॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
विंशांश (D20) वर्ग कुंडली का पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
पाराशरी वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार
कक्षा में पढ़ाने हेतु क्रमबद्ध, विस्तृत एवं उदाहरण सहित अध्ययन सामग्री
मुख्य विषय: विंशांश की परिभाषा, निर्माण विधि, ग्रहों की स्थापना, विंशांश लग्न, देवता, आध्यात्मिक प्रवृत्ति, साधना, उपासना, मंत्रसिद्धि, गुरु-कृपा, आध्यात्मिक उन्नति तथा फलादेश की शास्त्रीय पद्धति।
अध्याय 1 : विंशांश (D20) वर्ग कुंडली का परिचय
1.1 विंशांश क्या है?
पाराशरी वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए षोडशवर्ग अर्थात् सोलह प्रमुख वर्ग कुंडलियों का वर्णन मिलता है।
इन्हीं षोडशवर्गों में विंशांश (D20) एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।
विंशांश का शाब्दिक अर्थ है—
विंश = बीस
अंश = भाग
अर्थात् किसी राशि को बीस समान भागों में विभाजित करने से प्राप्त प्रत्येक भाग विंशांश कहलाता है।
ज्योतिषीय दृष्टि से विंशांश कुंडली का प्रमुख संबंध जातक की धार्मिक प्रवृत्ति, उपासना, आध्यात्मिक साधना और साधना में प्रगति से माना जाता है।
पाराशरी वर्ग-विचार में विंशांश का संबंध विशेष रूप से उपासना से है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए।
धर्म, अध्यात्म, मंत्रसाधना और मोक्ष परस्पर संबंधित अवश्य हैं, किंतु ज्योतिषीय दृष्टि से ये पूर्णतः एक ही विषय नहीं हैं।
उदाहरण के लिए—
नवम भाव धर्म, भाग्य, गुरु और परंपरा का प्रमुख भाव है।
पंचम भाव मंत्र, विद्या, बुद्धि और पूर्वपुण्य से संबंधित है।
द्वादश भाव त्याग, एकांत, व्यय और मोक्ष से संबंधित माना जाता है।
विंशांश वर्ग कुंडली विशेष रूप से उपासना और आध्यात्मिक साधना की सूक्ष्म प्रवृत्तियों का अध्ययन करने के लिए प्रयुक्त होती है।
अतः केवल विंशांश के आधार पर किसी जातक की संपूर्ण आध्यात्मिक स्थिति का अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
अध्याय 2 : विंशांश का गणितीय निर्माण
2.1 एक राशि में कितने अंश होते हैं?
ज्योतिष में संपूर्ण राशिचक्र 360° का होता है।
इसमें कुल बारह राशियाँ होती हैं।
इसलिए प्रत्येक राशि का विस्तार—
360° ÷ 12 = 30°
अर्थात् प्रत्येक राशि 30° की होती है।
अब विंशांश बनाने के लिए एक राशि को बीस समान भागों में विभाजित किया जाता है।
30° ÷ 20 = 1°30′
अतः एक विंशांश का विस्तार 1°30′ अर्थात् एक अंश तीस कला होता है।
2.2 विंशांश के बीस विभाग
विंशांश क्रमांक
राशि के भीतर अंश सीमा
1
0°00′ से 1°30′
2
1°30′ से 3°00′
3
3°00′ से 4°30′
4
4°30′ से 6°00′
5
6°00′ से 7°30′
6
7°30′ से 9°00′
7
9°00′ से 10°30′
8
10°30′ से 12°00′
9
12°00′ से 13°30′
10
13°30′ से 15°00′
11
15°00′ से 16°30′
12
16°30′ से 18°00′
13
18°00′ से 19°30′
14
19°30′ से 21°00′
15
21°00′ से 22°30′
16
22°30′ से 24°00′
17
24°00′ से 25°30′
18
25°30′ से 27°00′
19
27°00′ से 28°30′
20
28°30′ से 30°00′
विशेष नियम: किसी विभाग का प्रारंभिक अंश उसी विभाग में सम्मिलित होगा तथा अंतिम अंश अगले विभाग में जाएगा।
उदाहरण—
यदि कोई ग्रह 4°30′ पर है, तो वह तीसरे में नहीं, बल्कि चौथे विंशांश में होगा।
अध्याय 3 : विंशांश में ग्रहों की राशि निर्धारण विधि
यह विंशांश निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
विद्यार्थियों को विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि विंशांश में ग्रहों की स्थापना केवल उनके अंशों से नहीं होती।
इसके लिए जन्मराशि की प्रकृति भी देखनी होती है।
3.1 राशियों के तीन स्वभाव
पाराशरी ज्योतिष में राशियाँ तीन प्रकार की होती हैं।
1. चर राशियाँ
मेष, कर्क, तुला और मकर।
2. स्थिर राशियाँ
वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ।
3. द्विस्वभाव राशियाँ
मिथुन, कन्या, धनु और मीन।
3.2 विंशांश में राशि गणना का पाराशरी नियम
विंशांश में राशि निर्धारण के लिए निम्नलिखित नियम प्रयुक्त होता है।
चर राशियों के लिए मेष से गणना प्रारंभ होती है।
स्थिर राशियों के लिए धनु से गणना प्रारंभ होती है।
द्विस्वभाव राशियों के लिए सिंह से गणना प्रारंभ होती है।
यह नियम विंशांश के पाराशरी निर्माण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
जन्मराशि का स्वभाव
गणना प्रारंभ करने की राशि
चर
मेष
स्थिर
धनु
द्विस्वभाव
सिंह
ध्यान दें कि यह नियम नवांश अथवा दशमांश के निर्माण नियम से अलग है।
अध्याय 4 : विंशांश की संपूर्ण राशि-सारणी
विंशांश के प्रत्येक भाग का राशि निर्धारण निम्न प्रकार किया जाता है।
विंशांश
चर राशि में
स्थिर राशि में
द्विस्वभाव राशि में
1
मेष
धनु
सिंह
2
वृषभ
मकर
कन्या
3
मिथुन
कुंभ
तुला
4
कर्क
मीन
वृश्चिक
5
सिंह
मेष
धनु
6
कन्या
वृषभ
मकर
7
तुला
मिथुन
कुंभ
8
वृश्चिक
कर्क
मीन
9
धनु
सिंह
मेष
10
मकर
कन्या
वृषभ
11
कुंभ
तुला
मिथुन
12
मीन
वृश्चिक
कर्क
13
मेष
धनु
सिंह
14
वृषभ
मकर
कन्या
15
मिथुन
कुंभ
तुला
16
कर्क
मीन
वृश्चिक
17
सिंह
मेष
धनु
18
कन्या
वृषभ
मकर
19
तुला
मिथुन
कुंभ
20
वृश्चिक
कर्क
मीन
इस सारणी की विशेषता
बीस विंशांश होने के कारण बारह राशियों का क्रम पूरा होने के बाद पुनः पहली राशि से गणना प्रारंभ हो जाती है।
इसलिए प्रथम और तेरहवें विंशांश की राशि समान होती है।
इसी प्रकार दूसरे और चौदहवें तथा आठवें और बीसवें विंशांश की राशियाँ समान होती हैं।
अध्याय 5 : विंशांश में ग्रह स्थापना के उदाहरण
अब हम गणितीय उदाहरणों से समझेंगे कि किसी ग्रह को D20 में किस राशि में स्थापित किया जाएगा।
उदाहरण 1 : सूर्य मेष राशि में 10°20′ पर है
प्रथम चरण : जन्मराशि देखें।
सूर्य मेष राशि में है।
मेष चर राशि है।
इसलिए गणना मेष से प्रारंभ होगी।
द्वितीय चरण : विंशांश क्रमांक निकालें।
सूर्य का अंश = 10°20′
इसे कला में बदलें—
10 × 60 + 20 = 620 कला
एक विंशांश = 90 कला
620 ÷ 90 = 6 पूर्ण भाग तथा 80 कला शेष।
अतः सूर्य सातवें विंशांश में है।
तृतीय चरण : सातवें विंशांश की राशि ज्ञात करें।
चर राशि में क्रम होगा—
मेष
वृषभ
मिथुन
कर्क
सिंह
कन्या
तुला
निष्कर्ष : सूर्य D20 में तुला राशि में स्थापित होगा।
यहाँ ध्यान रखें कि सूर्य जन्मकुंडली में मेष राशि में उच्च का होने पर भी D20 में तुला राशि प्राप्त कर सकता है।
इससे स्पष्ट होता है कि जन्मकुंडली और वर्ग कुंडली में ग्रहों की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
उदाहरण 2 : चंद्रमा वृषभ राशि में 17°45′ पर है
वृषभ स्थिर राशि है।
इसलिए विंशांश गणना धनु से प्रारंभ होगी।
चंद्रमा का अंश = 17°45′
कला में—
17 × 60 + 45 = 1065 कला।
1065 ÷ 90 = 11 पूर्ण भाग तथा 75 कला शेष।
अतः चंद्रमा बारहवें विंशांश में है।
स्थिर राशि में धनु से गणना—
धनु
मकर
कुंभ
मीन
मेष
वृषभ
मिथुन
कर्क
सिंह
कन्या
तुला
वृश्चिक
निष्कर्ष : चंद्रमा D20 में वृश्चिक राशि में होगा।
उदाहरण 3 : बृहस्पति मिथुन राशि में 22°10′ पर है
मिथुन द्विस्वभाव राशि है।
इसलिए गणना सिंह से प्रारंभ होगी।
बृहस्पति का अंश = 22°10′
यह पंद्रहवें विंशांश में आता है।
द्विस्वभाव राशि में सिंह से गणना प्रारंभ करने पर—
13वाँ विंशांश = सिंह
14वाँ विंशांश = कन्या
15वाँ विंशांश = तुला
अतः बृहस्पति D20 में तुला राशि में स्थापित होगा।
अध्याय 6 : विंशांश लग्न का निर्धारण
जिस प्रकार जन्मकुंडली में लग्न महत्त्वपूर्ण होता है, उसी प्रकार विंशांश में भी लग्न का विशेष महत्त्व है।
D20 लग्न से जातक की उपासना संबंधी प्रवृत्तियों तथा आध्यात्मिक साधना के प्रति दृष्टिकोण का अध्ययन किया जाता है।
उदाहरण
मान लीजिए किसी जातक का जन्मलग्न—
कन्या राशि 8°15′ है।
अब D20 लग्न निकालते हैं।
प्रथम चरण
कन्या द्विस्वभाव राशि है।
इसलिए गणना सिंह से प्रारंभ होगी।
द्वितीय चरण
8°15′ छठे विंशांश में आता है।
तृतीय चरण
सिंह से छठी राशि गिनें—
सिंह
कन्या
तुला
वृश्चिक
धनु
मकर
अतः जातक का विंशांश लग्न मकर होगा।
महत्त्वपूर्ण सावधानी
विंशांश का प्रत्येक भाग केवल 1°30′ का होता है।
इस कारण जन्मसमय में थोड़ी त्रुटि होने पर भी D20 लग्न बदल सकता है।
विशेषकर जब जन्मलग्न किसी विंशांश की सीमा के निकट हो, तब जन्मसमय की शुद्धता की जाँच आवश्यक है।
अध्याय 7 : विंशांश के अधिदेवता
पाराशरी वर्ग-विचार में विंशांश के बीस विभागों के लिए देवता-संज्ञाओं का भी वर्णन मिलता है।
प्रचलित पाराशरी पाठ-परंपरा में विंशांश के देवताओं के तीन क्रम बताए जाते हैं, जो चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों के अनुसार लागू होते हैं।
इनमें काली, गौरी, जया, लक्ष्मी, विजया, विमला, सती, तारा, ज्वालामुखी, श्वेता, ललिता, बगला, प्रत्यंगिरा, शची, रौद्री, भवानी, वरदा, जया, त्रिपुरा तथा सुमुखी जैसे नाम मिलते हैं।
यहाँ एक पाठ-संबंधी सावधानी आवश्यक है। विंशांश देवताओं के नामों, पाठभेदों और क्रम के विषय में विभिन्न प्रकाशित संस्करणों में अंतर मिल सकता है। अतः किसी विशिष्ट देवता का अंतिम निर्धारण करते समय प्रयुक्त बृहत्पाराशरहोराशास्त्र के प्रमाणित संस्करण से मूल श्लोक और क्रम का मिलान करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त विंशांश के अधिदेवता और किसी व्यक्ति के इष्टदेवता को अनिवार्य रूप से समान नहीं मानना चाहिए।
इष्टदेवता के निर्धारण की अन्य ज्योतिषीय पद्धतियाँ भी हैं।
विशेषतः जैमिनीय परंपरा में आत्मकारक, कारकांश और उससे द्वादश स्थान का विचार किया जाता है।
इसलिए केवल D20 में किसी देवता-संज्ञा के आधार पर किसी व्यक्ति को विशेष मंत्र की दीक्षा देना उचित नहीं है।
अध्याय 8 : विंशांश कुंडली का फलादेश कैसे करें?
अब हम विंशांश के वास्तविक विश्लेषण की ओर बढ़ते हैं।
D20 का फलादेश करते समय निम्नलिखित आधारों को क्रमशः देखना चाहिए।
जन्मकुंडली में धर्म और साधना संबंधी योग।
जन्मकुंडली का पंचम और नवम भाव।
जन्मकुंडली का द्वादश भाव।
विंशांश लग्न।
विंशांश लग्नेश।
विंशांश का पंचम भाव और पंचमेश।
विंशांश का नवम भाव और नवमेश।
विंशांश का द्वादश भाव और द्वादशेश।
बृहस्पति, सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल और शनि की स्थिति।
ग्रहों की दशा और अंतर्दशा।
यह क्रम एक व्यवस्थित व्यावहारिक अध्ययन-पद्धति है। इसे मूल ग्रंथ का शब्दशः फलादेश-सूत्र नहीं समझना चाहिए।
अध्याय 9 : विंशांश लग्न का विश्लेषण
विंशांश लग्न जातक की साधना संबंधी प्रवृत्ति का प्रमुख आधार माना जा सकता है।
इससे निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जाता है—
जातक का उपासना की ओर स्वाभाविक आकर्षण।
साधना के प्रति मानसिक दृष्टिकोण।
धार्मिक अनुशासन।
आध्यात्मिक अभ्यास की निरंतरता।
व्यक्तिगत साधना-पद्धति के प्रति रुचि।
9.1 अग्नितत्त्व राशियों में विंशांश लग्न
मेष, सिंह और धनु अग्नितत्त्व राशियाँ हैं।
ऐसी स्थिति में परंपरागत राशि-स्वभाव के आधार पर जातक में उत्साह, संकल्प, नेतृत्व तथा सक्रिय उपासना की प्रवृत्ति पर विचार किया जा सकता है।
मंगल, सूर्य और बृहस्पति की स्थिति से इस प्रवृत्ति की पुष्टि करनी चाहिए।
9.2 पृथ्वीतत्त्व राशियों में विंशांश लग्न
वृषभ, कन्या और मकर पृथ्वीतत्त्व राशियाँ हैं।
इनसे नियमित अभ्यास, विधि-विधान, अनुशासन और व्यवस्थित पूजा-पद्धति की रुचि का अनुमान लगाया जा सकता है।
9.3 वायुतत्त्व राशियों में विंशांश लग्न
मिथुन, तुला और कुंभ वायुतत्त्व राशियाँ हैं।
इन राशियों से आध्यात्मिक विषयों के बौद्धिक अध्ययन, शास्त्रचर्चा और विचारप्रधान साधना की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।
9.4 जलतत्त्व राशियों में विंशांश लग्न
कर्क, वृश्चिक और मीन जलतत्त्व राशियाँ हैं।
इनसे भावनात्मक भक्ति, अंतर्मुखता, ध्यान और उपासना के प्रति संवेदनशीलता का विचार किया जा सकता है।
ध्यान दें: ये राशियों के सामान्य तात्त्विक गुणों से निकाले गए व्याख्यात्मक संकेत हैं, न कि विंशांश के लिए स्वतंत्र रूप से निर्दिष्ट निश्चित पाराशरी फल।
अध्याय 10 : विंशांश लग्नेश का विश्लेषण
विंशांश लग्नेश का बल और स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
लग्नेश के अध्ययन में निम्नलिखित बातें देखें।
1. लग्नेश की राशि
क्या लग्नेश अपनी राशि, उच्च राशि, मित्र राशि, सम राशि, शत्रु राशि अथवा नीच राशि में है?
2. लग्नेश का भाव
लग्नेश किस भाव में स्थित है?
3. लग्नेश का संबंध
क्या लग्नेश पंचमेश, नवमेश अथवा द्वादशेश से संबंधित है?
4. शुभ और पाप प्रभाव
लग्नेश पर किन ग्रहों की युति अथवा दृष्टि है?
5. जन्मकुंडली से पुष्टि
जन्मकुंडली में वही ग्रह किस स्थिति में है?
उदाहरण
यदि D20 में लग्नेश नवम भाव में स्थित हो और नवमेश से शुभ संबंध बनाए, तो परंपरागत भावार्थों के आधार पर जातक में गुरु, धर्म और साधना के प्रति रुचि का संकेत माना जा सकता है।
यदि यही योग जन्मकुंडली के पंचम और नवम भाव से भी समर्थित हो, तो इस निष्कर्ष को अधिक महत्त्व दिया जा सकता है।
लेकिन इससे किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से सिद्ध पुरुष घोषित नहीं किया जा सकता।
अध्याय 11 : विंशांश के बारह भावों का विस्तृत विश्लेषण
यह अध्याय कक्षा में फलादेश सिखाने के लिए विशेष उपयोगी है।
नीचे दिए गए भावार्थ सामान्य पाराशरी भाव-सिद्धांतों को उपासना-विषयक D20 पर लागू करके समझाए गए हैं।
इन्हें स्वतंत्र, निश्चित अथवा शाब्दिक शास्त्रीय भविष्यवाणियाँ नहीं समझना चाहिए।
प्रथम भाव : साधक का व्यक्तित्व
प्रथम भाव से साधना के प्रति जातक का व्यक्तिगत दृष्टिकोण समझा जाता है।
इससे विचार करें—
साधना में रुचि।
आत्मानुशासन।
आध्यात्मिक अभ्यास के प्रति सक्रियता।
उपासना की व्यक्तिगत शैली।
लग्न और लग्नेश की शक्ति इस अध्ययन में प्रमुख होगी।
द्वितीय भाव : मंत्रोच्चारण और वाणी
द्वितीय भाव वाणी का भाव है।
D20 में इसका उपयोग मंत्रोच्चारण, स्तोत्रपाठ और मौखिक धार्मिक अध्ययन की प्रवृत्ति समझने के लिए किया जा सकता है।
बुध तथा बृहस्पति का संबंध यहाँ विशेष रूप से देखा जा सकता है।
तृतीय भाव : साधना में पुरुषार्थ
तृतीय भाव पराक्रम, प्रयास और अभ्यास का भाव है।
D20 में यह नियमित अभ्यास, जप की निरंतरता तथा साधना में व्यक्तिगत प्रयास का संकेत दे सकता है।
मंगल और तृतीयेश की स्थिति देखें।
चतुर्थ भाव : आंतरिक शांति
चतुर्थ भाव मन के सुख, स्थिरता और आंतरिक संतोष से संबंधित है।
इससे पूजा, ध्यान अथवा भक्ति में भावनात्मक स्थिरता का अध्ययन किया जा सकता है।
चंद्रमा और चतुर्थेश महत्त्वपूर्ण होंगे।
पंचम भाव : मंत्रविद्या और उपासना
विंशांश के अध्ययन में पंचम भाव अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सामान्य पाराशरी भाव-विचार में पंचम भाव बुद्धि, विद्या, मंत्र और पूर्वपुण्य से संबंधित माना जाता है।
D20 में पंचम भाव से विचार करें—
मंत्राध्ययन।
जप में रुचि।
उपासना की बौद्धिक समझ।
मंत्रपरंपरा से संबंध।
साधना के अभ्यास में एकाग्रता।
पंचमेश और बृहस्पति की स्थिति का विशेष अध्ययन करें।
मंत्रसिद्धि का निश्चित निर्णय केवल पंचम भाव के आधार पर नहीं किया जा सकता।
षष्ठ भाव : साधना में बाधाएँ
षष्ठ भाव संघर्ष, रोग, ऋण और शत्रु का भाव है।
D20 में इससे साधना के मार्ग में आने वाली व्यावहारिक बाधाओं पर विचार किया जा सकता है।
उदाहरण—
समय का अभाव, अभ्यास में अनियमितता, मानसिक संघर्ष अथवा स्वास्थ्य संबंधी कठिनाई।
यह भी देखना चाहिए कि षष्ठेश और लग्नेश में कैसा संबंध है।
सप्तम भाव : साधना में सहयोग
सप्तम भाव साझेदारी और अन्य व्यक्तियों के साथ संबंधों का भाव है।
D20 में इससे गृहस्थ जीवन और व्यक्तिगत उपासना के बीच सामंजस्य तथा साधना में सहयोग की संभावनाएँ देखी जा सकती हैं।
केवल सप्तम भाव से गुरु का निर्णय करना उचित नहीं है; गुरु-विचार में नवम भाव अधिक महत्त्वपूर्ण है।
अष्टम भाव : गूढ़ साधना और परिवर्तन
अष्टम भाव रहस्य, गूढ़ विषय, दीर्घकालिक परिवर्तन और अप्रत्याशित परिस्थितियों से संबंधित है।
D20 में इससे गूढ़ आध्यात्मिक विषयों, गहन आत्मचिंतन और परिवर्तनकारी अनुभवों की रुचि का अध्ययन किया जा सकता है।
परंतु—
अष्टम भाव में राहु, केतु अथवा शनि होने मात्र से तंत्रसिद्धि, कुंडलिनी जागरण या अलौकिक शक्ति प्राप्त होने की घोषणा नहीं करनी चाहिए।
ऐसे निष्कर्षों के लिए सामान्य ज्योतिषीय संकेत पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
नवम भाव : धर्म, गुरु और आध्यात्मिक परंपरा
नवम भाव धर्म, गुरु, भाग्य, उच्च ज्ञान और परंपरा का प्रमुख भाव है।
D20 में नवम भाव से विचार करें—
गुरु के प्रति श्रद्धा।
आध्यात्मिक परंपरा से संबंध।
शास्त्राध्ययन।
धार्मिक अनुशासन।
उच्च आध्यात्मिक ज्ञान की खोज।
नवमेश तथा बृहस्पति की स्थिति महत्त्वपूर्ण है।
दशम भाव : धर्म का व्यवहार में प्रयोग
दशम भाव कर्म का भाव है।
D20 में इससे यह समझने का प्रयास किया जा सकता है कि जातक अपनी धार्मिक या आध्यात्मिक मान्यताओं को व्यवहार में किस प्रकार लागू करता है।
उदाहरण के लिए—
धार्मिक शिक्षण, सेवा, पूजा-संबंधी कार्य अथवा आध्यात्मिक संस्थाओं में सक्रियता।
हालाँकि किसी व्यक्ति का वास्तविक व्यवसाय निर्धारित करने के लिए जन्मकुंडली और दशमांश (D10) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
एकादश भाव : साधना से प्राप्त संतोष
एकादश भाव लाभ, उपलब्धि और इच्छापूर्ति से संबंधित है।
D20 में इससे धार्मिक समूहों से सहयोग, साधना के उद्देश्य और अभ्यास से प्राप्त व्यक्तिगत संतोष का अध्ययन किया जा सकता है।
द्वादश भाव : त्याग, एकांत और मोक्षाभिमुखता
द्वादश भाव व्यय, शयन, एकांत, त्याग तथा मोक्ष से संबंधित माना जाता है।
D20 में इससे निम्नलिखित विषयों का अध्ययन किया जा सकता है—
एकांत साधना में रुचि।
आश्रम अथवा तीर्थवास की प्रवृत्ति।
ध्यान और आत्मचिंतन।
त्याग और वैराग्य।
आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए समय तथा संसाधनों का समर्पण।
विशेष सावधानी: द्वादश भाव या केतु की स्थिति से किसी व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो चुका है अथवा निश्चित रूप से मोक्ष मिलेगा, ऐसा निर्णय नहीं करना चाहिए।
अध्याय 12 : विंशांश में नवग्रहों का विश्लेषण
अब हम समझेंगे कि D20 में प्रत्येक ग्रह की भूमिका का अध्ययन किस प्रकार किया जा सकता है।
यहाँ ग्रहों के सामान्य पाराशरी कारकत्व को उपासना के विषय से जोड़कर विवेचन किया जा रहा है।
12.1 सूर्य : आत्मबल, तेज और अनुशासन
सूर्य आत्मा, अधिकार, तेज और नेतृत्व का नैसर्गिक कारक है।
D20 में सूर्य से विचार किया जा सकता है—
आत्मानुशासन।
संकल्पशक्ति।
धार्मिक कर्तव्य के प्रति गंभीरता।
सूर्योपासना अथवा वैदिक परंपरा में रुचि।
सूर्य के फल का निर्णय उसकी राशि, भाव, स्वामित्व और अन्य ग्रहों से संबंध देखकर करना चाहिए।
12.2 चंद्रमा : भक्ति और मन की एकाग्रता
चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है।
D20 में चंद्रमा का अध्ययन विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि उपासना में मन की स्थिरता आवश्यक होती है।
शुभ प्रभाव वाला चंद्रमा भक्ति, श्रद्धा और भावनात्मक एकाग्रता का संकेत दे सकता है।
पीड़ित चंद्रमा मानसिक अस्थिरता अथवा अभ्यास में उतार-चढ़ाव की संभावना दिखा सकता है।
परंतु किसी व्यक्ति के वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य का निर्णय ज्योतिष से नहीं करना चाहिए।
12.3 मंगल : साधना का पुरुषार्थ
मंगल ऊर्जा, साहस, पराक्रम और सक्रियता का कारक है।
D20 में मंगल से विचार किया जा सकता है—
कठिन अभ्यास करने की इच्छाशक्ति।
नियमित साधना का पुरुषार्थ।
अनुशासनपूर्ण प्रयास।
चुनौतीपूर्ण धार्मिक व्रतों में रुचि।
मंगल की स्थिति को लग्नेश और पंचमेश से जोड़कर देखें।
12.4 बुध : मंत्र, उच्चारण और शास्त्राध्ययन
बुध बुद्धि, भाषा, गणना और विश्लेषण का कारक है।
D20 में बुध का संबंध निम्नलिखित विषयों से जोड़ा जा सकता है—
मंत्रों के अर्थ का अध्ययन।
संस्कृत भाषा में रुचि।
शास्त्रीय तर्क।
स्तोत्र और मंत्रोच्चारण।
आध्यात्मिक विषयों का अध्ययन और शिक्षण।
यहाँ बुध के साथ पंचम और द्वितीय भाव का संबंध विशेष रूप से उपयोगी है।
12.5 बृहस्पति : गुरु, धर्म और ज्ञान
बृहस्पति D20 के अध्ययन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण नैसर्गिक कारक है।
बृहस्पति धर्म, गुरु, ज्ञान, सदाचार और शास्त्रीय परंपरा का कारक है।
D20 में इससे विचार करें—
गुरु के प्रति श्रद्धा।
धार्मिक ज्ञान।
शास्त्राध्ययन।
सदाचार।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करने की प्रवृत्ति।
बृहस्पति का पंचमेश, नवमेश और लग्नेश से संबंध विशेष रूप से देखें।
12.6 शुक्र : भक्ति का सौंदर्य और समर्पण
शुक्र कला, सौंदर्य, सुख और अनुराग का कारक है।
D20 में शुक्र से संगीतप्रधान भक्ति, स्तुति, सौंदर्यपूर्ण उपासना और भावनात्मक समर्पण की प्रवृत्ति का अध्ययन किया जा सकता है।
लेकिन शुक्र की स्थिति मात्र से किसी विशिष्ट देवी की उपासना निश्चित नहीं की जा सकती।
12.7 शनि : तप, धैर्य और निरंतरता
शनि श्रम, धैर्य, अनुशासन और दीर्घकालिक प्रयास का कारक है।
D20 में शनि से विचार किया जा सकता है—
लंबे समय तक अभ्यास करने की क्षमता।
तप और संयम।
नियमित साधना।
कठिन परिस्थितियों में धैर्य।
शनि का शुभ संबंध निरंतरता का संकेत दे सकता है।
प्रतिकूल संबंध होने पर विलंब अथवा कठिनाई का विचार किया जा सकता है।
12.8 राहु : अपरंपरागत आध्यात्मिक रुचियाँ
राहु का संबंध सामान्यतः असामान्य प्रवृत्तियों, तीव्र इच्छाओं और परंपरा से भिन्न अनुभवों से जोड़ा जाता है।
D20 में राहु से अपरंपरागत धार्मिक विचारों, विदेशी आध्यात्मिक परंपराओं अथवा गूढ़ विषयों में रुचि का अनुमान लगाया जा सकता है।
राहु के आधार पर तंत्रसिद्धि या किसी विशिष्ट गुप्त शक्ति का निर्णय करना उचित नहीं है।
12.9 केतु : वैराग्य और अंतर्मुखता
केतु को अनेक ज्योतिषीय व्याख्याओं में वैराग्य, विरक्ति और मोक्षाभिमुखता से जोड़ा जाता है।
D20 में केतु से विचार किया जा सकता है—
सांसारिक आकर्षणों से दूरी।
एकांत साधना में रुचि।
आत्मचिंतन।
ध्यान की प्रवृत्ति।
त्यागपूर्ण जीवन के प्रति आकर्षण।
लेकिन केतु का बलवान होना अपने आप में आध्यात्मिक सिद्धि का प्रमाण नहीं है।
अध्याय 13 : विंशांश में महत्त्वपूर्ण ग्रह-संबंध
D20 में कुछ ग्रह-संबंधों का अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
13.1 लग्नेश और पंचमेश का संबंध
यह संबंध साधक के व्यक्तित्व तथा मंत्रविद्या के बीच सामंजस्य का संकेत दे सकता है।
यदि दोनों ग्रह बलवान हों और जन्मकुंडली भी समर्थन करे, तो मंत्राध्ययन और नियमित उपासना की प्रवृत्ति पर विचार किया जा सकता है।
13.2 लग्नेश और नवमेश का संबंध
यह संबंध साधक के व्यक्तिगत जीवन तथा धर्म-गुरु परंपरा के बीच सामंजस्य का संकेत दे सकता है।
13.3 पंचमेश और नवमेश का संबंध
पंचम भाव मंत्र और विद्या का तथा नवम भाव धर्म और गुरु का है।
इसलिए दोनों भावेशों का शुभ संबंध मंत्राध्ययन, शास्त्रज्ञान और गुरु-परंपरा के प्रति रुचि का सहायक संकेत माना जा सकता है।
13.4 पंचमेश और द्वादशेश का संबंध
इस संबंध से जप, ध्यान और एकांत उपासना में रुचि का विचार किया जा सकता है।
13.5 बृहस्पति और नवमेश का संबंध
यह धर्म, गुरु और उच्च ज्ञान से जुड़े विषयों का अध्ययन करने में उपयोगी हो सकता है।
13.6 शनि और पंचमेश का संबंध
यह मंत्राभ्यास में अनुशासन, पुनरावृत्ति और दीर्घकालिक प्रयास की संभावना का संकेत दे सकता है।
इन सभी योगों में ग्रहों की शक्ति, स्वामित्व, भावस्थिति और जन्मकुंडली से पुष्टि आवश्यक है।
अध्याय 14 : विंशांश में मंत्रसाधना का विश्लेषण
अब एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न—
क्या D20 देखकर यह जाना जा सकता है कि जातक मंत्रसाधना करेगा या नहीं?
ज्योतिषीय परंपरा के अंतर्गत इसकी संभावित प्रवृत्ति का अध्ययन किया जा सकता है।
इसके लिए क्रमशः निम्नलिखित विषय देखें।
प्रथम चरण : जन्मकुंडली का पंचम भाव
पंचम भाव, पंचमेश और बृहस्पति का अध्ययन करें।
द्वितीय चरण : जन्मकुंडली का नवम भाव
गुरु, धर्म और आध्यात्मिक परंपरा से संबंधित संकेत देखें।
तृतीय चरण : विंशांश लग्न
साधना के प्रति व्यक्तिगत प्रवृत्ति का विचार करें।
चतुर्थ चरण : विंशांश पंचम भाव
मंत्राध्ययन और जप की रुचि का अध्ययन करें।
पंचम चरण : विंशांश नवम भाव
गुरु, दीक्षा-परंपरा और शास्त्रीय मार्गदर्शन से संबंध देखें।
षष्ठ चरण : बुध और बृहस्पति
मंत्रों के अध्ययन, समझ और उच्चारण से संबंधित संकेत देखें।
सप्तम चरण : दशा-अंतर्दशा
संबंधित ग्रहों की दशा में उपासना के प्रति रुचि बढ़ने की पारंपरिक संभावना का विचार करें।
निष्कर्ष: इन संकेतों से साधना की प्रवृत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है; मंत्रसिद्धि की वास्तविक प्राप्ति की पुष्टि नहीं की जा सकती।
अध्याय 15 : विंशांश से गुरु और दीक्षा का विचार
धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में गुरु का महत्त्व अत्यधिक है।
ज्योतिषीय अध्ययन में गुरु-संबंधी विषयों के लिए मुख्यतः नवम भाव तथा बृहस्पति को देखा जाता है।
D20 में निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है।
1. नवम भाव: आध्यात्मिक परंपरा के प्रति दृष्टिकोण।
2. नवमेश: गुरु और धर्म संबंधी विषयों की स्थिति।
3. बृहस्पति: ज्ञान, मार्गदर्शन और शास्त्रपरंपरा।
4. पंचम भाव: मंत्रविद्या और अध्ययन।
5. लग्नेश: साधक की व्यक्तिगत प्रवृत्ति।
उदाहरण
यदि D20 में नवमेश पंचम भाव में हो और बृहस्पति से शुभ संबंध रखता हो, तो गुरु-परंपरा में मंत्राध्ययन की रुचि का संकेत माना जा सकता है।
यदि जन्मकुंडली में भी पंचमेश और नवमेश बलवान हों, तो इस व्याख्या को अतिरिक्त समर्थन मिलता है।
लेकिन इससे किसी विशेष समय पर दीक्षा प्राप्त होने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
अध्याय 16 : विंशांश से भक्ति, ज्ञान और कर्मप्रधान साधना का विचार
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भक्ति, ज्ञान, कर्म और ध्यान के विविध मार्ग मिलते हैं।
D20 में ग्रहों के सामान्य कारकत्व के आधार पर इन प्रवृत्तियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
साधना की प्रवृत्ति
विचारणीय प्रमुख ग्रह
विचारणीय भाव
भक्तिप्रधान
चंद्रमा, शुक्र, बृहस्पति
पंचम, नवम
ज्ञानप्रधान
बुध, बृहस्पति, सूर्य
पंचम, नवम
कर्मप्रधान
सूर्य, मंगल, शनि
तृतीय, दशम
ध्यानप्रधान
चंद्रमा, शनि, केतु
चतुर्थ, द्वादश
मंत्राध्ययनप्रधान
बुध, बृहस्पति
द्वितीय, पंचम
वैराग्यप्रधान
शनि, केतु
अष्टम, द्वादश
यह तालिका शिक्षण के लिए बनाई गई व्याख्यात्मक रूपरेखा है।
इसे किसी प्राचीन ग्रंथ में दी गई निश्चित साधना-वर्गीकरण सारणी नहीं समझना चाहिए।
अध्याय 17 : विंशांश और आध्यात्मिक उन्नति का समय
ज्योतिष में घटनाओं के समय निर्धारण के लिए ग्रहों की दशा-अंतर्दशा का उपयोग किया जाता है।
आध्यात्मिक जीवन के विषय में भी परंपरागत ज्योतिषी दशाओं का अध्ययन करते हैं।
17.1 किन ग्रहों की दशा देखें?
विशेष रूप से—
जन्मकुंडली के पंचमेश।
जन्मकुंडली के नवमेश।
जन्मकुंडली के द्वादशेश।
D20 लग्नेश।
D20 पंचमेश।
D20 नवमेश।
D20 द्वादशेश।
बृहस्पति।
उदाहरण
मान लीजिए किसी जातक की जन्मकुंडली में बृहस्पति नवमेश है।
वह पंचम भाव में स्थित है।
D20 में भी बृहस्पति बलवान है तथा पंचमेश से संबंध रखता है।
ऐसी स्थिति में बृहस्पति की दशा के दौरान जातक के जीवन में धार्मिक अध्ययन, गुरु-संपर्क या उपासना संबंधी गतिविधियाँ प्रमुख होने की संभावना का विचार किया जा सकता है।
लेकिन यह निश्चित फल नहीं है।
दशा-विचार में जन्मकुंडली को प्राथमिक आधार बनाना चाहिए।
अध्याय 18 : एक उदाहरणात्मक विंशांश कुंडली का पूर्ण विश्लेषण
अब विद्यार्थियों को फलादेश की पद्धति समझाने के लिए एक काल्पनिक D20 कुंडली लेते हैं।
यह उदाहरण केवल शिक्षण के लिए है, किसी वास्तविक जन्मपत्रिका का गणितीय निर्माण नहीं है।
18.1 काल्पनिक ग्रहस्थिति
मान लीजिए D20 में—
ग्रह
राशि
लग्न से भाव
लग्न
धनु
प्रथम
सूर्य
सिंह
नवम
चंद्रमा
मीन
चतुर्थ
मंगल
मेष
पंचम
बुध
कन्या
दशम
बृहस्पति
धनु
प्रथम
शुक्र
तुला
एकादश
शनि
कुंभ
तृतीय
राहु
मिथुन
सप्तम
केतु
धनु
प्रथम
अब क्रमशः इसका विश्लेषण करते हैं।
18.2 प्रथम चरण : लग्न का अध्ययन
विंशांश लग्न धनु है।
धनु बृहस्पति की राशि है।
धनु राशि का सामान्य संबंध धर्म, उच्च ज्ञान और सिद्धांतों से जोड़ा जाता है।
इसलिए प्रारंभिक रूप से धर्म और ज्ञान संबंधी विषयों में रुचि का संकेत लिया जा सकता है।
18.3 द्वितीय चरण : लग्नेश
धनु लग्न का स्वामी बृहस्पति है।
बृहस्पति प्रथम भाव में अपनी ही राशि में स्थित है।
यह लग्नेश की मजबूत स्थिति है।
इससे जातक की धार्मिक अध्ययन तथा आध्यात्मिक चिंतन में रुचि का संकेत मिल सकता है।
केतु की युति होने से अंतर्मुखता और वैराग्य संबंधी विषय भी विचारणीय होंगे।
18.4 तृतीय चरण : पंचम भाव
धनु लग्न से पंचम भाव मेष है।
मेष का स्वामी मंगल है।
मंगल पंचम भाव में अपनी राशि में स्थित है।
इससे मंत्राध्ययन और उपासना में सक्रिय प्रयास तथा दृढ़ता का संकेत लिया जा सकता है।
18.5 चतुर्थ चरण : नवम भाव
धनु लग्न से नवम भाव सिंह है।
सिंह में सूर्य अपनी राशि में स्थित है।
इससे धर्म, कर्तव्य, परंपरा और अनुशासन संबंधी प्रवृत्तियों को बल मिल सकता है।
18.6 पंचम चरण : चंद्रमा
चंद्रमा चतुर्थ भाव में मीन राशि में है।
यह स्थिति भक्ति, भावनात्मक संवेदनशीलता और आंतरिक शांति की खोज से संबंधित व्याख्या का समर्थन कर सकती है।
18.7 षष्ठ चरण : शनि
शनि तृतीय भाव में कुंभ राशि में अपनी राशि में स्थित है।
तृतीय भाव पुरुषार्थ और अभ्यास का है।
इसलिए शनि की यह स्थिति नियमित प्रयास और दीर्घकालिक अनुशासन का संकेत दे सकती है।
18.8 सप्तम चरण : बुध
बुध दशम भाव में कन्या राशि में स्थित है।
बुध की यह मजबूत स्थिति अध्ययन, भाषा, विश्लेषण तथा शास्त्रीय विषयों को व्यवस्थित ढंग से समझने की प्रवृत्ति का संकेत दे सकती है।
18.9 समग्र निष्कर्ष
इस काल्पनिक D20 में—
लग्नेश बृहस्पति बलवान है।
पंचमेश मंगल बलवान है।
नवमेश सूर्य बलवान है।
तृतीय भाव में शनि बलवान है।
दशम भाव में बुध बलवान है।
इन स्थितियों को संयुक्त रूप से देखने पर धार्मिक अध्ययन, मंत्राध्ययन, अनुशासित अभ्यास और शास्त्रचिंतन की प्रवृत्तियों का संकेत मिलता है।
परंतु वास्तविक फलादेश के लिए जन्मकुंडली, जन्मसमय की शुद्धता और संबंधित ग्रहों की दशाओं की पुष्टि आवश्यक होगी।
अध्याय 19 : विंशांश और अन्य वर्ग कुंडलियों का संबंध
विंशांश का अध्ययन अन्य वर्ग कुंडलियों से अलग करके नहीं करना चाहिए।
विशेष रूप से निम्नलिखित वर्ग उपयोगी हो सकते हैं।
वर्ग कुंडली
प्रमुख विषय
D1 राशि कुंडली
संपूर्ण जीवन तथा धर्म संबंधी मूल योग
D9 नवांश
धर्म, विवाह तथा ग्रहों का सूक्ष्म बल
D12 द्वादशांश
माता-पिता और वंशपरंपरा
D20 विंशांश
उपासना और आध्यात्मिक साधना
D24 चतुर्विंशांश
विद्या, शिक्षा और अध्ययन
D30 त्रिंशांश
अशुभ प्रभाव और कठिनाइयाँ
D60 षष्ट्यंश
अत्यंत सूक्ष्म कर्मफल संबंधी पारंपरिक विचार
यहाँ D9, D24 और D20 का संयुक्त अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।
उदाहरण—
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में पंचम और नवम भाव मजबूत हैं, D24 में अध्ययन संबंधी योग अनुकूल हैं तथा D20 में भी पंचमेश और नवमेश बलवान हैं, तो धार्मिक एवं शास्त्रीय अध्ययन में गहरी रुचि का संयुक्त संकेत माना जा सकता है।
अध्याय 20 : विंशांश फलादेश में होने वाली प्रमुख गलतियाँ
विद्यार्थियों को निम्नलिखित गलतियों से बचना चाहिए।
गलती 1 : D20 को स्वतंत्र जन्मकुंडली मान लेना
वर्ग कुंडली जन्मकुंडली का सूक्ष्म विभाग है।
इसे D1 से पूर्णतः अलग करके नहीं देखना चाहिए।
गलती 2 : केवल बृहस्पति से संपूर्ण निर्णय करना
बृहस्पति महत्त्वपूर्ण है, किंतु लग्न, लग्नेश, पंचम और नवम भाव भी आवश्यक हैं।
गलती 3 : केतु को हमेशा मोक्ष का निश्चित कारक मान लेना
केतु वैराग्य संबंधी संकेत दे सकता है, लेकिन मोक्ष का निश्चित निर्णय नहीं करता।
गलती 4 : अष्टम भाव को हमेशा तंत्रसिद्धि का प्रमाण मान लेना
अष्टम भाव गूढ़ विषयों से संबंधित है, परंतु इससे अलौकिक सिद्धियों की पुष्टि नहीं होती।
गलती 5 : जन्मसमय की शुद्धता की उपेक्षा
D20 में प्रत्येक विभाग केवल 1°30′ का होता है।
इसलिए गणना में सूक्ष्म त्रुटि भी वर्गस्थिति बदल सकती है।
गलती 6 : ग्रहों की वास्तविक स्थिति के बिना योग घोषित करना
ग्रहों की राशि, भाव, स्वामित्व, युति, दृष्टि और दशा देखे बिना फलादेश अधूरा रहेगा।
गलती 7 : इष्टदेवता और विंशांश अधिदेवता को समान मानना
दोनों अवधारणाओं में अंतर है।
किसी विशेष मंत्र अथवा दीक्षा का निर्णय केवल वर्ग कुंडली से नहीं करना चाहिए।
अध्याय 21 : विंशांश विश्लेषण की क्रमबद्ध अंतिम पद्धति
कक्षा में विद्यार्थियों को D20 का विश्लेषण निम्नलिखित क्रम से करना सिखाया जा सकता है।
क्रम
क्या देखना है?
अध्ययन का उद्देश्य
1
जन्मकुंडली
धर्म और साधना के मूल संकेत
2
जन्मकुंडली का पंचम भाव
मंत्र, विद्या और पूर्वपुण्य
3
जन्मकुंडली का नवम भाव
धर्म, गुरु और परंपरा
4
जन्मकुंडली का द्वादश भाव
त्याग और मोक्षाभिमुखता
5
D20 लग्न
साधना के प्रति व्यक्तिगत प्रवृत्ति
6
D20 लग्नेश
साधक के अभ्यास की संभावित शक्ति
7
D20 पंचम भाव
मंत्राध्ययन और जप
8
D20 पंचमेश
मंत्र-संबंधी विषयों की स्थिति
9
D20 नवम भाव
गुरु और धर्म
10
D20 नवमेश
परंपरा और मार्गदर्शन
11
D20 द्वादश भाव
एकांत, त्याग और ध्यान
12
बृहस्पति
धर्म, गुरु और ज्ञान
13
चंद्रमा
भक्ति और मानसिक एकाग्रता
14
बुध
मंत्रोच्चारण और शास्त्राध्ययन
15
शनि
तप, धैर्य और नियमित अभ्यास
16
केतु
वैराग्य और अंतर्मुखता
17
दशा-अंतर्दशा
साधना-संबंधी प्रवृत्तियों के सक्रिय होने का संभावित समय
18
समग्र मिलान
D1 और D20 के संकेतों की पुष्टि
अध्याय 22 : विंशांश के पाँच महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय सिद्धांत
प्रथम सिद्धांत
विंशांश का प्रमुख विषय उपासना है।
इसलिए इसका उपयोग मुख्यतः धार्मिक और आध्यात्मिक साधना संबंधी विषयों के सूक्ष्म अध्ययन में किया जाना चाहिए।
द्वितीय सिद्धांत
विंशांश के निर्माण में राशि का स्वभाव महत्त्वपूर्ण है।
चर राशि में मेष, स्थिर राशि में धनु और द्विस्वभाव राशि में सिंह से गणना प्रारंभ होती है।
तृतीय सिद्धांत
विंशांश में प्रत्येक विभाग 1°30′ का होता है।
इसलिए ग्रहों के सही अंश और जन्मसमय की शुद्धता आवश्यक है।
चतुर्थ सिद्धांत
जन्मकुंडली प्राथमिक है और विंशांश उसका पूरक है।
D20 के किसी एक योग से संपूर्ण फलादेश नहीं करना चाहिए।
पंचम सिद्धांत
आध्यात्मिक उपलब्धि और ज्योतिषीय संकेत अलग-अलग विषय हैं।
ज्योतिषीय परंपरा में साधना की रुचि और परिस्थितियों का अनुमान लगाया जाता है; किसी व्यक्ति की वास्तविक आध्यात्मिक अनुभूति या सिद्धि का वस्तुनिष्ठ प्रमाण केवल ग्रहस्थितियाँ नहीं हो सकतीं।
अध्याय 23 : मूल शास्त्रीय आधार और अध्ययन-संदर्भ
विंशांश का मूल अध्ययन पाराशरी षोडशवर्ग परंपरा के अंतर्गत किया जाता है।
इस विषय के लिए प्रमुख ग्रंथ है—
बृहत्पाराशरहोराशास्त्र — षोडशवर्ग-विवेचन।
इसमें वर्गों की रचना, वर्गों के प्रयोजन और वर्गाधिदेवताओं से संबंधित सामग्री मिलती है।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बृहत्पाराशरहोराशास्त्र के विभिन्न प्रकाशित संस्करणों में अध्याय क्रम, श्लोक संख्या और कुछ पाठ अलग हो सकते हैं।
इसलिए बिना किसी निश्चित संस्करण का मिलान किए श्लोक संख्या देना उचित नहीं होगा।
इसी प्रकार इस पाठ में वर्णित सभी भावगत फल मूल ग्रंथ के शब्दशः श्लोक नहीं हैं। इनमें से अनेक निष्कर्ष सामान्य पाराशरी भावार्थ, ग्रहकारकत्व और वर्ग-विचार के संयुक्त प्रयोग से प्राप्त व्यावहारिक व्याख्याएँ हैं।
अध्याय 24 : विंशांश की गणना का संक्षिप्त सूत्र
किसी भी ग्रह या लग्न का D20 ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित गणितीय पद्धति अपनाएँ।
प्रथम चरण
ग्रह के राशि के भीतर स्थित अंश को कला में बदलें।
कुल कला = अंश × 60 + शेष कला
द्वितीय चरण
कुल कला को 90 से भाग दें।
प्राप्त पूर्ण भागफल में 1 जोड़ें।
यही विंशांश क्रमांक होगा।
अर्थात्—
विंशांश क्रमांक = पूर्णांक भाग (कुल कला ÷ 90) + 1
यह सूत्र राशि के भीतर 0°00′ से लेकर 30°00′ से कम अंशों पर लागू होता है।
तृतीय चरण
जन्मराशि का स्वभाव देखें।
चर = मेष से गणना।
स्थिर = धनु से गणना।
द्विस्वभाव = सिंह से गणना।
चतुर्थ चरण
प्रारंभिक राशि को पहला स्थान मानकर विंशांश क्रमांक तक गणना करें।
बारह राशियाँ पूरी होने पर पुनः मेष से राशि-क्रम चलता रहेगा।
प्राप्त राशि में ग्रह अथवा लग्न को D20 में स्थापित करें।
अंतिम निष्कर्ष
पाराशरी वैदिक ज्योतिष में विंशांश (D20) उपासना संबंधी विषयों के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण वर्ग कुंडली है।
इसकी सहायता से परंपरागत ज्योतिषीय सिद्धांतों के अंतर्गत जातक की धार्मिक रुचि, मंत्राध्ययन, गुरु-परंपरा से संबंध, ध्यान, भक्ति, तप, वैराग्य और आध्यात्मिक अभ्यास की प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया जाता है।
इसका सही अध्ययन करने के लिए तीन बातें विशेष रूप से आवश्यक हैं—
पहली — विंशांश का गणितीय निर्माण पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए।
दूसरी — जन्मकुंडली तथा विंशांश के संबंधित ग्रहों और भावों का संयुक्त अध्ययन करना चाहिए।
तीसरी — शास्त्र में प्रत्यक्ष रूप से बताए गए नियमों और सामान्य ज्योतिषीय सिद्धांतों से विकसित व्याख्याओं के बीच अंतर स्पष्ट रखना चाहिए।
इस प्रकार विंशांश केवल ग्रहों को बीस भागों में विभाजित करने की गणितीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि पारंपरिक ज्योतिष में उपासना संबंधी प्रवृत्तियों का सूक्ष्म अध्ययन करने का एक माध्यम भी है।
॥ इति विंशांश-वर्गकुण्डली-विवेचनम् ॥
अगले अध्ययन के लिए विशेष विषय
इस मूल पाठ के बाद विंशांश का और अधिक गहन अध्ययन निम्नलिखित तीन विषयों में किया जा सकता है।
1. विंशांश के बीस अधिदेवताओं का मूल संस्कृत श्लोक सहित विस्तृत विवेचन — चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में प्रत्येक विंशांश के अधिदेवता का शास्त्रीय निर्धारण, पाठभेद और देवता-संज्ञाओं का अर्थ।
2. D20 से इष्टदेवता, कुलदेवता, उपास्यदेवता और मंत्रसाधना का तुलनात्मक शास्त्रीय अध्ययन — पाराशरी तथा जैमिनीय पद्धतियों में अंतर सहित।
3. D20 के बारह भावों में नवग्रहों का विस्तृत फलादेश — सूर्य से केतु तक प्रत्येक ग्रह के प्रथम से द्वादश भाव में होने पर कुल 108 स्थितियों का क्रमबद्ध विश्लेषण।
इनमें तीसरा विषय विशेष रूप से कक्षा में विद्यार्थियों को विंशांश का व्यावहारिक फलादेश सिखाने के लिए उपयोगी होगा।