नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जितना महत्व सूर्य सहित नौ ग्रहों का है, उतना ही गहन और अनिवार्य महत्व नक्षत्रों का भी माना गया है। नक्षत्र केवल आकाशीय तारों के समूह नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, स्वभाव, भाग्य, मानसिक स्थिति, विवाह, मुहूर्त, नामकरण और गुण-मिलान जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों की कुंजी हैं।
आज वैदिक ऐस्ट्रो केयर के इस विशेष ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे कि नक्षत्र क्या होते हैं, कितने प्रकार के होते हैं, उनका महत्व क्या है और जीवन के विभिन्न संस्कारों में उनकी क्या भूमिका है।
नक्षत्रों की पौराणिक उत्पत्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुल 27 नक्षत्र दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियाँ थीं, जिनका विवाह चंद्रमा से हुआ था। चंद्रमा का प्रेम रोहिणी नक्षत्र से विशेष रूप से अधिक था। इसी पक्षपात से क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को क्षय रोग का श्राप दे दिया, जिससे उनका तेज क्षीण होने लगा।
देवताओं और ब्रह्मा जी के अनुरोध पर यह श्राप आंशिक रूप से शिथिल हुआ, जिसके फलस्वरूप चंद्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ता और कृष्ण पक्ष में क्षीण होता है। यही कारण है कि चंद्रमा लगभग 27 दिनों में 27 नक्षत्रों की यात्रा पूर्ण करता है और पूर्णिमा व अमावस्या का निर्माण होता है।
नक्षत्र क्या होते हैं?
नक्षत्र शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—
नक्शा (मानचित्र) + तारा
अर्थात तारों का मानचित्र।
आकाश में तारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता है। चंद्रमा प्रतिदिन लगभग एक नक्षत्र पार करता है और इसी कारण नक्षत्रों को ज्योतिष में सबसे सटीक भविष्यवाणी का आधार माना जाता है।
राशि और नक्षत्र का संबंध
वैदिक ज्योतिष में आकाश को 12 भागों में बाँटा गया जिन्हें राशियाँ कहा गया। आगे सूक्ष्म अध्ययन हेतु इन 12 राशियों को 27 भागों में विभाजित किया गया, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं।
राशि अपेक्षाकृत बड़ी होती है जबकि नक्षत्र छोटे होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों (पदों) में विभाजित किया गया है। इस प्रकार एक राशि में लगभग सवा दो नक्षत्र आते हैं।
जन्म नक्षत्र क्या होता है?
जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, वही व्यक्ति का जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र व्यक्ति के स्वभाव, मानसिक प्रवृत्ति, शक्ति, कमजोरी और जीवन की दिशा को दर्शाता है। इसी कारण जन्मपत्रिका विश्लेषण में नक्षत्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
नक्षत्रों के गण (Gan)
27 नक्षत्रों को तीन गणों में विभाजित किया गया है—
1. देव-गण (शुभ नक्षत्र)
देवताओं के समान कोमल, शुद्ध और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले।
2. मनुष्य-गण (मध्यम नक्षत्र)
संतुलित, व्यवहारिक और कर्मप्रधान स्वभाव वाले।
3. राक्षस-गण (उग्र नक्षत्र)
उग्र, तीक्ष्ण और कभी-कभी विनाशक प्रवृत्ति वाले।
27 नक्षत्र और उनके संक्षिप्त स्वभाव
अश्विनी (देव) – सुंदर, शांत, चिकित्सा व आभूषण प्रेमी
भरणी (मनुष्य) – उत्साही, सुखी, सत्यप्रिय
कृत्तिका (राक्षस) – स्वाभिमानी, शक्तिशाली, क्रोधी
रोहिणी (मनुष्य) – आकर्षक, ईमानदार, उदार
मृगशिरा (देव) – साधारण जीवन, आर्थिक रूप से सुरक्षित
आर्द्रा (मनुष्य) – भावुक, आत्मकेंद्रित
पुनर्वसु (देव) – विनम्र, चतुर, व्यापार कुशल
पुष्य (देव) – धार्मिक, सत्यप्रिय
आश्लेषा (राक्षस) – कपटी, चालाक, भोजन प्रेमी
मघा (राक्षस) – विलासप्रिय, आरामतलबी
पूर्वा फाल्गुनी (मनुष्य) – परोपकारी, वक्तृत्व कला में निपुण
उत्तरा फाल्गुनी (मनुष्य) – ईमानदार, उदार
हस्त (देव) – परोपकारी, कलाप्रेमी
चित्रा (राक्षस) – आकर्षक शरीर, सौंदर्य प्रिय
स्वाति (देव) – शिष्ट, आत्मसंयमी
विशाखा (राक्षस) – ईमानदार, कभी-कभी आक्रामक
अनुराधा (देव) – भक्त, विदेश में भाग्यशाली
ज्येष्ठा (राक्षस) – प्रभावशाली, दानशील
मूल (राक्षस) – दृढ़ विचार, रहस्यमयी
पूर्वाषाढ़ा (मनुष्य) – उदार, धर्मार्थ
उत्तराषाढ़ा (मनुष्य) – दयालु, आकर्षक व्यक्तित्व
श्रवण (देव) – बुद्धिमान, विनम्र
धनिष्ठा (राक्षस) – साहसी, महत्वाकांक्षी
शतभिषा (राक्षस) – सच्चे, लोकप्रिय
पूर्वा भाद्रपद (मनुष्य) – ईर्ष्यालु, आत्मसंशयग्रस्त
उत्तरा भाद्रपद (मनुष्य) – दयालु, विज्ञान व कला प्रेमी
रेवती (देव) – सुडौल शरीर, कूटनीतिक, संपन्न
मुहूर्त, नामकरण और नक्षत्र
हर शुभ कार्य का मुहूर्त नक्षत्रों के आधार पर तय किया जाता है।
नामकरण संस्कार में बच्चे का नाम जन्म नक्षत्र और उसके चरण के अनुसार रखा जाता है।
उदाहरण: अश्विनी नक्षत्र के चरण— चू, चे, चो, ला
पंचक और नक्षत्र
जब चंद्रमा धनिष्ठा से रेवती तक पाँच नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उसे पंचक कहा जाता है। इस काल में विवाह जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।
गण्डमूल नक्षत्र
आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती और अश्विनी को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है। इन नक्षत्रों में जन्म लेने पर विशेष शांति पूजा आवश्यक मानी जाती है क्योंकि इनके कुछ चरण माता-पिता या परिवार के लिए कष्टकारी हो सकते हैं।
विवाह और गुण मिलान में नक्षत्रों की भूमिका
अष्टकूट गुण मिलान में नक्षत्रों के आधार पर ही गण-दोष, नाड़ी-दोष आदि का विचार किया जाता है।
सुखी वैवाहिक जीवन के लिए न्यूनतम 18 गुणों का मिलना आवश्यक माना गया है।
देव-गण अन्य गणों से तालमेल बैठा सकता है, लेकिन मनुष्य और राक्षस गण का मेल गण-महादोष माना जाता है।
निष्कर्ष
नक्षत्र प्रतिदिन हमारे मन और जीवन को प्रभावित करते हैं क्योंकि चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र से होकर गुजरता है। जन्म नक्षत्र और उसमें स्थित ग्रह हमारे व्यक्तित्व, भाग्य और जीवन मार्ग को निर्देशित करते हैं।
यदि नक्षत्रों का सम्यक ज्ञान हो, तो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और वैवाहिक समस्याओं से बचाव संभव है।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय, सुखी और सफल जीवन की कामना करता है।
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें