सोमवार, 3 अगस्त 2026

षष्ट्यांश (Ṣaṣṭyāṁśa) क्या होता है? — उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या

षष्ट्यांश (Ṣaṣṭyāṁśa) क्या होता है? — उदाहरण सहित विस्तृत व्याख्या
षष्ट्यांश का शाब्दिक अर्थ है "साठवाँ भाग"।
संस्कृत में—
षष्टि = 60
अंश = भाग
अर्थात् किसी पूर्ण मान (Full Value) को 60 समान भागों में बाँटा जाए, तो प्रत्येक भाग एक षष्ट्यांश कहलाता है।
1. ज्योतिष में षष्ट्यांश का प्रयोग
वैदिक ज्योतिष में "षष्ट्यांश" शब्द दो अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त होता है, जिन्हें अलग-अलग समझना आवश्यक है।
(क) बल (Shadbala) मापने की इकाई
षड्बल में ग्रहों की शक्ति षष्ट्यांश (Virupa) में मापी जाती है।
यह उसी प्रकार है जैसे—
दूरी → किलोमीटर में
वजन → किलोग्राम में
समय → घंटे में
ग्रहबल → षष्ट्यांश में
अर्थात यहाँ षष्ट्यांश माप की इकाई है।
(ख) षष्ट्यांश वर्ग (D-60)
वर्ग कुण्डलियों में एक राशि (30°) को 60 समान भागों में विभाजित किया जाता है।
तब—
30° ÷ 60 = 0°30′ (30 आर्क-मिनट)
अर्थात प्रत्येक भाग 30 मिनट (0°30′) का होता है।
इसे षष्ट्यांश वर्ग (D-60) कहते हैं।
यह जन्म के सूक्ष्म कर्मफल के विश्लेषण में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
षड्बल में षष्ट्यांश कैसे समझें?
मान लीजिए—
सूर्य का केन्द्रादि बल = 60 षष्ट्यांश
इसका अर्थ यह नहीं है कि सूर्य 60 डिग्री का हो गया।
इसका अर्थ केवल इतना है कि
सूर्य ने केन्द्रादि बल में पूर्ण अंक (Maximum Score) प्राप्त किए हैं।
इसे परीक्षा के उदाहरण से समझिए।
यदि परीक्षा 60 अंकों की हो—
छात्र A = 60/60
छात्र B = 30/60
छात्र C = 15/60
तो स्पष्ट है—
A सबसे अधिक सक्षम
B मध्यम
C अपेक्षाकृत कम
ठीक इसी प्रकार—
केन्द्र = 60
पाणफर = 30
अपोक्लिम = 15
उदाहरण 1
बृहस्पति दशम भाव में है।
दशम = केन्द्र
अतः
केन्द्रादि बल = 60 षष्ट्यांश
अर्थ
बृहस्पति ने केन्द्रादि बल में पूर्ण अंक प्राप्त किए।
उदाहरण 2
शुक्र पंचम भाव में है।
पंचम = पाणफर
अतः
केन्द्रादि बल = 30 षष्ट्यांश
अर्थ
शुक्र को आधा बल प्राप्त हुआ।
उदाहरण 3
मंगल नवम भाव में है।
नवम = अपोक्लिम
अतः
केन्द्रादि बल = 15 षष्ट्यांश
अर्थ
मंगल को केन्द्रादि बल का केवल एक-चौथाई भाग प्राप्त हुआ।
क्या 60 षष्ट्यांश = 60 डिग्री?
नहीं।
यह सबसे सामान्य भ्रम है।
डिग्री (°) ग्रह की स्थिति बताती है।
षष्ट्यांश (Virupa) ग्रह की शक्ति का माप बताता है।
दोनों का आपस में कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
शास्त्रीय दृष्टि
बृहत्पाराशर होराशास्त्र में ग्रहबल की गणना रूप (Rūpa) और विरूप (Virūpa) के आधार पर की गई है।
यहाँ—
1 रूप = 60 विरूप (षष्ट्यांश)
इसलिए यदि किसी ग्रह का कुल बल 360 विरूप है, तो उसे
360 ÷ 60 = 6 रूप
कहा जाएगा।
सरल उपमा
कल्पना कीजिए कि किसी ग्रह की शक्ति मापने के लिए 60 अंकों का पैमाना बनाया गया है।
60 = पूर्ण शक्ति
45 = अच्छी शक्ति
30 = मध्यम शक्ति
15 = कम शक्ति
0 = शक्ति नहीं
यहाँ "षष्ट्यांश" उसी अंक (Score) की तरह कार्य करता है।
निष्कर्ष
षष्ट्यांश का अर्थ हर जगह एक जैसा नहीं होता। षड्बल में यह ग्रहबल की माप की इकाई (Virūpa) है, जबकि षष्ट्यांश वर्ग (D-60) में यह एक राशि के 60 समान भागों में से एक भाग (0°30′) है। इसलिए किसी भी ज्योतिषीय ग्रंथ का अध्ययन करते समय यह अवश्य देखें कि "षष्ट्यांश" शब्द बल की इकाई के रूप में प्रयुक्त हुआ है या वर्ग कुण्डली (D-60) के संदर्भ में।

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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