D9 नवांश कुंडली — कक्षा हेतु क्रमबद्ध अध्ययन
1. D9 चार्ट क्या होता है?
D9 = नवांश = राशि का नौवाँ विभाजन।
एक राशि का विस्तार:
30°
अतः,
30° ÷ 9 = 3°20′
इसलिए प्रत्येक राशि को 3°20′ के 9 भागों में विभाजित किया जाता है। इन प्रत्येक भाग को एक नवांश कहते हैं।
अर्थात्:
1 नवांश = 3°20′
और सम्पूर्ण राशि में:
9 नवांश × 3°20′ = 30°
पूरी 360° राशि-मंडल में:
12 राशियाँ × 9 नवांश = 108 नवांश
इसलिए D9 को नवांश कुंडली कहा जाता है।
2. D9 को नवांश क्यों कहते हैं?
संस्कृत में—
नव = 9
इसलिए राशि के नौवें विभाजन को नवांश कहा गया।
पाराशरी वर्ग-विभाजन में D9 अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वर्ग कुंडलियों का उद्देश्य जन्मकुंडली में दिखाई देने वाले विषयों को अधिक सूक्ष्म स्तर पर समझना है।
विशेष रूप से D9 का प्रयोग:
विवाह
जीवनसाथी
वैवाहिक जीवन
धर्म एवं जीवन-मूल्य
भाग्य की परिपक्वता
ग्रहों की सूक्ष्म शक्ति
ग्रह की वास्तविक सामर्थ्य
ग्रह के फल की पुष्टि
आदि के लिए किया जाता है।
लेकिन विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही यह बात स्पष्ट कर दें:
D9 केवल विवाह की कुंडली नहीं है।
3. एक राशि में नवांश कैसे बनाए जाते हैं?
अब सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है।
मान लीजिए किसी ग्रह की स्थिति है:
मेष 10°15′
सबसे पहले देखें कि वह मेष राशि के किस नवांश में है।
मेष राशि के नवांश:
प्रथम से नवें नवांश तक प्रत्येक नवांश की अंश सीमा
प्रथम नवांश - 0°00′ – 3°20′
दूसरा नवांश - 3°20′ – 6°40′
तीसरा नवांश - 6°40′ – 10°00′
चौथा नवांश - 10°00′ – 13°20′
पांचवां नवांश - 13°20′ – 16°40′
छठा नवांश - 16°40′ – 20°00′
सातवां नवांश - 20°00′ – 23°20′
आठवां नवांश - 23°20′ – 26°40′
नवां नवांश - 26°40′ – 30°00′
10°15′, 10°00′ से 13°20′ के बीच है।
अतः यह चतुर्थ नवांश है।
अब प्रश्न है—
चतुर्थ नवांश किस राशि का होगा?
इसके लिए नवांश राशि निर्धारण का नियम समझना आवश्यक है।
4. नवांश राशि निर्धारित करने का मुख्य नियम
राशियों को तीन प्रकार में बाँटा जाता है:
चर राशि - मेष, कर्क, तुला, मकर
स्थिर राशि - वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ
द्विस्वभाव राशि - मिथुन, कन्या, धनु, मीन
अब D9 में नवांश राशि निकालने का पाराशरी नियम:
चर राशि -
चर राशि में, लग्न कुंडली में जिस राशि में ग्रह हो उसी राशि से नवांश भावों की गिनती शुरू होती है,
उदाहरण:
मेष → मेष से प्रारंभ
नवांश क्रम:
मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या → तुला → वृश्चिक → धनु
स्थिर राशि -
स्थिर राशि में, लग्न कुंडली में जिस स्थिर राशि में ग्रह हो उस राशि से गिनकर, ठीक नवम राशि से नवांश क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
वृषभ
वृषभ से नवम राशि:
वृषभ(1), मिथुन(2), कर्क(3), सिंह(4), कन्या(5), तुला(6), वृश्चिक(7), धनु(8), मकर(9)
अतः वृषभ के नवांश:
मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन → कर्क → सिंह → कन्या
द्विस्वभाव राशि -
द्विस्वभाव राशि में, जिस राशि में ग्रह लग्न कुंडली में हो, उस राशि से ठीक पांचवीं राशि से गणना क्रम प्रारंभ होता है।
उदाहरण:
मिथुन
मिथुन से पंचम राशि:
मिथुन(1), कर्क(2), सिंह(3), कन्या(4), तुला(5)
अतः मिथुन के नवांश:
तुला → वृश्चिक → धनु → मकर → कुंभ → मीन → मेष → वृषभ → मिथुन
5. पूरी नवांश राशि-तालिका
जन्म राशि - मेष - चर
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - वृषभ - स्थिर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - मिथुन - द्विस्वभाव
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - कर्क - चर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - सिंह - स्थिर
धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह
जन्म राशि - कन्या - द्विस्वभाव
मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक
जन्म राशि - तुला - चर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - वृश्चिक - स्थिर
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
जन्म राशि - धनु - द्विस्वभाव
मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु
जन्म राशि - मकर - चर
मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन–कर्क–सिंह–कन्या
जन्म राशि - कुंभ - स्थिर
तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन–मेष–वृषभ–मिथुन
जन्म राशि - मीन - द्विस्वभाव
कर्क–सिंह–कन्या–तुला–वृश्चिक–धनु–मकर–कुंभ–मीन
यहाँ एक रोचक बात विद्यार्थियों को बताई जा सकती है:
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों में नवांश क्रम अलग प्रारंभ-बिंदु से चलता है, लेकिन प्रत्येक राशि में क्रम लगातार राशिचक्र के अनुसार आगे बढ़ता है।
6. उदाहरण से D9 बनाना
मान लीजिए:
गुरु = वृषभ 14°20′
पहले देखें:
वृषभ के नवांश:
0°–3°20′ → मकर
3°20′–6°40′ → कुंभ
6°40′–10° → मीन
10°–13°20′ → मेष
13°20′–16°40′ → वृषभ
गुरु 14°20′ पर है।
अतः गुरु पंचम नवांश में है।
वृषभ का पंचम नवांश = वृषभ
इसलिए:
D1 में गुरु = वृषभ
और
D9 में गुरु = वृषभ
इस स्थिति को आगे चलकर वर्गोत्तम की चर्चा में जोड़ा जा सकता है।
7. दूसरा उदाहरण — द्विस्वभाव राशि
मान लीजिए:
शुक्र = मिथुन 8°00′
मिथुन के नवांश:
तुला = 0°–3°20′
वृश्चिक = 3°20′–6°40′
धनु = 6°40′–10°
शुक्र 8° पर है।
अतः शुक्र तीसरे नवांश में है।
मिथुन का तीसरा नवांश = धनु
इसलिए:
D9 में शुक्र धनु राशि में होगा।
8. D9 में लग्न कैसे निर्धारित होता है?
यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
D9 का लग्न निकालने का तरीका भी ग्रहों जैसा ही है।
सबसे पहले D1 में लग्न की सटीक अंश स्थिति चाहिए।
मान लीजिए:
लग्न = सिंह 18°25′
सिंह के नवांश:
धनु — 0°–3°20′
मकर — 3°20′–6°40′
कुंभ — 6°40′–10°
मीन — 10°–13°20′
मेष — 13°20′–16°40′
वृषभ — 16°40′–20°
18°25′ छठे नवांश में है।
सिंह का छठा नवांश = वृषभ
अतः:
D9 लग्न = वृषभ
यही नवांश कुंडली का प्रथम भाव/लग्न बन जाएगा।
इसके बाद अन्य सभी ग्रहों को उनके-अपने नवांश राशियों में रखा जाता है।
9. D9 कुंडली बनाने की पूरी प्रक्रिया
कक्षा में विद्यार्थियों को यह 6 चरणों में सिखाएँ:
चरण 1
D1 कुंडली से ग्रहों की सटीक राशि और अंश लिखें।
चरण 2
प्रत्येक राशि के 30° को 9 भागों में बाँटें।
प्रत्येक भाग = 3°20′
चरण 3
ग्रह किस नवांश क्रमांक में है, यह निर्धारित करें।
चरण 4
राशि के चर/स्थिर/द्विस्वभाव होने के अनुसार नवांश की प्रारंभिक राशि निर्धारित करें।
चरण 5
उस क्रमांक की नवांश राशि ग्रह को दें।
चरण 6
इसी प्रक्रिया से लग्न सहित सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु-केतु के D9 स्थान निर्धारित करें।
11. D9 क्यों देखा जाता है?
अब फलित ज्योतिष का मुख्य भाग।
D9 को मुख्यतः निम्न विषयों के लिए देखा जाता है:
1. विवाह
विवाह की गुणवत्ता
वैवाहिक संबंध
जीवनसाथी का स्वभाव
वैवाहिक स्थिरता
विवाह के बाद जीवन में परिवर्तन
2. ग्रह की शक्ति
कई बार D1 में ग्रह अच्छी स्थिति में दिखाई देता है लेकिन D9 में कमजोर होता है।
या D1 में सामान्य दिखाई देने वाला ग्रह D9 में अत्यंत अच्छी स्थिति प्राप्त करता है।
इसलिए D9 ग्रह की सूक्ष्म स्थिति को समझने में सहायता करता है।
3. धर्म
D9 का संबंध धर्म, जीवन के सिद्धांतों और व्यक्ति की आंतरिक परिपक्वता से भी जोड़ा जाता है।
4. भाग्य की परिपक्वता
विशेष रूप से गुरु, नवम भाव, नवमेश और संबंधित ग्रहों को D1 के साथ D9 में देखने से व्यक्ति के जीवन में धर्म एवं भाग्य के विकास को समझने में सहायता मिलती है।
12. क्या D9 अकेले देखकर फलादेश किया जा सकता है?
नहीं।
यह विद्यार्थियों को बहुत स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए।
सही क्रम:
D1 → D9 → अन्य आवश्यक वर्ग → दशा → गोचर
D9, D1 का विकल्प नहीं है।
पहले D1 में योग और स्थिति देखें।
फिर D9 से उसकी पुष्टि, सूक्ष्म शक्ति और परिपक्व फल को समझें।
13. D1 और D9 का संबंध
इसे कक्षा में इस प्रकार समझाएँ:
D1 = जीवन का मुख्य आधार
D9 = उस आधार की सूक्ष्म गुणवत्ता और परिपक्वता
उदाहरण के लिए यदि D1 में शुक्र मजबूत है, तो विवाह एवं संबंधों के विषय में शुभ संकेत मिल सकते हैं।
लेकिन यदि D9 में शुक्र अत्यंत पीड़ित हो तो उस शुभता को बिना जाँच के पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसी प्रकार:
D1 में ग्रह मध्यम हो लेकिन D9 में स्वक्षेत्री/उच्च/मित्र राशि में हो, तो ग्रह के फल में आंतरिक मजबूती दिखाई दे सकती है।
लेकिन दोनों कुंडलियों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है।
14. D9 में सबसे पहले क्या देखें?
कक्षा में फलित की यह क्रम व्यवस्था रखें:
पहला — D9 लग्न
देखें:
D9 लग्न कौन-सी राशि है?
लग्नेश कहाँ है?
लग्न पर कौन से ग्रह दृष्टि डाल रहे हैं?
लग्न में कौन से ग्रह हैं?
लग्नेश की D9 स्थिति कैसी है?
दूसरा — D9 का लग्नेश
लग्नेश की:
राशि, भाव, उच्च/नीच, स्वक्षेत्र, मित्र/शत्रु राशि, युति,
दृष्टि, षड्बल आदि देखें।
तीसरा — D9 का सप्तम भाव
विवाह के लिए: - सप्तम राशि, सप्तमेश, सप्तम भाव में ग्रह, सप्तमेश की शक्ति, शुक्र, गुरु, D1 का सप्तम भाव एवं सप्तमेश, सबको मिलाकर देखें।
15. विवाह के लिए D9 कैसे पढ़ें?
एक व्यवस्थित सूत्र विद्यार्थियों को दें:
D1 सप्तम भाव → D1 सप्तमेश → शुक्र → गुरु → D9 लग्न → D9 सप्तम भाव → D9 सप्तमेश → D9 शुक्र → D9 गुरु → दशा
फिर आवश्यकता के अनुसार:
उपपद लग्न, नवम भाव, द्वितीय भाव तथा अन्य संबंधित संकेतक भी देखें।
इससे विद्यार्थी केवल “D9 का सातवाँ भाव देखकर विवाह बता देना” जैसी गलती नहीं करेंगे।
16. D9 में शुक्र का महत्व
विवाह के संदर्भ में शुक्र अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है।
देखें:
D1 में शुक्र, D9 में शुक्र, शुक्र का D9 भाव, शुक्र की राशि,
शुक्र की शक्ति, शुक्र पर पाप/शुभ प्रभाव, शुक्र का संबंध सप्तमेश से, शुक्र का संबंध लग्नेश से।
पुरुष की कुंडली में परंपरागत रूप से शुक्र को पत्नी/विवाह का प्रमुख कारक माना जाता है।
स्त्री की कुंडली में गुरु का भी विशेष महत्त्व माना जाता है।
लेकिन आधुनिक फलित में केवल लिंग आधारित एक ग्रह पर निर्भर न रहकर सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र, गुरु और संपूर्ण योग-संबंध देखना अधिक उचित है।
17. D9 में वर्गोत्तम क्या होता है?
यह D9 पढ़ाते समय अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
यदि D1 में ग्रह जिस राशि में है, D9 में भी उसी राशि में स्थित हो जाए तो वह ग्रह: वर्गोत्तम कहलाता है।
उदाहरण:
D1 में: सूर्य = मेष और D9 में भी: सूर्य = मेष
तो सूर्य वर्गोत्तम हुआ।
वर्गोत्तम को ग्रह की स्थिति की विशेष दृढ़ता के संकेत के रूप में देखा जाता है।
लेकिन:
वर्गोत्तम = हर परिस्थिति में शुभ होगा ऐसा कहना सही नहीं है।
ग्रह की प्राकृतिक प्रकृति, भावाधिपत्य, भावस्थिति, दृष्टि, युति और संपूर्ण कुंडली देखना आवश्यक है।
18. D9 में उच्च और नीच ग्रह
यदि कोई ग्रह D9 में उच्च राशि में हो तो उसकी सूक्ष्म शक्ति का शुभ संकेत मिल सकता है।
यदि नीच राशि में हो तो ग्रह के फल में कमजोरी का संकेत मिल सकता है।
लेकिन फिर वही नियम:
केवल D9 की एक स्थिति देखकर अंतिम फल नहीं।
D1 + D9 + दशा + संबंधित भाव = समग्र फल।
19. D9 में भावों का अर्थ
D9 में भी 12 भाव होते हैं।
संक्षेप में:
भाव
मुख्य विषय
1
स्वयं, व्यक्तित्व, जीवन-दृष्टि
2
परिवार, वाणी, विवाह के बाद परिवार
3
प्रयास, साहस, संचार
4
सुख, गृहस्थ सुख, मानसिक शांति
5
बुद्धि, संस्कार, प्रेम, संतान
6
संघर्ष, ऋण, रोग, विवाद
7
विवाह, जीवनसाथी, साझेदारी
8
वैवाहिक गहराई, परिवर्तन, संयुक्त विषय
9
धर्म, भाग्य, गुरु, सिद्धांत
10
कर्म, उत्तरदायित्व, कार्य
11
लाभ, इच्छापूर्ति, सामाजिक संबंध
12
व्यय, त्याग, शयन, निजी जीवन
20. D9 फलित का स्वर्णिम नियम
विद्यार्थियों को यह सूत्र लिखवा दें:
“नवांश को जन्मकुंडली से अलग करके नहीं, बल्कि जन्मकुंडली के साथ पढ़ना चाहिए।”
और दूसरा:
“D1 घटना का आधार बताता है, D9 उस घटना की सूक्ष्म गुणवत्ता और ग्रह की शक्ति को समझने में सहायता करता है।”
21. D9 फलादेश की आदर्श क्रम-पद्धति
किसी भी कुंडली में D9 पढ़ते समय:
① D1 लग्न और लग्नेश
↓
② D1 संबंधित भाव
↓
③ संबंधित भावेश
↓
④ कारक ग्रह
↓
⑤ D9 लग्न
↓
⑥ D9 लग्नेश
↓
⑦ D9 संबंधित भाव
↓
⑧ D9 संबंधित भावेश
↓
⑨ संबंधित कारक ग्रह की D9 स्थिति
↓
⑩ वर्गोत्तम/उच्च/नीच/स्वक्षेत्र आदि
↓
⑪ D1 और D9 के बीच सामंजस्य
↓
⑫ दशा
↓
⑬ गोचर
इस क्रम से फलादेश करने पर विश्लेषण अधिक व्यवस्थित होगा।
22. विद्यार्थियों को होने वाली सामान्य गलतियाँ
गलती 1
D9 को केवल विवाह की कुंडली मानना।
गलती 2
D9 देखकर अकेले फलादेश करना।
गलती 3
ग्रह का नवांश निकालते समय 3°20′ की सीमा गलत लगाना।
गलती 4
चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के प्रारंभिक नवांश को भूल जाना।
गलती 5
D1 और D9 के संबंध को न देखना।
गलती 6
सिर्फ उच्च/नीच देखकर फलादेश कर देना।
गलती 7
वर्गोत्तम को स्वतः पूर्ण शुभ मान लेना।
गलती 8
दशा को छोड़ देना।
23. कक्षा में अभ्यास के लिए सरल उदाहरण
विद्यार्थियों को ये तीन ग्रह देकर नवांश निकलवाएँ:
सूर्य — मेष 12°15′
मेष का:
0–3°20′ मेष
3°20′–6°40′ वृषभ
6°40′–10° मिथुन
10°–13°20′ कर्क
अतः सूर्य का D9:
कर्क
दूसरा:
चंद्र — वृषभ 15°00′
वृषभ का पाँचवाँ नवांश:
वृषभ
अतः:
D9 चंद्र = वृषभ
तीसरा:
मंगल — मिथुन 22°00′
मिथुन:
1 तुला
2 वृश्चिक
3 धनु
4 मकर
5 कुंभ
6 मीन
7 मेष
20°00′–23°20′ = सातवाँ नवांश
अतः:
D9 मंगल = मेष
इस प्रकार विद्यार्थियों को पहले स्वयं गणना करवाएँ, फिर उत्तर बताएं।
सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष
D9 अर्थात नवांश को समझने के लिए विद्यार्थियों को चार बातें बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए:
1. 30° ÷ 9 = 3°20′
2. प्रत्येक ग्रह की D9 राशि उसके D1 के सटीक अंश से निर्धारित होती है।
3. नवांश राशि का प्रारंभ चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के नियम से निर्धारित होता है।
4. फलादेश में D1 और D9 को साथ पढ़ना चाहिए; D9 अकेले अंतिम निर्णय का आधार नहीं है।
यदि आप इसे आगे उच्च स्तर की पाराशरी कक्षा के रूप में पढ़ाना चाहते हैं, तो अगला चरण होना चाहिए—�“D9 के 108 नवांश, नवांश गणना की गणितीय विधि, D9 में ग्रहों की शक्ति, वर्गोत्तम, पुष्कर नवांश, वेशी/वोशी आदि योगों से संबंध, D1+D9 संयुक्त फलादेश तथा विवाह के 5–6 वास्तविक उदाहरणों पर पूर्ण केस-स्टडी”।
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