नमस्कार। आध्यात्म संस्कृति परिवार में आपका हार्दिक अभिनंदन है। सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी घर भी होय |
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय।।अर्थात पुत्र, सुंदर पत्नी और धन सम्पति यह तो पापी मनुष्य के पास भी हो सकती है | परन्तु संत का समागम अर्थात संत का संग और प्रभु की कथा, हरि चर्चा यह दोनों ही इस भौतिक जगत में दुर्लभ है। और जिस किसी के पास इस कलिकाल में, आजीविका चलाने हेतु आय का समुचित साधन, उत्तम स्वास्थ्य, संस्कारी परिवार, के साथ साथ भगवान का नाम लेने का समय है वास्तव में उस पर भगवान की केवल कृपा नहीं, अपितु अति कृपा है। सुखी जीवन के लिए बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। सुख और आनंद मन की अनुभूति हैं। जिन्हें सीमित संसाधनों का समुचित उपयोग कर, जो प्राप्त है उसी पर गर्व कर के, अनुभव किया जा सकता है। यदि मन में तृष्णाऐं हैं, तो बड़े बड़े महलों में रहते हुए, अपार धन संपदा होते हुए भी व्यक्ति सदैव अशांत और दुःखी ही रहता है।
एक नगर का राजा जिसे ईश्वर ने सब कुछ दिया, एक समृद्ध राज्य, सुशील और गुणवती पत्नी, संस्कारी सन्तान सब कुछ था उसके पास पर फिर भी दुःखी का दुःखी ही रहता था। एक बार वो भ्रमण करते हुए एक छोटे से गाँव मे पहुँचा जहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकीया बेच रहा था और साथ ही उसने कुछ मटकीयों मे यात्रियों को पिलाने के लिए पानी भर रखा था। वही छाया में लेटे लेटे आनंद से वह कुम्हार हरिभजन गा रहा था। राजा वहाँ आया और भगवान भोले बाबा के दर्शन किये।फिर कुम्हार के पास आया तो कुम्हार ने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया! राजा कुम्हार को इस अवस्था में भी परम आनंदित और सुखी देखकर बड़ा प्रभावित हुआ। और विचार करने लगा की ये कुम्हार इतनी सी मटकीयों को बेच कर क्या कमाता होगा? राजा ने पूछा, क्यों भाई प्रजापति जी! मेरे साथ नगर चलोगे? वहाँ चलना और वहाँ खुब मटकीया बनाना। कुम्हार बोला, फिर उन मटकीयों का क्या करूँगा महाराज ? अरे क्या करेगा? बहुत बड़ा नगर है। तेरी खूब सारी मटकियां बिकेंगी। खुब पैसा आयेगा तुम्हारे पास!
फिर क्या करूँगा उस पैसे का? कुम्हार ने फिर से प्रश्न किया। तो राजा बोले, अरे पैसे का क्या करेगा? अरे क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि धन दौलत, पैसा ही सबकुछ है?
पैसे से तुम अपनी सारी इच्छाओं को पूरा कर सकते हो। और इच्छाओं की पूर्ति होने पर तुम आनंद से रहोगे। फिर आराम से भगवान का भजन करना।
कुम्हार बड़े गम्भीर भाव से बोला। क्षमा करना राजन! पर आप मुझे ये बताईये की अभी मै क्या कर रहा हुं और हाँ पुरी ईमानदारी से विचार करके बताना। काफी सोच विचार किया राजा ने और मानो इस सवाल ने राजा को अंदर तक झकझोर दिया।
राजा कहने लगे, हाँ प्रजापति जी आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हो और जहाँ तक मुझे दिख रहा है आप पुरे आनन्द मे हो।
हां राजन यही तो विचारणीय है कि आनन्द पैसे से प्राप्त नही किया जा सकता है! यदि जीवन में शान्ति की अभिलाषा है। आनंद प्राप्त करना चाहते हैं तो जो कुछ भी आपके पास उपलब्ध है, उसी से परोपकार कीजिए। यदि जीवन में देना सीख लिया तो समझ लेना आपने आनन्द की राह पर कदम रख लिया! स्वार्थ को त्यागो परमार्थ को चुनो। अधिकांशतः लोगो के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है की जो कुछ भी उनके पास है वो उसमे सन्तुष्ट नही है और बस जो नही है उसे पाने के लिए दुःखी है। कुम्हार के पास घड़े हैं तो वह राहगीरों को पानी पिला रहे हैं। उसी से उन्हें सुख और आनंद की प्राप्ति हो रही है। अतः जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनमें खुश रहना सीख लो दुःख अपने आप चले जायेंगे और जो नही है क्यों उसके चक्कर मे दुःखी रहते हो!
आत्मसंतोष से बड़ा कोई सुख नही और जिसके पास सन्तोष रूपी धन है वही सबसे बड़ा सुखी है और वही आनन्द मे है और सही मायने मे वही राजा है। क्योंकि
चाह गई चिंता गई मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ ना चाहिए, सो ही शहंशाह।।
आध्यात्म संस्कृति परिवार आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।
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