रविवार, 9 मई 2021

भक्ति में विश्वास

नमस्कार। आध्यात्म संस्कृति परिवार में आपका हार्दिक अभिनंदन है। महाभारत का एक हृदय विदारक प्रसंग है चीर हरण। दुर्योधन द्वारा दुशासन को द्रोपदी को नग्न कर देने के लिए जब कहा गया, तो द्रोपदी ने उस सभा में उपस्थित सभी ज्येष्ठ श्रेष्ठ योद्धाओं, जिसमें पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, आदि सभी थे, उन सभी से स्वयं की सहायता हेतु विनती की गई। किन्तु सभी सिर झुकाकर बैठे रहे। फिर द्रोपदी ने कोई सहायता ना मिलते देख स्वयं ही दुशासन का प्रतिकार किया। क्योंकि वह भी तो क्षत्रिय कन्या थी, उसे भी अपने बल पर विस्वास था। किंतु हुआ क्या? दुशासन के आगे वह भी हार गई। और अंत में स्वयं को द्रोपदी ने भगवान कृष्ण के शरणागत कर दिया। जग विदित है कि भगवान ने किस प्रकार वस्त्रावतार धारण कर द्रोपदी की लाज रखी। हम सब भी जब तक स्वयं के शारिरिक बल,  धन के गर्व आदि में होते हैं, तब तक परमात्मा हमारी कोई सहायता नहीं करते। एक दृष्टांत के माध्यम से समझें, द्वारका में भगवान कृष्ण भोजन के लिए बैठे थे। एक दो कौर मुँह में लेते ही अचानक उठ खड़े हुए। बड़ी व्यग्रता से द्वार की तरफ भागे, फिर लौट आए उदास और भोजन करने लगे। रुक्मणी ने पूछा," प्रभु,थाली छोड़कर इतनी तेजी से क्यों गये ? और इतनी उदासी लेकर क्यों लौट आये?" कृष्ण ने कहा, " मेरा एक प्रेमी भक्त राजधानी से गुजर रहा है। नंगा फ़कीर है। इकतारे पर मेरे नाम की धुन बजाते हुए मस्ती में झूमते चला जा रहा है। लोग उसे पागल समझकर उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। उस पर पत्थर फेंक रहे हैं। और वो है कि मेरा ही गुणगान किए जा रहा है। उसके माथे से खून टपक रहा है। वह असहाय है, इसलिए दौड़ना पड़ा " " तो फिर लौट क्यों आये?" कृष्ण बोले, " मैं द्वार तक पहुँचा ही था कि उसने इकतारा नीचे फेंक दिया और पत्थर हाथ में उठा लिया। अब वह खुद ही उत्तर देने में तत्पर हो गया है। उसे अब मेरी जरूरत न रही। जरा रूक जाता, *मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास रखता तो मैं पहुँच गया होता* 
यही पर आकर हम अपने भगवान् पर विश्वास खो देते है।भगवान् जरा सी परीक्षा लेते है और हम धैर्य नहीं रख पाते।इसलिए सर्वप्रथम अपनी भक्ति को दृढ बनाना परम् आवश्यक है। आध्यात्म संस्कृति परिवार आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

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जय श्री श्याम

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Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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