्या होता है?
D12 को द्वादशांश कहा जाता है।
संस्कृत में:
द्वादश = 12
अंश = भाग
अर्थात किसी राशि को 12 समान भागों में विभाजित करने से द्वादशांश बनता है।
एक राशि का विस्तार 30° होता है।
इस 30° राशि को 12 बराबर भागों में बाँटने पर:
30° ÷ 12 = 2°30′
अर्थात D12 का प्रत्येक द्वादशांश:
2°30′ का होता है।

इसलिए जन्मकुंडली में किसी ग्रह की वास्तविक स्थिति से यह निर्धारित किया जाता है कि वह अपनी राशि के किस 2°30′ के भाग में स्थित है और उस आधार पर D12 में उसकी राशि निर्धारित की जाती है।

2. D12 का मुख्य विषय क्या है?
D12 मुख्य रूप से निम्न विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया जाता है- 
माता
पिता
माता-पिता का प्रभाव
माता-पिता से प्राप्त संस्कार
पारिवारिक एवं वंशगत प्रभाव
कुल एवं वंश की परंपरा
पूर्वजों से प्राप्त प्रभाव
माता-पिता की स्थिति से जुड़े संकेत
पारिवारिक गुण और दोष
व्यक्ति के जीवन में माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय सावधानी है।
D12 को केवल माता-पिता की कुंडली मान लेना उचित नहीं है।
माता के लिए मुख्य जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव और चंद्रमा, तथा पिता के लिए नवम भाव और सूर्य आदि का भी परीक्षण आवश्यक है।
इसलिए D12 को मुख्य जन्मकुंडली के सहयोगी वर्ग के रूप में देखना चाहिए, न कि अकेले निर्णय का आधार बनाना चाहिए।

3. D12 चार्ट कैसे बनता है?
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है।
प्रत्येक राशि 30° की होती है।
इसे 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।
प्रत्येक भाग 2°30′ का होगा।
इस प्रकार द्वादशांश अंश सीमा - 
1
0°00′ – 2°30′
2
2°30′ – 5°00′
3
5°00′ – 7°30′
4
7°30′ – 10°00′
5
10°00′ – 12°30′
6
12°30′ – 15°00′
7
15°00′ – 17°30′
8
17°30′ – 20°00′
9
20°00′ – 22°30′
10
22°30′ – 25°00′
11
25°00′ – 27°30′
12
27°30′ – 30°00′
यही D12 के 12 भाग हैं।

4. D12 में ग्रह को किस राशि में रखा जाता है?
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण नियम है।
D12 में किसी ग्रह को रखने के लिए पहले यह देखें कि ग्रह D1 में किस राशि में और कितने अंश पर स्थित है।
इसके बाद यह निर्धारित करें कि वह उस राशि के कौन-से द्वादशांश में है।
फिर उस राशि से राशि-क्रम में आगे बढ़ते हुए उस द्वादशांश के अनुसार D12 राशि निर्धारित की जाती है।
अर्थात D12 का मूल सिद्धांत है:
राशि को 12 बराबर भागों में बाँटना और प्रथम द्वादशांश से राशि-क्रम प्रारंभ करना।
यहाँ:
चर राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं,
स्थिर राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं,
द्विस्वभाव राशि के लिए कोई अलग दिशा नहीं।
इसलिए D12 को D3 या D7 की तरह चर-स्थिर-द्विस्वभाव नियम से नहीं बनाना चाहिए।

5. D12 में राशि-क्रम कैसे चलता है?
D12 में प्रत्येक राशि के 12 द्वादशांश उसी राशि से शुरू होकर क्रमशः 12 राशियों तक जाते हैं।
उदाहरण के लिए मेष राशि के 12 द्वादशांश होंगे:
मेष में ग्रह की स्थिति
D12 राशि
0°00′ – 2°30′
मेष
2°30′ – 5°00′
वृषभ
5°00′ – 7°30′
मिथुन
7°30′ – 10°00′
कर्क
10°00′ – 12°30′
सिंह
12°30′ – 15°00′
कन्या
15°00′ – 17°30′
तुला
17°30′ – 20°00′
वृश्चिक
20°00′ – 22°30′
धनु
22°30′ – 25°00′
मकर
25°00′ – 27°30′
कुंभ
27°30′ – 30°00′
मीन
यह D12 निर्माण का सबसे सरल उदाहरण है।
6. वृषभ राशि में D12 कैसे निकालेंगे?
अब दूसरे उदाहरण से समझते हैं।
वृषभ से राशि-क्रम शुरू होगा:
वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष
इसलिए:
वृषभ में ग्रह की स्थिति
D12 राशि
0°00′ – 2°30′
वृषभ
2°30′ – 5°00′
मिथुन
5°00′ – 7°30′
कर्क
7°30′ – 10°00′
सिंह
10°00′ – 12°30′
कन्या
12°30′ – 15°00′
तुला
15°00′ – 17°30′
वृश्चिक
17°30′ – 20°00′
धनु
20°00′ – 22°30′
मकर
22°30′ – 25°00′
कुंभ
25°00′ – 27°30′
मीन
27°30′ – 30°00′
मेष
7. प्रत्येक राशि के लिए सरल नियम
याद रखने का सबसे आसान नियम है:
जिस राशि में ग्रह स्थित है, उसी राशि से D12 का पहला भाग शुरू होगा।
इसके बाद प्रत्येक 2°30′ पर अगली राशि आएगी।
इसलिए:
मेष → मेष से शुरू
वृषभ → वृषभ से शुरू
मिथुन → मिथुन से शुरू
कर्क → कर्क से शुरू
सिंह → सिंह से शुरू
और इसी प्रकार:
कन्या → कन्या से शुरू
तुला → तुला से शुरू
वृश्चिक → वृश्चिक से शुरू
धनु → धनु से शुरू
मकर → मकर से शुरू
कुंभ → कुंभ से शुरू
मीन → मीन से शुरू
यानी D12 में पहला द्वादशांश हमेशा मूल राशि से प्रारंभ होता है।

8. उदाहरण से ग्रह का D12 निकालना
मान लीजिए:
सूर्य = 18°20′ मेष
अब देखें:
मेष में:
17°30′ से 20°00′
आठवाँ द्वादशांश है।
मेष से आठवीं राशि:
मेष 1
वृषभ 2
मिथुन 3
कर्क 4
सिंह 5
कन्या 6
तुला 7
वृश्चिक 8
अतः:
सूर्य 18°20′ मेष → D12 में वृश्चिक
9. दूसरा उदाहरण
मान लीजिए:
गुरु = 23°10′ सिंह
सिंह में:
22°30′ – 25°00′
दसवाँ द्वादशांश है।
सिंह से दसवीं राशि:
सिंह 1
कन्या 2
तुला 3
वृश्चिक 4
धनु 5
मकर 6
कुंभ 7
मीन 8
मेष 9
वृषभ 10
अतः:
गुरु 23°10′ सिंह → D12 में वृषभ

10. D12 लग्न कैसे निर्धारित होता है?
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
D12 लग्न निकालने के लिए केवल जन्मलग्न की राशि देखना पर्याप्त नहीं है।
हमें जन्मलग्न की वास्तविक डिग्री चाहिए।
उदाहरण:
मान लीजिए जन्मकुंडली में लग्न है:
मिथुन 14°20′
अब मिथुन राशि के भीतर 14°20′ किस द्वादशांश में आता है?
12°30′ – 15°00′
यह छठा द्वादशांश है।
मिथुन से छठी राशि:
मिथुन 1
कर्क 2
सिंह 3
कन्या 4
तुला 5
वृश्चिक 6
इसलिए:
D12 लग्न = वृश्चिक
इस प्रकार D12 की कुंडली में वृश्चिक को प्रथम भाव अर्थात लग्न बनाया जाएगा।
इसके बाद भाव क्रम से:
वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला
होंगे।

11. D12 लग्न निकालते समय एक बहुत महत्वपूर्ण सावधानी
D12 लग्न निकालते समय:
लग्न की डिग्री को सही-सही जानना आवश्यक है।
केवल यह कहना कि:
"जन्मलग्न मिथुन है"
पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि मिथुन के:
0° से 30°
तक अलग-अलग 12 द्वादशांश होंगे और प्रत्येक 2°30′ पर D12 लग्न बदल सकता है।
इसलिए जन्मसमय में थोड़ी त्रुटि होने पर विशेष रूप से D12 लग्न और उसके भावों में परिवर्तन संभव है।

12. D12 में ग्रहों को रखने की पूरी प्रक्रिया
कक्षा में विद्यार्थियों को आप यह प्रक्रिया इस प्रकार समझा सकते हैं:
पहला चरण: D1 में ग्रह की राशि देखें।
दूसरा चरण: ग्रह की डिग्री देखें।
तीसरा चरण: ग्रह किस 2°30′ के खंड में है, यह निर्धारित करें।
चौथा चरण: उस ग्रह की मूल राशि से राशि-क्रम में उतनी राशि गिनें।
पाँचवाँ चरण: प्राप्त राशि को D12 में ग्रह की राशि मानें।
छठा चरण: इसी प्रकार सभी ग्रहों की D12 राशियाँ निकालें।
सातवाँ चरण: जन्मलग्न के लिए भी यही प्रक्रिया करें।
आठवाँ चरण: प्राप्त D12 लग्न को प्रथम भाव बनाकर पूरा D12 भावचक्र तैयार करें।

13. D12 क्यों देखा जाता है?
अब प्रश्न है कि आखिर D12 की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
क्योंकि जन्मकुंडली व्यक्ति के जीवन की व्यापक तस्वीर देती है, जबकि वर्ग कुंडलियाँ जीवन के विशेष क्षेत्रों को अधिक सूक्ष्मता से देखने में सहायता करती हैं।
D12 विशेष रूप से:
माता-पिता और वंशगत प्रभाव
के अध्ययन में उपयोगी है।
उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में माता-पिता से संबंधित संकेत सामान्य रूप से दिखाई दे सकते हैं, लेकिन D12 उन संकेतों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर समझने में सहायता कर सकता है।

14. माता के लिए D12 में क्या देखें?
माता से संबंधित अध्ययन में निम्न बातों को संयुक्त रूप से देखना चाहिए:
D1 में
चतुर्थ भाव
चतुर्थेश
चंद्रमा
चंद्रमा की स्थिति
चतुर्थ भाव पर ग्रहों की दृष्टि
D12 में
D12 लग्न
D12 का चतुर्थ भाव
चतुर्थेश
चंद्रमा
चंद्रमा की स्थिति
शुभ और अशुभ ग्रहों का प्रभाव
इससे माता से संबंधित संकेतों को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिल सकती है।

15. पिता के लिए D12 में क्या देखें?
पिता के अध्ययन में मुख्य रूप से:
D1 में
नवम भाव
नवमेश
सूर्य
सूर्य की स्थिति
नवम भाव पर ग्रहों का प्रभाव
और D12 में:
लग्न
नवम भाव
नवमेश
सूर्य
सूर्य की स्थिति
शुभ-अशुभ प्रभाव
का अध्ययन किया जाता है।

16. क्या केवल D12 देखकर माता-पिता का फलादेश कर सकते हैं?
नहीं।
यह बहुत महत्वपूर्ण नियम है।
किसी भी वर्ग कुंडली को अकेले लेकर अंतिम निर्णय देना उचित नहीं है।
उदाहरण के लिए यदि D12 में कोई ग्रह अशुभ स्थिति में दिखाई दे रहा है, तो तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि माता-पिता के जीवन में निश्चित रूप से कोई बड़ी समस्या होगी।
पहले D1 में संबंधित भाव और ग्रह की स्थिति देखनी चाहिए।
फिर D12 से उस संकेत की पुष्टि या सूक्ष्मता समझनी चाहिए।

17. D12 में ग्रहों का फल कैसे देखें?
अब फलादेश की प्रक्रिया समझते हैं।
किसी ग्रह का फल देखते समय क्रम रखें:
1. D12 लग्न
सबसे पहले D12 का लग्न देखें।
2. D12 लग्नेश
लग्नेश किस राशि में है, किस भाव में है और किन ग्रहों से प्रभावित है।
3. संबंधित भाव
माता के लिए चतुर्थ भाव और पिता के लिए नवम भाव आदि।
4. संबंधित ग्रह
माता के लिए चंद्रमा और पिता के लिए सूर्य के संकेतों को देखें।
5. ग्रहों की शक्ति
ग्रह उच्च, नीच, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री आदि स्थिति में है या नहीं।
6. ग्रहों का संबंध
युति, दृष्टि और अन्य ग्रह संबंध देखें।
7. शुभ-अशुभ प्रभाव
शुभ ग्रहों का प्रभाव और पाप ग्रहों का प्रभाव देखें।
8. D1 से तुलना करें
यही सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
18. D12 में उच्च ग्रह
यदि D12 में संबंधित ग्रह उच्च स्थिति में हो और D1 में भी उसका समर्थन हो, तो उस ग्रह से जुड़े विषयों में सकारात्मक संकेत मजबूत हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए यदि माता से संबंधित अध्ययन में चंद्रमा D12 में अच्छी स्थिति में है और D1 में भी चंद्रमा मजबूत है, तो माता से संबंधित शुभ संकेतों की पुष्टि हो सकती है।
लेकिन केवल D12 के उच्चत्व के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं देना चाहिए।

19. D12 में नीच ग्रह
यदि संबंधित ग्रह D12 में नीच राशि में हो, तो उसके संकेतों में कमजोरी या चुनौती का संकेत मिल सकता है।
लेकिन:
नीच = निश्चित अशुभ फल
ऐसा सरल नियम नहीं है।
नीचभंग, अन्य ग्रहों का प्रभाव, D1 की स्थिति, भावाधिपत्य और ग्रहबल आदि को भी देखना आवश्यक है।

20. D12 में शुभ ग्रह
यदि गुरु, शुक्र, बुध या शुभ स्थिति वाला चंद्रमा संबंधित भावों को प्रभावित करे तो पारंपरिक फलादेश में इसे सामान्यतः सहयोगी संकेत माना जा सकता है।
लेकिन ग्रह की वास्तविक प्रकृति के साथ-साथ:
भावाधिपत्य
स्थिति
युति
दृष्टि
बल
को भी देखना चाहिए।

21. D12 में पाप ग्रह
सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु-केतु जैसे ग्रह यदि संबंधित भावों को प्रभावित करें तो संघर्ष, कठोरता, दूरी, जिम्मेदारी या कठिन अनुभव जैसे संकेतों पर विचार किया जा सकता है।
लेकिन यहाँ भी केवल "पाप ग्रह = खराब फल" का नियम नहीं लगाना चाहिए।
क्योंकि कोई पाप ग्रह मजबूत होकर किसी भाव को अनुशासन, दृढ़ता या संघर्ष से सफलता प्राप्त करने की क्षमता भी दे सकता है।

22. D12 में भावों का सामान्य महत्व
D12 में भावों को सामान्यतः इस प्रकार समझ सकते हैं:
1 भाव: व्यक्ति और उसका पारिवारिक/वंशगत स्वरूप
2 भाव: परिवार, कुल, पारिवारिक संस्कार और संसाधन
3 भाव: भाई-बहन, पराक्रम, प्रयास एवं पारिवारिक संचार
4 भाव: माता, मातृसुख, घर और मातृ पक्ष
5 भाव: संस्कार, पूर्व पुण्य, परंपरा एवं संतति से जुड़े संकेत
6 भाव: ऋण, रोग, संघर्ष और पारिवारिक विवाद
7 भाव: संबंध, साझेदारी और पारिवारिक संबंधों में परस्परता
8 भाव: वंशगत गहराई, परिवर्तन, विरासत एवं गुप्त प्रभाव
9 भाव: पिता, धर्म, गुरु, भाग्य और पितृ पक्ष
10 भाव: कर्म, प्रतिष्ठा तथा परिवार से प्राप्त कर्म-संस्कार
11 भाव: लाभ, उपलब्धि और पारिवारिक सहयोग
12 भाव: व्यय, दूरी, अलगाव और त्याग
इन अर्थों को D12 के विशिष्ट संदर्भ में समझना चाहिए; इन्हें D1 के भावार्थ का यांत्रिक विकल्प नहीं मानना चाहिए।

23. D12 में लग्नेश का महत्व
D12 का लग्नेश बहुत महत्वपूर्ण है।
देखें:
किस राशि में है?
किस भाव में है?
उच्च/नीच है?
स्वक्षेत्री है?
शुभ ग्रहों से संबंध है?
पाप ग्रहों से पीड़ित है?

D1 में उसकी क्या स्थिति है?
यदि D12 लग्नेश मजबूत हो और D1 भी समर्थन करे तो व्यक्ति के पारिवारिक एवं वंशगत आधार से मिलने वाले सहयोग के संकेत मजबूत हो सकते हैं।

24. D12 में चंद्रमा
D12 में चंद्रमा को विशेष ध्यान से देखना चाहिए क्योंकि चंद्रमा:
माता
मन
मातृभाव
भावनात्मक संस्कार
से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रह है।
देखें:
चंद्रमा किस भाव में है?
किस राशि में है?
किससे युति है?
किसकी दृष्टि है?
D1 में चंद्रमा कैसा है?
इसके बाद माता से संबंधित संकेतों का मूल्यांकन करें।

25. D12 में सूर्य
सूर्य को विशेष रूप से पिता और पितृ प्रभाव के संदर्भ में देखें।
देखें:
सूर्य का D12 भाव
सूर्य की राशि
सूर्य का बल
सूर्य पर शुभ-अशुभ प्रभाव
D1 में सूर्य की स्थिति
D1 के नवम भाव और नवमेश की स्थिति
यदि D1 और D12 दोनों में सूर्य मजबूत संकेत दे रहा है, तो पिता से संबंधित सकारात्मक संकेत अधिक विश्वसनीय माने जा सकते हैं।

26. D12 में राहु-केतु
राहु और केतु के संबंध में भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
इनकी स्थिति:
वंशगत असामान्यता
पारिवारिक दूरी
असामान्य परिस्थितियाँ
अलग प्रकार के पारिवारिक अनुभव
आध्यात्मिक या रहस्यमय वंशगत प्रभाव
जैसे संकेतों की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती है।
लेकिन किसी विशेष घटना का निर्णय केवल राहु-केतु देखकर नहीं किया जाना चाहिए।

27. D1 और D12 का संयुक्त फलादेश
सबसे अच्छा तरीका है:
D1 → मुख्य संकेत
D12 → सूक्ष्म पुष्टि
उदाहरण:
यदि D1 में:
चतुर्थ भाव मजबूत है,
चतुर्थेश मजबूत है,
चंद्रमा शुभ है,
और D12 में भी:
चंद्रमा शुभ है,
चतुर्थ भाव मजबूत है,
तो माता से संबंधित सकारात्मक संकेत अधिक मजबूत माने जा सकते हैं।
इसी प्रकार पिता के लिए:
D1 का नवम भाव + नवमेश + सूर्य
और
D12 का नवम भाव + नवमेश + सूर्य
को मिलाकर देखना चाहिए।

28. D12 में वर्गोत्तम का महत्व
यदि कोई ग्रह D1 और D12 दोनों में एक ही राशि में हो तो वह वर्गोत्तम स्थिति प्राप्त करता है।
उदाहरण:
यदि सूर्य D1 में सिंह राशि में है और D12 में भी सिंह राशि में है, तो सूर्य वर्गोत्तम होगा।
ऐसी स्थिति ग्रह की मूल राशि-संबंधी शक्ति को विशेष महत्व दे सकती है।
लेकिन वर्गोत्तम का अर्थ यह नहीं कि ग्रह हर परिस्थिति में पूर्णतः शुभ फल देगा।
भावाधिपत्य और अन्य कारक भी देखे जाएंगे।

29. D12 में ग्रहों की पुनरावृत्ति
यदि D12 में कई ग्रह एक ही राशि में आ जाएँ तो उस राशि और उसके स्वामी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
उदाहरण:
यदि D12 में सूर्य और गुरु एक राशि में हों, तो उनके बीच युति का प्रभाव देखा जाएगा।
फिर:
राशि स्वामी
भाव
ग्रहबल
D1 स्थिति
को मिलाकर फलादेश किया जाएगा।

30. D12 और दशा
D12 मुख्य रूप से सूक्ष्म पारिवारिक एवं माता-पिता संबंधी संकेतों को समझने के लिए है।
लेकिन किसी घटना का समय निर्धारित करने के लिए केवल D12 पर्याप्त नहीं है।
दशा-अंतर्दशा में संबंधित ग्रह सक्रिय हो और साथ में D1 तथा आवश्यक वर्गकुंडली समर्थन दे रही हो, तब घटना के समय के संबंध में अधिक मजबूत निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
इसलिए:
D12 = विषय की सूक्ष्मता
और
दशा/गोचर = घटना के समय की सहायता
के रूप में समझना अधिक उचित है।

31. D12 के फलादेश में सबसे बड़ी गलती
विद्यार्थियों को विशेष रूप से ये गलतियाँ नहीं करनी चाहिए:
गलती 1: D12 को केवल माता-पिता की कुंडली मान लेना।
गलती 2: केवल D12 देखकर फलादेश कर देना।
गलती 3: D12 निर्माण में चर-स्थिर-द्विस्वभाव का नियम लगाना।
गलती 4: तत्वों के आधार पर ग्रहों को रखना।
गलती 5: ग्रह की राशि देखकर डिग्री की उपेक्षा करना।
गलती 6: D12 में नीच ग्रह को निश्चित अशुभ मानना।
गलती 7: D12 में उच्च ग्रह को निश्चित शुभ मानना।
गलती 8: D1 की पुष्टि के बिना बड़ा निष्कर्ष निकालना।
गलती 9: D12 से सीधे घटना का समय निर्धारित करना।
गलती 10: माता-पिता के संबंध में केवल एक ग्रह देखकर निर्णय देना।

32. D12 निकालने का सबसे आसान गणितीय तरीका
यदि ग्रह की राशि के भीतर स्थिति को कुल डिग्री में लें, तो:
द्वादशांश क्रम = ग्रह की राशि के भीतर डिग्री ÷ 2°30′
से निर्धारित किया जा सकता है।
उदाहरण:
ग्रह:
16°40′
पर है।
16°40′, 15°00′ से 17°30′ के बीच है।
अतः यह:
7वाँ द्वादशांश
है।
अब ग्रह जिस राशि में है, उस राशि से सातवीं राशि गिनकर D12 राशि प्राप्त होगी।
33. कक्षा में विद्यार्थियों को याद कराने का सूत्र
D12 के लिए यह सूत्र याद कराएँ:
30° ÷ 12 = 2°30′
और:
पहला द्वादशांश = मूल राशि
फिर:
हर 2°30′ पर अगली राशि
यानी:
0°00′ से 2°30′ → पहली राशि
2°30′ से 5°00′ → दूसरी राशि
5°00′ से 7°30′ → तीसरी राशि
और इसी प्रकार 12वें भाग तक।

34. D12 का आदर्श फलादेश क्रम
किसी भी कुंडली में D12 का फलादेश करते समय यह क्रम अपनाना बहुत व्यवस्थित रहेगा:
चरण 1
D1 लग्न देखें।
चरण 2
D1 में माता-पिता से संबंधित मुख्य भाव देखें।
चरण 3
D1 में संबंधित ग्रह देखें।
चरण 4
D12 लग्न निर्धारित करें।
चरण 5
D12 लग्नेश देखें।
चरण 6
D12 का चतुर्थ भाव और चंद्रमा देखें।
चरण 7
D12 का नवम भाव और सूर्य देखें।
चरण 8
संबंधित भावेश की स्थिति देखें।
चरण 9
शुभ-अशुभ ग्रहों का प्रभाव देखें।
चरण 10
उच्च, नीच, स्वक्षेत्र, मित्रक्षेत्र आदि देखें।
चरण 11
वर्गोत्तम आदि विशेष स्थितियाँ देखें।
चरण 12
D1 और D12 के संकेतों को मिलाएँ।
चरण 13
दशा और गोचर से घटना की सक्रियता देखें।
चरण 14
तभी अंतिम फलादेश दें।

35. D12 के बारे में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
पूरे अध्याय को यदि पाँच सूत्रों में याद करना हो तो:
सूत्र 1: D12 का नाम द्वादशांश है।
सूत्र 2: प्रत्येक राशि के 30° को 12 भागों में बाँटा जाता है।
सूत्र 3: प्रत्येक द्वादशांश का विस्तार 2°30′ होता है।
सूत्र 4: D12 में प्रथम भाग उसी राशि से प्रारंभ होता है और फिर राशि क्रम चलता है।
सूत्र 5: D12 मुख्यतः माता-पिता, वंश, कुल और पारिवारिक संस्कारों के सूक्ष्म अध्ययन में सहायक है, लेकिन फलादेश D1 और अन्य आवश्यक संकेतों के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए।
एक संपूर्ण उदाहरण
मान लीजिए जन्मकुंडली में:
लग्न = मिथुन 14°20′
सूर्य = सिंह 23°10′
चंद्रमा = वृषभ 16°40′
लग्न
मिथुन 14°20′:
12°30′–15°00′ = छठा द्वादशांश
मिथुन से छठी राशि:
वृश्चिक
अतः:
D12 लग्न = वृश्चिक
सूर्य
सिंह 23°10′:
22°30′–25°00′ = दसवाँ द्वादशांश
सिंह से दसवीं राशि:
वृषभ
अतः:
सूर्य D12 में वृषभ
चंद्रमा
वृषभ 16°40′:
15°00′–17°30′ = सातवाँ द्वादशांश
वृषभ से सातवीं राशि:
वृश्चिक
अतः:
चंद्रमा D12 में वृश्चिक
अब D12 की कुंडली में:
वृश्चिक लग्न
होगा, सूर्य वृषभ में और चंद्रमा वृश्चिक में रखा जाएगा।
इसके बाद D12 के भावों को वृश्चिक से क्रमशः स्थापित करके माता-पिता से संबंधित फलादेश किया जाएगा।
यही D12 निर्माण की मूल पाराशरी पद्धति है।
यदि आप इसे विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए और भी व्यवस्थित बनाना चाहते हैं, तो अगला सबसे उपयोगी चरण होगा �⁠D12 की 12ों राशियों की पूरी तालिका + �⁠12ों भावों का फल + �⁠10–15 वास्तविक गणितीय उदाहरण + �⁠माता और पिता के अलग-अलग फलादेश के उदाहरण।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

दशमांश D10 चार्ट: पाराशरी सिद्धांत एवं विश्लेषण पद्धति।

Vedic Astro Care
कक्षा में पढ़ाने के उद्देश्य से दशमांश D10 चार्ट का पाराशरी वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार स्टेप-बाय-स्टेप पूर्ण विश्लेषण।

दशमांश D10 चार्ट: पाराशरी सिद्धांत एवं विश्लेषण पद्धति।

1 - D10, अर्थात दशमांश चार्ट क्या होता है?

महर्षि पराशर कृत वृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार, षोडशवर्ग, अर्थात 16 वर्ग कुंडलियों में D10 यानी दशमांश कुंडली का विशेष स्थान है।

मूल अवधारणा: लग्न कुंडली के किसी भी भाव के 30° विस्तार को जब 10 समान भागों में विभाजित किया जाता है, तो प्रत्येक भाग 3° यानी 3° 00' का होता है। इसे दशमांश कहते हैं।

महत्व: यह मुख्य रूप से जातक के कर्म क्षेत्र, Career और Profession, समाज में मान-प्रतिष्ठा, राज्य या सरकार से लाभ या हानि, सत्ता, पद-प्रतिष्ठा और आजीविका के साधनों का अध्ययन करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

सूक्ष्म अर्थ: लग्न कुंडली, D1, बीज यानी Seed है, तो D10 उस बीज का फल यानी Fruit है, जो कर्म के रूप में सामने आता है।

2 - D10 चार्ट कैसे बनता है और ग्रहों को रखने के नियम, उदाहरण सहित।

दशमांश का निर्माण राशि की प्रकृति, अर्थात विषम या सम, पर निर्भर करता है।

विभाजन का नियम, Division Rule।

एक राशि 30° की होती है, जिसे 10 भागों में बाँटने पर प्रत्येक भाग 3° का बनता है।

भाग एक: 00° 00' से 03° 00'।

भाग दो: 03° 00' से 06° 00'।

भाग तीन: 06° 00' से 09° 00'।

भाग चार: 09° 00' से 12° 00'।

भाग पाँच: 12° 00' से 15° 00'।

भाग छह: 15° 00' से 18° 00'।

भाग सात: 18° 00' से 21° 00'।

भाग आठ: 21° 00' से 24° 00'।

भाग नौ: 24° 00' से 27° 00'।

भाग दस: 27° 00' से 30° 00'।

ग्रहों को रखने का पाराशरी नियम।

विषम राशि, Odd Signs, अर्थात 1, 3, 5, 7, 9 और 11।

यदि ग्रह विषम राशि में स्थित है, तो गणना उसी राशि, Same Sign, से शुरू करके क्रमानुसार आगे की राशियों में की जाती है।

सम राशि, Even Signs, अर्थात 2, 4, 6, 8, 10 और 12।

यदि ग्रह सम राशि में स्थित है, तो गणना उस राशि से 9वीं राशि, 9th Sign from it, से शुरू करके क्रमानुसार आगे की राशियों में की जाती है।

व्यावहारिक उदाहरण, Practical Examples।

उदाहरण एक: विषम राशि, Odd Sign, में ग्रह।

स्थिति: सूर्य, मेष राशि, Mesh, अर्थात 1, विषम राशि, में 13° 20' पर स्थित है।

गणना।

13° 20' पाँचवें भाग, 12° 00' से 15° 00', में आता है।

मेष विषम राशि है, इसलिए गिनती मेष, अर्थात 1, से ही शुरू होगी।

मेष, 1, से 5वीं राशि = सिंह, 5।

परिणाम: D10 चार्ट में सूर्य सिंह राशि में स्थापित होगा।

उदाहरण दो: सम राशि, Even Sign, में ग्रह।

स्थिति: शुक्र, वृषभ राशि, Vrishabha, अर्थात 2, सम राशि, में 22° 10' पर स्थित है।

गणना।

22° 10' आठवें भाग, 21° 00' से 24° 00', में आता है।

वृषभ सम राशि है, इसलिए पहली गिनती वृषभ से 9वीं राशि अर्थात मकर, 10, से शुरू होगी।

मकर, 10, से क्रमानुसार 8वीं राशि गिनें: मकर, 1; कुंभ, 2; मीन, 3; मेष, 4; वृषभ, 5; मिथुन, 6; कर्क, 7; सिंह, 8।

परिणाम: D10 चार्ट में शुक्र सिंह राशि में स्थापित होगा।

3 - D10 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?

D10 कुंडली का लग्न निर्धारित करने का नियम भी वही है, जो ग्रहों को स्थापित करने का है।

पहला चरण: लग्न का अंश और राशि नोट करें, D1 कुंडली से।

मुख्य लग्न कुंडली, D1, के लग्न की राशि और उसका सटीक अंश, Degree और Minute, देखें।

दूसरा चरण: राशि की प्रकृति पहचानें।

विषम या सम।

तीसरा चरण: दशमांश भाग ज्ञात करें।

0 से 30 अंश की तालिका के अनुसार अंश के अनुसार देखें कि लग्न 1 से 10 में से किस दशमांश भाग में गिर रहा है।

चौथा चरण: D10 का लग्न स्थापित करें।

अंतिम परिणाम।

प्रारंभिक राशि से उतने ही घर आगे गिनें, जितना भाग प्राप्त हुआ है। वही राशि D10 कुंडली के प्रथम भाव, लग्न, में आएगी।

उदाहरण: यदि D1 का लग्न मिथुन 04° 30' है।

मिथुन विषम राशि, 3, है। इसलिए गिनती मिथुन से शुरू होगी।

04° 30' दूसरे भाग, 03° से 06°, में आता है।

मिथुन से 2री राशि = कर्क राशि, 4।

अतः D10 का लग्न कर्क होगा।

4 - D10 चार्ट क्यों देखा जाता है?

केवल D1, लग्न कुंडली, या D9, नवांश, देखकर करियर का पूर्ण सत्य नहीं जाना जा सकता। D10 चार्ट निम्नलिखित सूक्ष्म पहलुओं के विश्लेषण के लिए देखा जाता है।

आजीविका का क्षेत्र, Field of Career: जातक नौकरी करेगा, व्यापार करेगा, या स्वतंत्र व्यवसाय, Freelancing और Consultancy।

पद-प्रतिष्ठा और पदोन्नति, Promotion और Status: जीवन में अधिकार, सत्ता और ऊँचे पद की प्राप्ति होगी या नहीं।

कार्यक्षेत्र में बाधाएँ, Obstacles और Job Loss: नौकरी छूटना, बार-बार तबादले, Transfers, या कार्यस्थल पर राजनीति।

राज्य या सरकार से संबंध, Government Recognition: सरकारी नौकरी, सरकारी टेंडर, या टैक्स और कानूनी विवाद।

कर्म का उद्देश्य, Dharma और Karma: जातक का समाज में वास्तविक योगदान और उसकी व्यावसायिक छवि, Professional Reputation।

5 - D10 चार्ट का फलादेश कैसे किया जाता है? Step-by-Step Analysis।

विद्यार्थियों को फलादेश सिखाते समय इस 6-चरणीय प्रक्रिया का पालन करवाएँ।

चरण 1: D1 और D10 के दशमेश का संबंध, Connection of 10th Lord।

D1 का 10वें भाव का स्वामी, दशमेश, D10 में किस स्थिति, मित्र, शत्रु, उच्च या नीच, में बैठा है, यह देखें।

यदि D1 का 10th Lord D10 में केंद्र या त्रिकोण, 1, 4, 7, 10, 5 और 9, में बलवान होकर स्थित है, तो करियर में बड़ी सफलता मिलती है।

चरण 2: D10 के लग्न और लग्नेश का विश्लेषण।

D10 का लग्न जातक की स्वयं की कार्यक्षमता और व्यावसायिक दृष्टिकोण है।

यदि D10 का लग्नेश मजबूत, शुभ भावों में और शुभ ग्रहों से दृष्ट, है, तो जातक कार्यक्षेत्र में दबाव सहने में सक्षम होता है।

चरण 3: D10 के मुख्य भावों की भूमिका।

पहला भाव: जातक की व्यावसायिक पहचान और निर्णय लेने की क्षमता।

दूसरा भाव: कर्म से प्राप्त प्रत्यक्ष धन और व्यावसायिक वाणी।

छठा भाव: नौकरी, प्रतियोगिता, सेवा क्षेत्र, और कार्यस्थल के शत्रु तथा चुनौतियाँ।

सातवाँ भाव: व्यापार, साझीदारी, Partnerships, ग्राहक और अनुबंध, Contracts।

दसवाँ भाव: कर्म का सर्वोच्च बिंदु, सत्ता, पद और मुख्य करियर।

ग्यारहवाँ भाव: कर्म से होने वाला कुल लाभ और उपलब्धियाँ।

चरण 4: इंद्र और दिक्पालों के आधार पर देवता विश्लेषण, Advanced Parashari Concept।

पाराशरी नियम अनुसार, D10 के 10 भागों के 10 संरक्षक देवता, दिक्पाल, होते हैं।

चरण 5: दशा और गोचर का संयोजन, Dasha Application।

सफलता का समय: जब D10 के 10th Lord, 1st Lord या 11th Lord की महादशा या अंतर्दशा चलती है, तो पदोन्नति या करियर में बड़ा उछाल आता है।

संघर्ष का समय: D10 के 6ठें, 8वें या 12वें भाव के स्वामियों की दशा में कार्यक्षेत्र में तनाव, नौकरी में परिवर्तन या रुकावटें आती हैं।

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

D9 नवांश कुंडली — कक्षा हेतु क्रमबद्ध अध्ययन

Vedic Astro Care
D9 नवांश कुंडली — कक्षा हेतु क्रमबद्ध अध्ययन
1. D9 चार्ट क्या होता है?
D9 = नवांश = राशि का नौवाँ विभाजन।
एक राशि का विस्तार:
30°
अतः,
30° ÷ 9 = 3°20′
इसलिए प्रत्येक राशि को 3°20′ के 9 भागों में विभाजित किया जाता है। इन प्रत्येक भाग को एक नवांश कहते हैं।
अर्थात्:
1 नवांश = 3°20′
और सम्पूर्ण राशि में:
9 नवांश × 3°20′ = 30°
पूरी 360° राशि-मंडल में:
12 राशियाँ × 9 नवांश = 108 नवांश
इसलिए D9 को नवांश कुंडली कहा जाता है।

2. D9 को नवांश क्यों कहते हैं?
संस्कृत में—
नव = 9
इसलिए राशि के नौवें विभाजन को नवांश कहा गया।
पाराशरी वर्ग-विभाजन में D9 अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वर्ग कुंडलियों का उद्देश्य जन्मकुंडली में दिखाई देने वाले विषयों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर समझना है।
विशेष रूप से D9 का प्रयोग:
विवाह
जीवनसाथी
वैवाहिक जीवन
धर्म एवं जीवन-मूल्य
भाग्य की परिपक्वता
ग्रहों की सूक्ष्म शक्ति
ग्रह की वास्तविक सामर्थ्य
ग्रह के फल की पुष्टि
आदि के लिए किया जाता है।
लेकिन विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही यह बात स्पष्ट कर दें:
D9 केवल विवाह की कुंडली नहीं है।

3. एक राशि में नवांश कैसे बनाए जाते हैं?
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है।
मान लीजिए किसी ग्रह की स्थिति है:
मेष 10°15′
सबसे पहले देखें कि वह मेष राशि के किस नवांश में है।
मेष राशि के नवांश:

प्रथम से नवें नवांश तक प्रत्येक नवांश की अंश सीमा
प्रथम नवांश - 0°00′ – 3°20′
दूसरा नवांश - 3°20′ – 6°40′
तीसरा नवांश - 6°40′ – 10°00′
चौथा नवांश - 10°00′ – 13°20′
पांचवां नवांश - 13°20′ – 16°40′
छठा नवांश - 16°40′ – 20°00′
सातवां नवांश - 20°00′ – 23°20′
आठवां नवांश - 23°20′ – 26°40′
नवां नवांश - 26°40′ – 30°00′

10°15′, 10°00′ से 13°20′ के बीच है।
अतः यह चतुर्थ नवांश है।
अब प्रश्न है—
चतुर्थ नवांश किस राशि का होगा?
इसके लिए नवांश राशि निर्धारण का नियम समझना आवश्यक है।

4. नवांश राशि निर्धारित करने का मुख्य नियम
राशियों को तीन प्रकार में बाँटा जाता है:
चर राशि - मेष, कर्क, तुला, मकर
स्थिर राशि - वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ
द्विस्वभाव राशि - मिथुन, कन्या, धनु, मीन

अब D9 में नवांश राशि निकालने का पाराशरी नियम:

चर राशि - 
चर राशि में, लग्न कुंडली में जिस राशि में ग्रह हो उसी राशि से नवांश भावों की गिनती शुरू होती है, 
उदाहरण:
मेष → मेष से प्रारंभ
नवांश क्रम:
मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु

स्थिर राशि - 
स्थिर राशि में, लग्न कुंडली में जिस स्थिर राशि में ग्रह हो उस राशि से गिनकर, ठीक नवम राशि से नवांश क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
वृषभ
वृषभ से नवम राशि:
वृषभ(1), मिथुन(2), कर्क(3), सिंह(4), कन्या(5), तुला(6), वृश्चिक(7), धनु(8), मकर(9)
अतः वृषभ के नवांश:
मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या

द्विस्वभाव राशि -
द्विस्वभाव राशि में, जिस राशि में ग्रह लग्न कुंडली में हो, उस राशि से ठीक पांचवीं राशि से गणना क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
मिथुन
मिथुन से पंचम राशि:
मिथुन(1), कर्क(2), सिंह(3), कन्या(4), तुला(5)
अतः मिथुन के नवांश:
तुला → वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन

5. पूरी नवांश राशि-तालिका

जन्म राशि - मेष - चर
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - वृषभ - स्थिर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - मिथुन - द्विस्वभाव
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - कर्क - चर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - सिंह - स्थिर
धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह
जन्म राशि - कन्या - द्विस्वभाव
मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक
जन्म राशि - तुला - चर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - वृश्चिक - स्थिर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - धनु - द्विस्वभाव
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - मकर - चर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - कुंभ - स्थिर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - मीन - द्विस्वभाव
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन

यहाँ एक रोचक बात विद्यार्थियों को बताई जा सकती है:
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में नवांश क्रम अलग प्रारंभ-बिंदु से चलता है, लेकिन प्रत्येक राशि में क्रम लगातार राशिचक्र के अनुसार आगे बढ़ता है।

6. उदाहरण से D9 बनाना
मान लीजिए:
गुरु = वृषभ 14°20′
पहले देखें:
वृषभ के नवांश:
0°–3°20′ → मकर
3°20′–6°40′ → कुंभ
6°40′–10° → मीन
10°–13°20′ → मेष
13°20′–16°40′ → वृषभ
गुरु 14°20′ पर है।
अतः गुरु पंचम नवांश में है।
वृषभ का पंचम नवांश = वृषभ
इसलिए:
D1 में गुरु = वृषभ
और
D9 में गुरु = वृषभ
इस स्थिति को आगे चलकर वर्गोत्तम की चर्चा में जोड़ा जा सकता है।

7. दूसरा उदाहरण — द्विस्वभाव राशि
मान लीजिए:
शुक्र = मिथुन 8°00′
मिथुन के नवांश:
तुला = 0°–3°20′
वृश्चिक = 3°20′–6°40′
धनु = 6°40′–10°
शुक्र 8° पर है।
अतः शुक्र तीसरे नवांश में है।
मिथुन का तीसरा नवांश = धनु
इसलिए:
D9 में शुक्र धनु राशि में होगा।

8. D9 में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
D9 का लग्न निकालने का तरीका भी ग्रहों जैसा ही है।
सबसे पहले D1 में लग्न की सटीक अंश स्थिति चाहिए।
मान लीजिए:
लग्न = सिंह 18°25′
सिंह के नवांश:
धनु — 0°–3°20′
मकर — 3°20′–6°40′
कुंभ — 6°40′–10°
मीन — 10°–13°20′
मेष — 13°20′–16°40′
वृषभ — 16°40′–20°
18°25′ छठे नवांश में है।
सिंह का छठा नवांश = वृषभ
अतः:
D9 लग्न = वृषभ
यही नवांश कुंडली का प्रथम भाव/लग्न बन जाएगा।
इसके बाद अन्य सभी ग्रहों को उनके-अपने नवांश राशियों में रखा जाता है।

9. D9 कुंडली बनाने की पूरी प्रक्रिया
कक्षा में विद्यार्थियों को यह 6 चरणों में सिखाएँ:
चरण 1
D1 कुंडली से ग्रहों की सटीक राशि और अंश लिखें।
चरण 2
प्रत्येक राशि के 30° को 9 भागों में बाँटें।
प्रत्येक भाग = 3°20′
चरण 3
ग्रह किस नवांश क्रमांक में है, यह निर्धारित करें।
चरण 4
राशि के चर/स्थिर/द्विस्वभाव होने के अनुसार नवांश की प्रारंभिक राशि निर्धारित करें।
चरण 5
उस क्रमांक की नवांश राशि ग्रह को दें।
चरण 6
इसी प्रक्रिया से लग्न सहित सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु के D9 स्थान निर्धारित करें।

11. D9 क्यों देखा जाता है?
अब फलित ज्योतिष का मुख्य भाग।
D9 को मुख्यतः निम्न विषयों के लिए देखा जाता है:
1. विवाह
विवाह की गुणवत्ता
वैवाहिक संबंध
जीवनसाथी का स्वभाव
वैवाहिक स्थिरता
विवाह के बाद जीवन में परिवर्तन

2. ग्रह की शक्ति
कई बार D1 में ग्रह अच्छी स्थिति में दिखाई देता है लेकिन D9 में कमजोर होता है।
या D1 में सामान्य दिखाई देने वाला ग्रह D9 में अत्यंत अच्छी स्थिति प्राप्त करता है।
इसलिए D9 ग्रह की सूक्ष्म स्थिति को समझने में सहायता करता है।

3. धर्म
D9 का संबंध धर्म, जीवन के सिद्धांतों और व्यक्ति की आंतरिक परिपक्वता से भी जोड़ा जाता है।

4. भाग्य की परिपक्वता
विशेष रूप से गुरु, नवम भाव, नवमेश और संबंधित ग्रहों को D1 के साथ D9 में देखने से व्यक्ति के जीवन में धर्म एवं भाग्य के विकास को समझने में सहायता मिलती है।

12. क्या D9 अकेले देखकर फलादेश किया जा सकता है?
नहीं।
यह विद्यार्थियों को बहुत स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।
सही क्रम:
D1 → D9 → अन्य आवश्यक वर्ग → दशा → गोचर
D9, D1 का विकल्प नहीं है।
पहले D1 में योग और स्थिति देखें।
फिर D9 से उसकी पुष्टि, सूक्ष्म शक्ति और परिपक्व फल को समझें।

13. D1 और D9 का संबंध
इसे कक्षा में इस प्रकार समझाएँ:
D1 = जीवन का मुख्य आधार
D9 = उस आधार की सूक्ष्म गुणवत्ता और परिपक्वता
उदाहरण के लिए यदि D1 में शुक्र मजबूत है, तो विवाह एवं संबंधों के विषय में शुभ संकेत मिल सकते हैं।
लेकिन यदि D9 में शुक्र अत्यंत पीड़ित हो तो उस शुभता को बिना जाँच के पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसी प्रकार:
D1 में ग्रह मध्यम हो लेकिन D9 में स्वक्षेत्री/उच्च/मित्र राशि में हो, तो ग्रह के फल में आंतरिक मजबूती दिखाई दे सकती है।
लेकिन दोनों कुंडलियों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है।

14. D9 में सबसे पहले क्या देखें?
कक्षा में फलित की यह क्रम व्यवस्था रखें:
पहला — D9 लग्न
देखें:
D9 लग्न कौन-सी राशि है?
लग्नेश कहाँ है?
लग्न पर कौन से ग्रह दृष्टि डाल रहे हैं?
लग्न में कौन से ग्रह हैं?
लग्नेश की D9 स्थिति कैसी है?

दूसरा — D9 का लग्नेश
लग्नेश की:
राशि, भाव, उच्च/नीच, स्वक्षेत्र, मित्र/शत्रु राशि, युति, 
दृष्टि, षड्बल आदि देखें।

तीसरा — D9 का सप्तम भाव
विवाह के लिए: - सप्तम राशि, सप्तमेश, सप्तम भाव में ग्रह, सप्तमेश की शक्ति, शुक्र, गुरु, D1 का सप्तम भाव एवं सप्तमेश, सबको मिलाकर देखें।

15. विवाह के लिए D9 कैसे पढ़ें?
एक व्यवस्थित सूत्र विद्यार्थियों को दें:
D1 सप्तम भाव → D1 सप्तमेश → शुक्र → गुरु → D9 लग्न → D9 सप्तम भाव → D9 सप्तमेश → D9 शुक्र → D9 गुरु → दशा
फिर आवश्यकता के अनुसार:
उपपद लग्न, नवम भाव, द्वितीय भाव तथा अन्य संबंधित संकेतक भी देखें।
इससे विद्यार्थी केवल “D9 का सातवाँ भाव देखकर विवाह बता देना” जैसी गलती नहीं करेंगे।

16. D9 में शुक्र का महत्व
विवाह के संदर्भ में शुक्र अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है।
देखें:
D1 में शुक्र, D9 में शुक्र, शुक्र का D9 भाव, शुक्र की राशि, 
शुक्र की शक्ति, शुक्र पर पाप/शुभ प्रभाव, शुक्र का संबंध सप्तमेश से, शुक्र का संबंध लग्नेश से। 
पुरुष की कुंडली में परंपरागत रूप से शुक्र को पत्नी/विवाह का प्रमुख कारक माना जाता है।
स्त्री की कुंडली में गुरु का भी विशेष महत्त्व माना जाता है।
लेकिन आधुनिक फलित में केवल लिंग आधारित एक ग्रह पर निर्भर न रहकर सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, गुरु और संपूर्ण योग-संबंध देखना अधिक उचित है।

17. D9 में वर्गोत्तम क्या होता है?
यह D9 पढ़ाते समय अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
यदि D1 में ग्रह जिस राशि में है, D9 में भी उसी राशि में स्थित हो जाए तो वह ग्रह: वर्गोत्तम कहलाता है।
उदाहरण:
D1 में: सूर्य = मेष और D9 में भी: सूर्य = मेष
तो सूर्य वर्गोत्तम हुआ।
वर्गोत्तम को ग्रह की स्थिति की विशेष दृढ़ता के संकेत के रूप में देखा जाता है।
लेकिन:
वर्गोत्तम = हर परिस्थिति में शुभ होगा ऐसा कहना सही नहीं है।
ग्रह की प्राकृतिक प्रकृति, भावाधिपत्य, भावस्थिति, दृष्टि, युति और संपूर्ण कुंडली देखना आवश्यक है।

18. D9 में उच्च और नीच ग्रह
यदि कोई ग्रह D9 में उच्च राशि में हो तो उसकी सूक्ष्म शक्ति का शुभ संकेत मिल सकता है।
यदि नीच राशि में हो तो ग्रह के फल में कमजोरी का संकेत मिल सकता है।
लेकिन फिर वही नियम:
केवल D9 की एक स्थिति देखकर अंतिम फल नहीं।
D1 + D9 + दशा + संबंधित भाव = समग्र फल।

19. D9 में भावों का अर्थ
D9 में भी 12 भाव होते हैं।
संक्षेप में:
भाव
मुख्य विषय
1
स्वयं, व्यक्तित्व, जीवन-दृष्टि
2
परिवार, वाणी, विवाह के बाद परिवार
3
प्रयास, साहस, संचार
4
सुख, गृहस्थ सुख, मानसिक शांति
5
बुद्धि, संस्कार, प्रेम, संतान
6
संघर्ष, ऋण, रोग, विवाद
7
विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी
8
वैवाहिक गहराई, परिवर्तन, संयुक्त विषय
9
धर्म, भाग्य, गुरु, सिद्धांत
10
कर्म, उत्तरदायित्व, कार्य
11
लाभ, इच्छापूर्ति, सामाजिक संबंध
12
व्यय, त्याग, शयन, निजी जीवन

20. D9 फलित का स्वर्णिम नियम
विद्यार्थियों को यह सूत्र लिखवा दें:
“नवांश को जन्मकुंडली से अलग करके नहीं, बल्कि जन्मकुंडली के साथ पढ़ना चाहिए।”
और दूसरा:
“D1 घटना का आधार बताता है, D9 उस घटना की सूक्ष्म गुणवत्ता और ग्रह की शक्ति को समझने में सहायता करता है।”

21. D9 फलादेश की आदर्श क्रम-पद्धति
किसी भी कुंडली में D9 पढ़ते समय:
① D1 लग्न और लग्नेश
② D1 संबंधित भाव
③ संबंधित भावेश
④ कारक ग्रह
⑤ D9 लग्न
⑥ D9 लग्नेश
⑦ D9 संबंधित भाव
⑧ D9 संबंधित भावेश
⑨ संबंधित कारक ग्रह की D9 स्थिति
⑩ वर्गोत्तम/उच्च/नीच/स्वक्षेत्र आदि
⑪ D1 और D9 के बीच सामंजस्य
⑫ दशा
⑬ गोचर
इस क्रम से फलादेश करने पर विश्लेषण अधिक व्यवस्थित होगा।

22. विद्यार्थियों को होने वाली सामान्य गलतियाँ
गलती 1
D9 को केवल विवाह की कुंडली मानना।
गलती 2
D9 देखकर अकेले फलादेश करना।
गलती 3
ग्रह का नवांश निकालते समय 3°20′ की सीमा गलत लगाना।
गलती 4
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के प्रारंभिक नवांश को भूल जाना।
गलती 5
D1 और D9 के संबंध को न देखना।
गलती 6
सिर्फ उच्च/नीच देखकर फलादेश कर देना।
गलती 7
वर्गोत्तम को स्वतः पूर्ण शुभ मान लेना।
गलती 8
दशा को छोड़ देना।

23. कक्षा में अभ्यास के लिए सरल उदाहरण
विद्यार्थियों को ये तीन ग्रह देकर नवांश निकलवाएँ:
सूर्य — मेष 12°15′
मेष का:
0–3°20′ मेष
3°20′–6°40′ वृषभ
6°40′–10° मिथुन
10°–13°20′ कर्क
अतः सूर्य का D9:
कर्क

दूसरा:
चंद्र — वृषभ 15°00′
वृषभ का पाँचवाँ नवांश:
वृषभ
अतः:
D9 चंद्र = वृषभ

तीसरा:
मंगल — मिथुन 22°00′
मिथुन:
1 तुला
2 वृश्चिक
3 धनु
4 मकर
5 कुंभ
6 मीन
7 मेष
20°00′–23°20′ = सातवाँ नवांश
अतः:
D9 मंगल = मेष

इस प्रकार विद्यार्थियों को पहले स्वयं गणना करवाएँ, फिर उत्तर बताएं।

सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
D9 अर्थात नवांश को समझने के लिए विद्यार्थियों को चार बातें बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए:
1. 30° ÷ 9 = 3°20′
2. प्रत्येक ग्रह की D9 राशि उसके D1 के सटीक अंश से निर्धारित होती है।
3. नवांश राशि का प्रारंभ चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के नियम से निर्धारित होता है।
4. फलादेश में D1 और D9 को साथ पढ़ना चाहिए; D9 अकेले अंतिम निर्णय का आधार नहीं है।

यदि आप इसे आगे उच्च स्तर की पाराशरी कक्षा के रूप में पढ़ाना चाहते हैं, तो अगला चरण होना चाहिए—�⁠“D9 के 108 नवांश, नवांश गणना की गणितीय विधि, D9 में ग्रहों की शक्ति, वर्गोत्तम, पुष्कर नवांश, वेशी/वोशी आदि योगों से संबंध, D1+D9 संयुक्त फलादेश तथा विवाह के 5–6 वास्तविक उदाहरणों पर पूर्ण केस-स्टडी”।

रविवार, 6 सितंबर 2026

D7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?

Vedic Astro Care
कक्षा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पाराशरी ज्योतिष के आधार पर सप्तमांश (D-7) चार्ट का यह एक विस्तृत और स्टेप-बाय-स्टेप (Step-by-Step) पाठ है। इसे आप अपनी कक्षा में एक रूपरेखा (Framework) की तरह उपयोग कर सकते हैं।

विषय: सप्तमांश चार्ट (D-7) का पूर्ण विश्लेषण

1. D-7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?
​परिभाषा: वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली (D-1) के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए 16 वर्गीय कुंडलियों (षोडश वर्ग) का निर्माण किया जाता है। इनमें से 7वीं वर्गीय कुंडली को 'सप्तमांश' या D-7 चार्ट कहा जाता है।
​गणितीय आधार: एक राशि 30 डिग्री (अंश) की होती है। जब हम एक राशि को 7 बराबर भागों में बाँटते हैं, तो एक भाग 4 अंश, 17 कला और 8.5 विकला (4^\circ 17' 8.5'') का होता है। इसी एक भाग को 'सप्तमांश' कहते हैं।
​सरल शब्दों में: जन्म कुंडली के ग्रहों की डिग्री को 7 भागों में बाँटकर जो नई कुंडली बनती है, वह D-7 है।

2. D-7 चार्ट बनता कैसे है और ग्रहों को रखने का नियम क्या है?
​D-7 चार्ट बनाने के लिए महर्षि पाराशर ने विषम (Odd) और सम (Even) राशियों के लिए अलग-अलग नियम बताए हैं।
डिग्री का विभाजन (7 भाग):


ग्रहों को स्थापित करने के नियम:
विषम राशि नियम - (1, 3, 5, 7, 9, 11 - मेष, मिथुन, सिंह आदि): यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में विषम राशि में है, तो D-7 में उसकी गिनती उसी राशि से शुरू करनी है जिस राशि में वह ग्रह लग्न कुंडली में उपस्थित है। फिर देखना यह है कि वह ग्रह कितने डिग्री का है। उसी आधार पर सप्तांश के जिस भाग में वह अंश पड़ेंगे उसी भाव में वह ग्रह सप्तांश कुंडली में रखा जाएगा। 

सम राशि नियम - (2, 4, 6, 8, 10, 12 - वृषभ, कर्क, कन्या आदि): यदि कोई ग्रह जन्म कुंडली में सम राशि में है, तो D-7 में उसकी गिनती उस राशि से, जिस राशि में वह ग्रह लग्न कुंडली में है, उससे सातवीं जो राशि पड़ेगी, उस से शुरू करनी है। फिर देखना यह है कि वह ग्रह कितने डिग्री का है। उसी आधार पर सप्तांश के जिस भाग में वह अंश पड़ेंगे उसी भाव में वह ग्रह सप्तांश कुंडली में रखा जाएगा। 

उदाहरण से समझें:
​उदाहरण 1 (विषम राशि): मान लीजिए सूर्य जन्म कुंडली (D-1) में मेष राशि (विषम) में 10 डिग्री पर है।
​10 डिग्री तीसरे सप्तमांश (8° 34' से 12° 51') में आता है।
​चूँकि मेष विषम राशि है, हम गिनती मेष से ही शुरू करेंगे: 1. मेष, 2. वृषभ, 3. मिथुन।
​निष्कर्ष: D-7 चार्ट में सूर्य मिथुन (3 नंबर) राशि में बैठेगा।

​उदाहरण 2 (सम राशि): मान लीजिए चंद्रमा जन्म कुंडली में वृषभ राशि (सम) में 15° पर है।
​15° चौथे सप्तमांश (12° 51' से 17° 8') में आता है।
​वृषभ सम राशि है, इसलिए गिनती वृषभ से 7वीं राशि यानी वृश्चिक से शुरू होगी।
​वृश्चिक से 4 गिनें: 1. वृश्चिक, 2. धनु, 3. मकर, 4. कुंभ।
​निष्कर्ष: D-7 चार्ट में चंद्रमा कुंभ (11 नंबर) राशि में बैठेगा।

3. D-7 चार्ट क्यों देखा जाता है?
​कक्षा में छात्रों को यह स्पष्ट करें कि D-1 का 5वाँ भाव जो बताता है, D-7 उसकी सूक्ष्म 'X-Ray' रिपोर्ट है।
​संतान सुख (Progeny): व्यक्ति को जीवन में संतान का सुख है या नहीं? संतान उत्पत्ति में कोई बाधा तो नहीं?
​संतान का भविष्य और स्वास्थ्य: बच्चों का स्वास्थ्य, उनका करियर और माता-पिता के साथ उनके संबंध कैसे रहेंगे।
​रचनात्मकता (Creativity): सिर्फ जैविक संतान ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के 'ब्रेन चाइल्ड' यानी उसकी रचनात्मक कृतियाँ, किताबें, या प्रोजेक्ट्स भी D-7 से देखे जाते हैं।
​वंश वृद्धि: परिवार का नाम आगे चलेगा या नहीं।

4. D-7 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​लग्न का निर्धारण बिल्कुल ग्रहों की तरह ही होता है।
​जन्म कुंडली (D-1) में लग्न की जो सटीक डिग्री (अंश और कला) है, उसे नोट करें।
​देखें कि जन्म कुंडली का लग्न सम राशि में है या विषम राशि में।
​उसी 'सम-विषम' नियम (जो ऊपर ग्रहों के लिए बताया गया है) का पालन करते हुए सप्तमांश की गिनती करें।
​जो राशि प्राप्त होगी, वही D-7 चार्ट का लग्न (Ascendant) बन जाएगी और उसी के आधार पर बाकी 12 भावों का निर्माण होगा।

5. D7 चार्ट का फलादेश कैसे करें? (विस्तृत नियम)
​D7 चार्ट का फलित करते समय नीचे दिए गए मुख्य कारकों और नियमों का अध्ययन अनिवार्य है:

​A. मुख्य भावों की भूमिका
​1st House (D7 का लग्न): जातक की स्वयं की क्षमता और संतानोत्पत्ति की शारीरिक क्षमता/सृजन शक्ति।

​5th House: प्रथम संतान, प्राथमिक शिक्षा, मेधा शक्ति।

​7th House: द्वितीय संतान (5th से 3rd भाव), जीवनसाथी का सहयोग संतान प्राप्ति में।

​9th House: तृतीय संतान (7th से 3rd भाव), संतान का भाग्य और उच्च संस्कार।

​6th, 8th, 12th House: संतान प्राप्ति में बाधा, बीमारी, कष्ट या दूरी।

B. मुख्य कारक ग्रह (Significators)
​गुरु (Jupiter): संतान का प्राकृतिक कारक (Natural Significator)।
​शुक्र व मंगल: गर्भाधान और सृजन शक्ति (Spur/Ovum dynamics) के कारक।

C. चरणबद्ध फलादेश नियम (Step-by-Step Analysis Rules)

​D1 और D7 का समन्वय (Cross-Verification):
​सबसे पहले D1 के 5वें भाव, पंचमेश और गुरु की स्थिति देखें।
​यदि D1 में संतान योग कमजोर है लेकिन D7 में 1st, 5th और 9th भाव मजबूत हैं, तो उपचार और समय के साथ संतान सुख अवश्य मिलता है।

​D7 लग्न और लग्नेश की स्थिति:
​D7 का लग्नेश बलि होकर शुभ भावों (1, 4, 5, 7, 9, 10) में हो, तो संतान सुख सुलभ होता है।
​यदि D7 लग्नेश 6, 8, या 12वें भाव में अस्त, नीच या राहु-केतु अक्ष पर हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब या चिंताएं आती हैं।

5वें भाव और पंचमेश का विश्लेषण:
​D7 के 5वें भाव पर शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र, शुभ बुध, चंद्र) की दृष्टि या उपस्थिति शुभ संतान देती है।

​पाप ग्रहों (शनि, राहु, केतु, मंगल, सूर्य) का प्रभाव विलंब, गर्भपात (Miscarriage), या शल्य चिकित्सा (C-section) का कारण बनता है।

संतान के लिंग (Gender Prediction) के सामान्य संकेत:
पुरुष संतान: 5वें भाव/पंचमेश पर पुरुष राशियों (1, 3, 5, 7, 9, 11) या पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) का प्रभाव।

स्त्री संतान: 5वें भाव/पंचमेश पर स्त्री राशियों (2, 4, 6, 8, 10, 12) या स्त्री ग्रहों (शुक्र, चंद्र) का प्रभाव।
​(नोट: वर्तमान युग में लिंग निर्णय से अधिक ध्यान संतान के स्वास्थ्य एवं समृद्धि पर देना चाहिए।)

दशा और गोचर का उपयोग:
​संतान प्राप्ति सदैव D1 या D7 के पंचमेश, लग्नेश, या गुरु की महादशा/अंतरदशा में होती है।
​गोचर में गुरु का प्रभाव D1 या D7 के 5वें भाव या 5वेंेश पर होना संतान आगमन का समय तय करता है।

क्लास के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र (Pro Tip):
विद्यार्थियों को बताएं कि कभी भी D-7 को स्वतंत्र रूप से (अकेले) नहीं देखना चाहिए। हमेशा पहले D-1 (लग्न कुंडली) में संतान का प्रॉमिस चेक करें, उसके बाद सूक्ष्मता के लिए D-7 पर जाएँ। यदि D-1 में ही बीज नहीं है, तो D-7 फसल नहीं दे सकता।






​1. D7 चार्ट (सप्तमांश) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में सप्तमांश (D7) महर्षि पाराशर द्वारा वर्णित 16 वर्ग कुंडलियों (षोडशवर्ग) में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।

2. D7 चार्ट कैसे बनता है और ग्रहों को रखने का नियम (उदाहरण सहित)
​सप्तमांश कुंडली बनाने का नियम सम (Even) और विषम (Odd) राशियों पर आधारित होता है।
​(A) राशि विभाजन तालिका (Degree Brackets)

D4 चार्ट (चतुर्थांश) का पूर्ण विश्लेषण

Vedic Astro Care
d4 चार्ट (चतुर्थांश कुंडली / Chaturthamsa Chart) वैदिक ज्योतिष का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ग चार्ट (Divisional Chart) है। यह मुख्य रूप से व्यक्ति की अचल संपत्ति, वाहन, घरेलू सुख, माता के सुख और भाग्य के निर्माण का सूक्ष्म विश्लेषण करने के लिए उपयोग किया जाता है।
​कक्षा में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए इसका क्रमबद्ध और व्यावहारिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
​1. D4 चार्ट (चतुर्थांश) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में महर्षि पराशर ने लग्न कुंडली के 12 भावों के सूक्ष्म अध्ययन के लिए 16 प्रकार के वर्ग चार्ट (षोडशवर्ग) बताए हैं।
​D4 का अर्थ है — जन्म राशि (30°) को 4 बराबर भागों में बांटना।
​प्रत्येक भाग (चतुर्थांश) 7° 30' (7 डिग्री 30 मिनट) का होता है।
​लग्न कुंडली का चतुर्थ भाव (4th House) अचल संपत्ति, माता और सुख का होता है। D4 चार्ट उसी चतुर्थ भाव का विस्तृत और गहराई से अध्ययन करने के लिए बनाया गया माइक्रोस्कोपिक व्यू है।
​2. D4 चार्ट बनता कैसे है? (गणितीय और तकनीकी विधि)
​एक राशि 30° की होती है। इसे 4 बराबर भागों में विभाजित करने पर प्रत्येक भाग का मान निम्न प्रकार होता है:

D4 में ग्रहों और लग्न को स्थापित करने का नियम:
​प्रथम भाग (0° - 7° 30'): ग्रह/लग्न उसी राशि में रहेगा जिसमें वह लग्न कुंडली में है।
​द्वितीय भाग (7° 30' - 15°): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 4th राशि (चतुर्थ राशि) में जाएगा।
​तृतीय भाग (15° - 22° 30'): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 7th राशि (सप्तम राशि) में जाएगा।
​चतुर्थ भाग (22° 30' - 30°): ग्रह/लग्न अपनी वर्तमान राशि से 10th राशि (दशम राशि) में जाएगा।
​याद रखने की ट्रिक (कक्षा के लिए): 1 - 4 - 7 - 10 का नियम (केन्द्र भावों का अनुक्रम)।

​3. D4 चार्ट क्यों देखा जाता है? (महत्व और उपयोगिता)
​लग्न कुंडली से चतुर्थ भाव की सामान्य जानकारी मिलती है, लेकिन सटीक फलादेश के लिए D4 चार्ट देखा जाता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
​अचल संपत्ति (Real Estate): भूमि, मकान, प्लॉट, दुकान या भवन का निर्माण होगा या नहीं।
​वाहन सुख (Vehicles): व्यक्ति के पास अपने वाहन होंगे या नहीं, और वाहनों का सुख कैसा रहेगा।
​अचानक मिला भाग्य/पैतृक संपत्ति (Inheritance): वसीयत या गड़ा हुआ धन मिलने के योग।
​माता का स्वास्थ्य और सुख: माता के साथ संबंध और उनका जीवन।
​स्थायी निवास/स्थानान्तरण (Relocation): व्यक्ति अपने जन्मस्थान पर घर बनाएगा या विदेश/दूसरे शहर में संपत्ति खरीदेगा।
​मानसिक शांति और घरेलू वातावरण: घर का माहौल सौहार्दपूर्ण रहेगा या क्लेशयुक्त।

​4. D4 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​D4 चार्ट का लग्न निर्धारित करने के लिए लग्न कुंडली के लग्न की सटीक डिग्री देखी जाती है।
​उदाहरण द्वारा समझें:
​मान लीजिए लग्न कुंडली में मेष राशि (Aries) का लग्न 18° 45' पर है।
​डिग्री चेक करें: 18° 45' तीसरे भाग (15^\circ \text{ से } 22^\circ 30') में आता है।
​नियम लागू करें: नियम के अनुसार, तीसरा भाग 7th राशि को दर्शाता है।
​गणना करें: मेष (1) से 7वीं राशि कौन-सी होगी? तुला राशि (Libra - 7)।
​परिणाम: D4 चार्ट में तुला राशि का लग्न बनेगा और तुला से ही 12 भावों की गिनती होगी।
​(इसी प्रकार सभी 9 ग्रहों की डिग्री देखकर D4 चार्ट के 12 भावों में उन्हें बैठाया जाता है।)

​5. D4 चार्ट का फलादेश कैसे किया जाता है? (स्टेप-बाय-स्टेप फलादेश नियम)
​कक्षा में विद्यार्थियों को फलादेश सिखाते समय निम्नलिखित 5 चरणों का पालन कराएं:

कक्षा में पढ़ाने के लिए मुख्य "थम्ब रूल्स" (Key Takeaways):
​6th, 8th, 12th House का प्रभाव: D4 में चतुर्थ भाव पर 6ठे भाव के स्वामी का प्रभाव हो तो संपत्ति के लिए लोन (ऋण) लेना पड़ता है या कोर्ट केस होता है। 8वें भाव का प्रभाव हो तो पैतृक संपत्ति में अड़चनें आती हैं। 12वें भाव का प्रभाव जन्मस्थान से दूर घर बनने का संकेत देता है।
​राहु-केतु का प्रभाव: D4 के चतुर्थ भाव में राहु या शनि हो तो घर में वास्तु दोष या घरेलू अशांति रहती है।

​1. D3 चार्ट (द्रेष्काण कुंडली) क्या होता है?

Vedic Astro Care
 ​1. D3 चार्ट (द्रेष्काण कुंडली) क्या होता है?
​वैदिक ज्योतिष में महर्षि पराशर द्वारा 16 प्रकार की सूक्ष्म कुंडलियों (षोडशवर्ग) का उल्लेख किया गया है, जिनमें से D3 या द्रेष्काण कुंडली (Drekkana Chart) अति महत्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।
​अर्थ: 'द्रेष्काण' शब्द संस्कृत के 'त्रि-अंश' (तीन भाग) से बना है। जब किसी एक राशि (30°) को 3 बराबर भागों में बांटा जाता है, तो प्रत्येक भाग 10^\circ का होता है। इसे ही एक 'द्रेष्काण' कहते हैं।
​मुख्य विचार: D3 कुंडली मूल रूप से व्यक्ति के अनुज/अग्रज (भाई-बहन), पराक्रम, साहस, ऊर्जा, तीसरे भाव से जुड़े विषय तथा शारीरिक बल एवं अंगों के विभाजन को देखने के लिए प्रयोग की जाती है।

2. D1 (लग्न कुंडली) से D3 चार्ट बनता कैसे है?
​किसी राशि का मान (30°) होता है। इसे तीन बराबर भागों में बांटने का नियम निम्नलिखित है:
नियम याद रखने की ट्रिक (1-5-9 सूत्र):
D3 चार्ट पूर्णतः त्रिकोण सिद्धांत (1, 5, 9) पर आधारित है। पहला भाग स्वयं वही राशि, दूसरा भाग उसी तत्व की अगली राशि (5वीं), और तीसरा भाग उसी तत्व की तीसरी राशि (9वीं) होती है।

3. D3 चार्ट में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
​D3 चार्ट का लग्न निकालने के लिए हमें D1 (लग्न कुंडली) के लग्न के अंश (Ascendant Degree) और उसकी राशि को देखना होता है।
​लग्न निर्धारण प्रक्रिया:
​D1 में लग्न राशि और उसके सटीक अंश नोट करें।
​देखें कि अंश 
0°-10°, 
10° -20°, 
या 20°-(30°) में से किस वर्ग में आते हैं।
​उपर्युक्त 1-5-9 नियम लागू करके D3 का लग्न तय करें।
​उदाहरण:
​मान लीजिए D1 में लग्न मिथुन (3) है और लग्न के अंश 14° हैं।
​14° द्वितीय द्रेष्काण (10°-20°) में आता है।
​मिथुन से 5वीं राशि = तुला (7)।
​अतः, D3 कुंडली का लग्न तुला (7) बनेगा।

4. D3 चार्ट में ग्रहों को रखने का सही नियम (उदाहरण सहित)
​ग्रहों को D3 में स्थापित करने के लिए भी वही 1-5-9 का नियम लागू होता है जो लग्न निर्धारण के लिए प्रयोग किया जाता है।
​नियम विस्तार:
​यदि ग्रह 0^\circ - 10^\circ के बीच है: ग्रह D3 में उसी राशि में रहेगा जिसमें वह D1 में है।
​यदि ग्रह 10^\circ1' - 20^\circ के बीच है: ग्रह D3 में अपनी D1 राशि से 5वीं राशि में जाएगा।
​यदि ग्रह 20^\circ1' - (30°) के बीच है: ग्रह D3 में अपनी D1 राशि से 9वीं राशि में जाएगा।

व्यावहारिक उदाहरण (D1 से D3 में परिवर्तन):
​मान लीजिए किसी जातक की D1 कुंडली और ग्रहों के अंश इस प्रकार हैं:
D3 का जो लग्न निकला है, उसमें राशियों को क्रमानुसार 1 से 12 भावों में लिखकर उपर्युक्त गणना के आधार पर ग्रहों को D3 के संबंधित भावों/राशियों में स्थापित कर दिया जाता है।

5. D3 चार्ट क्यों देखा जाता है?
​पाराशरी सिद्धांत के अनुसार D1 शरीर है, तो वर्ग कुंडलियां उस शरीर के विशिष्ट अंग व विषय हैं। D3 मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से देखा जाता है:
​भाई-बहनों का विचार (Siblings): छोटे व बड़े भाई-बहनों का सुख, उनका स्वभाव, संबंध तथा उनके जीवन की स्थिति।
​पराक्रम व साहस (Courage & Effort): जातक का आत्मबल, मेहनत करने की क्षमता और रिस्क लेने की प्रवृत्ति।
​शारीरिक अंग व स्वास्थ्य (Medical Astrology): D3 चार्ट से शरीर के मुख्य भागों का क्षय या रोग (जैसे- सिर, छाती, हाथ, फेफड़े) देखा जाता है।
​आयु और मृत्यु का सूक्ष्म विचार: ३रा और ८वां भाव आयु से संबंधित हैं; द्रेष्काण से '22वां द्रेष्काण' निकालकर मृत्यु के कारण व समय का विचार किया जाता है।
​यात्राएं (Short Travels): छोटी दूरी की यात्राएं और उनसे मिलने वाला लाभ/हानि।

6. D3 चार्ट का फलादेश (Analysis) कैसे किया जाता है?
​D3 चार्ट का सटीक विश्लेषण करने के लिए कक्षा में विद्यार्थियों को निम्नलिखित 5-चरणीय नियम सिखाएं:
​चरण 1: D3 के लग्न व लग्नेश की स्थिति
​D3 का लग्न मजबूत होना चाहिए। यदि D3 लग्नेश शुभ भावों (1, 4, 5, 7, 9, 10) में उच्च या मित्र राशि में स्थित है, तो जातक पराक्रमी होगा और उसे भाई-बहनों का सहयोग मिलेगा।
​यदि D3 लग्नेश 6, 8, या 12वें भाव में हो या पापक्रांत हो, तो पराक्रम में कमी या भाई-बहनों से मतभेद रहते हैं।
​चरण 2: तीसरे भाव (3rd House) और उसके स्वामी का विश्लेषण
​D3 का तीसरा भाव भाई-बहन और साहस का मुख्य केंद्र है।
​यदि 3रे भाव में शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध) हों, तो भाई-बहनों से संबंध मधुर होते हैं।
​यदि 3रे भाव में क्रूर/पाप ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, राहु) हों, तो जातक स्वयं बहुत साहसी होता है, परंतु भाई-बहनों के साथ तनाव या दूरी संभव है।
​चरण 3: कारक ग्रह 'मंगल' की स्थिति
​तीसरे भाव और D3 चार्ट का प्राकृतिक कारक मंगल (Mars) है।
​D3 में मंगल की स्थिति (बली/निर्बली) यह तय करती है कि जातक का वास्तविक पराक्रम और ऊर्जा का स्तर कैसा रहेगा।
​चरण 4: D1 और D3 का तुलनात्मक अध्ययन (Cross Verification)
​नियम: यदि D1 में 3रा भाव पीड़ित है, लेकिन D3 कुंडली अत्यंत मजबूत और शुभ स्थिति में है, तो अंतिम परिणाम अनुकूल प्राप्त होंगे। D3, D1 के वादों (Promises) की पुष्टि करता है।
​चरण 5: 22वें द्रेष्काण का सावधानीपूर्वक अवलोकन
​D1 के लग्न के अंशों के आधार पर जो 22वां द्रेष्काण (D1 के 8वें भाव का द्रेष्काण) बनता है, उसका स्वामी 'छिद्र ग्रह' या बाधक ग्रह कहलाता है। उसकी दशा-अंतरदशा में स्वास्थ्य और कष्टों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

D2 होरा वर्ग कुंडली विश्लेषण

Vedic Astro Care
2. D2 होरा का शास्त्रीय आधार
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के षोडशवर्ग अध्याय में होरा के लिए स्पष्ट नियम दिया गया है।
मुख्य श्लोक का अंश है:
सूर्येन्द्वोर्विषमे राशौ समे तद्विपरीतकम् ॥
अर्थात विषम राशियों में सूर्य और चन्द्र की होरा का क्रम एक प्रकार से तथा सम राशियों में उसका विपरीत क्रम होता है। अगले श्लोक में सूर्य और चन्द्र होरा के अधिपत्य का उल्लेख है। 

प्रश्न - यदि केवल लग्न कुंडली उपलब्ध हो तो लग्न कुंडली से d2 चार्ट अर्थात होरा कुंडली कैसे बनाएं? लग्न कुंडली से होरा कुंडली का विश्लेषण कैसे करें, उदाहरण सहित समझाएं

यदि केवल D1 अर्थात जन्म/लग्न कुंडली उपलब्ध हो, तो उससे D2 (होरा) कुंडली बनाई जा सकती है। इसके लिए अलग जन्म-समय की आवश्यकता नहीं होती; D1 में प्रत्येक ग्रह की राशि में स्थिति के अंश (degree) देखकर उसे होरा में स्थान दिया जाता है।
1. D2 होरा कुंडली क्या है?
D1 = राशि/लग्न कुंडली
D2 = होरा कुंडली
राशि के 30° को दो समान भागों में बाँटने पर:
प्रथम होरा = 0°00′ से 15°00′
द्वितीय होरा = 15°00′ से 30°00′
इस प्रकार प्रत्येक राशि के भीतर दो होरे होते हैं।
परंपरागत पराशरी होरा-विभाजन में:
विषम राशियाँ
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ
0°–15° → सूर्य की होरा
15°–30° → चन्द्र की होरा
सम राशियाँ
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
0°–15° → चन्द्र की होरा
15°–30° → सूर्य की होरा
इसे विद्यार्थी इस सरल सूत्र से याद कर सकते हैं:
विषम राशि — पहले सूर्य, फिर चन्द्र।
सम राशि — पहले चन्द्र, फिर सूर्य।

2. D1 से D2 बनाने की पूरी विधि
हर ग्रह के लिए केवल दो बातें देखनी हैं:
(1) ग्रह किस राशि में है?
(2) उस राशि में कितने अंश पर है?
फिर निर्धारित करें कि वह 0°–15° में है या 15°–30° में।
उदाहरण
मान लीजिए:
अब एक-एक करके देखें।
सूर्य — मेष 10°
मेष विषम राशि है।
10° प्रथम अर्ध में है।
विषम राशि का प्रथम होरा = सूर्य।
अतः सूर्य सूर्य-होरा में।

चन्द्र — वृषभ 20°
वृषभ सम राशि है।
20° द्वितीय अर्ध में है।
सम राशि का द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः चन्द्र सूर्य-होरा में।

मंगल — मिथुन 8°
मिथुन विषम राशि है।
8° प्रथम अर्ध में है।
प्रथम होरा = सूर्य।
अतः मंगल सूर्य-होरा में।

बुध — कर्क 25°
कर्क सम राशि है।
25° द्वितीय अर्ध में है।
द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः बुध सूर्य-होरा में।

गुरु — सिंह 12°
सिंह विषम राशि है।
12° प्रथम अर्ध में है।
प्रथम होरा = सूर्य।
अतः गुरु सूर्य-होरा में।

शुक्र — कन्या 18°
कन्या सम राशि है।
18° द्वितीय अर्ध में है।
द्वितीय होरा = सूर्य।
अतः शुक्र सूर्य-होरा में।

शनि — मकर 7°
मकर सम राशि है।
7° प्रथम अर्ध में है।
सम राशि का प्रथम होरा = चन्द्र।
अतः शनि चन्द्र-होरा में।

राहु — तुला 22°
तुला विषम राशि है।
22° द्वितीय अर्ध में है।
विषम राशि का द्वितीय होरा = चन्द्र।
अतः राहु चन्द्र-होरा में।

3. लेकिन D2 कुंडली में ग्रह किस राशि में रखेंगे?
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।
पराशरी D2 में ग्रहों को सामान्यतः दो राशियों—सिंह और कर्क—में ही रखा जाता है।
सूर्य-होरा → सिंह
चन्द्र-होरा → कर्क
इसलिए ऊपर के उदाहरण में:
4. D2 लग्न कैसे निकालेंगे?
यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है।
केवल ग्रहों की D2 स्थिति निकालना पर्याप्त नहीं है। D2 लग्न भी निकालना होता है।
D1 लग्न की राशि और उसके अंश देखें।
( एस्ट्रोसेज सॉफ्टवेयर में लग्न के अंश स्पष्ट रूप से लिखे होते हैं )
उदाहरण:
मान लें D1 में:
लग्न = मेष 18°20′
मेष विषम राशि है।
18°20′ → द्वितीय होरा।
विषम राशि का द्वितीय होरा = चन्द्र होरा।
इसलिए D2 में लग्न कर्क होगा।
अर्थात:
D1 लग्न = मेष 18°20′
द्वितीय होरा
चन्द्र होरा
D2 लग्न = कर्क

5. एक पूरा उदाहरण
मान लें D1 में निम्न स्थिति है:
लग्न — मेष 18°20′
सूर्य — मेष 10°
चन्द्र — वृषभ 20°
मंगल — मिथुन 8°
बुध — कर्क 25°
गुरु — सिंह 12°
शुक्र — कन्या 18°
शनि — मकर 7°
राहु — तुला 22°
अब D2:
लग्न:
मेष 18°20′ → चन्द्र होरा → कर्क लग्न
सूर्य:
मेष 10° → सूर्य होरा → सिंह
चन्द्र:
वृषभ 20° → सूर्य होरा → सिंह
मंगल:
मिथुन 8° → सूर्य होरा → सिंह
बुध:
कर्क 25° → सूर्य होरा → सिंह
गुरु:
सिंह 12° → सूर्य होरा → सिंह
शुक्र:
कन्या 18° → सूर्य होरा → सिंह
शनि:
मकर 7° → चन्द्र होरा → कर्क
राहु:
तुला 22° → चन्द्र होरा → कर्क
तो D2 में बहुत सारे ग्रह सिंह में और कुछ ग्रह कर्क में आ गए।
यही D2 की विशेषता है—इसमें ग्रहों का वितरण केवल कर्क और सिंह के बीच दिखाई देता है।

6. D2 का मुख्य विषय क्या है?
D2 को मुख्यतः धन, संपत्ति, आर्थिक स्थिति और धन-संचय की क्षमता के अध्ययन में उपयोग किया जाता है।
विशेष रूप से देखा जाता है:-
◆ धन प्राप्ति की क्षमता
◆ धन का संचय
◆ आर्थिक स्थिरता
◆ पारिवारिक धन
◆ भौतिक समृद्धि
◆ धन के प्रति दृष्टिकोण
◆ आय को संपत्ति में बदलने की क्षमता
◆ आर्थिक उतार-चढ़ाव
◆ धन के उपयोग और संरक्षण की प्रवृत्ति
लेकिन एक विद्यार्थी को यह बात विशेष रूप से समझानी चाहिए:
D2 अकेले देखकर किसी व्यक्ति की पूरी आर्थिक स्थिति का निर्णय नहीं करना चाहिए।
D2 को D1 के साथ मिलाकर देखना अधिक उचित है।

7. D2 में सूर्य और चन्द्र का महत्व
चूँकि D2 मुख्यतः सूर्य-होरा और चन्द्र-होरा से बनता है, इसलिए सूर्य और चन्द्र के प्रतीकात्मक अर्थ महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
सूर्य-होरा
सूर्य का संबंध माना जाता है:
● अधिकार
● आत्मबल
● नेतृत्व
● प्रतिष्ठा
● शासन
● स्वतंत्र आर्थिक क्षमता
● अपनी योग्यता से अर्जित धन
इसलिए D2 में सूर्य-होरा की प्रधानता होने पर व्यक्ति में स्वावलंबन और अपने प्रयास से आर्थिक स्थिति बनाने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है—लेकिन अंतिम निर्णय D1 के धन भावों से ही करना चाहिए।

चन्द्र-होरा
चन्द्र का संबंध माना जाता है:
● प्रवाह
● पोषण
● परिवार
● जनता
● परिवर्तनशीलता
● तरल संसाधन
● संरक्षण
अतः चन्द्र-होरा की प्रधानता में धन की प्राप्ति और उपयोग में प्रवाह/परिवर्तनशीलता का संकेत देखा जा सकता है।

8. D2 में सबसे पहले क्या देखें?
विद्यार्थियों को मैं यह क्रम सिखाने की सलाह दूँगा:
पहला — D2 लग्न देखें:
D2 लग्न कर्क है या सिंह?
लग्न में कौन-कौन से ग्रह हैं?
लग्नेश की स्थिति कैसी है?
D2 लग्न पर शुभ/पाप प्रभाव क्या है?
दूसरा — सूर्य और चन्द्र
D2 में:
सूर्य कहाँ है?
चन्द्र कहाँ है?
दोनों में कौन अधिक प्रभावशाली है?
सूर्य/चन्द्र पर शुभ या अशुभ प्रभाव है?
तीसरा — कर्क और सिंह का बल
क्योंकि D2 की संरचना ही मुख्यतः इन दोनों राशियों पर आधारित है, इसलिए:
कर्क = चन्द्र पक्ष
सिंह = सूर्य पक्ष
इन दोनों की स्थिति को ध्यान से देखें।
चौथा — ग्रहों की संख्या
कितने ग्रह:
सूर्य-होरा में हैं?
चन्द्र-होरा में हैं?
लेकिन केवल संख्या देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
ग्रहों की प्रकृति और D1 में उनकी वास्तविक स्थिति भी देखनी होगी।

9. उदाहरण से D2 का विश्लेषण
ऊपर के उदाहरण में:
D2 लग्न = कर्क
और:
सिंह में: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र
कर्क में: शनि, राहु
यहाँ सूर्य-होरा अत्यधिक प्रधान है।
इससे प्रथम स्तर पर यह संकेत मिल सकता है कि जातक के आर्थिक विषयों में:
स्वप्रयास
अधिकार
नेतृत्व
अपनी योग्यता
प्रतिष्ठा
कार्यक्षमता
का महत्व अधिक हो सकता है।
लेकिन दूसरी ओर कर्क में शनि और राहु होने से आर्थिक मामलों में कुछ प्रकार की रुकावट, विलंब, अस्थिरता अथवा जटिलता के संकेत हो सकते हैं।
परंतु यह अंतिम फलादेश नहीं है।
अब D1 देखना आवश्यक होगा।

10. D1 से D2 का संबंध कैसे जोड़ें?
मान लें D1 में:
द्वितीय भावेश मजबूत है।
एकादश भावेश मजबूत है।
गुरु शुभ स्थिति में है।
पंचम और नवम भाव से धन भावों का संबंध है।
और D2 में भी सूर्य/चन्द्र पक्ष बलवान है।
तब D1 + D2 मिलकर आर्थिक क्षमता के पक्ष में अधिक मजबूत संकेत देंगे।

इसके विपरीत:
यदि D1 में:
द्वितीय भाव पीड़ित
द्वितीयेश निर्बल
एकादश भाव पीड़ित
एकादशेश निर्बल
और D2 में भी पाप प्रभाव अधिक हो, तो आर्थिक संघर्ष की संभावना अधिक गंभीरता से देखी जाएगी।

11. एक बहुत महत्वपूर्ण नियम
D1 बताता है कि धन का योग कहाँ और किस प्रकार बन रहा है।
D2 बताता है कि उस धन-संबंधी विषय की सूक्ष्म शक्ति और आर्थिक प्रकृति कैसी है।
इसे विद्यार्थी इस प्रकार याद कर सकते हैं:
D1 = धन का मूल आधार
D2 = धन की सूक्ष्म शक्ति/आर्थिक स्वरूप
लेकिन D2 को स्वतंत्र रूप से फलित करना उचित नहीं है।

12. D2 में ग्रहों के फल को कैसे समझें?
उदाहरण के लिए यदि D2 में सूर्य-होरा में:
गुरु है → आर्थिक विषयों में गुरु के कारकत्व का सहयोग देखा जा सकता है।
बुध है → व्यापार, गणना, वाणिज्य, लेखन, बुद्धि, संचार आदि के माध्यम से आर्थिक संबंधों की संभावना देखी जा सकती है।
शुक्र है → सुख-सुविधा, कला, सौंदर्य, विलास, वाहन आदि से संबंधित आर्थिक विषयों का संकेत मिल सकता है।
शनि है → श्रम, सेवा, उद्योग, दीर्घकालीन प्रयास, विलंब आदि से धन संबंधी संकेत देखे जा सकते हैं।
लेकिन इन ग्रहों का फल D1 में उनके स्वामित्व, स्थिति, युति, दृष्टि, दशा और बल से संशोधित होगा।

13. राहु-केतु को लेकर सावधानी
D2 की गणना की अलग-अलग परंपराएँ मिलती हैं, विशेषतः सूक्ष्म-वर्ग कुंडलियों में।
इसलिए विद्यार्थियों को पहले यह निश्चित करना चाहिए कि वे किस परंपरा की D2 पद्धति पढ़ रहे हैं।
पराशरी/राशि-आधारित होरा में मुख्य गणना सूर्य और चन्द्र होरा के आधार पर की जाती है और D2 का मूल ढाँचा सिंह-कर्क पर आधारित माना जाता है।

14. D2 बनाने का सबसे आसान सूत्र
इसे कक्षा में बोर्ड पर इस तरह लिख सकते हैं:
राशि के 30° ÷ 2 = 15°
फिर:
विषम राशि
0°–15° = सूर्य → सिंह
15°–30° = चन्द्र → कर्क
सम राशि
0°–15° = चन्द्र → कर्क
15°–30° = सूर्य → सिंह
बस।

15. विद्यार्थियों के लिए अभ्यास
उन्हें यह अभ्यास दें:
मान लें:
लग्न — कन्या 13°
सूर्य — मिथुन 21°
चन्द्र — मकर 8°
मंगल — वृश्चिक 17°
बुध — तुला 4°
गुरु — धनु 27°
शुक्र — वृषभ 11°
शनि — कुंभ 19°
अब प्रत्येक के सामने लिखें:
राशि → विषम/सम → अंश → प्रथम/द्वितीय होरा → सूर्य/चन्द्र होरा → D2 राशि
इस अभ्यास से D2 बनाना पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।

एक पंक्ति में पूरा नियम
D1 में ग्रह जिस राशि में जितने अंश पर है, उस राशि के पहले 15° या बाद के 15° का निर्धारण करें; राशि विषम हो तो पहले सूर्य और बाद में चन्द्र, तथा राशि सम हो तो पहले चन्द्र और बाद में सूर्य; सूर्य होरा को सिंह और चन्द्र होरा को कर्क में रखकर D2 तैयार करें।

Our Team

  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer