विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥
विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर विद्या आश्रय देती है, विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इस लिए हमारे ऋषि महर्षियों ने कहा है कि अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या के अधिकारी बनो । सनातन धर्म संस्कृति में मां शारदा को विद्या की देवी कहा जाता है। मां शारदा की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा हेतु प्रत्येक वर्ष में एक विशिष्ट शुभ मुहूर्त होता है बसन्त पंचमी का। आज हम बसन्त पंचमी के दिन मां सरस्वती की कृपा प्राप्ति के लिए एक सिद्ध मन्त्र इस वीडियो के माध्यम से आपको बताएंगे। अतः आप वीडियो को अंत तक अवश्य देखें एवं वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
बसंत पंचमी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। आज ही के दिन से भारत में वसंत ऋतु का आरम्भ होता है। इस दिन विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी की पूजा सूर्योदय के बाद और दिन के मध्य भाग से पहले की जाती है। इस समय को पूर्वाह्न भी कहा जाता है। यदि पंचमी तिथि दिन के मध्य के बाद शुरू हो रही है तो ऐसी स्थिति में वसंत पंचमी की पूजा अगले दिन की जाएगी। हालाँकि यह पूजा अगले दिन उसी स्थिति में होगी जब तिथि का प्रारंभ पहले दिन के मध्य से पहले नहीं हो रहा हो; यानि कि पंचमी तिथि पूर्वाह्नव्यापिनी न हो। बाक़ी सभी परिस्थितियों में पूजा पहले दिन ही होगी। इसी वजह से कभी-कभी पंचांग के अनुसार बसन्त पंचमी चतुर्थी तिथि को भी पड़ जाती है। इस दिन विद्या प्राप्ति के अभिलाषी भक्तों द्वारा मां सरस्वती की पूजा एवं प्रेम और वैवाहिक सुख की प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों द्वारा देवी रति एवं भगवान कामदेव की पूजा की जाती है। यदि बसन्त पंचमी के दिन पति-पत्नी भगवान कामदेव और देवी रति की पूजा षोडशोपचार विधि से करते हैं तो उनके वैवाहिक जीवन में अपार ख़ुशियाँ आती हैं और उनका रिश्ता भी दृढ़ होता है।
विद्या प्राप्ति के लिए बसन्त पंचमी के दिन पूर्ण विधि विधान से माता सरस्वती की पूजा अर्चना करनी चाहिए। इस दिन जो साहित्य संगीत कला से जुड़े हुए व्यक्ति हैं, उन्हें भी अपनी कलाओं, अर्थात पुस्तकों, वाद्ययंत्रों या कलाकृतियों की भी पूजा करनी चाहिए। बसन्त पंचमी के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व जगकर, शौच स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत होकर सर्वप्रथम प्रकट होते भगवान सूर्य को अरुणोदय काल में गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार अर्घ्य प्रदान करें। इसके बाद नित्य पूजा के उपरांत लकड़ी की एक चौकी पर पीले रंग का सूती कपड़ा बिछाकर, उस पर रोली या चन्दन से अष्टदल बनाएं। फिर अष्टदल के ऊपर एक कलश की स्थापना कर, उसके ऊपर रखे पूर्णपात्र के ऊपर सरस्वती माता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फिर माता सरस्वती का हाथ जोड़कर कोई एक ध्यान मन्त्र का उच्चारण करते हुए एकाग्रचित्त होकर ध्यान करें। ततपश्चात पाद्य अर्घ्य आचमनी पंचामृत गन्ध अक्षत पुष्प पुष्पमाला धूप दीप नैवेद्य आदि जो भी उपलब्ध हो उस सामग्री से माता सरस्वती की भाव से पूजा करें। फिर कोई एक स्तुति गाकर, माता की आरती उतारें। फिर रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से इस मंत्र का इक्कीस माला जप करें।
ॐ सर्व चैतन्य रूपां तामाद्यां विद्यांं च धी मही बुद्धिंं या नः प्रचोदयात।।
इस सिद्ध मन्त्र के प्रभाव से मेधा शक्ति में वृद्धि होती है। माता सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही किसी भी विषय को सीखने में आ रही कठिनाइयां दूर होती हैं। पढाई के क्षेत्र में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए इस मंत्र का अनुष्ठान वैदिक कर्मकाण्डी ब्राह्मणों के द्वारा किसी शुभ मुहूर्त में करवाना चाहिए। इससे शिक्षा के क्षेत्र में उपस्थित समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। आजकल के समय में माता पिता की सबसे बड़ी चिंता का मुख्य कारण भी यही होता है कि बच्चों को किसी श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में प्रवेश मिल जाए। किन्तु अनेक बार अथक प्रयासों के उपरांत भी सफलता मिल नहीं पाती। अतः ईश्वर में आस्था रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि शिक्षा प्राप्ति के मार्ग में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए तथा अपने कार्य की सिद्धि के लिए जप पूजन आदि का अवलम्बन स्वीकार करना चाहिए। यही हितकर मार्ग है। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।
https://youtu.be/lxxfFF64ALo
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