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सनातन धर्म में देव पूजन के उपरांत आरती ग्रहण कर , चरणामृत लेकर, प्रसाद लिया जाता है। और तभी पूजन पूर्ण भी माना जाता है। किंतु पूजन की किसी भी क्रिया का एक विशेष विधान और महत्व होता है। अतः किसी भी देवपूजन में हम जो कुछ भी क्रियाएं करते हैं, उनके पीछे बहुत गूढ़ रहस्य होते हैं। पूजन करने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह जो कुछ भी कर रहा है, उसके बारे में सही जानकारी भी प्राप्त करे। वैसे तो देव पूजन भाव प्रधान होता है। कहा गया है कि जिस प्रकार भूमि पर पड़ा हुआ बीज, उल्टा गिरे या सीधे, उगता अवश्य है, ठीक उसी प्रकार किसी भी देवता का पूजन अवश्य ही फलदाई होता है। किंतु यह भक्ति मार्ग है। भक्ति मार्ग भाव प्रधान है। यहां कामना रहित पूजा होती है। और जब पूजन निष्काम भाव से किया जाए, तो पूजन सामग्री, पूजन विधि, या अन्यान्य साधन का महत्व गौण हो जाता है। और जब किसी भी देवता का पूजन, सकाम, अर्थात किसी भी तरह की कामना की पूर्ति करने के लिए किया जाता है, तो पूजन विधि, पूजन सामग्री, मुहूर्त, और जो भी पूजन आप कर रहे हैं उसका समुचित ज्ञान होना भी परमावश्यक होता है। क्योंकि जो भी पूजन कर्म हम करते हैं, यदि उसे क्यों किया जाता है, यह हमें पता ही न हो तो हमारी भक्ति अंधभक्ति कहलाती है।अतः यह आवश्यक है कि पूजन के अंतर्गत आने वाली समस्त क्रियाओं को ध्यान से समझें। और यदि स्वयं ना समझ पाएं तो पूजन करवाने वाले आचार्य जी से ही शंकाओं के निवारण हेतु निवेदन करें। हमें बहुत बार यह देखने को मिलता है कि बहुत से यजमानों को तो पंचामृत और चरणामृत में अंतर ही नहीं पता होता है।
चलिए आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं। पहले पंचामृत को समझें।
पंचामृत शब्द का शाब्दिक अर्थ है पांच अमृत। और यह पांच अमृत हैं, दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर। इन्ही पांच वस्तुओं को मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है। और इसी पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया जाता है। और भगवान का स्नान, अभिषेक किया हुआ जो पंचामृत होता है वही चरणामृत होता है। पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत कई रोगों में लाभ-दायक और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। इसका एक आध्यात्मिक पहलू भी है। वह यह कि पंचामृत की पांचों वस्तु आत्मोन्नति के 5 प्रतीक हैं। जैसे - दूध
दूध पंचामृत का प्रथम भाग है। यह शुभ्रता का प्रतीक है, अर्थात हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए। दूसरा है दही- दही का गुण है कि यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है। दही चढ़ाने का अर्थ यही है कि पहले हम निष्कलंक हो सद्गुण अपनाएं और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं। तीसरा है घी- घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतीक है। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो, यही भावना है। चौथा है शहद- शहद मीठा होने के साथ ही शक्तिशाली भी होता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कुछ नहीं कर सकता, तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है। और पांचवां है शक्कर- शक्कर का गुण है मिठास, शकर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोलें। मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है और इससे मधुर व्यवहार बनता है। इन सभी गुणों से हमारे जीवन में सफलता प्राप्त होती है।भगवान को अर्पित पंचामृत का सेवन करने से शरीर पुष्ट और रोगमुक्त रहता है। पंचामृत से जिस तरह हम भगवान को स्नान कराते हैं, ऐसा ही स्वयं भी स्नान करने से शरीर की कांति बढ़ती है। अब चरणामृत को समझें। चरणामृत का शाब्दिक अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत। भगवान को पंचामृत या शुद्ध जल से स्नान करवाने पर वह पंचामृत या जल चरणामृत कहलाता है। और पूजन के उपरांत इसे तीन आचमनी मन्त्र का उच्चारण करते हुए पिया जाता है। चरणामृत लेने का मन्त्र इस प्रकार है।
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।।अर्थात भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है। यह औषधि के समान है। जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है।
चरणामृत ग्रहण करने के बाद बहुत से लोग सिर पर हाथ फेरते हैं, लेकिन शास्त्रीय मत है कि ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है। चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए और श्रद्घाभक्तिपूर्वक मन को शांत रखकर ग्रहण करना चाहिए। इससे चरणामृत अधिक लाभप्रद होता है। चरणामृत लेने के उपरांत हाथ अवश्य धो लेने चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु आयुर्वेद की दृष्टि से भी चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार स्वर्ण, पीतल आदि धातु से निर्मित भगवान के श्री विग्रह को करवाए गए स्नान से प्राप्त चरणामृत में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। यह पौरूष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी माना जाता है। स्नान अभिषेक के समय भगवान को चढाई गई तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता हैं। स्वास्थ्य लाभ के साथ ही साथ चरणामृत बुद्घि, स्मरण शक्ति को बढ़ाने
में भी कारगर सिद्ध होता है। हम आशा करते हैं कि आप पंचामृत और चरणामृत का भेद अच्छे से समझ चुके होंगे। ज्ञान बांटने से बढ़ता है अतः सहयोगी बनें। और वीडियो को शेयर कर लाइक करना न भूलें। यदि पहली बार चैनल पर आए हैं तो आपके अपने इस आध्यात्म संस्कृति परिवार को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट करना न भूलें। आध्यात्म संस्कृति परिवार आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।
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