षड्बल के छः मुख्य बलों के अंतर्गत आने वाले सभी उपबलों के नाम इस प्रकार हैं।
पाराशरी परंपरा में विशेष रूप से स्थान बल के 5 और काल बल के 9 अंग माने जाते हैं।
१. स्थान बल — ५ उपबल
उच्च बल — Uccha Bala
सप्तवर्गज बल — Saptavargaja Bala
ओज-युग्म राशि-अंश बल — Ojha-Yugma Bala
केन्द्रादि बल — Kendradi Bala
द्रेष्काण बल — Drekkana Bala
२. दिग्बल — कोई पृथक उपबल नहीं
दिग्बल स्वयं एक स्वतंत्र बल है। ग्रह की दिशात्मक स्थिति के अनुसार इसकी गणना होती है।
३. काल बल — ९ उपबल
पाराशरी षड्बल-गणना में कालबल के अंतर्गत ये अंग आते हैं—
नाथोन्नत बल — Natonnata Bala
पक्ष बल — Paksha Bala
त्रिभाग बल — Tribhaga Bala
वर्ष बल — Varsha/Abda Bala
मास बल — Masa Bala
वार बल — Vara/Dina Bala
होरा बल — Hora Bala
अयन बल — Ayana Bala
युद्ध बल — Yuddha Bala
ध्यान दें कि वर्ष–मास–वार–होरा को कई ग्रंथ/सॉफ्टवेयर एक संयुक्त खंड Abda-Masa-Dina-Hora Bala के रूप में भी प्रदर्शित करते हैं; इसलिए अलग-अलग पुस्तकों में उपबलों की सूची 6, 8 या 9 शीर्षकों में दिखाई दे सकती है। पाराशरी गणना में युद्धबल को कालबल के योग में शामिल किया जाता है।
४. चेष्टा बल — कोई पृथक उपबल नहीं
चेष्टा बल ग्रह की गति, वक्रीत्व तथा गति की अवस्था के आधार पर निर्धारित होता है।
५. नैसर्गिक बल — कोई पृथक उपबल नहीं
नैसर्गिक बल ग्रह की स्वाभाविक शक्ति है। सात ग्रहों के लिए इसका स्थिर मान निर्धारित है।
६. दृग्बल — कोई पृथक उपबल नहीं
दृग्बल अन्य ग्रहों से प्राप्त शुभ अथवा अशुभ दृष्टि के आधार पर निर्धारित होता है।
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