शुक्रवार, 14 मई 2021

"मृत्यु से भय कैसा" शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को अंतिम उपदेश

नमस्कार। आध्यात्म संस्कृति परिवार आपका हार्दिक अभिनंदन करता है। मुट्ठी में पकड़ी हुई सूखी रेत की भांति जो निरन्तर धीरे धीरे सरकता जा रहा है,  वही संसार है। चाहे कोई इसमें कितना भी आसक्त हो जाए, चाहे कोई इसे कितना भी प्रेम कर ले, यह छूटता अवश्य है। और वास्तव में जो इस बात को जितना शीघ्र ग्रहण कर ले, उसे इस नष्वर संसार को छोड़ने में कष्ट उतना ही कम होता है। इसका नाम ही है मृत्यलोक। यहां जन्म के साथ ही मृत्यु भी निश्चित है। महत्व केवल इतना है कि आप जिए कैसे। ध्यान दीजिए। महत्वपूर्ण यह बिल्कुल भी नहीं है कि आप कितना जिए। महत्व केवल इस बात का है कि आप जिए कैसे। आपका जीवन पशुवत, केवल अपने लिए, अपनों के लिए रहा,  या सार्वभौम समस्त प्राणी मात्र के लिए? इस मृत्यलोक में महत्ता दिव्यजीवी की है, दीर्घजीवी की नहीं। सौ वर्ष की आयु तक जी लिए। सम्पूर्ण जीवन का विचार किया तो पाया कि जन्म से लेकर मृत्यु शय्या तक की यात्रा बस खाने पीने सोने संग्रह करने में ही बीत गई। अनमोल मानव जीवन निर्रथक हो गया। न जाने किन पूण्य कर्मों से, या परमात्मा की अकारण करुणा से प्राप्त हुआ था। पर हमने स्वयं व्यर्थ कर दिया। अंग शिथिल पड़ गए, साधन अब सम्भव नहीं, तो फिर मुक्ति कैसे सम्भव है। किंतु उस परमपिता ने फिर भी एक ऐसा साधन मानव की मुक्ति के लिए बता दिया, जिसे अंत समय में यदि अपना लिया तो मुक्ति निश्चित है। और मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य भी यही है। जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः। की इस मानव जीवन के अंत समय में भगवान नारायण की स्मृति हो आए। किन्तु यह इतना सहज है नहीं। क्योंकि जब जीवन पर्यन्त नाम का अभ्यास किया ही नहीं तो अंत समय में मुख से ईश्वर का नाम निकलेगा कैसे? विचार कीजिए। जीव तो अंतकाल में यमदूतों को देखकर, मृत्यु भय से ही भयाक्रांत रहता है। फिर कहां उसे भगवान का नाम स्मरण होगा। अंत समय में नाम तभी निकल सकता है जब जीवन पर्यन्त आपने नाम जप का अभ्यास किया हो। 
राजन् परीक्षित को श्रीमद्भागवत महापुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक ( सर्प ) के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु होने का केवल एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीछित का शोक और मृत्यु का भय दूर नही हुआ.....!!!
अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी ने राजन परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि पड़ गई और भारी वर्षा पड़ने लगी। जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे। वह राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा। रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी। उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की। बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी - कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं।  ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।। इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा। राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है। बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।
वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा। राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा, " परीक्षित ! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था ?
परीक्षित ने उत्तर दिया," भगवन् ! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है। " श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा, " हे राजा परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।
इस मल-मूत्र की गठरी देह में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक
जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?" राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए। वास्तव में यही सत्य है। जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवन् ! मुझे यहाँ इस कोख से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन - सुमिरन करूँगा।
और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो ( उस राजा की तरह हैरान होकर ) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया ( और पैदा होते ही रोने लगता है )
फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक
उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।
यही हम सबकी स्थिति है। कोई भी यहां से जाना ही 
नहीं चाहता, किन्तु जिसकी भी यहां अवधि पूर्ण होगी यहां से जाना तो पड़ेगा ही। स्वयं विचार कीजिए। और अभय रहिये । आध्यात्म संस्कृति परिवार आपके मंगलमय दिव्य जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

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Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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