नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। हमारे सनातन धर्म में अनेक व्रत त्योहारों के अवसर पर प्रकृति की सेवा, नदी पहाड़ भूमि वृक्षों आदि के पूजन का विशिष्ट महत्व है। वास्तव में देखा जाए तो प्रकृति की सेवा ही नारायण सेवा है। इसे इस तरह समझें। प्रकृति का अर्थ है पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश। यही पंचतत्व कहलाते हैं। और इन्ही पंचतत्वों से सम्पूर्ण भौतिक संसार का निर्माण हुआ है। अतः ईश्वर द्वारा पंचमहाभूतों से रचित इस प्रकृति की सेवा करना ही सच्चे अर्थों में परमात्मा की सेवा करना होता है। तभी तो हमारे ऋषि महर्षियों ने व्रत पर्व त्योहारों के माध्यम से नदी पर्वत वृक्षों की पूजा का विधान बनाया है। इसी क्रम में एक मुख्य व्रत है आमलकी एकादशी व्रत। जिसे आंवला एकादशी भी कहा जाता है। आज हम इस दिव्य व्रत के बारे में पूर्ण चर्चा करेंगे। अतः सम्पूर्ण जानकारी के लिए आप वीडियो को अंत तक पूरा अवश्य देखें, और साथ ही अपने इस वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
आमलकी एकादशी को आमलक्य एकादशी या आंवला एकादशी भी कहा जाता है। आमलकी का अर्थ आंवला होता है, जिसे सनातन धर्म की मुख्य चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में सर्वश्रेष्ठ औषधि बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है। आंवले के वृक्ष में श्री हरि एवं लक्ष्मी जी का वास होता है। आंवले के वृक्ष में भगवान लक्ष्मीनारायण का वास होने के कारण, आमलकी एकादशी व्रत के दिन इस वृक्ष की विधि विधान से पूजा की जाती है। इस दिन आंवले का प्रयोग बहुत प्रकार से किया जाता है, जैसे स्नान के जल में आंवला मिलाकर स्नान करना, आंवले का तेल लगाना, आंवले के वृक्ष की पूजा करना, आंवले से बने भोजन मिठाई आदि का सेवन करना, तथा इस दिन आंवले का दान करना भी विशेष महत्व रखता है। हर एकादशी व्रत की तरह ही आमलकी एकादशी व्रत को भी विधि विधान से संपन्न किया जाता है। एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही प्रारम्भ हो जाता है। अत: दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। किन्तु यदि स्वास्थ्य समस्याओं के चलते आवश्यक हो तो भोजन शुद्ध सात्विक अथवा दुग्ध फलाहार आदि ही लेना चाहिए। एकादशी तिथि को प्रातः सूर्योदय से पूर्व जगकर शौच स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर सर्व प्रथम भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य प्रदान करें। फिर व्रत का संकल्प लेकर भगवान नारायण की विधिवत पूजा अर्चना कर भोग लगाएं। भगवान की पूजा के उपरांत आंवले के वृक्ष की पूजा भी अवश्य करें। इसके लिए आंवले के पेड़ के नीचे भूमि को चारों तरफ अच्छे से साफ कर गोबर से लीपकर एक चौकी पर विधिवत कलश स्थापना करें। उसके बाद कलश में नदियों सागरों पर्वतों सहित वरुण एवं भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा कर, आंवले के पेड़ की भी पूजा करें। पूजन के उपरांत वृक्ष की सात परिक्रमा करना भी ना भूलें। फिर
पूरे दिन निराहार व्रत रखकर सन्ध्या समय पुनः पूजन करें, एवं आमलकी एकादशी व्रत की कथा श्रवण करें। आरती करने के उपरांत पुनः भगवान को भोग लगाएं। एकादशी के अगले दिन द्वादशी पर पूजन के बाद जरुरतमंद व्यक्तियों एवं ब्राह्मणों को भोजन करवाकर और दान-दक्षिणा देकर, अंत में भोजन करके व्रत खोलना चाहिए।
पद्म पुराण के अनुसार आमलकी एकादशी का व्रत करने से श्रेष्ठ तीर्थ वास के समान पुण्य प्राप्त होता है। यज्ञों के समान फल देने वाले आमलकी एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति को मोक्ष पद की प्राप्ति होती है। जो लोग आमलकी एकादशी का व्रत नहीं करते हैं वह भी इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं भी खाएं। शास्त्रों के अनुसार आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन करना बहुत लाभकारी होता है। इससे आयु आरोग्यता की वृद्धि होती है।
हमारे समस्त श्रोताओं को आमलकी एकादशी व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें