मंगलवार, 18 मई 2021

गीता-साधक-संजीवनी

नमस्कार। आध्यात्म संस्कृति परिवार में आपका हार्दिक अभिनंदन है। साधन के बिना साधना सम्भव नहीं होती। यह दुर्लभ मानव शरीर, एक साधन मात्र है। अतः साधक को विचार करना चाहिये कि ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो सदा हमारे पास रहेगी और हम सदा उसके पास रहेंगे? ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जो सदा हमारे साथ रहेगा और हम सदा उसके साथ रहेंगे? ऐसी कौन-सी क्रिया है, जिसको हम सदा करते रहेंगे और जो सदा हमसे होती रहेगी ?सदा के लिये हमारे साथ न कोई वस्तु रहेगी, न कोई व्यक्ति रहेगा और न कोई क्रिया रहेगी। एक दिन हमें वस्तु, व्यक्ति और क्रियासे रहित होना ही पड़ेगा। अगर हम वर्तमानमें ही उनके वियोगको स्वीकार कर लें, उनसे असंग हो जायँ तो जीवन्मुक्ति स्वत: सिद्ध है। तात्पर्य है कि वस्तु, व्यक्ति और क्रियाका संयोग तो अनित्य है, पर वियोग नित्य है। नित्यको स्वीकार करनेसे नित्य-तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है और कोई अभाव शेष नहीं रहता।
इन्द्रियोंके भोगोंमें और कर्मोंमें आसक्ति न होनेका अर्थ है —कामनारहित और कर्तृत्वरहित होना। इन्द्रियोंके भोगोंमें, पदार्थोमें आसक्ति न हो तो साधक कामनारहित हो जाता है और क्रियाओंमें आसक्ति न हो तो कर्तृत्वरहित हो जाता है। कामनारहित और कर्तृत्वरहित होनेपर स्वरूपमें स्वत: स्थिति हो जाती है। वास्तवमें स्थिति होती नहीं, प्रत्युत स्थिति है; परन्तु कामनारहित और कर्तृत्वरहित न होनेसे इसका अनुभव नहीं होता।कामना और कर्तृत्वका अभाव होनेपर स्वरूपमें स्वत: सिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। जैसे लिखनेके समय लेखनीको काममें लेते हैं और लिखना पूरा होते ही लेखनी को ज्यों-का-त्यों रख देते हैं, ऐसे ही साधक कार्य करते समय शरीर को काममें ले और कार्य पूरा होते ही उसको ज्यों-का-त्यों रख दे अर्थात् असंग हो जाय तो प्रत्येक क्रियाके बाद उसकी योग (समता) में स्थिति होगी।अगर क्रियासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाये तो वह योगारूढ़ हो जायगा।
क्रिया अर्थात भोग, और पदार्थ अर्थात ऐश्वर्य की आसक्ति से पतन होता है श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक चौवालीस के अनुसार
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥44॥ 
अर्थात जो लोग इन्द्रिय भोग तथा भौतिक ऐश्र्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं, उनके मनों में भगवान के प्रति भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता। भाव यह है कि - पुष्पित वाक्यों के द्वारा अपहृत या आकृष्ट चित्त वाले व्यक्ति भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हो जाते हैं। उन व्यक्तियों की समाधि या चित्त की एकाग्रता अर्थात् एक मात्र परमेश्वर के प्रति उन्मुख होने की निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती है। 
इसीलिए न तो क्रिया में आसक्ति हो और न फलमें ही आसक्ति हो।
श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय, श्लोक सैंतालीसवें के अनुसार,
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

साधक का कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं। वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए साधक का फल में कभी अधिकार न हो अर्थात् साधक को किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफल में साधक की तृष्णा होगी तो साधक कर्मफलप्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्ति का कारण साधक को नहीं बनना चाहिए।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफलकी कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफल रूप पुनर्जन्म का हेतु बन ही जाता है। यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःख रूप कर्म करने की क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करने में भी साधक की आसक्ति प्रीति नहीं होनी चाहिये। अर्थात संकल्पजन्य सुख का भोग भी न हो अर्थात् संकल्पपूर्तिका सुख भी न ले। अपनी मुक्ति का भी संकल्प न हो; क्योंकि मुक्ति के संकल्प से बन्धन की सत्ता दृढ़ होती है। अत: कोई भी संकल्प न रखकर सदैव उदासीन रहे। अध्यात्म संस्कृति परिवार आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

           !!!! शुभमस्तु !!!!

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Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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