नमस्कार।
वैदिक एस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
सर्वप्रथम हमारे समस्त दर्शकों को आशुतोष भगवान शिव के परम् प्रिय श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएं।
शिवमहापुराण में श्रावण मास के महत्व को लोक कल्याण हेतु महर्षि वेदव्यास जी ने विस्तार से बताया है। श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना का फल हजारों गुणा अधिक होता है। अतः विशेष रूप से शिव पूजन हेतु श्रावण माह का महत्व है। पुराणों के अनुसार श्रावण मास में ही देवताओं और दैत्यों ने मिलकर भगवान विष्णु की आज्ञा से समुद्र मंथन किया था। समुद्र मंथन के फलस्वरूप चौदह दिव्य रत्न प्राप्त हुए।
लक्ष्मी: कौस्तुभ पारिजातक सुरा धन्वन्तरिश्चन्द्रमा:।
गाव: कामदुहा सुरेश्वरगजो रम्भादिदेवांगना:।
अश्व: सप्तमुखो विषं हरिधनु: शंखोमृतं चाम्बुधे:।
रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्यात्सदा मंगलम।
समुद्र मंथन से प्राप्त होने वाले चौदह रत्नों में सर्व प्रथम कालकूट विष निकला, जिसके भयंकर प्रभाव से समस्त संसार के प्राणी त्राहि त्राहि कर उठे। तब समस्त देवताओं और दैत्यों ने भगवान शिव की आराधना की, और त्रिलोकी की रक्षा हेतु निवेदन किया। भगवान शिव ने दिव्य राम नाम से सम्पुटित कर समुद्र मंथन से निकले हुए उस भयंकर कालकूट विष को अपने कण्ठ में धारण कर समस्त प्राणियों की रक्षा की। उसी दिन से भगवान शिव का एक नाम नीलकण्ठ पड़ा। मान्यताओं के अनुसार नीलकंठ भगवान के कंठ में गरल के ताप को कम करने हेतु समस्त देवताओं ने अनेक औषधि मिश्रित जल, अनेक फलों के रस एवं गौ माता के दूध से महादेव का अभिषेक किया। तभी से श्रावण मास में भगवान शिव के अभिषेक का विशेष महत्व होता है। उसमें भी यदि सोमवार को रुद्राभिषेक किया जाए तो यह विशेष फलदायी होता है।
माता सती के देहत्याग के उपरांत जगतजननी पराम्बा पराशक्ति ने पर्वत राज हिमालय और माता मैना देवी के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु मां पार्वती ने श्रावण मास के प्रथम सोमवार से ही व्रत धारण कर भगवान शिव की दिव्य आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ही भगवान शिव ने पार्वती जी को अर्धांगिनी रूप में स्वीकार किया। और आशीर्वाद भी दिया कि जो भी अविवाहित कन्या भक्ति भाव से श्रावण मास के प्रथम सोमवार से प्रारंभ कर सोलह सोमवार के व्रत धारण करेगी उसे भगवान शिव के आशीर्वाद से मनोवांछित वर की प्राप्ति होगी।तभी से सोलह सोमवार व्रत की विधि प्रचलित हुई।
तथा जो सद्गृहस्थ श्रावण मास के सभी सोमवारों को व्रत धारण कर भगवान शिव की आराधना करते हैं उन्हें गृहस्थ आश्रम के समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।
कल 6 जून 2020 को श्रावण मास के कृष्ण पक्ष का प्रथम सोमवार है। अतः श्रावण सोमवार की व्रत विधि आदि जानने हेतु आप वीडियो को पूरा देखें और यदि आपने अभी तक हमारा यह वैदिक एस्ट्रो केयर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो अवश्य सब्सक्राइब करें, और साथ ही नए नोटिफिकेशन की जानकारी हेतु वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के पंचाग परम्परा अनुसार, सावन महीने की शुरुआत 5 जुलाई 2020 प्रातःकाल 10 बजकर 15 मिनट से होगी। जबकि यह तिथि अगले दिन 6 जुलाई को 9 बजकर 25 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि, 5 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा है। अतः सावन प्रतिपदा सोमवार को मानी जाएगी। इसी प्रकार सावन महीने का समापन 3 अगस्त को है। इस दिन रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाएगा।
पंचांग के अनुसार, इस बार सावन महीने में 5 सोमवार है। इस महीने की शुरुआत सोमवार 6 जुलाई से हो रही है। जबकि समापन सोमवार 3 अगस्त को सावन पूर्णिमा के दिन होगा। इससे पहले 2017 में सावन महीने में 5 सोमवार पड़े थे।
पहला सावन सोमवार व्रत 06 जुलाई 2020 को है
दूसरा सावन सोमवार व्रत 13 जुलाई 2020 को है
तीसरा सावन सोमवार व्रत 20 जुलाई 2020 को है
चौथा सावन सोमवार व्रत 27 जुलाई 2020 को है
पांचवां और अंतिम सावन सोमवार व्रत 03 अगस्त 2020 को है
इसके अतिरिक्त सावन के महीने में ही मंगला गौरी का व्रत मनाया जाता है। इस प्रकार हर मंगलवार को मंगला गौरी व्रत मनाया जाएगा। इस दिन माता पार्वती की पूजा-उपासना करने का विधान है। जबकि इस महीने में कुछ अन्य महत्वपूर्ण पर्व त्योहार भी पड़ रहे हैं, जिनमें
7 जुलाई को मंगला गौरी व्रत है। 10 जुलाई को मोनी पंचमी है। पुनः 14 जुलाई को मंगला गौरी व्रत है।
फिर 16 जुलाई को एकादशी है। 18 जुलाई को प्रदोष व्रत है। 20 जुलाई को सोमवती अमावस्या है।
23 जुलाई को हरियाली तीज है। 25 जुलाई को नागपंचमी है। और अंत में 3 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षाबंधन का पर्व है।
भगवान शिव की प्रसन्नता हेतु रखे जाने वाले श्रावण सोमवार व्रत की विधि का अनुपालन करना अति आवश्यक होता है। अतः व्रती को चाहिए कि प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व जगकर स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें। आचमन देहशुद्धि भूमि पूजन धूप दीप प्रज्वलित कर भगवान सूर्य को पूर्वाभिमुख हो अर्घ्य प्रदान करें। ततपश्चात व्रत का संकल्प लें और शिव मंदिर जाकर दूध दही घी शहद शक्कर पंचामृत से शिवलिंग को स्नान करवा कर पुनः शुद्ध जल से शुद्धोदकस्नान करवाएं। वस्त्र उपवस्त्र चढ़ाकर बेलपत्र आक शमी पत्र फूल, माला आदि से पूजन करें। धूप दीप प्रज्वलित कर भगवान शिव की आराधना करें। ततपश्चात नैवेद्य आदि का भाव से भोग लगाएं। एवं भगवान शिव की आरती कर, स्तोत्र आदि का पाठ कर प्रार्थना करें। पूरे दिन उपवास रखकर सन्ध्या समय फिर से भगवान का पंचोपचार पूजन कर आरती उतारें, भोग लगाएं और सभी को प्रसाद वितरण कर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।
श्रावण मास में भगवान शिव की वैदिक विधि द्वारा विशेष आराधना, रुद्राभिषेक हेतु आप हमसे भी सम्पर्क कर सकते हैं।
वैदिक एस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है। नमस्कार
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें