ग्रहों की अवस्थाएँ (Avasthās of Planets)
वैदिक ज्योतिष में ग्रह की अवस्था (Avasthā) से तात्पर्य उस ग्रह की कार्य करने की स्थिति, शक्ति तथा मानसिक दशा से है। ग्रह केवल राशि और भाव से ही फल नहीं देता, बल्कि उसकी अवस्था भी उसके शुभ-अशुभ फल को प्रभावित करती है।
पराशर, वराहमिहिर, कल्याणवर्मा आदि आचार्यों ने ग्रहों की अनेक अवस्थाओं का वर्णन किया है। इनमें प्रमुख अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं—
1. बाल अवस्था (Bāla Avasthā)
ग्रह प्रारम्भिक अवस्था में होता है।
फल:
कम शक्ति
फल देने में असमर्थ
परिणाम धीरे-धीरे मिलते हैं
अनुभव की कमी
2. कुमार अवस्था (Kumāra Avasthā)
ग्रह विकासशील अवस्था में होता है।
फल:
उत्साह
प्रगति
सीखने की क्षमता
मध्यम से शुभ फल
3. युवा अवस्था (Yuvā Avasthā)
यह ग्रह की सर्वश्रेष्ठ अवस्था मानी जाती है।
फल:
पूर्ण शक्ति
उत्कृष्ट परिणाम
सफलता
प्रतिष्ठा
कार्य सिद्धि
4. वृद्ध अवस्था (Vṛddha Avasthā)
ग्रह की शक्ति घटने लगती है।
फल:
विलम्ब
थकावट
अवसरों में कमी
मध्यम फल
5. मृत अवस्था (Mṛta Avasthā)
ग्रह अत्यन्त निर्बल माना जाता है।
फल:
कारकत्व में बाधा
असफलता
रोग
कष्ट
अपेक्षित फल का अभाव
अंशों के अनुसार अवस्थाएँ
विषम राशियाँ
(मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ)
अंश
अवस्था
0°–6°
बाल
6°–12°
कुमार
12°–18°
युवा
18°–24°
वृद्ध
24°–30°
मृत
सम राशियाँ
(वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन)
अंश
अवस्था
0°–6°
मृत
6°–12°
वृद्ध
12°–18°
युवा
18°–24°
कुमार
24°–30°
बाल
जाग्रतादि अवस्थाएँ
1. जाग्रत (जागृत)
ग्रह पूर्ण रूप से सक्रिय रहता है।
फल:
ग्रह अपने कारकत्व का पूर्ण फल देता है।
2. स्वप्न
ग्रह आंशिक रूप से सक्रिय रहता है।
फल:
मध्यम फल
विलम्ब से सफलता
3. सुषुप्ति
ग्रह सुप्त अवस्था में होता है।
फल:
कारकत्व कमजोर
शुभ फल कम
ग्रहों की जाग्रतादि अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) कैसे ज्ञात करें? सम्पूर्ण विश्लेषण
पराशर होरा शास्त्र के अनुसार ग्रह की जाग्रतादि अवस्था उसके राशि में स्थित अंश (Longitude) और राशि के सम (Even) या विषम (Odd) होने पर निर्भर करती है।
1. विषम राशियाँ
मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुम्भ
अंश
अवस्था
0°00′–10°00′
जाग्रत
10°00′–20°00′
स्वप्न
20°00′–30°00′
सुषुप्ति
2. सम राशियाँ
वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन
अंश
अवस्था
0°00′–10°00′
सुषुप्ति
10°00′–20°00′
स्वप्न
20°00′–30°00′
जाग्रत
उदाहरण 1
सूर्य – मेष 8°15′
मेष = विषम राशि
8° पहले 10° में
अतः सूर्य = जाग्रत अवस्था
उदाहरण 2
चन्द्र – कन्या 16°40′
कन्या = सम राशि
16° दूसरे 10° में
अतः चन्द्र = स्वप्न अवस्था
उदाहरण 3
मंगल – मकर 25°10′
मकर = सम राशि
25° तीसरे 10° में
अतः मंगल = जाग्रत अवस्था
उदाहरण 4
बुध – सिंह 23°05′
सिंह = विषम राशि
23° तीसरे 10° में
अतः बुध = सुषुप्ति अवस्था
फलादेश
1. जाग्रत अवस्था
ग्रह पूर्ण रूप से सक्रिय होता है।
अपने कारकत्व का पूर्ण एवं प्रभावी फल देता है।
शुभ ग्रह अधिक शुभ तथा पाप ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार अधिक प्रभावी होते हैं।
2. स्वप्न अवस्था
ग्रह मध्यम रूप से सक्रिय रहता है।
फल मिलते हैं, परन्तु विलम्ब, उतार-चढ़ाव या आंशिक रूप में।
3. सुषुप्ति अवस्था
ग्रह की अभिव्यक्ति कमज़ोर होती है।
कारकत्व का फल कम या बाधित रूप में मिलता है।
यदि ग्रह अन्य प्रकार से अत्यन्त बलवान हो (उच्च, स्वराशि, शुभ दृष्टि आदि), तो सुषुप्ति का दुष्प्रभाव काफी हद तक कम हो सकता है।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
केवल जाग्रतादि अवस्था देखकर अंतिम फलादेश नहीं किया जाता। ग्रह का षड्बल, उच्च-नीच, दृष्टि, युति, नवांश (D-9), दशा, गोचर तथा अन्य अवस्थाएँ (दीप्तादि, बालादि, लज्जितादि) भी साथ में विचारणीय हैं।
सूत्र (याद रखने की ट्रिक):
विषम राशि: जाग्रत → स्वप्न → सुषुप्ति
सम राशि: सुषुप्ति → स्वप्न → जाग्रत
दीप्तादि अवस्थाएँ
दीप्त — उच्च राशि में
स्वस्थ — स्वराशि में
मुदित — मित्र राशि में
शान्त — सम राशि में
दीन — शत्रु राशि में
दुःखित — पाप प्रभाव से पीड़ित
विकल — अस्त या निर्बल
खल — नीच या अत्यन्त पापग्रस्त
कोप — क्रूर प्रभाव से युक्त
लज्जितादि अवस्थाएँ
पराशर ने छह विशेष अवस्थाएँ बताई हैं—
लज्जित
गर्वित
क्षुधित
तृषित
मुदित
क्षोभित
इनका उपयोग ग्रहों के मानसिक एवं व्यवहारिक फल जानने के लिए किया जाता है।
लज्जितादि अवस्थाएँ (Lajjitādi Avasthā) कैसे ज्ञात करें? सम्पूर्ण विश्लेषण
लज्जितादि अवस्थाएँ का वर्णन बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में मिलता है। ये ग्रह की मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाती हैं। कुल 6 अवस्थाएँ हैं—
लज्जित (Lajjita)
गर्वित (Garvita)
क्षुधित (Kṣudhita)
तृषित (Tṛṣita)
मुदित (Mudita)
क्षोभित (Kṣobhita)
इनका निर्धारण ग्रह की राशि, युति और दृष्टि के आधार पर किया जाता है।
1. लज्जित अवस्था (Lajjita)
यदि कोई ग्रह—
पंचम भाव में स्थित हो, तथा
राहु या केतु, अथवा
सूर्य, शनि या मंगल जैसे पापग्रहों से युक्त या पीड़ित हो,
तो वह लज्जित अवस्था में होता है।
फल
संतान संबंधी कष्ट
मानसिक ग्लानि
आत्मविश्वास में कमी
शिक्षा में बाधा
कार्यों में संकोच
2. गर्वित अवस्था (Garvita)
यदि ग्रह—
उच्च राशि में हो, अथवा
मूलत्रिकोण में हो,
तो वह गर्वित अवस्था में होता है।
फल
प्रतिष्ठा
सफलता
सम्मान
आत्मविश्वास
ग्रह के कारकत्व में वृद्धि
3. क्षुधित अवस्था (Kṣudhita)
यदि ग्रह—
शत्रु राशि में हो, अथवा
शत्रु ग्रह से युक्त हो, अथवा
शनि से पीड़ित हो,
तो वह क्षुधित अवस्था में माना जाता है।
फल
असंतोष
संघर्ष
आर्थिक कठिनाई
इच्छाओं की पूर्ति में बाधा
4. तृषित अवस्था (Tṛṣita)
यदि ग्रह—
जल राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) में हो,
शत्रु ग्रह की दृष्टि प्राप्त करे,
और शुभ ग्रह की दृष्टि न हो,
तो वह तृषित अवस्था में होता है।
फल
मानसिक अशांति
असंतुष्टि
संबंधों में दूरी
अपेक्षाएँ अधूरी रहना
5. मुदित अवस्था (Mudita)
यदि ग्रह—
मित्र राशि में हो, अथवा
मित्र ग्रह से युक्त हो, अथवा
गुरु से युक्त या दृष्ट हो,
तो वह मुदित अवस्था में होता है।
फल
प्रसन्नता
शुभ फल
उन्नति
सुख
सहयोग
6. क्षोभित अवस्था (Kṣobhita)
यदि ग्रह—
सूर्य से अस्त (Combust) हो,
अथवा
पापग्रह से पीड़ित हो,
तथा साथ में शत्रु दृष्टि भी प्राप्त हो,
तो वह क्षोभित अवस्था में होता है।
फल
तनाव
विवाद
असफलता
मानसिक अशांति
ग्रह के कारकत्व में बाधा
लज्जित - पंचम भाव में पापग्रह (विशेषतः राहु/केतु) से युक्त या पीड़ित
गर्वित - उच्च या मूलत्रिकोण राशि
क्षुधित - शत्रु राशि, शत्रु युति या शनि से पीड़ित
तृषित - जल राशि + शत्रु दृष्टि + शुभ दृष्टि का अभाव
मुदित - मित्र राशि, मित्र युति या गुरु की दृष्टि/युति
क्षोभित - अस्त (Combust) या पापग्रह एवं शत्रु दृष्टि से पीड़ित
महत्वपूर्ण तथ्य
एक ही ग्रह पर एक से अधिक लज्जितादि अवस्थाओं के संकेत लागू हो सकते हैं। ऐसे में ग्रह का समग्र बल, राशि, नवांश, दृष्टि, युति, षड्बल और दशा का संयुक्त विचार करके ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है।
फलादेश में इन अवस्थाओं का उपयोग सहायक संकेतक के रूप में किया जाता है; इन्हें अकेले आधार बनाकर निर्णय नहीं करना चाहिए।
गर्वित और मुदित अवस्थाएँ सामान्यतः शुभ मानी जाती हैं, जबकि लज्जित, क्षुधित, तृषित और क्षोभित अवस्थाएँ ग्रह के शुभ फल में कमी या संघर्ष का संकेत दे सकती हैं।
अवस्था का फलादेश में महत्व
ग्रह की युवा, दीप्त, स्वस्थ अवस्था सर्वोत्तम मानी जाती है।
बाल ग्रह प्रारम्भ में कम फल देता है।
वृद्ध ग्रह विलम्ब से फल देता है।
मृत, विकल, खल अवस्था ग्रह के शुभ फल को कम कर देती है।
ग्रह की अवस्था का विचार राशि, भाव, दृष्टि, युति, षड्बल, नवांश तथा दशा के साथ संयुक्त रूप से करना चाहिए।
निष्कर्ष
ग्रहों की अवस्था यह बताती है कि कोई ग्रह अपनी शक्ति का उपयोग किस स्तर पर कर रहा है। केवल उच्च या स्वराशि में होना ही पर्याप्त नहीं है; ग्रह की अवस्था, बल, दृष्टि, युति और वर्गबल को साथ लेकर ही सटीक फलादेश किया जाता है। इसलिए वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की अवस्थाओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
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