नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। विवाह गृहस्थाश्रम की आधारशिला है और उसी के माध्यम से मनुष्य, देव, ऋषि एवं पितृ
आदि ऋण त्रय से उऋण होकर परम कल्याण को प्राप्त कर सकता है। तद् हेतु उत्तम लक्षणों
जैसे-सुन्दर, सुशीला, मधुरभाषिणी एवं पतिव्रता कन्या तथा कर्त्तव्यनिष्ठ, स्वस्थ, शिक्षित, सदाचारी
एवं सुसंस्कृत लड़के के साथ विवाह सम्बन्ध शुभ होता है। विवाह सम्बन्ध करने से पूर्व लड़के- लड़की का कुल, गोत्र, सनाथता, विद्या, धन, स्वास्थ्य और आयु-इन सात गुणों की परीक्षा करने के पश्चात् ही कुण्डलियों में परस्पर मंगलीक आदि अरिष्ट योगों तथा वर्ग, कर्तरि एवं वर्णादि अष्टकूटों का विचार करना चाहिए। मेलापक प्रक्रिया में मंगलीक और अष्टकूट तत्त्वों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि वर- कन्या के दाम्पत्य जीवन को अधिकाधिक सुखी एवं मंगलमय बनाने के लिए उनके जन्म नक्षत्रों एवं जन्म कुण्डलियों के अनुसार मिलान करना अत्यन्त आवश्यक है। उपयुक्त मिलान न होने की स्थिति में पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन में-विचार वैमनस्य, सन्तान कष्ट, वैधव्य,
वैधुर्यादि दोष अथवा पारिवारिक कष्ट होने की सम्भावनाएं हो जाती है। जन्म कुंडली मिलान के मुख्य तत्व अष्टकूट के विवेचन के अंतर्गत मंगलीक दोष का पूर्ण विश्लेषण हम पूर्व के वीडियो में कर चुके हैं। आज हम नाड़ी दोष के करे में विस्तार से चर्चा करेंगे। आप वीडियो को अंत तक पूरा अवश्य देखें, साथ ही वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
यहाँ पर विशेष ध्यान रहे,कि अष्ट कूटों का निर्णय वर-कन्या के जन्म नक्षत्रों से ही किया जाता है। अष्टकूटों के आठ कूट अर्थात आठ अंग इस प्रकार हैं
(१) वर्ण (२) वश्य (३) तारा (४) योनि (५) ग्रहमैत्री (६) गणमैत्री (७) भकूट तथा (८) नाड़ी -ये आठ कूट हैं।
प्रत्येक कूट की क्रम संख्या अपने श्रेष्ठ गुणों की सूचक है। वर्णादि अष्टकूटों में गुणों का कुल योग ३६ होता है। इसमें क्रमानुसार वर्ण का १ गुण, वश्य के २, तारा के ३, योनि के ४, ग्रहमैत्री के ५, गण-मैत्री के ६, भकूट के ७ एवं नाड़ी के ८ (आठ) गुण होते हैं। वर्णादि कुल ३६ गुणों के योग में से १ से १७ तक गुण मिलान तुच्छ एवं निन्दनीय अर्थात त्याज्य माने जाते हैं, १८ से २१ तक मध्यम एवं ग्राह्य और २२ से २८ तक उत्तम तथा २९
से ३६ तक गुण सर्वोत्कृष्ट मिलान माना जाता है।
एकैकवृद्धितो ज्ञेया वर्णादीनां गुणाः क्रमात् ।
विवाह शुभदस्तेषां गुणे त्वष्टादशाधिके ।
इन समस्त अष्टकूट निर्धारक तत्त्वों में नाड़ी का विशेष महत्त्व है। वर-कन्या की एक ही नाड़ी होना विवाह में अशुभ माना गया है। 36 गुणों में से इसके 8 गुण होते
हैं। भिन्न नाड़ी के आठ गुण तथा नाड़ी समान होने पर गुणाभाव अर्थात् शून्य गुण होता है।
अश्विनी आदि २७ जन्म नक्षत्रों को तीन नाड़ियों में विभाजित किया गया है- आदि, मध्य और अन्त्य । इनमें से आदि नाड़ी के अंतर्गत अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, और पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र आते हैं। दूसरी है मध्य नाड़ी। इसके अंतर्गत भरणी मृगशिरा पुष्य पूर्वाफाल्गुनी चित्रा अनुराधा पूर्वाषाढ़ा धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र आते हैं।
तीसरी है अन्त्य नाड़ी।। इसके अंतर्गत कृतिका रोहिणी आश्लेषा मघा स्वाति विशाखा उत्तराषाढ़ा श्रवण और रेवती नक्षत्र आते हैं।
वर-कन्या का जन्म नक्षत्र एक ही नाड़ी में पड़ना विवाह में अशुभ माना जाता है। बृहज्योतिषसार ग्रन्थ के अनुसार वर कन्या दोनों की आदि नाड़ी हो, तो विवाह के पश्चात् उनका परस्पर वियोग होता है। मध्य नाड़ी हो,
तो दोनों की हानि तथा अन्त्य नाड़ी हो तो वैधव्य या अतिशय दुःख होता है।
वर-कन्या के नक्षत्र एक ही नाड़ी वाले हों, तो नाड़ी दोष माना जाता है। एक समान नाड़ी वाले वर-कन्या को ज्योतिष ग्रन्थों ने बहुत अशुभ माना है। विवाह में नाड़ी दोष को आचार्यों द्वारा विशेष महत्त्व दिया गया है। नारद ऋषि के अनुसार-
एक नाडी विवाहश्च गुणैः सर्वे समन्वितः।
वर्जनीयः प्रयलेन दम्पत्योः निधनं यतः॥
अर्थात् विवाह मिलान में चाहे सब गुण मिल रहे हों, परन्तु वर-कन्या की एक ही नाड़ी का प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिए। यह दोष दम्पत्ति के लिए अनिष्टकर घातक माना जाता है।
नाड़ी दोष में एक ही नक्षत्र और समान नक्षत्र चरण होने पर भी सभी आचार्यों ने एकमत से इसे अनिष्टकारी कहा है।
कुछ ज्योतिषीय ग्रन्थों एवं आचार्यों ने नाड़ी दोष के कुछ परिहार भी बतलाए हैं। जैसे, वर-कन्या की एक ही राशि हो, परन्तु नक्षत्र अलग-अलग हों। तो नाड़ी दोष नहीं होता।
विवाह वृन्दावन के अनुसार वर-कन्या दोनों का जन्म नक्षत्र एक हो, परन्तु राशियाँ भिन्न-भिन्न हों, तो नाड़ी दोष
अविचारणीय है।
या वर-कन्या, दोनों का नक्षत्र एक हो, परन्तु चरण भिन्न-भिन्न हों तो नाड़ी दोष नहीं होता।
नाड़ी दोषस्तु विप्राणां वर्णदोषश्च क्षत्रिये। गणदोषश्च वैश्येषु योनि दोषस्तु पाद्जान्॥
अर्थात नाड़ी दोष ब्राह्मणों के लिए, वर्णदोष क्षत्रियों के लिए, गण दोष वैश्यों के लिए तथा
योनि दोष शूद्रों के लिए विशेष रूप से विचारणीय होता है। यह अनेक मत भी देखने को मिलते हैं, किन्तु किसी भी वाद विवाद में शास्त्र को ही निर्णायक माना जाता है। अतः नाड़ी दोष का विचार सभी जाति के वर-कन्याओं के मिलान के सम्बन्ध में समान रूप से करना चाहिए।
ज्योतिष तत्त्व प्रकाश ग्रन्थ के अनुसार, यद्यपि वर-कन्या का एक ही नक्षत्र अथवा एक ही राशि का होने से नाड़ी दोष का परिहार माना गया है, परन्तु यदि दोनों के नक्षत्र चरणों में समानता हो अथवा नक्षत्रों में पाद वेध हो,
तो विवाह सर्वदा त्याज्य एवं वर्जित होगा।
एक नक्षत्र जातानां नाड़ी दोषो न विद्यते। अन्य‘नाड़ीवेधेषु विवाहो वर्जितः सदा॥
यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि किसी नक्षत्र के प्रथम पाद और चतुर्थ पाद तथा दूसरे एवं तीसरे पाद
में परस्पर वेध होना भी पाद-वेध कहलाता है।
विद्वानों के अनुसार गण, योनि, षडाष्टक, द्विद्वादश, नाड़ी आदि अष्टकूटों में परिहार वाक्य उपलब्ध हो जाने पर भी अपनी शक्ति एवं सामर्थ्यानुसार यथोचित संख्या में जप, पाठ, दानादि अवश्य करवा लेना चाहिए।
बृहस्पति संहिता के अनुसार नाड़ी दोष की शान्ति के लिए श्री महामृत्युञ्जय मन्त्र का जाप करके ब्राह्मणों को गौ, वस्त्र, अनाज, घृतादि सहित भोजन एवं सुवर्ण,
चांदी, रत्नों की दक्षिणा आदि से सन्तुष्ट करने से नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।
षडाष्टके गोमिथुनं प्रदेयं, कास्यं सरूप्यं नवपंचमेच।
नाड्यां सुवर्णान्नमथो सुधेनुं द्विद्वादशे ब्राह्मणतपर्णं च ॥
अर्थात् शत्रु षडाष्टक दोष होने पर गोमिथुन अर्थात (एक गाय,और एक बैल), नवपंचम में चांदी- और कांसे का बर्तन, नाड़ी दोष में गाय, अन्न, सुवर्ण सहित वस्त्र का दान तथा द्विद्वादश में ब्राह्मणों एवं सुपात्र जनों को यथाशक्ति भोजन, दान-दक्षिणादि द्वारा सन्तुष्ट करने से मिलान सम्बन्धी अष्टकूट दोषों की शान्ति हो जाती है।
वर-कन्या की कुण्डली में नाड़ी-दोष हो, परन्तु अत्यन्त आवश्यक परिस्थिति वश विवाह करना आवश्यक हो, तो उस स्थिति में वरकन्या का अर्ककुम्भ विवाह, महामृत्युजंय जप, सुवर्ण, रत्न, चांदी, अनाज आदि के दान, ब्राह्मण भोजन आदि के पश्चात् ही विवाह कार्य करना शास्त्र सम्मत है। मुहूर्त गणपति के अनुसार,
हेमाज्यरत्नगोदानं मृत्युञ्जयजपस्तथा।
कुर्यादवश्यमुद्वाहे नाडीदोषाऽपनुत्तये॥
वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।
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