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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

ग्रह दृष्टि (Graha Dṛṣṭi)

Vedic Astro Care

अध्याय – ग्रह दृष्टि (Graha Dṛṣṭi)
एकपाद, द्विपाद, त्रिपाद एवं पूर्ण दृष्टि का शास्त्रीय विवेचन
प्रस्तावना
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के फलनिर्णय के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं— ग्रह की स्थिति (स्थिति), ग्रह का बल (बल) तथा ग्रह की दृष्टि (दृष्टि)। यदि किसी ज्योतिषी को ग्रह दृष्टि का यथार्थ ज्ञान न हो, तो वह किसी भी जन्मकुण्डली का सूक्ष्म एवं शास्त्रीय फलादेश नहीं कर सकता।
'दृष्टि' शब्द संस्कृत की "दृश्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है— देखना, अवलोकन करना अथवा अपनी चेतना का किसी वस्तु पर केन्द्रित होना। जैसे मनुष्य जिस वस्तु को देखता है, उससे उसका सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी प्रकार ग्रह भी जिस भाव अथवा ग्रह को देखते हैं, उसे प्रभावित करते हैं। इसीलिए ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होते हैं उसी का फल नहीं देते, बल्कि जिन भावों एवं ग्रहों पर उनकी दृष्टि पड़ती है, उनके फल में भी परिवर्तन कर देते हैं।
अतः किसी भाव का फल केवल उसके स्वामी या उसमें स्थित ग्रहों से ही निर्धारित नहीं होता, बल्कि उस भाव पर पड़ने वाली शुभ अथवा अशुभ दृष्टियों से भी निर्धारित होता है।
दृष्टि का शास्त्रीय सिद्धान्त
प्राचीन आचार्यों ने ग्रह-दृष्टि को अत्यन्त सूक्ष्म विज्ञान माना है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में ग्रह-दृष्टि का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। पराशर मुनि के अनुसार ग्रहों की दृष्टि समान नहीं होती। कुछ दृष्टियाँ पूर्ण प्रभाव वाली होती हैं, जबकि कुछ आंशिक प्रभाव प्रदान करती हैं।
जैसे सूर्य की किरणें प्रातःकाल तिरछी होने के कारण कम ताप देती हैं, मध्याह्न में वही किरणें सीधी पड़ने पर अत्यधिक उष्णता प्रदान करती हैं। ठीक उसी प्रकार ग्रह की पूर्ण दृष्टि सर्वाधिक प्रभाव उत्पन्न करती है, जबकि आंशिक दृष्टियाँ क्रमशः कम प्रभाव प्रदान करती हैं।
क्या ग्रह केवल पूर्ण दृष्टि ही रखते हैं?
अधिकांश विद्यार्थी केवल मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि, गुरु की पंचम एवं नवम दृष्टि तथा शनि की तृतीय एवं दशम दृष्टि तक ही सीमित ज्ञान रखते हैं। परन्तु यह ज्ञान पूर्ण नहीं है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार प्रत्येक ग्रह की चार प्रकार की दृष्टियाँ मानी गई हैं—
एकपाद दृष्टि
द्विपाद दृष्टि
त्रिपाद दृष्टि
पूर्ण दृष्टि
यद्यपि व्यवहारिक फलित में मुख्यतः पूर्ण दृष्टि का ही अधिक प्रयोग किया जाता है, तथापि सूक्ष्म फलादेश में आंशिक दृष्टियों का भी विचार किया जाता है।
एकपाद दृष्टि (¼ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का केवल एक-चतुर्थांश (25%) प्रभाव डालता है, उसे एकपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
तृतीय भाव
दशम भाव
पर एकपाद दृष्टि डालता है।
अर्थात यदि कोई ग्रह लग्न में स्थित हो तो वह तृतीय तथा दशम भाव को लगभग 25% शक्ति से प्रभावित करेगा।
द्विपाद दृष्टि (½ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का अर्ध भाग (50%) प्रदान करता है, उसे द्विपाद दृष्टि कहा जाता है।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
पंचम भाव
नवम भाव
पर द्विपाद दृष्टि रखता है।
यदि गुरु लग्न में स्थित हो तो सामान्य नियम से पंचम एवं नवम पर आधी दृष्टि होनी चाहिए, किन्तु गुरु की विशेष दृष्टि होने से वहाँ पूर्ण प्रभाव उत्पन्न होता है।
त्रिपाद दृष्टि (¾ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का तीन-चतुर्थांश (75%) प्रभाव देता है, उसे त्रिपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्यतः प्रत्येक ग्रह—
चतुर्थ भाव
अष्टम भाव
पर त्रिपाद दृष्टि डालता है।
यदि मंगल इन भावों को देखे तो उसकी विशेष दृष्टि के कारण यह त्रिपाद न रहकर पूर्ण दृष्टि बन जाती है।
पूर्ण दृष्टि (100%)
जिस भाव पर ग्रह अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रभाव डालता है, उसे पूर्ण दृष्टि कहा जाता है।
सभी ग्रह अपने स्थान से सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि सप्तम भाव को ग्रह-दृष्टि का सर्वाधिक प्रभाव प्राप्त होता है।
विशेष पूर्ण दृष्टियाँ
सामान्य नियम से सभी ग्रहों की केवल सप्तम दृष्टि पूर्ण होती है, किन्तु तीन ग्रहों को विशेष दृष्टियाँ प्राप्त हैं।
मंगल की विशेष दृष्टि
मंगल अपने स्थान से—
चतुर्थ
सप्तम
अष्टम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
मंगल अग्नितत्त्व प्रधान ग्रह है। इसलिए जहाँ उसकी दृष्टि पड़ती है वहाँ ऊर्जा, साहस, संघर्ष, पराक्रम तथा कभी-कभी क्रोध एवं दुर्घटना की सम्भावना भी बढ़ जाती है।
गुरु की विशेष दृष्टि
गुरु अपने स्थान से—
पंचम
सप्तम
नवम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
गुरु ज्ञान, धर्म, सद्बुद्धि एवं संरक्षण का कारक ग्रह है। अतः उसकी दृष्टि सामान्यतः जिस भाव पर पड़ती है वहाँ वृद्धि, संरक्षण एवं शुभता प्रदान करती है।
शनि की विशेष दृष्टि
शनि अपने स्थान से—
तृतीय
सप्तम
दशम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
शनि कर्म, अनुशासन, धैर्य, विलम्ब एवं परीक्षा का ग्रह है। इसलिए उसकी दृष्टि जीवन में संघर्ष अवश्य देती है, किन्तु परिश्रम के माध्यम से स्थायी सफलता भी प्रदान करती है।
ग्रहों की दृष्टि सारणी
भाव
सामान्य ग्रह
विशेष ग्रह
तृतीय
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
चतुर्थ
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
पंचम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
सप्तम
पूर्ण
सभी ग्रह
अष्टम
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
नवम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
दशम
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
क्या दृष्टि सदैव शुभ अथवा अशुभ होती है?
यह भी एक सामान्य भ्रान्ति है कि शुभ ग्रह की दृष्टि सदैव शुभ तथा पाप ग्रह की दृष्टि सदैव अशुभ होती है।
वास्तव में दृष्टि का फल निम्न बातों पर निर्भर करता है—
ग्रह का स्वभाव
ग्रह का बल
ग्रह की अवस्था
ग्रह की मित्रता एवं शत्रुता
ग्रह का भावाधिपत्य
दृष्ट भाव का स्वभाव
ग्रह की दशा
योग एवं राजयोग
सम्पूर्ण कुण्डली का सन्तुलन
उदाहरणार्थ—
यदि शनि षष्ठ भाव को देखे तो शत्रुओं पर विजय दिला सकता है।
यदि मंगल तृतीय भाव को देखे तो पराक्रम एवं साहस बढ़ा सकता है।
यदि गुरु अष्टम भाव पर दृष्टि डाले तो आयु की रक्षा तथा गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति करा सकता है।
अतः केवल ग्रह के शुभ या पाप होने से फल का निर्णय नहीं किया जाता।
ग्रह की दृष्टि ग्रहों पर भी पड़ती है
ग्रह केवल भावों को ही नहीं देखते, बल्कि अन्य ग्रहों को भी प्रभावित करते हैं।
यदि गुरु शनि को देखे तो शनि के कठोर स्वभाव में संतुलन आता है।
यदि मंगल चन्द्रमा को देखे तो जातक में शीघ्र क्रोध, मानसिक उत्तेजना अथवा रक्त सम्बन्धी विकारों की सम्भावना बढ़ सकती है।
यदि शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो तो भोग के साथ सदाचार एवं संयम भी उत्पन्न होता है।
दृष्टि और युति में अन्तर
जब दो ग्रह एक ही भाव में स्थित होते हैं तो उसे युति कहते हैं।
जब ग्रह अलग-अलग भावों में स्थित होकर एक-दूसरे को देखते हैं, तो उसे दृष्टि सम्बन्ध कहते हैं।
युति में ग्रहों की शक्तियाँ परस्पर मिश्रित होती हैं, जबकि दृष्टि में दूरस्थ प्रभाव उत्पन्न होता है।
फलित ज्योतिष में दृष्टि का प्रयोग
व्यवहारिक फलित में सामान्यतः—
सप्तम दृष्टि
मंगल की 4 एवं 8 दृष्टि
गुरु की 5 एवं 9 दृष्टि
शनि की 3 एवं 10 दृष्टि
का अधिक प्रयोग किया जाता है।
परन्तु सूक्ष्म अनुसन्धान एवं गहन फलनिर्णय में एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद दृष्टियों का भी विचार करना चाहिए।
उपसंहार
ग्रह-दृष्टि वैदिक ज्योतिष का अत्यन्त गूढ़ एवं वैज्ञानिक विषय है। ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होता है उसी का फल नहीं देता, बल्कि जिन भावों तथा ग्रहों पर उसकी दृष्टि पड़ती है, उनके स्वभाव, शक्ति एवं परिणामों को भी परिवर्तित कर देता है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार सभी ग्रहों की आंशिक दृष्टियाँ (एकपाद, द्विपाद एवं त्रिपाद) तथा पूर्ण दृष्टि होती हैं। मंगल, गुरु एवं शनि को विशेष पूर्ण दृष्टियाँ प्राप्त हैं। एक कुशल ज्योतिषी को ग्रह की स्थिति, बल, दृष्टि, भावाधिपत्य, दशा तथा सम्पूर्ण कुण्डली का समन्वित अध्ययन करके ही फलादेश करना चाहिए। यही शास्त्रीय एवं प्रमाणिक ज्योतिष का आधार है।

27 नक्षत्रों का स्वरूप और फलादेष

Vedic Astro Care
✓•अभिजित को छोड़ कर २७ नक्षत्र और उनके १०८ चरणों पर विचार किया गया। १०८ मनकों की माला में अभिजित् का एक मनका सुमेरु है। इसका उल्लंघन नहीं किया जाता। यह चरणहीन है। २८ नक्षत्र हैं। चन्द्रमा २७ का भोग करता है, अभिजित का नहीं। इस विषय में शास्त्र प्रमाण है। अतः अभिजित् को नक्षत्र मण्डली से बहिष्कृत कर रहा हूँ। २८ की संख्या अशुभ है। भागवत में २८ नरकों का वर्णन आया है। इसके अतिरिक्त २८ की संख्या में २ का अंक शुक्र का तथा ८ का अंक मंगल का है। २८ में शुक्र को मंगल दूषित कर रहा है। वृष और वृश्चिक का साथ अशुभ परिणामी है। दूसरे प्रकार से, २८ + ९ = ३ आवृत्ति, १ शेष १ मंगल का अंक होने से अशुभ परिणामी है। जब कि २७ की संख्या में २ और ७ के दोनों अंक शुक्र के हैं। वृष और तुला का मेल शुक्र के स्वामित्व के कारण पूर्ण शुभ है। दूसरे प्रकार से, २७÷ ९= ३ आवृत्ति ० शेष शून्य असत् वा ब्रह्म है। अतः वरणीय है। नक्षत्रों की संख्या २७ मानने में यह एक रहस्य है।

✓•सभी नक्षत्रों का कोई न कोई गोत्र होता है। अभिजित गोत्र होन है चन्द्रमा से अयुक्त, पादहीन, गोत्रहीन नक्षत्र का वर्णन करना मेरे लिये अभीष्ट नहीं है। फिर अभिजित् का किया क्या जाय ? इसे मूहूर्त की संज्ञा देना अधिक उपयुक्त है। इसे जाति परिवर्तन वा धर्मान्तरण माना जाय। यह नक्षत्र मूहूर्त का आवरण डाल कर अहोरात्र में एक बार आता है। दिन के मध्यभाग मे इसकी उपस्थिति होती है। यह मुहूर्त रूप से मध्याह में १ घटी पर्यन्त रहता है। इस अभिजित मुहूर्त में पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ है। अभिजित् मुहूर्त जातक का फल ऐसा कहा गया है ...

"अतिसुललित कान्तिः सम्मतः सज्जनानां
 ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः ।
 द्विजवरसुरभक्तिर्व्यक्तवाद मानवः स्याद् अभिजिति यदि सूतिर्भूपतिः स स्ववंशे ॥" 
                 (दुण्डिराज )

✓•जिसका जन्म अभिजित मुहूर्त में होता है, वह अत्यन्त शोभायमान कान्ति से युक्त तथा सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित होता है। वह जातक निश्चय ही विनयी, सुन्दर कीर्तिमान, तथा सुरुपवान् होता है। वह द्विजश्रेष्ठ (ब्राह्मण) एवं देवता में भक्ति रखता है, प्रशस्त वक्ता होता है। वह अपने वंश में प्रमुख होता है।

 ✓•दिन के मध्य में सूर्य दिग्बली होता है। सूर्य के बलवान् होने से जातक राजा वा राजतुल्य शासक/प्रशासक होता है। मेरा जन्म ज्येष्ठकृष्ण दशमी के दिन ठीक मध्याह्न काल (अभिजित मुहूर्त) में हुआ है। सूर्य के उच्चच्युत (वृष में प्रवेश) होने से इस मुहूर्त के सम्पूर्ण फल में हास स्पष्ट है। मध्याह्न जातक जातकों को मैंने शासन प्रशासन में प्रविष्ट होते हुए देखा है। 

✓•२७ नक्षत्रों की सरणी में सब लोग वह रहे हैं। मैं इस में स्नान कर रहा हूँ। इसमें १०८ घाट हैं। हर घाट अनोखा है। इन घाटों की सुषमा किश्चित कथ्य है। श्री १०८ को मेरा प्रणाम ।

✓•१. अश्विनीनक्षत्र...
 इसमें ३ तारे हैं। घोड़ा के मुख सदृश इस का आकार है। आश्विन मास की पूर्णिमा के आस पास चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है। यह लघु वा क्षित्र संज्ञक नक्षत्र है। अश्विनीकुमार इसके देवता हैं। मेष राशि के १३° अंश २०' कला तक इसका क्षेत्र है। शीर्ष एवं प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध पर इसका नियन्त्रण है। चिन्तन प्रक्रिया पर इसका विशेष प्रभाव होता है। आवेश में आना ऊहापोह, कल्पनाशीलता, तन्द्रा, तनाव, आत्मविस्मृति, अपस्मार, उपता, अनिद्रा, आसक्ति, अन्यमनस्कता, ऐंठन, अंगघात, लकवा, सिरपीड़ा का विचार इस नक्षत्र से किया जाता है। 

इस नक्षत्र का स्वामी केतु है तथा यह नक्षत्र जिस राशि में पड़ता है, उसका स्वामी मंगल है। अतः अश्विनी नक्षत्र जात व्यक्ति के स्वभाव में केतु एवं मंगल की भूमिका का वर्चस्व होता है। इस नक्षत्र में सूर्य उच्च का तथा शनि नीच का होता है। सूर्य इस नक्षत्र पर प्रतिवर्ष वैशाख के प्रारंभ में लगभग १३.१/४ दिन के लिये आता है, जब कि चन्द्रमा प्रति सत्ताइसवें दिन इस नक्षत्र का भोग करता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक विचारशील, अध्ययन शील, झगड़ालू, ज्योतिष वैद्यक में रुचि रखने वाले, भ्रमणप्रिय, चंचलस्वभाव, अर्शरोगी, बुद्धिमान, तथा महाकांक्षी होते हैं।

✓•२. भरणी नक्षत्र...
 इसमें छोटे-छोटे तारों से छोटा सा रिकोग बनता है। यह अश्विनी के आगे पूर्व की ओर है। ३ इसे योन्याकार बताया गया है। यह मेष राशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' तक फैला हुआ है। इस का स्वामी शुक्र है। प्रमस्तिष्कीय मध्य भाग तथा सिर इसका प्रभाव क्षेत्र है। भरणीजात व्यक्ति का मस्तिष्क शुक्र और मंगल के प्रभाव से युक्त होता है। मंगल तम्बाकू का कारक है तथा शुक्र मदिरा एवं रसीले पदार्थों का कारक है। अतः ऐसा जातक धूम्रपान, मदपान करता है, रसीले पदार्थों में रुचि रखता है। सुखानुभूति की विशेष चाह, रसिक स्वभाव, मांसाहारी होने पर अत्यधिक क्रूरता एवं आक्रामकता, नीच संगता, साहस, उद्देश्य प्राप्ति मे सफल, चातुर्य, सच्चाई, प्रासाद एवं रोग मुक्तता ऐसे जातक में सामान्यतः देखी जाती है।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर, सिर के अग्रभाग में चोट रति रोग से अस्वस्थता, हड़बड़ी, सिर का नजला, कफ, जुकाम चक्षुपीडा, धमनीविकार, व्यसन चटोरेपन की प्रवृत्ति जातक में पायी जाती है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक बलवान् विरोधियों को नीचा दिखाने वाले, धार्मिक कार्यों में रुचि रखने वाले, धोखा देने वाले, निम्न स्तर के कार्यों में लगे रहने वाले, कलात्मक अभिरुचियों वाले, यात्री एवं चर प्रकृति के होते हैं।

✓•३. कृत्तिका नक्षत्र...
यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है। कार्तिक के महीने में रात्र्यारंभ में यह पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसमें ६ तारे माने गये हैं। इसकी आकृति क्षुर सदृश कही गई है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर होता है। इस नक्षत्र का स्वामी सूर्य है। इसका प्रथम चरण मेष राशि के २६° ४०' से लेकर ३०° तक है। अन्य तीन चरण वृष राशि के १०° तक फैले हैं। इसके दूसरे चरण में चन्द्रमा उच्च का होता है।

 सिर का अगला भाग, मस्तिष्क दृष्टि भाग, ललाट पर इसके प्रथम चरण का तथा मुख, कण्ठ, निम्नहनु,कपोल पर इसके अन्य तीन चरणों का प्रभाव रहता है। यह नक्षत्र मेष एवं वृष राशियों का योजक है। पहले चरण पर सूर्य एवं मंगल का प्रभाव तथा शेष तीन चरणों पर सूर्य एवं शुक्र का प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र पर दूषित प्रभाव होने से तीव्र ज्वर, मस्तिष्क ज्वर, चेचक, झाई, मुहासा, दृष्टिदोष, कण्ठावरोध, कण्ठ प्रदाह, विस्मृति, चेहरे पर धब्बा मस्सा होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक हृष्टपुष्ट, युयुत्सु, श्रेष्ठ, प्रधान, तार्किक, विषयाकांक्षी, आसक्त, तीव्र, प्रसिद्ध, मैत्रीपरायण, सहृदयपूर्ण व्यवहार करने वाले, शांति के इच्छुक, द्यूतप्रिय, धनीएवं सामाजिक क्रिया कलापों में भाग लेने वाले होते हैं।

✓•४. रोहिणी नक्षत्र...
इसमें ५ तारे माने जाते हैं। यह गाड़ी के सदृश होता है। कृत्तिका के कुछ दक्षिण में इस की स्थिति देखी जाती है। कहा जाता है जब शनि और मंगल रोहिणी के तारों के बीच से हो कर जाते हैं, (शकट भेदन) तो प्रलय होता है। केवल चन्द्रमा को इसका भेदन करते हुए देखा जाता है। इसी कारण चन्द्रमा को रोहिणी पति कहते हैं। यह नक्षत्र वृष राशि के १०° से लेकर २३° २०' रहता है। इसलिये रोहिणी जात जातक पर चन्द्र एवं शुक्र का स्पष्ट प्रभाव देखा जाता है। ऐसे जातक सौम्य प्रकृति, सुहासप्रिय, सौन्दर्य प्रेमी, संगीत में रुचि रखने वाले, ललित कला, सरस साहित्य, नाट्य शास्त्र, यात्रा एवं उत्सव प्रिय होते हैं। मातृस्नेह प्राप्त करने वाले, विपरीतयोनि के साथ सतत जीवन जीने वाले मृदु हृदय, मधुर भाषी, प्रियदर्शी, परोपकारी, शुद्धात्मा तथा स्थिर विचारों के होते हैं।

 इस नक्षत्र के दूषित होने पर कण्ठ स्वर विकृत होता है, छाती में पीड़ा होती है, हृदय को ठेस पहुंचती है। तालु, ग्रीवा, जिह्वा, मुंह, शीर्ष प्रभाग, अनुमस्तिष्क पर इसका विशेष प्रभाव होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए अधिकांश जातक स्वच्छताप्रिय, असत्यवादी, चापलूस, संगीतज्ञ, समाजसेवी, यात्री प्रसन्नचित, अन्धविश्वासी, सत्यनिष्ठ तथा आस्तिक होते हैं।

✓•५. मृगशिरा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग वृष राशि में तथा शेष आधा भाग मिथुन में होता है। वृष के २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा मिथुन राशि के ६° ४०' तक उत्तरार्धभाग का विस्तार है। मृगशिरा के उत्तरार्ध भाग में पैदा होने वाले मंगल और बुध के संयुक्त प्रभाव में होते हैं। इसके पूर्वार्ध में जो जातक पैदा होते हैं, उन पर मंगल और शुक्र का सम्मिलित प्रभाव होता है। मृगशिरा का स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के प्रभाव में सम्पूर्ण वाक् तन्त्र होता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर पर स्त्रियों को अनियमित मासिक सूजन, मूत्रकृच्छ्र, रतिपीड़ा, नाक से रक्त स्राव, दन्त शूल, प्रीवास्थिका विच्छेद, कन्धे में/ के आस पास पीड़ा, बाहु पीड़ा होती है। 

इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले अधिकांश जातक धनवान् अनैतिक कार्यों से धनार्जन करने वाले, अविश्वासी, उन्नतिगामी, कार्यनिपुण, झूठे, आडम्बरी, पाखण्डी, प्रतिभाशाली तथा धर्म में पाखण्डी होते हैं। इसके उत्तरार्ध में उत्पन्न जातक साहसी उत्साही, विनोदी, उर्वर मस्तिष्क, वाक् पद्, सततसावधान एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व से सम्पन्न होते हैं। शीघ्र उत्तेजित होना, तुरन्त प्रत्युत्तर देना, वासनोन्मुख, स्वार्थपरता, उद्यमता, अस्थैर्य इनके स्वभाव का अंग होता है।

✓•६. आर्द्रा नक्षत्र...
यह राहु का नक्षत्र है। मिथुन राशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक इसका विस्तार है। स्कन्ध, बाहु एवं हाथ पर इसका प्रभाव रहता है। श्वासनली, प्रसिका तथा कर्णेनली पर इसका नियन्त्रण हैं। यह नक्षत्र दूषित होने पर सूखी खाँसी, गले का सूखना, कान का जाम हो जाना, स्वर भंग, श्वसन क्रिया में पीड़ा करता है।

इस नक्षत्र में उत्पन्न हुआ जातक प्रखर प्रतिभावान् पूर्वानुमान में दक्ष, पूर्वाभासयुक्त, निष्पकट, किन्तु आलोचक, सच्चरित्र, शोधपरक मस्तिष्क से सम्पन्न होता है। इन्द्रजालिक एवं तात्रिक योग्यताओं का धनी होता है। निन्दित कार्य करने वाला कृतघ्न, विश्वासघाती, अभिचारकर्मक तथा मध्यवय में अत्यन्त कष्ट पाने वाला जातक इस नक्षत्र की देन है। यह नक्षत्र सन्तानोत्पादन मे निर्बल होता है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले अधिकांश जातक अल्पवीर्य एवं स्खलनरोगी होते हैं तथा गणित सांख्यिकी वाणिज्य में विशेषयोग्यता रखते हैं। बुध की राशि एवं राहु के इस नक्षत्र में पैदा होने वाले लोग अधिकतर मधुर वाक् तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं, वैद्य एवं मंत्रज्ञ होते हैं, मदसेवन करते हैं, घमण्डी, दम्भी एवं यायावर होते हैं, आडम्बर पूर्ण 'जीवन व्यतीत करते हैं।

✓•७. पुनर्व नक्षत्र...
यह गुरु का नक्षत्र है। इसके तीन पाद मिथुन राशि में अंतिम चौथा पाद कर्क राशि में होता है। यह मिथुन में २०° से लेकर ३०° तथा कर्क में ३° २०' तक फैला हुआ है। कन्धे और गले से लेकर फेफड़े, अन्तः श्वासनली, प्रास-नली, छाती का ऊपरी भाग, स्तनाम पर्यन्त इसका प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गलगण्ड, श्वासनलीशोथ, कान की सूजन, रक्तविकार यक्ष्मा, शीतज्वर न्यूमोनिया छाती में जलन तथा हृदय प्रदाह होता है।

 नक्षत्र स्वामी गुरु तथा राशि स्वामी बुध के प्रभाव से अधिकांश जातक विचार पूर्वक कार्य करने वाले मेधावी प्रज्ञावान् होते हैं। विस्तृत दृष्टिकोण तीव्रबुद्धि, अच्छी स्मरणशक्ति, पूर्वानुमान में कुशल, व्यावहारिक कार्य क्षमता से युक्त शुद्ध सत्यवादी उच्चविचारों वाले धार्मिक कार्यकता, दिव्यज्ञान सम्पन्न, धनी, आत्मकेन्द्रित होना इसके लिये सहज है।

 चन्द्रमा की राशि तथा गुरु के नक्षत्र पुनर्वसु में पैदा होने वाले जातक महत्वपूर्व जीवन जीने वाले, आचारविचार का ध्यान रखने वाले, सुन्दर कल्पनाशक्ति से युक्त, विश्वसनीय, क्षमाशील, सौन्दर्योपासक, प्रभावशाली तर्क प्रस्तुत करने वाले, दानी, न्यायप्रिय, दयालु, धनाढ्य, शिक्षक, राजनेता, कवि एवं तीर्थयात्री होते हैं।

✓•८. पुष्य नक्षत्र...
इस नक्षत्र का स्वामी शनि है। यह कर्क राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' तक विस्तृत है। पौषमास में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर आता है। पूरा वक्षस्थल, हृदय, फुफ्फुस, यकृत, अग्न्याशय इस के प्रभाव में रहता है। इसके दूषित होने पर राजयक्ष्मा, अन्तः श्वसनीयप्रणाली में व्रण, पित्त अश्मरी, घृणा, जुगुप्सा, हिचकी, पौलिया, श्वास कास, तपेदिक ज्वर का उदय होता है। इसनक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मितव्ययी, बुद्धिमान, अल्पव्ययी (कंजूस भी), विवादी चिन्तनशील, सावधान, तत्पर, आत्मकेन्द्रित क्रमबद्ध, नियमबद्ध, सहनशील, उद्योगशील, स्पष्टभाषी एवं कार्य निपुण होते हैं। अधिकांश जातक बड़े परिवार वाले तथा बृहत् स्रोतों से युक्त होते हैं। इनका मन अस्थिर रहता है। ये भ्रमणशील प्रकृति के होते हैं। कठिन कार्यों को भी दक्षतापूर्वक निपटाने में सफल होते हैं। साधारण सी बात पर चिन्ता करते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी ये साहस नहीं छोड़ते। इनकी आर्थिक स्थिति साधारण ही होती है। ये ईश्वर भक्त एवं दार्शनिक स्वभाव के होते हैं। पुष्य नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक दीर्घायु होते हैं तथा सांसारिक दृष्टि से सफल माने जाते हैं। जब भी शनि इस नक्षत्र पर आता है तो जातक आजीविका एवं सम्पत्ति द्वारा विशेष लाभ पाता है।

✓•९. आश्लेषा यह बुध का नक्षत्र है। कर्क राशि में १६° ४०' से लेकर ३०० तक इसका वर्चस्व है। फुफ्फुस, हृदय, यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अधोमासनली, हृदय महाशिरा पर इसका प्रभाव जाना जाता है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर, श्वास कास वायुगोला आमवात गठिया मन्दाग्नि अपच का रोग होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक बुध और चन्द्रमा के सम्मिलित प्रभाव से युक्त होते हैं। धैर्यहीनता, परिवर्तनशीलता, कल्पनाशीलता, वारियता इनका विशेष गुण होता है ये कार्यकुशल, अनर्गलवक्ता, बहुभाषी, विदूषक, विद्वान, विद्याव्यसनी, संगीत साहित्य कलाविद, स्वार्थी, प्रपञ्ची, मायावी एवं अविश्वसनीय होते हैं। स्वांगरचने, अभिनय करने में ये दक्ष होते हैं। दूसरों की भाषा आसानी से समझ लेते हैं। दूसरों की अनुकृति करने में पटु होते हैं। ये धनवान् यथार्थवादी, स्त्री में लीन, मृदुभोजी, सरस व्यञ्जन प्रिय, हँसमुख, सरल और धूर्त होते हैं।

✓•१०. मघा नक्षत्र...
यह केतु का नक्षत्र है। सिंह राशि का प्रारंभ इसी से होता है। यह सिंह राशि के १३° २०' पर्यन्त फैला हुआ है। इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र पीठ, रीढ़ की हड्डी, हृदयस्पन्दन सुषुम्णा नाड़ी, आमाशय, महाधमनी एवं नाभि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर हृदरोग, हृदय में अत्यधिक एवं अचानक स्पन्दन, ठेस, पीठ में दर्द, उद्रिरण, आमाशयिक व्रण, मूर्छा, पागलपन, भ्रान्ति, शंसय, जठराग्निघ्नता एवं उदरपीड़ा होती है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक स्पष्टवादी, युयुत्सु लड़ाकू, शक्तिशाली, निर्भीक, साहसी निर्लज्ज ढीठ, कामी, अनुरागी बैरागी, अभिमानी दानी, शीघ्रकोपी, शीघ्रतुष्टी, शीघ्रगामी, शीघ्रकर्मी, स्वार्यतत्पर, उच्चाभिलाषी, उष्णप्रकृति, औम, शीघ्रविश्वासी, धनी, कार्यपटु, उत्साही, अविलम्बी, अधिक श्रम न करने वाले, ईश्वरपरायण, न्याय प्रिय, गुप्त कार्यों के प्रति यत्नशील तथा संशयी होते हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य और केतु का सम्मिलित प्रभाव काम करता है। ऐसे जातक अपने से बड़ों के प्रति आदर भाव रखते हैं, एकाएक चोट खाते हैं, उन्नति के मार्ग में बार बार बाधाओं का सामना करते हैं, तेज बोलने वाले एवं चिन्ताग्रस्त मनः स्थिति के होते हैं।

✓•११. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र...
शुक्र का यह नक्षत्र सूर्य की राशि सिंह में १३° २०' से २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। हृदय रीढ रज्जु सुषुम्नानाडी तथा उदरभाग पर इसका विशेष प्रभाव रहता है। इस नक्षत्र के दषित होने पर सन्तान कष्ट, विपरीत योनिपीड़ा, स्त्रियों को गर्भाशय का रोग, बार बार गर्भ स्राव, मृतसन्तान, अनियमित अतुधर्म (मासिकस्राव), प्रेम वैफल्य, हदपीड़ा, उदर विकार, अरुचि, रक्ताल्पता, हृदय में सूजन व्रण तथा रक्तचापाधिक्य का रोग होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक उदात्त हृदय, प्रगल्भमन, प्रियदर्शी, हँसमुख, विलासी और आरामप्रिय, कवि, उदार, दीनचित्त, सावधान, सत्यनिष्ठ, शुद्ध, सरल, विनोदी, क्रीडावान्, उद्यमशील, आत्मसंस्थ, भूषाप्रिय, सेनानी सभ्य और सुहृद होते हैं। ये जातक कोमल हृदय, अपराध से डरने वाले, करुणरस बहाने वाले, सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाले, सुभाषित शस्त्र एवं शास्त्र वेत्ता, पशुपालक, सम्मान प्रिय, स्वाभिमानी, शुद्धाचारी एवं विपरीतयोनि की प्रशंसा करने वाले होते हैं। ऐसे जातक प्रेमपथिक तथा पाप से दूर रहते हैं। साहित्य एवं स्वच्छ राजनीति का क्षेत्र इन के लिये सर्वाधिक उपयुक्त रहता है।

✓•१२. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र...
 इस नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि में २६° ४०' से ले कर पूरा ३०° तक है। इसका शेषतीन चरण कन्या राशि में ०° से १०° तक व्याप्त है। इस नक्षत्र का अधिपति सूर्य है। इस का प्रभाव क्षेत्र रीढ रज्जु का अंतिम भाग, क्षुद्रान्त्र, बृहदान्त्र एवं कुक्षि है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर उदरशूल, पीठदर्द, मस्तिष्कीय उद्घान्ति, मलावरोध, रक्तदूषण, त्वविकार, ज्वर, आत्रपुच्छशोथ का रोग होता है। 

इस नक्षत्र के प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातकों पर सूर्य का सम्पूर्ण प्रभाव होता है तथा इसके अन्य तीन चरणों में पैदाहोने वालों पर सूर्य तथा बुध का संयुक्त प्रभाव रहता है। प्रथमपाद जात व्यक्ति आत्मबलसम्पन्न, उदार चेता, संकीर्णविचारों से दूर रहने वाले तथा नैतिक मापदण्डों पर चलने वाले होते हैं। इनकी स्मरणशक्ति तीव्र होती है तथा ये अल्पभोजी एवं अल्प सन्तानवान् होते हैं। उच्चाभिलाषी, अधिकार प्राप्त, देश भक्त एवं हिंसात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य तीन पादों में पैदा होने पर बुध के प्रभाव से इनमें विद्याध्ययन की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये विषय विशेषज्ञ, ज्योतिषी, खगोलज्ञ, गणितज्ञ, वाग्मी, मुखर, अभियन्ता, कूटनीतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, लेखक, व्यापार प्रवीण तथा निश्च्छल होते हैं। इस नक्षत्र में पैदा होने वालों का दाँत आगे निकला होता है।

✓•१३. हस्त नक्षत्र ...
यह नक्षत्र कन्याराशि में १०° से लेकर २३° २०' तक विस्तार वाला है। इसका स्वामी चन्द्रमा है। छोटी आँत, वृक्क, मूत्राशय पर इसका वर्चस्व है। दूषित होने पर तत्संबंधी अंगों में विकार उत्पन्न होता है। उदर में वायु का भरना, आंतों का उतरना, आँतों में दर्द, आंतों में मल का रुकना, आँतों का शिथिल होना, आंतों में कीड़े पड़ना, अतिसार, आँव, मूत्ररोग, गुर्दे में पथरी होना, रोग इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक में सामान्यतः होते है। बुध की राशि एवं चन्द्रमा के नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक पर इन ग्रहों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। ऐसे जातक वेदज्ञ, सिद्धान्तशास्त्री, पौराणिक कथाकार, ज्योतिषी होते हैं। इनमें व्यापारिक बुद्धि होती है। ये उद्यमी, कार्यकुशल, चोर, शिल्पी, मद्यप, तरलपदार्थों के शौकीन होते हैं। ऐसे जातक अधिकांशतः कृतघ्नी, कपटी, असत्यवादी, अभिमानी, उत्तरदायित्व न निभाने वाले, गायन प्रेमी, लम्बे कद के होते हैं। ऐसे जातक अधिकतर साधारण जीवन जीने वाले होते हैं। इसमें पैदा हुआ जातक बुद्धिमान् होता है। 

✓•१४. चित्रा नक्षत्र...
इस नक्षत्र का आधा भाग कन्या राशि में तथा शेष आधा भाग तुला राशि में पड़ता है। कन्या में २३° २०' से लेकर ३०° तक पूर्वार्ध तथा तुला में ०° से लेकर ६° ४०' तक उत्तरार्ध भाग फैला है। इस का नक्षत्र स्वामी मंगल है। इस नक्षत्र के पूर्वार्ध में पैदा होने वाले जातकों पर मंगल एवं बुध का मिश्र प्रभाव रहता है। इसके उत्तरार्ध भाग में जायमान लोगों पर शुक्र एवं मंगल का मिश्र प्रभाव होता है।

 इस नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र कटि है। इस के दूषित होने पर कमर का दर्द तथा कटिस्थ अंगों में विकार उत्पन्न होता है। मूत्र नलिका में जलन, वृक्क शैथिल्य, उत्तेजना, मस्तिष्क ताप, शिरपीडा, बुक्क अश्मरी, मूत्रावरोध, वस्तिशूल का रोग ऐसे जातकों को प्रायः होता है।

 इसमें पूर्वार्धजात लोग हास्यप्रिय प्रयोगवादी शक्तिवन्त, तीक्ष्ण तर्कशील, असहनशील, साहसी, व्यापारी, उद्यमी वाकुशल, भव्य आकृति एवं बहुकम होते हैं। ऐसे जातक अद्भुतकर्मा, आक्रामक बलिष्ठ, दीर्घकाय तथा सामान्य आर्थिक स्थिति के नायक होते हैं। उत्तरार्धजात लोग श्रृंगारप्रिय, प्रत्यक्षानुमान एवं परीक्षण करने वाले, उत्कृष्ट अभिरुचिवाले आदर्शवादी, उत्तमकर्मक, संगीत प्रेमी तथा मृदुकटु स्वभावाले होते हैं। ये अतिकामुक तथा यौन रोगी होते हैं।

✓•१५. स्वानी नक्षत्र...
राहु का यह नक्षत्र तुलाराशि में ६° ४०' से लेकर २०° तक विस्तार वाला है। वस्ति भाग पर इस का पूरा नियन्त्रण है। मूत्राशय, मलाशय, शुक्राशय, गर्भाशय पर इसका विशेष प्रभाव है। इस नक्षत्र के दूषित होने पर गर्भाशय में व्रण गर्भस्खलन, बन्ध्यापन का दोष स्त्रियों में होता है। जननेन्द्रिय में अति उत्तेजना वा शिथलन पुरुषों में होता है। मलाशय दोष से शरीर पर चकते पड़ते हैं तथा कुष्ठ होता है। 

इस नक्षत्र में पैदा हुए जातक संवेदनशील, दयालु, मिलनसार, स्पष्ट भाषी, अन्तर्ज्यानी भविष्यवक्ता, समालोचक विनम्र, भावुक, मदिरादि सेवी, बातचीत के मर्म को समझने वाले तथ्य की गहराई में पहुँचने वाले, साधु, योगी, तपस्वी, यती, चरित्री होते हैं। इनकी अद्भुत स्मरणशक्ति होती है। ये आचारशील विवेकी शुद्धान्तःकरण के होते हैं। ये शीघ्ररुष्ट हो जाते हैं, घुमक्कड़ होते हैं। इन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है।

✓•१६. विशाखा नक्षत्र...
 इस नक्षत्र के प्रथम तीन चरण तुलाराशि में २०° से ३०° तक तथा अन्तिम चरण वृश्चिक राशि में  ०° से ३° २०' तक फैले हुए हैं। इसका स्वामी गुरु है। जनन और उत्सर्जन अंग इसके अधिकार में हैं। इसके दूषित होने पर मधुमेह का रोग, जिससे चिड़चिड़ापन, चक्कर आना, सुस्ती, आलस्य आता है। गर्भाशय एवं जननेन्द्रिय के रोग, पौरुष ग्रन्थि का शिथिलन, जलोदर, रक्त स्राव, उलझन, घबराहट एवं मोटापा होता है।

 शुक्र की राशि एवं गुरु के नक्षत्र भाग में पैदा होने वाले जातक प्रसन्नवदन, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, नम्र, आस्थावान्, परम्परावादी, सभ्य, ईश्वर भक्त, न्यायप्रिय, विद्वान् वाक् कुशल, चमकदार एवं स्वच्छ वेश भूषा, लालची, ईर्ष्यालु, अभिमानी एवं शिक्षक होते हैं। ऐसे जातक मनोरंजन प्रिय, रतिप्रिय, सुखी, जीवन के उत्तरार्ध में सफल तथा विश्वसनीय होते हैं।

 मंगल की राशि वृश्चिक में विशाखा के चतुर्थचरण जात लोग उदार, दयालु अतिवादी स्पष्टवादी स्वच्छन्द उत्साही सादगीपसन्द, भद्र, गौरवान्वित अनियंत्रित इच्छाशक्तिवाले, शूर, कूटनीतिज्ञ होते हैं। व्यर्थदोषरोपण एवं छिद्रान्वेषण करते हैं। विचार एवं कार्य दोनों में प्रवीण होते हैं। गुरु के पीड़ित होने पर चोर तथा लड़ाकू होते हैं।

✓•१७. अनुराधा नक्षत्र...
वृश्चिक राशि में ३° २०' से लेकर १६° ४०' पर्यन्त इस का प्रस्तार है। इसका स्वामी शनि है। गुह्यांग पर इसका नियन्त्रण है। इसके दूषित होने पर स्त्रियों को मासिक कष्ट होते है। गुदा स्थान में मस्से उभरते हैं। कोष्ठबद्धता, काँच का निकलना, अर्श, वायु प्रकोप, सन्धिवात, सन्निपात तथा तीक्ष्ण दर्द होता है। 

इस नक्षत्र में जयमान लोग दृढनिश्चयी, शुध्वमना, अभियकर, शक्तिवान् अधिकारपूर्ण वाणी से युक्त, स्वार्थी, हिंसात्मक प्रवृत्ति, क्रूर, बलशाली, नीच मनोवृत्ति, मलिन मन, प्रतिशोधी, आक्रामक, पराक्रमी, निर्भीक, शिवभक्त, धैर्यवान्, एकान्तप्रेमी रहस्यपूर्ण, शोधकर्ता, आविष्कारक प्रयोगवादी, गुप्तकार्यों मे लगे रहने वाले, चिन्तनशील, दुर्धर्ष, असामाजिक कृत्यों में लीन हरते हैं। ऐसे जातक स्वधर्म में स्थित तथा प्रशस्त विचार धारा के होते हैं। दर्शनशास्त्र, ज्ञान विज्ञान एवं तकनीकी कार्यों में रुचि रखते हैं। ये जातक अल्पसुखी, चतुराई से काम निकालने वाले तथा मनोश्लेषी होते हैं। आश्चर्यजनक कार्यों को करने वाले ऐसे जातक प्रायः सर्वभक्षी एवं दुःखी बचपन वाले होते हैं।

✓•१८. ज्येष्ठा नक्षत्र....
 यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में १६° २०' से ३०° पर्यन्त व्याप्त है। इसका स्वामी बुध है। मलद्वार वृषण, गुप्तांग डिम्बन्धि पर इसका वर्चस्व है। इसके दूषित होने पर गुदा विकृति, अर्शपीड़ा, स्त्रियों में अनियंत्रित मासिक रक्त स्राव, प्रदर कमर दर्द होता है। इस नक्षत्र में बृहस्पति के होने पर नितम्ब वा श्रोणि प्रदेश विस्तृत तथा भव्य होता है। 

इसमें पैदा होने वाले जातक अध्ययन शील, अध्यवसायी, कार्यशील, क्रिया तत्पर, शोधकर्मी, निष्कपट, सरलचित, हास्यप्रधान, तीक्षणबुद्धि, कृच्छ्र स्वभाव, स्पष्टवादी, वाग्युद्धपटु, तर्कशास्त्री, विद्वान होते हैं। सतत काम में लगे रहने वाले प्रयोगवादी मस्तिष्क, वाक्चातुर्य युक्त, तीव्रता से कार्यों का निपटारा करते हैं। ऐसे जातक अतिशयता की सीमा छूने वाले, विकट क्रोधी, प्रख्यात, विजयी, उठाईगीर, ठग, चोर, लुच्चा, धूर्त होते. हैं। वैज्ञानिक रुचि एवं अस्थिर मान्यताओं से युक्त ये दूत का काम करने वाले वा सेनानी होते हैं। ये उच्चस्वर वाले अभिमानी तथा मित्रों के प्रति नम्र रहते हैं। ये कुलविरोधी एवं विघ्नों से सदा घिरे रहते हैं।

✓•१९ मूल नक्षत्र...
 इस नक्षत्र से धनुराशि का प्रारंभ होता है। यह ०° से १३° २०' धनु में फैला है। इसका स्वामी केतु है। दोनों जघन उर्वस्थि, श्रोणि मेखला, नितम्ब का अग्रभाग इसका प्रभाव क्षेत्र है। इसके दूषित होने पर जघन प्रदेश का सौन्दर्य क्षीण होता है। शुभप्रभाव में होने पर पुरुष मल्लयुद्ध के योग्य जंघा वाला तथा स्त्री सुरति प्रवीण होती है।

 इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक उदार, सत्यवान्, आदरणीय, शिष्ट, सदाचारी, अनुशासित, प्रसादचित्त, प्रगल्भ, उच्चाभिलाषी, प्रज्ञावान्, आस्थावान्, चिन्तनशील, देवपूजक, गुरुत्वयुक्त होते हैं। वे प्राचीनता के पोषक, उत्कर्षचेता आशावादी, मन्त्रशक्ति सम्पन्न, अच्छेपरामर्शदाता, क्षमी, लोक हितैषी, धार्मिक अनुष्ठानों पर व्यय करने वाले, अभिमानी, दृढ निश्चयी तथा स्वस्थ होते हैं। मूलजातक सदैव समय का सदुपयोग करते है। गुप्त कार्यों में संलग्न रहते हैं, अभिचार कर्म में दक्ष एवं विरोधियों पर विजय पाने में समर्थ होते हैं।

✓•२०. पूर्वाषाढ नक्षत्र...
 यह धनुराशि में १३° २०' से लेकर २६° ४०' पर्यन्त व्याप्त है। इसका अधिपति ग्रह शुक्र है। यह नक्षत्र जघनतट के सौन्दर्य एवं मादकता की कुञ्जी है। जाँघों की पुष्टता एवं मसृणता पर इसका अधिकार है। इस के दूषित होने पर जाँघें लोमयुक्त एवं अस्निग्ध होती हैं।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति दूसरों से सम्मानवाने वाले बलकामी, बहुयोनि भोगी, दुर्बलकाय, गायन-वादन-प्रेमी, नाट्यशास्त्री, अभिनेता, स्त्रियों से मान पाने वाले, मानसिक ऊहापोह से युक्त तथा शीघ्र सफलता पाने वाले होते हैं। ये मुक्तहस्त, आवश्यकता से अधिक दानी, भद्र, व्यापक दृष्टिकोण वाले, न्यायी, संवेदनशील, संतुलित, सहनशील, अनुचर, अपव्ययी, अत्याधुनिक, संग्रही, निर्बल हृदय, वचनबद्ध तथा स्वप्रशंसक होते हैं।

✓•२१. उत्तराषाढ नक्षत्र...
सूर्य के स्वामित्व वाला यह नक्षत्र अपने प्रथम चरण से धनराशि को २६° ४०' से ३०° तक तथा अपने शेष तीन चरणों से मकरराशि को ०° से १०° तक व्याप्त किये है। इसका प्रभाव क्षेत्र जानु घुटना है। इसके दूषित होने पर घुटने का दर्द होता है। गठिया, संधिवात जानु अस्थिघात होता है। चक्षुपीड़ा, हृदय रोग, उदर रोग, फुफ्फुसरोग, शीतपित्त, छाती में दर्द, अस्थिज्वर, चर्मरोग, कुष्ठ एवं क्षय होता है। सूर्य का नक्षत्र होने से ये रोग सूर्य की निर्बलता के कारण होते हैं।

 इसके प्रथम चरण में पैदा होने वाले जातक सूर्य और गुरु के प्रभाव के कारण प्रायः अध्ययनशील, कठिन विषयों के ज्ञाता, महत्वाकांक्षी जीवन के अभिलाषी, पुष्ट शरीर, श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त होते हैं। शेष तीन वरणों में पैदा होने वाले सूर्य और शनि के मिश्र प्रभाव के कारण कूटनीतिज्ञ, निम्नस्तर का आचरण करने वाले, प्रशासन में दक्ष, योजनबद्ध ढंग से काम करने वाले, आलोचनाप्रिय एवं वैज्ञानिक प्रतिभा के धनी होते हैं। ये आलसी और दीर्घसूत्र होकर भी दूसरों को उपदेश करते हैं।

✓•२२. श्रवण नक्षत्र....
 इसका स्वामी चन्द्रमा है। यह मकरराशि में १०° से लेकर २३°२०' तक व्याप्त है। जानु और उसकी गति का यह नियन्त्रक है। इसके दोष युक्त होने पर घुटने की गतिशीलता क्षीण होती है, सूजन आती है। चन्द्रमा का नक्षत्र होने से हाथी पाँव का रोग होता है। शनि की राशि में स्थित होने से सन्निपात, सन्धिपात, शीतज्वर, वायुगुल्म, क्षय का प्रकोप होता है। चित्तविक्षेप, स्मरण हास, गहन चिन्ता का रोग चन्द्रमा के निर्बल होने से होता है।

 इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक मनस्वी, महिमामय, घोर उदात्त, सचेत, अतिवादी, आशंकित, विनोदी, हास्य प्रिय, बुद्धिमान् एवं विचारशील होते हैं। इनमें साहस की कमी होती है, व्यर्थ के कार्यों में लगे रहते हैं, कार्यों को टालते रहते हैं तथा बाद में पश्चाताप करते हैं। ये सहनशील, विष्णु के भक्त, अद्भुत धारणाशक्ति रखते हैं, आश्चर्यचकित करने वाले कार्य करते हैं। ये प्रसिद्ध होते हैं तथा सुन्दर साथी का वरण करते हैं। ये चंचल, मातृपितृ पूजक, अच्छे भोजन के शौकीन तथा शरीर से स्वस्थ होते हैं। शनि के क्षेत्र में होने से श्रवणजात लोग लालची, नीचमनोवृत्ति दोषदर्शी, चिड़चिड़े होते हैं ?

23. धनिष्ठा नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी मंगल है। यह नक्षत्र मकर राशि के 23°20′ से कुंभ राशि के 6°40′ तक विस्तृत है। इसका प्रतीक ढोल (मृदंग) है, जो गति, ताल और क्रिया का संकेत देता है। इसके देवता अष्ट वसु हैं।
धनिष्ठा नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 घुटने (Knees)
धनिष्ठा नक्षत्र घुटनों और उनकी गति को नियंत्रित करता है।
दूषित होने पर घुटनों में दर्द, जकड़न, चोट, गठिया, मोच या ऑपरेशन योग बनते हैं। मंगल प्रभाव के कारण अचानक चोट की संभावना रहती है।
इस नक्षत्र के दूषित होने पर रक्त विकार, तेज बुखार, चोट, दुर्घटना, क्रोधजन्य रोग तथा हड्डियों से संबंधित कष्ट होते हैं। मंगल प्रधान होने से कट-फट, शल्य चिकित्सा, रक्तचाप तथा अग्नि से कष्ट की संभावना रहती है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक तेजस्वी, साहसी, कर्मठ, महत्वाकांक्षी और नेतृत्व गुणों से युक्त होते हैं। ये अनुशासनप्रिय होते हैं परंतु कभी-कभी अत्यधिक कठोर और हठी हो जाते हैं। धन कमाने की क्षमता प्रबल होती है, पर खर्च भी शीघ्र कर देते हैं। संगीत, लय, ताल, सेना, पुलिस, प्रशासन, राजनीति तथा तकनीकी क्षेत्र में सफलता पाते हैं। स्त्री जातक प्रभावशाली व स्वाभिमानी होती हैं।

✓ 24. शतभिषा नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी राहु है। यह नक्षत्र कुंभ राशि के 6°40′ से 20°00′ तक फैला है। इसका प्रतीक खाली वृत्त (100 चिकित्सक) है। इसके देवता वरुण हैं।
शतभिषा नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 पिंडलियाँ (Calves) व स्नायु तंत्र
शतभिषा नक्षत्र पिंडलियों, नसों और विषैले तत्वों से जुड़ा होता है।
दूषित होने पर वैरिकोज़ वेन्स, नसों में खिंचाव, एलर्जी, विष प्रभाव, स्नायु दुर्बलता और रहस्यमय रोग उत्पन्न होते हैं।
दूषित होने पर यह नक्षत्र रहस्यमय रोग, विष, एलर्जी, त्वचा रोग, मानसिक तनाव, भय, अनिद्रा, नशे की प्रवृत्ति तथा गुप्त रोग देता है। राहु के प्रभाव से भ्रम, भटकाव और असंतुलन देखा जाता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक रहस्यप्रिय, शोधकर्ता, एकांतप्रिय, विचारों में गहराई रखने वाले होते हैं। ये डॉक्टर, वैज्ञानिक, ज्योतिषी, तांत्रिक, रिसर्चर, आईटी और गुप्त विद्या के क्षेत्र में श्रेष्ठ होते हैं। समाज से थोड़े अलग रहते हैं, पर बुद्धि अत्यंत प्रखर होती है। कभी-कभी अविश्वासी और शंकालु स्वभाव के हो जाते हैं।

✓ 25. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी बृहस्पति है। यह कुंभ राशि के 20°00′ से मीन राशि के 3°20′ तक स्थित है। इसका प्रतीक दो मुख वाला व्यक्ति या तलवार है। इसके देवता अज एकपाद हैं।
पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 जांघें (Thighs)
यह नक्षत्र जांघों की शक्ति और सहनशक्ति का कारक है।
दोष होने पर जांघों में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, रक्तचाप असंतुलन और चलने में कठिनाई होती है। उग्र मानसिकता शरीर पर भी प्रभाव डालती है।
दोषयुक्त होने पर मानसिक द्वंद्व, सिरदर्द, रक्तचाप, उग्र विचार, दुर्घटनाएँ और आत्मघाती प्रवृत्ति देखी जाती है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक उग्र, प्रभावशाली, सिद्धांतवादी, स्पष्टवक्ता और क्रांतिकारी विचारों वाले होते हैं। ये सत्य के लिए कठोर निर्णय लेने में नहीं हिचकते। आध्यात्मिकता, दर्शन, राजनीति, धर्म प्रचार और सामाजिक आंदोलन में अग्रणी होते हैं। कभी-कभी अत्यधिक उग्रता इनके संबंधों में बाधा बनती है।

✓ 26. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी भी शनि है। यह नक्षत्र मीन राशि के 3°20′ से 16°40′ तक फैला है। इसका प्रतीक सर्प अथवा समाधि है। देवता अहिर्बुध्न्य हैं।
उत्तराभाद्रपद नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 घुटनों के नीचे का भाग व पैरों की नसें
यह नक्षत्र स्नायु, जलतत्त्व और गुप्त शक्ति से संबंधित है।
दूषित होने पर पैरों में सूजन, सुन्नता, त्वचा रोग, नसों की कमजोरी और लंबे समय तक चलने वाले रोग बनते हैं।
दूषित होने पर यह नक्षत्र उदासी, अवसाद, पैरों के रोग, जल तत्व से कष्ट, त्वचा व स्नायु विकार देता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक गंभीर, स्थिर, धैर्यवान, त्यागी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होते हैं। ये कम बोलते हैं पर गहन सोच रखते हैं। दीर्घकालिक सफलता पाते हैं और वृद्धावस्था में विशेष सम्मान प्राप्त करते हैं। संत, गुरु, साधक, लेखक और मार्गदर्शक के रूप में श्रेष्ठ होते हैं।

✓ 27. रेवती नक्षत्र
इस नक्षत्र का स्वामी बुध है। यह मीन राशि के 16°40′ से 30°00′ तक व्याप्त है। इसका प्रतीक मछली है। इसके देवता पूषा हैं।
रेवती नक्षत्र – शरीर प्रभाव
👉 पैरों के तलवे (Feet / Soles)
रेवती नक्षत्र पैरों के अंतिम भाग को नियंत्रित करता है।
दोष होने पर पैरों में जलन, घाव, थकान, फंगल इन्फेक्शन, यात्रा से कष्ट तथा दिशा भ्रम होता है। यह जीवन यात्रा के अंतिम चरण का भी सूचक है।
दोषयुक्त होने पर यह नक्षत्र भ्रम, निर्णयहीनता, पैरों के रोग, मानसिक अस्थिरता तथा आर्थिक असंतुलन देता है।
इस नक्षत्र में जन्मे जातक दयालु, सौम्य, विनम्र, बुद्धिमान और कलात्मक होते हैं। ये यात्राओं, व्यापार, लेखन, शिक्षा, मीडिया, काउंसलिंग और आध्यात्मिक कार्यों में सफल होते हैं। दूसरों की सहायता करने में आनंद लेते हैं और जीवन के अंतिम चरण में सुख-शांति प्राप्त करते हैं।

स्थान बल (Sthāna Bala) — पूर्ण विश्लेषण

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स्थान बल (Sthāna Bala) — पूर्ण विश्लेषण
स्थान बल (Sthāna Bala) षड्बल (Ṣaḍbala) का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इससे ज्ञात होता है कि कोई ग्रह अपने स्थान (राशि, भाव एवं वर्गों) के कारण कितना शक्तिशाली है।
यदि ग्रह उचित स्थान पर स्थित हो, तो वह अपने शुभ-अशुभ फल देने में अधिक सक्षम होता है।
स्थान बल के प्रमुख उपबल
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार स्थान बल के मुख्य छह उपबल हैं—
1 - उच्च बल (Uccha Bala)
2 - सप्तवर्गज बल (Saptavargaja Bala)
3 - ओजयुग्म राशि-अंश बल (Ojayugma Rāśi-Aṁśa Bala)
4 - केन्द्रादि बल (Kendrādi Bala)
5 - द्रेष्काण बल (Drekkana Bala)
(कुछ ग्रंथों में) भाव/स्थानगत विशेष बल का भी उल्लेख मिलता है, पर षड्बल की मानक गणना में ऊपर के पाँच प्रमुख उपबलों के साथ उच्च बल सम्मिलित कर स्थान बल का निर्धारण किया जाता है।

1. उच्च बल (Uccha Bala)
जब ग्रह अपनी उच्च राशि के निकट होता है तो उसका उच्च बल बढ़ता है।
उच्च बिन्दु (Deep Exaltation) पर ग्रह को पूर्ण 60 षष्ट्यांश का उच्च बल मिलता है।
नीच बिन्दु (Deep Debilitation) पर उच्च बल शून्य होता है।
उदाहरण
☀ सूर्य
उच्च राशि – मेष 10°
नीच राशि – तुला 10°
यदि सूर्य मेष 10° पर है, तो उसे पूर्ण उच्च बल प्राप्त होगा।
यदि सूर्य तुला 10° पर है, तो उच्च बल शून्य होगा।
2. सप्तवर्गज बल (Saptavargaja Bala)
यह बल सात वर्ग कुंडलियों में ग्रह की स्थिति के आधार पर निर्धारित होता है।
ये सात वर्ग हैं—
D-1 राशि
D-2 होरा
D-3 द्रेष्काण
D-7 सप्तमांश
D-9 नवांश
D-12 द्वादशांश
D-30 त्रिंशांश
यदि ग्रह इन वर्गों में—
उच्च
स्वराशि
मूलत्रिकोण
मित्र राशि
में हो, तो उसका सप्तवर्गज बल अधिक होता है।
उदाहरण
यदि गुरु—
राशि में स्वराशि
नवांश में उच्च
द्रेष्काण में मित्र राशि
में हो, तो उसका सप्तवर्गज बल उत्कृष्ट होगा।

3. ओजयुग्म राशि-अंश बल (Ojayugma Rāśi-Aṁśa Bala)
यह बल ग्रह के सम (Even) एवं विषम (Odd) राशि और नवांश में स्थित होने पर प्राप्त होता है।
नियम - पुरुष ग्रह, सूर्य, मंगल, गुरु
यदि विषम राशि एवं विषम नवांश में हों तो बलवान माने जाते हैं।
स्त्री ग्रह, चन्द्र, शुक्र
यदि सम राशि एवं सम नवांश में हों तो बलवान माने जाते हैं।
बुध
बुध अनुकूल स्थिति के अनुसार दोनों प्रकार से बल प्राप्त कर सकता है।
उदाहरण
यदि मंगल—
सिंह राशि (विषम)
धनु नवांश (विषम)
में हो, तो ओजयुग्म बल अच्छा होगा।

4. केन्द्रादि बल (Kendrādi Bala)
यह ग्रह की भाव स्थिति पर आधारित है।
भाव
बल
केन्द्र (1, 4, 7, 10)
सर्वाधिक
पाणफर (2, 5, 8, 11)
मध्यम
अपोक्लिम (3, 6, 9, 12)
न्यून
उदाहरण
यदि शुक्र दशम भाव में है—
उसे पूर्ण केन्द्रादि बल प्राप्त होगा।
यदि मंगल तृतीय भाव में है—
उसे अपेक्षाकृत कम केन्द्रादि बल मिलेगा।
5. द्रेष्काण बल (Drekkana Bala)
यह बल ग्रह के द्रेष्काण (D-3) में स्थित होने पर निर्भर करता है।
सामान्य नियम—
पुरुष ग्रह पुरुष द्रेष्काण में अधिक बलवान।
स्त्री ग्रह स्त्री द्रेष्काण में अधिक बलवान।
बुध अनुकूल परिस्थिति में दोनों से लाभ ले सकता है।
उदाहरण
यदि सूर्य पुरुष द्रेष्काण में स्थित है—
तो उसे द्रेष्काण बल प्राप्त होगा।
स्थान बल का व्यावहारिक उदाहरण
मान लीजिए—
गुरु कर्क राशि (उच्च)
नवांश में धनु (स्वराशि)
दशम भाव (केन्द्र)
विषम राशि
D-3 में शुभ स्थिति
तो—
उच्च बल = उत्कृष्ट
सप्तवर्गज बल = उत्कृष्ट
केन्द्रादि बल = उत्कृष्ट
द्रेष्काण बल = अच्छा
ओजयुग्म बल = अच्छा
ऐसे गुरु का स्थान बल अत्यधिक होगा और वह अपनी दशा में श्रेष्ठ फल देने की क्षमता रखेगा।
स्थान बल का फलादेश में महत्व
यदि स्थान बल अधिक हो—
ग्रह अपने कारकत्व का पूर्ण फल देता है।
शुभ ग्रह अधिक शुभ फल देते हैं।
पाप ग्रह भी अपने स्वाभाविक कार्यों में अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
ग्रह की दशा-अन्तर्दशा अधिक फलदायी होती है।
यदि स्थान बल कम हो—
ग्रह का प्रभाव कम हो जाता है।
शुभ फल घट सकते हैं।
कारकत्व में बाधा आ सकती है।
निष्कर्ष
स्थान बल यह दर्शाता है कि कोई ग्रह अपने स्थान, राशि, भाव और विभिन्न वर्ग कुंडलियों के कारण कितना समर्थ है। षड्बल में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी ग्रह के वास्तविक बल का निर्णय केवल उच्च या स्वराशि देखकर नहीं किया जा सकता; उच्च बल, सप्तवर्गज बल, ओजयुग्म बल, केन्द्रादि बल तथा द्रेष्काण बल—इन सभी का संयुक्त विचार करने पर ही ग्रह की वास्तविक शक्ति का सही आकलन संभव होता है।

पंचक का सम्पूर्ण विश्लेषण

Vedic Astro Care
पंचक का सम्पूर्ण विश्लेषण
(वैदिक ज्योतिष एवं मुहूर्त शास्त्र – कक्षा हेतु)
भूमिका
भारतीय ज्योतिष एवं मुहूर्त शास्त्र में "पंचक" का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। सामान्य जनमानस में पंचक को केवल अशुभ काल माना जाता है, जबकि शास्त्रीय दृष्टि से यह एक विशिष्ट चन्द्रगोचर काल (Lunar Transit Period) है। इस समय कुछ कार्यों का निषेध बताया गया है, जबकि अनेक कार्य पूर्णतः शुभ एवं अनुमत हैं।
अतः पंचक को अन्धविश्वास या भय का विषय न मानकर, उसके शास्त्रीय आधार, उपयोगिता तथा अपवादों को समझना आवश्यक है।
पंचक क्या है?
जब चन्द्रमा निम्न पाँच नक्षत्रों में गोचर करता है, तब उस काल को पंचक कहते हैं—
धनिष्ठा (उत्तरार्ध – तृतीय एवं चतुर्थ चरण)
शतभिषा
पूर्वाभाद्रपदा
उत्तराभाद्रपदा
रेवती
इन्हीं पाँच नक्षत्रों के कारण इसका नाम पंचक पड़ा।
अर्थात्—
धनिष्ठा के उत्तरार्ध से लेकर रेवती नक्षत्र की समाप्ति तक का समय पंचक कहलाता है।
यह अवधि सामान्यतः लगभग ५ दिन की होती है, क्योंकि चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र में लगभग एक दिन रहता है।
पंचक की गणना
चन्द्रमा का गोचर देखें।
यदि चन्द्रमा—
धनिष्ठा (केवल तृतीय–चतुर्थ चरण)
शतभिषा
पूर्वाभाद्रपदा
उत्तराभाद्रपदा
रेवती
में हो, तो पंचक चल रहा है।
पंचक का शास्त्रीय आधार
मुहूर्त ग्रन्थों में पंचक को विशेष सावधानी का काल कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि इस अवधि में सभी कार्य निषिद्ध हैं, बल्कि कुछ विशेष कार्यों में विलम्ब या शान्ति का विधान बताया गया है।
पंचक में निषिद्ध कार्य
परम्परानुसार पाँच प्रमुख कार्यों का निषेध माना गया है—
1. दक्षिण दिशा की यात्रा
विशेषतः अत्यावश्यक न हो तो दक्षिण दिशा की यात्रा टालने का निर्देश मिलता है।
यदि यात्रा आवश्यक हो तो गणेश पूजन, इष्टदेव स्मरण या शान्ति करके प्रस्थान किया जाता है।
2. घर की छत बनाना
पंचक में मकान की छत डालना अथवा लकड़ी का प्रमुख ढाँचा बनाना कई परम्पराओं में वर्जित माना गया है।
मान्यता है कि इससे गृह में अस्थिरता या पुनः निर्माण की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है।
3. ईंधन या लकड़ी का संग्रह
अधिक मात्रा में लकड़ी, घास, ईंधन आदि का संग्रह पंचक में नहीं किया जाता।
यह प्रतीकात्मक रूप से अग्नि एवं क्षति की आशंका से जोड़ा गया है।
4. चारपाई (खाट) बनवाना
नई चारपाई बनवाना अथवा उसका निर्माण प्रारम्भ करना पंचक में वर्जित माना गया है।
5. शवदाह (विशेष विधान)
यदि किसी व्यक्ति का निधन पंचक में हो जाए, तो परम्परा में पंचक शान्ति कराकर अन्त्येष्टि का विधान बताया गया है।
कुछ क्षेत्रों में पाँच प्रतीकात्मक पुतलों (कुश, आटा आदि से निर्मित) का प्रयोग किया जाता है।
यह क्षेत्रीय परम्पराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है।
पंचक में मृत्यु क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?
लोकमान्यता है कि पंचक में मृत्यु होने पर परिवार में पुनः मृत्यु की आशंका रहती है।
किन्तु शास्त्रीय रूप से इसका आशय यह है कि विशेष शान्ति-विधान किया जाए ताकि अशुभता का निवारण हो।
इसे सार्वभौमिक एवं निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।
पंचक में कौन-कौन से कार्य किए जा सकते हैं?
यह एक सामान्य भ्रान्ति है कि पंचक में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जा सकता।
वास्तव में—
पूजा
जप
हवन
दान
व्रत
अध्ययन
परीक्षा
व्यापार
नौकरी
शिक्षा
चिकित्सा
सामान्य यात्रा
धार्मिक कार्य
गृहप्रवेश (यदि अन्य मुहूर्त अनुकूल हो)
विवाह (यदि मुहूर्त शुद्ध हो)
इन कार्यों का निर्णय केवल पंचक से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मुहूर्त-विचार से किया जाता है।
पंचक के पाँच प्रकार
वार के अनुसार पंचक का फल भिन्न माना गया है—
1. रोग पंचक
रविवार
रोग, स्वास्थ्य सम्बन्धी कष्ट की आशंका।
2. राज पंचक
सोमवार
सरकारी कार्य, अधिकारियों से भेंट, पद-प्रतिष्ठा सम्बन्धी कार्यों के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल।
3. अग्नि पंचक
मंगलवार
अग्नि, मशीनरी, विद्युत, दुर्घटना आदि में सावधानी।
4. चोर पंचक
बुधवार एवं गुरुवार
धन, यात्रा एवं सुरक्षा में सावधानी।
5. मृत्यु पंचक
शुक्रवार एवं शनिवार
इसे अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील माना गया है, विशेषतः रोगी व्यक्तियों की देखभाल तथा अन्त्येष्टि सम्बन्धी कार्यों में शास्त्रीय शान्ति का विधान बताया गया है।
ध्यान दें: विभिन्न पंचांगों एवं क्षेत्रीय परम्पराओं में वारानुसार पंचक-विभाजन में कुछ मतभेद मिलते हैं। अतः स्थानीय परम्परा या मान्य पंचांग का अनुसरण करना उचित है।
पंचक और नक्षत्रों का सम्बन्ध
नक्षत्र
राशि
धनिष्ठा (उत्तरार्ध)
कुम्भ
शतभिषा
कुम्भ
पूर्वाभाद्रपदा
कुम्भ–मीन
उत्तराभाद्रपदा
मीन
रेवती
मीन
स्पष्ट है कि पंचक मुख्यतः कुम्भ और मीन राशियों के अन्तिम भाग से सम्बन्धित है।
क्या पंचक सभी लोगों पर समान प्रभाव डालता है?
नहीं।
प्रभाव निर्भर करता है—
जन्मकुण्डली
गोचर
दशा
कार्य का प्रकार
मुहूर्त
स्थान एवं परिस्थिति
पर।
पंचक और गण्डमूल में अन्तर
पंचक
गण्डमूल
चन्द्रमा का गोचर
जन्म नक्षत्र आधारित दोष
पाँच नक्षत्रों का समूह
छह विशेष नक्षत्र
लगभग ५ दिन चलता है
जन्मकाल से सम्बन्धित
विशेष कार्यों का निषेध
जन्मशान्ति का विधान
पंचक शान्ति
यदि आवश्यक हो तो—
गणेश पूजन
नवग्रह पूजन
नक्षत्र पूजन
महामृत्युंजय जप
रुद्राभिषेक
हवन
ब्राह्मण भोजन
दान
का विधान किया जाता है।
व्यवहारिक उदाहरण
उदाहरण 1
यदि चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में है और कोई व्यक्ति लकड़ी का बड़ा भण्डारण करना चाहता है, तो परम्परा के अनुसार कार्य स्थगित करने या शान्ति के बाद करने की सलाह दी जाती है।
उदाहरण 2
यदि चन्द्रमा रेवती नक्षत्र में है और छात्र की परीक्षा है, तो परीक्षा स्थगित नहीं की जाती। पंचक के कारण शिक्षा या परीक्षा निषिद्ध नहीं मानी गई है।
उदाहरण 3
यदि पंचक में किसी व्यक्ति का निधन हो जाए, तो स्थानीय वैदिक परम्परा के अनुसार पंचक शान्ति कराकर अन्त्येष्टि सम्पन्न की जाती है।
परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिन्दु
पंचक में ५ नक्षत्र आते हैं।
प्रारम्भ: धनिष्ठा (तृतीय–चतुर्थ चरण)।
समाप्ति: रेवती नक्षत्र।
अवधि: लगभग ५ दिन।
प्रमुख निषिद्ध कार्य: दक्षिण यात्रा, छत निर्माण, लकड़ी संग्रह, चारपाई निर्माण, पंचक मृत्यु पर विशेष शान्ति।
पंचक का आधार चन्द्रमा का गोचर है।
पंचक का अर्थ यह नहीं कि सभी शुभ कार्य वर्जित हैं।
निष्कर्ष
पंचक वैदिक मुहूर्त शास्त्र का एक विशेष चन्द्रगोचर काल है। इसका उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि कुछ कार्यों में सावधानी बरतना है। शास्त्रों में जहाँ कुछ विशेष कार्यों के लिए निषेध बताया गया है, वहीं पूजा, जप, अध्ययन, दान, चिकित्सा तथा अनेक आवश्यक कार्यों पर कोई सार्वभौमिक प्रतिबन्ध नहीं है। अतः पंचक का निर्णय सदैव सम्पूर्ण मुहूर्त, जन्मकुण्डली, कार्य की प्रकृति तथा शास्त्रीय परम्परा को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

गण्डमूल (गण्डान्त) नक्षत्र का सम्पूर्ण विश्लेषण

Vedic Astro Care
गण्डमूल (गण्डान्त) नक्षत्र का सम्पूर्ण विश्लेषण
(वैदिक ज्योतिष कक्षा)
भूमिका
जब भी किसी बालक का जन्म अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल अथवा रेवती नक्षत्र में होता है तो अधिकांश परिवारों में यह कहा जाता है कि "बच्चा मूल नक्षत्र में जन्मा है।"
कई लोग इसे अत्यन्त अशुभ मान लेते हैं, जबकि कई लोग इसे बिल्कुल महत्व नहीं देते।
दोनों ही दृष्टिकोण पूर्णतः उचित नहीं हैं।
शास्त्रों के अनुसार गण्डमूल का अपना महत्व है, किन्तु उसका निर्णय केवल नक्षत्र देखकर नहीं किया जाता।
इस विषय को समझने के लिए हमें पहले "गण्ड" और "मूल" का वास्तविक अर्थ समझना होगा।
गण्ड का अर्थ
संस्कृत में "गण्ड" का अर्थ है—
गाँठ, संधि, जोड़ अथवा संक्रमण बिन्दु (Transition Point)।
जहाँ एक अवस्था समाप्त होकर दूसरी अवस्था प्रारम्भ होती है, उसे गण्ड कहा जाता है।
मूल का अर्थ
"मूल" का अर्थ है—
आरम्भ, जड़ अथवा प्रारम्भिक बिन्दु।
अर्थात जहाँ नई राशि अथवा नया नक्षत्र प्रारम्भ हो रहा हो।
गण्डान्त क्या है?
जब
एक जल राशि समाप्त होती है,
और अग्नि राशि प्रारम्भ होती है,
तब उस संधि क्षेत्र को
गण्डान्त (Gandanta)
कहा जाता है।
इसी संधि पर स्थित नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है।
केवल छह नक्षत्र ही गण्डमूल क्यों?
पूरे राशि चक्र में केवल तीन स्थान ऐसे हैं जहाँ
जल तत्व समाप्त होता है और अग्नि तत्व प्रारम्भ होता है।
यही परिवर्तन अत्यन्त संवेदनशील माना गया है।
पहला गण्डान्त
कर्क → सिंह
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
यहाँ
आश्लेषा समाप्त
मघा प्रारम्भ
दूसरा गण्डान्त
वृश्चिक → धनु
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
ज्येष्ठा समाप्त
मूल प्रारम्भ
तीसरा गण्डान्त
मीन → मेष
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
रेवती समाप्त
अश्विनी प्रारम्भ
इस प्रकार
गण्ड नक्षत्र
आश्लेषा
ज्येष्ठा
रेवती
मूल नक्षत्र
मघा
मूल
अश्विनी
इसे समझने का सरल उदाहरण
मान लीजिए
एक व्यक्ति समुद्र से निकलकर अचानक अग्नि के बीच पहुँच जाए।
या
ठण्ड से निकलकर अचानक तीव्र गर्मी में आ जाए।
शरीर पर प्रभाव पड़ेगा।
इसी प्रकार
जल तत्व से अग्नि तत्व में संक्रमण
ऊर्जा का अत्यन्त तीव्र परिवर्तन माना गया है।
ऋतु परिवर्तन का उदाहरण
जैसे
सर्दी से गर्मी
या
गर्मी से वर्षा
के बीच लोग अधिक बीमार पड़ते हैं।
इसी प्रकार
राशियों का यह परिवर्तन
ऊर्जा परिवर्तन का समय माना गया है।
गण्डमूल नक्षत्र
अश्विनी
आश्लेषा
मघा
ज्येष्ठा
मूल
रेवती
इनके स्वामी
केतु
अश्विनी
मघा
मूल
बुध
आश्लेषा
ज्येष्ठा
रेवती
बड़े मूल एवं छोटे मूल
बड़े मूल
आश्लेषा
ज्येष्ठा
मूल
छोटे मूल
अश्विनी
मघा
रेवती
परम्परा में बड़े मूल की शान्ति को अधिक महत्त्व दिया गया है।
क्या केवल गण्डमूल में जन्म अशुभ है?
नहीं।
यही सबसे बड़ी भ्रान्ति है।
यदि ऐसा होता तो
इन छह नक्षत्रों में जन्म लेने वाले सभी व्यक्ति दुःखी होते।
जबकि
असंख्य राजा
संत
महापुरुष
उद्योगपति
वैज्ञानिक
इन्हीं नक्षत्रों में जन्मे हैं।
अतः
केवल नक्षत्र देखकर फलादेश करना शास्त्रसम्मत नहीं है।
वास्तव में किन बातों को देखना चाहिए?
चन्द्रमा की शक्ति
चन्द्रमा पर शुभ या पाप दृष्टि
नक्षत्र स्वामी की स्थिति
लग्न
नवांश
दशा
षड्बल
चन्द्रबल
अभुक्त मूल है या नहीं
गण्डान्त के कितने समीप जन्म है
गण्डान्त का वास्तविक क्षेत्र
शास्त्रों में
केवल पूरा नक्षत्र ही नहीं
बल्कि
विशेष रूप से
जल राशि के अन्तिम अंश
और
अग्नि राशि के प्रारम्भिक अंश
को अधिक प्रभावी माना गया है।
अर्थात
सभी चार चरण समान प्रभाव नहीं देते।
छह नक्षत्रों के चरणफल
अश्विनी
प्रथम चरण — पिता के लिए कष्ट
द्वितीय — सुख
तृतीय — उच्च पद
चतुर्थ — सम्मान
आश्लेषा
प्रथम — शान्ति होने पर शुभ
द्वितीय — धन हानि
तृतीय — माता कष्ट
चतुर्थ — पिता कष्ट
मघा
प्रथम — माता
द्वितीय — पिता
तृतीय — शुभ
चतुर्थ — शिक्षा एवं सम्पत्ति
ज्येष्ठा
प्रथम — बड़ा भाई
द्वितीय — छोटा भाई
तृतीय — माता
चतुर्थ — स्वयं
मूल
प्रथम — पिता
द्वितीय — माता
तृतीय — सम्पत्ति
चतुर्थ — शान्ति के बाद शुभ
रेवती
प्रथम — सम्मान
द्वितीय — उच्च पद
तृतीय — धन
चतुर्थ — स्वयं
महत्वपूर्ण टिप्पणी: ये चरणफल विभिन्न ज्योतिषीय ग्रन्थों एवं परम्पराओं में कुछ भिन्न भी मिलते हैं। अतः इन्हें अंतिम एवं सार्वभौमिक सत्य न मानकर परम्परागत मत के रूप में पढ़ाना चाहिए।
अभुक्त मूल
सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय
इसे समझे बिना गण्डमूल अधूरा है।
अभुक्त मूल क्या है?
ज्येष्ठा नक्षत्र का अन्तिम भाग
और
मूल नक्षत्र का प्रारम्भिक भाग
अत्यन्त संवेदनशील माना गया है।
इसे
अभुक्त मूल
कहते हैं।
परम्परा में
इसे अत्यन्त कष्टकारी माना गया है।
इसी कारण
विशेष शान्ति कराई जाती है।
ध्यान दें: कुछ परम्पराओं में पिता द्वारा कुछ समय तक बालक का मुख न देखने का उल्लेख मिलता है, किन्तु वर्तमान समय में अधिकांश विद्वान इसे प्रतीकात्मक एवं परम्परागत विधान मानते हैं। इसका उद्देश्य शान्ति संस्कार की महत्ता बताना है, न कि परिवार में भय या दूरी उत्पन्न करना।
लग्न गण्डान्त
तीन स्थान
मीन–मेष
कर्क–सिंह
वृश्चिक–धनु
यदि लग्न इन संधियों के अत्यन्त समीप हो
तो
लग्न गण्डान्त।
तिथि गण्डान्त
५–६
१०–११
१५–१
तिथियों की संधि।
यदि तीनों एक साथ हों
यदि
लग्न
चन्द्र
तिथि
तीनों गण्डान्त में हों
तो प्रभाव अधिक माना गया है।
गण्डान्त दोष कब कम हो जाता है?
यदि
चन्द्रमा बलवान हो
गुरु की दृष्टि हो
लग्नेश समर्थ हो
शुभ ग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों
नक्षत्र स्वामी शुभ हो
तो दोष अत्यधिक कम हो जाता है।
गण्डमूल शान्ति
परम्परा अनुसार
जन्म नक्षत्र पुनः आने पर
अर्थात लगभग
२७वें दिन
मूल शान्ति की जाती है।
कुछ परम्पराओं में छोटे मूल की शान्ति १०वें अथवा १९वें दिन भी कराई जाती है।
शान्ति में क्या किया जाता है?
गणेश पूजन
कलश स्थापना
नवग्रह पूजन
नक्षत्र देवता पूजन
नक्षत्र स्वामी पूजन
महामृत्युंजय जप
रुद्राभिषेक
हवन
ब्राह्मण भोजन
दान
क्या मूल शान्ति आवश्यक है?
यदि परिवार शास्त्रीय परम्परा का पालन करता है तो मूल शान्ति कराना उचित माना गया है। यह एक वैदिक संस्कारात्मक उपाय है, जिसका उद्देश्य मानसिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक संतुलन स्थापित करना है। परन्तु यह समझना चाहिए कि केवल गण्डमूल के कारण किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन अशुभ हो जाएगा—ऐसा निष्कर्ष शास्त्रसम्मत नहीं है। सम्पूर्ण जन्मकुण्डली का समग्र परीक्षण आवश्यक है।
परीक्षा में याद रखने योग्य बिंदु
कुल गण्डमूल नक्षत्र – ६
गण्ड नक्षत्र – आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
मूल नक्षत्र – अश्विनी, मघा, मूल
बड़े मूल – आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल
छोटे मूल – अश्विनी, मघा, रेवती
केतु स्वामी – अश्विनी, मघा, मूल
बुध स्वामी – आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
गण्डान्त संधियाँ – कर्क–सिंह, वृश्चिक–धनु, मीन–मेष
विशेष गण्डान्त – अभुक्त मूल (ज्येष्ठा के अन्त एवं मूल के आरम्भ का संधिकाल)
निष्कर्ष
गण्डमूल कोई "शाप" नहीं है, बल्कि यह संधि (Transition) का सूचक है। संधियाँ सदैव संवेदनशील होती हैं—चाहे वे काल की हों, ऋतु की हों, तिथि की हों, लग्न की हों या नक्षत्र की। अतः गण्डमूल में जन्मे जातक का निर्णय केवल नक्षत्र देखकर नहीं, बल्कि चन्द्रमा की शक्ति, नक्षत्र स्वामी, लग्न, दशा, योग, ग्रहबल तथा सम्पूर्ण जन्मकुण्डली के समन्वित अध्ययन से ही करना चाहिए। यही वैदिक ज्योतिष का शास्त्रीय और संतुलित दृष्टिकोण है।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

नवतारा चक्र (Navatārā Chakra) – सम्पूर्ण विश्लेषण

Vedic Astro Care
नवतारा चक्र (Navatārā Chakra) – सम्पूर्ण विश्लेषण
नवतारा चक्र वैदिक ज्योतिष एवं मुहूर्त शास्त्र की अत्यन्त महत्वपूर्ण पद्धति है। इसके द्वारा जन्म नक्षत्र के आधार पर 27 नक्षत्रों की व्यक्ति-विशेष के लिए शुभाशुभता का निर्णय किया जाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग होता है, क्योंकि इसका आधार उसका जन्म नक्षत्र है।
इसका प्रयोग मुख्यतः मुहूर्त चयन, चन्द्र गोचर फल, यात्रा, विवाह, व्यापार, चिकित्सा, साधना तथा दैनिक शुभाशुभ विचार में किया जाता है।

नवतारा का अर्थ
नव + तारा = नौ तारे (नौ वर्ग)
27 नक्षत्रों को 9-9 के तीन चक्रों में विभाजित किया जाता है।
27 ÷ 9 = 3
अर्थात प्रत्येक तारा वर्ग में 3 नक्षत्र आते हैं।
नवतारा चक्र कैसे बनता है?
सबसे पहले जन्म नक्षत्र ज्ञात किया जाता है।
फिर जन्म नक्षत्र से आगे गिनते हुए प्रत्येक नक्षत्र को क्रमांक दिया जाता है।
गिनती
तारा
1
जन्म
2
सम्पत्
3
विपत्
4
क्षेम
5
प्रत्यक्
6
साधन
7
नैधन (वध)
8
मित्र
9
परममित्र
इसके बाद
10 = जन्म
11 = सम्पत्
12 = विपत्
...
18 = परममित्र
19 = जन्म
...
27 = परममित्र
27 नक्षत्रों पर नवतारा क्रम
क्रम
तारा
1
जन्म
2
सम्पत्
3
विपत्
4
क्षेम
5
प्रत्यक्
6
साधन
7
नैधन
8
मित्र
9
परममित्र
10
जन्म
11
सम्पत्
12
विपत्
13
क्षेम
14
प्रत्यक्
15
साधन
16
नैधन
17
मित्र
18
परममित्र
19
जन्म
20
सम्पत्
21
विपत्
22
क्षेम
23
प्रत्यक्
24
साधन
25
नैधन
26
मित्र
27
परममित्र
उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति का जन्म नक्षत्र रोहिणी है।
नक्षत्र
तारा
रोहिणी
जन्म
मृगशीर्षा
सम्पत्
आर्द्रा
विपत्
पुनर्वसु
क्षेम
पुष्य
प्रत्यक्
आश्लेषा
साधन
मघा
नैधन
पूर्वाफाल्गुनी
मित्र
उत्तराफाल्गुनी
परममित्र
फिर
हस्त = जन्म
चित्रा = सम्पत्
स्वाती = विपत्
इत्यादि।
प्रत्येक तारा का विस्तृत फल
1. जन्म तारा
अर्थ – स्वयं, शरीर, मन
फल
मानसिक चंचलता
आत्मचिन्तन
स्वास्थ्य पर ध्यान
नए कार्य में सावधानी
उपयुक्त कार्य
ध्यान
जप
आत्मविश्लेषण
2. सम्पत् तारा
अर्थ – धन एवं लाभ
फल
धन प्राप्ति
व्यापार वृद्धि
आय में वृद्धि
आर्थिक सफलता
उत्तम कार्य
निवेश
व्यापार
खरीदारी
धन सम्बन्धी निर्णय
3. विपत् तारा
अर्थ – विपत्ति
फल
बाधा
दुर्घटना की आशंका
विवाद
आर्थिक हानि
बचना चाहिए
यात्रा
नया व्यापार
जोखिम
4. क्षेम तारा
अर्थ – कल्याण
फल
स्वास्थ्य लाभ
सुरक्षा
सुख
परिवार में शांति
श्रेष्ठ कार्य
गृह प्रवेश
पारिवारिक कार्य
चिकित्सा
5. प्रत्यक् तारा
अर्थ – सामने आने वाला विरोध
फल
विरोध
मुकदमा
रुकावट
विलम्ब
बचना चाहिए
सरकारी कार्य
महत्वपूर्ण समझौते
6. साधन तारा
अर्थ – सिद्धि
फल
सफलता
परीक्षा में लाभ
साधना में प्रगति
लक्ष्य की प्राप्ति
श्रेष्ठ कार्य
प्रतियोगी परीक्षा
मंत्र सिद्धि
शोध
व्यवसाय विस्तार
7. नैधन (वध) तारा
अर्थ – नाश
सबसे अशुभ माना जाता है।
फल
हानि
रोग
दुर्घटना
मानसिक तनाव
आर्थिक नुकसान
इस दिन बचें
विवाह
यात्रा
निवेश
शुभारम्भ
8. मित्र तारा
फल
मित्र सहयोग
सफलता
सम्मान
प्रसन्नता
9. परममित्र तारा
सबसे श्रेष्ठ तारा।
फल
सर्वकार्य सिद्धि
प्रतिष्ठा
उन्नति
शुभ समाचार
राजकीय लाभ
नवतारा चक्र का प्रयोग कहाँ होता है?
1. मुहूर्त में
सबसे अधिक प्रयोग।
यदि चन्द्रमा शुभ तारा में हो तो कार्य सफल माना जाता है।
2. चन्द्र गोचर फल
प्रतिदिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र में रहता है, उस नक्षत्र का जन्म नक्षत्र से सम्बन्ध देखकर उस दिन का फल निकाला जाता है।
3. विवाह
विवाह मुहूर्त चयन में तारा बल देखा जाता है।
4. यात्रा
यात्रा प्रारम्भ करते समय विपत्, प्रत्यक् एवं नैधन तारा से बचना श्रेष्ठ माना गया है।
5. चिकित्सा
ऑपरेशन या महत्वपूर्ण उपचार के लिए शुभ तारा का विचार किया जाता है।
6. व्यापार
नई दुकान, कम्पनी, अनुबन्ध आदि के लिए सम्पत्, साधन एवं परममित्र तारा श्रेष्ठ माने जाते हैं।
7. साधना
दीक्षा, अनुष्ठान, जप एवं होम के आरम्भ में साधन, मित्र एवं परममित्र तारा विशेष फलदायी माने जाते हैं।
चन्द्र गोचर से नवतारा कैसे देखें?
मान लीजिए—
जन्म नक्षत्र = रोहिणी
आज चन्द्रमा = आश्लेषा
गिनती:
रोहिणी
मृगशीर्षा
आर्द्रा
पुनर्वसु
पुष्य
आश्लेषा
अतः आज साधन तारा है।
फल—कार्यसिद्धि, अध्ययन, साधना और योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए अनुकूल।
कौन-से तारे शुभ और कौन-से अशुभ?
अत्यन्त शुभ
सम्पत्
क्षेम
साधन
मित्र
परममित्र
मध्यम
जन्म
सावधानी योग्य
विपत्
प्रत्यक्
नैधन
नवतारा और तारा बल
मुहूर्त शास्त्र में नवतारा से प्राप्त शुभाशुभ स्थिति को तारा बल कहा जाता है। पंचांग के पाँच अंगों (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) के अतिरिक्त मुहूर्त निर्णय में तारा बल का भी महत्वपूर्ण स्थान है। यदि अन्य योग अच्छे हों, परन्तु तारा बल अत्यन्त प्रतिकूल (विशेषतः नैधन) हो, तो आचार्य आवश्यकता अनुसार शान्ति या वैकल्पिक मुहूर्त का विचार करते हैं।
शास्त्रीय महत्व
मुहूर्त ग्रन्थों जैसे मुहूर्त चिन्तामणि, धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, कालप्रकाशिका आदि में तारा बल एवं नवतारा का वर्णन मिलता है। शास्त्रों के अनुसार किसी कार्य की सफलता केवल सामान्य शुभ नक्षत्र पर नहीं, बल्कि उस नक्षत्र का व्यक्ति के जन्म नक्षत्र से सम्बन्ध भी महत्वपूर्ण होता है। यही सम्बन्ध नवतारा चक्र स्पष्ट करता है।
निष्कर्ष
नवतारा चक्र व्यक्ति-विशेष के लिए नक्षत्रों की व्यक्तिगत शुभाशुभता का मानदण्ड है। यह केवल सामान्य नक्षत्र-फल नहीं बताता, बल्कि यह दर्शाता है कि जन्म नक्षत्र की तुलना में वर्तमान नक्षत्र आपके लिए कैसा है। इसलिए मुहूर्त, चन्द्र गोचर, यात्रा, विवाह, व्यापार, चिकित्सा, साधना और दैनिक निर्णयों में इसका अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। सही प्रकार से प्रयोग करने पर यह शुभ समय के चयन और संभावित बाधाओं से बचने का प्रभावी ज्योतिषीय उपकरण सिद्ध होता है।

काल बल (Kāla Bala) — पूर्ण विश्लेषण

Vedic Astro Care
काल बल (Kāla Bala) — पूर्ण विश्लेषण
काल बल (Kāla Bala) षड्बल (Ṣaḍbala) का तीसरा प्रमुख अंग है। इससे ज्ञात होता है कि जन्म के समय (काल) के अनुसार कोई ग्रह कितना शक्तिशाली है।
अर्थात् ग्रह की शक्ति केवल उसकी राशि या भाव पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दिन-रात्रि, पक्ष, अयन, वर्ष, मास, वार, होरा आदि समय-कारकों से भी प्रभावित होती है।
काल बल के प्रमुख उपबल
1- नतोन्नत बल (Natonnata Bala)
2 - पक्ष बल (Pakṣa Bala)
3 - त्रिभाग बल (Tribhāga Bala)
4 - वर्ष–मास–दिन–होरा बल (Varṣa-Māsa-Dina-Horā Bala)
5 - अयन बल (Ayana Bala)
6 - युद्ध बल (Yuddha Bala)

1. नतोन्नत बल (Natonnata Bala)
इसे दिन-रात्रि बल (Diurnal/Nocturnal Strength) भी कहते हैं।
यह ग्रह की शक्ति को जन्म के दिन अथवा रात्रि के अनुसार बताता है।
दिन में बलवान ग्रह
☀ सूर्य
♃ गुरु
♄ शनि
यदि इनका जन्म दिन में हो तो ये अधिक बलवान माने जाते हैं।
उदाहरण
यदि किसी का जन्म दोपहर 12:30 बजे हुआ—
सूर्य → बलवान
गुरु → बलवान
शनि → बलवान
रात्रि में बलवान ग्रह
🌙 चन्द्र
♂ मंगल
♀ शुक्र
यदि जन्म रात्रि में हो तो ये अधिक बलवान होते हैं।
उदाहरण
यदि जन्म रात्रि 10:30 बजे हुआ—
चन्द्र → बलवान
मंगल → बलवान
शुक्र → बलवान
बुध
बुध दोनों समय लगभग समान बल रखता है।
2. पक्ष बल (Pakṣa Bala)
यह बल चन्द्रमा की कलाओं पर आधारित है।
शुक्ल पक्ष
शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है।
शुभ ग्रहों को अधिक बल मिलता है।
चन्द्र
गुरु
शुक्र
शुभ बुध
उदाहरण
यदि जन्म शुक्ल दशमी को हुआ—
तो चन्द्र, गुरु और शुक्र अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली होंगे।
कृष्ण पक्ष
कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला घटती है।
पाप ग्रहों को अधिक बल मिलता है।
सूर्य
मंगल
शनि
राहु
केतु
उदाहरण
यदि जन्म कृष्ण चतुर्दशी को हुआ—
तो मंगल और शनि अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी होंगे।
3. त्रिभाग बल (Tribhāga Bala)
दिन और रात्रि को तीन-तीन समान भागों में बाँटा जाता है।
प्रत्येक भाग में कुछ ग्रह विशेष बल प्राप्त करते हैं।
उदाहरण
यदि दिन 6:00 बजे से 6:00 बजे तक है—
पहला भाग
6–10 बजे
दूसरा भाग
10–2 बजे
तीसरा भाग
2–6 बजे
इसी प्रकार रात्रि को भी तीन भागों में विभाजित किया जाता है।
जिस भाग में ग्रह का विशेष अधिकार होता है, वहाँ वह अतिरिक्त बल प्राप्त करता है।
यह बल षड्बल की गणना में गणितीय विधि से निकाला जाता है और सामान्य फलादेश में प्रायः अलग से उपयोग नहीं किया जाता।
4. वर्ष–मास–दिन–होरा बल
यह चार उपबलों का समूह है।
(क) वर्ष बल
जिस ग्रह का उस वर्ष पर अधिकार होता है, उसे अतिरिक्त बल प्राप्त होता है।
(ख) मास बल
जिस ग्रह का उस मास पर अधिकार होता है, उसे बल मिलता है।
(ग) दिन बल
सप्ताह के वार के स्वामी को बल मिलता है।
उदाहरण
यदि जन्म मंगलवार को हुआ—
मंगल को अतिरिक्त बल मिलेगा।
यदि जन्म गुरुवार को हुआ—
गुरु को अतिरिक्त बल मिलेगा।
(घ) होरा बल
हर घंटे पर किसी ग्रह का अधिकार होता है।
जिस ग्रह की होरा में जन्म हो, वह अतिरिक्त शक्तिशाली हो जाता है।
उदाहरण
यदि जन्म सूर्य होरा में हुआ—
सूर्य को होरा बल प्राप्त होगा।
5. अयन बल (Ayana Bala)
सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन के आधार पर ग्रहों को प्राप्त होने वाला बल अयन बल कहलाता है।
उत्तरायण
(लगभग 14 जनवरी से 16 जुलाई)
सूर्य
मंगल
गुरु
शुक्र
इन ग्रहों को अपेक्षाकृत अधिक अयन बल प्राप्त होता है।
दक्षिणायन
(लगभग 16 जुलाई से 14 जनवरी)
चन्द्र
बुध
शनि
इन ग्रहों को अपेक्षाकृत अधिक अयन बल प्राप्त होता है।
उदाहरण
यदि जन्म 20 मई को हुआ—
तो सूर्य, गुरु, शुक्र और मंगल को अच्छा अयन बल प्राप्त होगा।
6. युद्ध बल (Yuddha Bala)
जब दो ताराग्रह (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) एक-दूसरे के अत्यन्त निकट आ जाते हैं, तो ग्रह युद्ध (Graha Yuddha) होता है।
जिस ग्रह की स्थिति अधिक प्रभावी होती है, वही युद्ध में विजयी होकर अधिक बल प्राप्त करता है।
ग्रह युद्ध में सम्मिलित ग्रह
मंगल
बुध
गुरु
शुक्र
शनि
ग्रह युद्ध में सम्मिलित नहीं होते
सूर्य
चन्द्र
राहु
केतु
उदाहरण
यदि शुक्र और बुध के देशांतर में अत्यल्प अंतर हो, तो ग्रह युद्ध होगा। यदि शुक्र विजयी हुआ, तो उसे युद्ध बल मिलेगा और बुध अपेक्षाकृत निर्बल माना जाएगा।
काल बल का फलादेश में महत्व
यदि किसी ग्रह को काल बल अधिक प्राप्त हो—
वह अपनी दशा में श्रेष्ठ फल देता है।
उसका कारकत्व प्रबल हो जाता है।
ग्रह कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर परिणाम दे सकता है।
यदि काल बल कम हो—
ग्रह के शुभ फल कम हो सकते हैं।
दशा में अपेक्षित परिणाम मिलने में विलम्ब या कमी हो सकती है।

काल बल का व्यावहारिक उदाहरण
मान लीजिए किसी जातक का जन्म:
समय: रात्रि 10:15 बजे
तिथि: शुक्ल एकादशी
वार: शुक्रवार
मास: वैशाख
अयन: उत्तरायण
तो—
नतोन्नत बल: चन्द्र, मंगल और शुक्र को लाभ।
पक्ष बल: चन्द्र, गुरु और शुक्र को अधिक बल।
दिन बल: शुक्रवार होने से शुक्र को अतिरिक्त बल।
अयन बल: उत्तरायण होने से सूर्य, मंगल, गुरु और शुक्र को लाभ।
इस प्रकार इस जन्म में शुक्र को अनेक स्रोतों से काल बल प्राप्त हो रहा है, इसलिए यदि शुक्र अन्य प्रकार से भी बलवान हो (उच्च, स्वराशि, शुभ दृष्टि आदि), तो वह अपनी दशा-अन्तर्दशा में अत्यंत प्रभावशाली शुभ फल देने में सक्षम होगा।
निष्कर्ष
काल बल यह दर्शाता है कि जन्म का समय ग्रहों की शक्ति को किस प्रकार प्रभावित करता है। किसी ग्रह का समुचित फलादेश करने के लिए केवल राशि, भाव या दृष्टि पर्याप्त नहीं होती; उसके काल बल, स्थान बल, दिग्बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल और दृष्टि बल—इन सभी षड्बलों का संयुक्त विचार करना आवश्यक है।

Our Team

  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer