बजरंग बाण पाठ से दोष निवारण एवं सिद्धि विधि
जन्मकुंडली अथवा वास्तु दोष के कारण जीवन में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में वास्तुदोष शांति करवाकर घर में पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके साथ यदि प्रतिदिन प्रातः एवं सायं बजरंग बाण का पाठ किया जाए, तो घर में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और वास्तुदोष स्वतः दूर होने लगते हैं।
मांगलिक दोष, राहु-केतु और बजरंग बाण
यदि जन्मकुंडली में मांगलिक दोष के कारण विवाह, कार्य या अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा आ रही हो, तो प्रत्येक मंगलवार संकल्प लेकर बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से मांगलिक दोष का प्रभाव शांत होता है।
इसके अतिरिक्त, राहु या केतु की महादशा चल रही हो, तो उस समय भी बजरंग बाण का नियमित पाठ अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। यह ग्रहजनित बाधाओं को कम कर मन को स्थिरता एवं बल प्रदान करता है।
बजरंग बाण पाठ में आवश्यक सावधानियाँ
यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है कि—
किसी को नीचा दिखाने,
किसी को हानि पहुँचाने,
या किसी प्रकार की नकारात्मक भावना से कभी भी बजरंग बाण का पाठ न करें।
इसी प्रकार किसी अनैतिक कार्य को सिद्ध करने अथवा विवाद में विजय प्राप्त करने की भावना से भी इसका पाठ नहीं करना चाहिए।
यद्यपि बजरंग बाण अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि इसका प्रयोग निरर्थक या अनुचित कार्यों के लिए किया जाए।
भक्ति भाव से बजरंग बाण का महत्व
यदि सच्ची श्रद्धा, विश्वास और नियमितता के साथ बजरंग बाण का पाठ किया जाए, तो यह एक कल्पवृक्ष के समान है, जो स्वयं ही भक्त की आवश्यकताओं को पूर्ण कर देता है। इसके लिए केवल आवश्यकता होती है—
भक्ति भाव, संयम और विधि-विधान का पालन।
बजरंग बाण सिद्ध करने की शास्त्रसम्मत विधि
बजरंग बाण को सिद्ध करने हेतु निम्न विधि अपनानी चाहिए—
मंगलवार की मध्यरात्रि को यह साधना प्रारंभ करें।
सबसे पहले पूर्व दिशा में एक चौकी स्थापित करें।
चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाएँ।
एक भोजपत्र लें और उस पर लाल चंदन या अष्टगंध से हनुमान यंत्र बनाएं।
यंत्र पर यह मंत्र लिखें—
“ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्”
इस यंत्र को प्रतिष्ठित कर चौकी पर स्थापित करें।
चौकी के दाईं ओर घी का दीपक प्रज्वलित करें।
कुशा के आसन पर बैठकर लाल वस्त्र धारण करें।
अब बजरंग बाण का 11 बार पाठ करें।
पाठ पूर्ण होने के बाद भोजपत्र को उठाकर घर के मंदिर में स्थापित कर दें।
प्रतिदिन उसकी विधिवत पूजा करें।
👉 इस प्रयोग को लगातार 41 मंगलवार करने से बजरंग बाण सिद्ध हो जाता है।
निष्कर्ष
बजरंग बाण श्रद्धा, संयम और शुद्ध भावना से किया गया ऐसा साधन है, जो
वास्तुदोष, ग्रहदोष और जीवन की अनेक बाधाओं को दूर करने में सक्षम है।
हनुमान जी की कृपा से साधक के जीवन में बल, बुद्धि और सफलता का संचार होता है।
🙏 जय बजरंग बली 🙏
" दोहा "
"निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।"
"तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥"
"चौपाई"
जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महासुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु महि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाई लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा।।
बाग़ उजारि सिन्धु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा।।
अक्षयकुमार को मारि संहारा। लूम लपेट लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर में भई।।
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होय दुख हरहु निपाता।।
जै गिरिधर जै जै सुखसागर। सुर समूह समरथ भटनागर।।
ॐ हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहिंं मारु बज्र की कीले।।
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो।।
ऊँकार हुंकार प्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ऊँ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा।।
सत्य होहु हरि शपथ पाय के। रामदूत धरु मारु जाय के।।
जय जय जय हनुमन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा।।
वन उपवन, मग गिरिगृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पांय परों कर ज़ोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।
जय अंजनिकुमार बलवन्ता। शंकरसुवन वीर हनुमन्ता।।
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर।।
इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की।।
जनकसुता हरिदास कहावौ। ताकी शपथ विलम्ब न लावो।।
जय जय जय धुनि होत अकाशा। सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा।।
चरण शरण कर ज़ोरि मनावौ। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं।।
उठु उठु चलु तोहि राम दुहाई। पांय परों कर ज़ोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपत चलंता। ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता।।
ऊँ हँ हँ हांक देत कपि चंचल। ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनन्द हमारो।।
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कौन उबारै।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत प्रेत सब काँपै।।
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा।।
"दोहा"
" प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान। "
" तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान।। "

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