बुधवार, 31 दिसंबर 2025

कुंडली में संतान योग, जानें हर बात

वैदिक ज्योतिष में संतान योग: संतान प्राप्ति के योग, बाधाएं और समाधान
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वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य आदि नवग्रह जब जन्मकुंडली के द्वादश भावों में युति, दृष्टि अथवा विशेष संबंध बनाते हैं, तो उनसे अनेक प्रकार के शुभ और अशुभ योगों का निर्माण होता है। इन योगों का प्रभाव मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ता है, जिनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है संतान योग।
प्रत्येक दंपति की यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि उनके जीवन में उत्तम, स्वस्थ और संस्कारी संतान की प्राप्ति हो। कुछ लोगों को यह सुख सहज रूप से मिल जाता है, कुछ को विलंब के बाद, और कुछ को अनेक प्रयासों, उपायों व चिकित्सा के पश्चात। वहीं कुछ दंपतियों को लंबे समय तक प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। यह सब कुछ जन्मकुंडली में निर्मित संतान योग पर ही निर्भर करता है।

संतान योग क्या है
जन्मकुंडली में संतान से संबंधित ग्रहों, भावों और उनके स्वामियों की स्थिति के आधार पर जो योग बनते हैं, उन्हें संतान योग कहा जाता है। यह योग यह बताता है कि संतान प्राप्ति होगी या नहीं, कब होगी, सहज होगी या कष्ट के साथ होगी, तथा संतान का स्वास्थ्य और भविष्य कैसा रहेगा।
संतान योग देखने के मुख्य भाव और ग्रह
वैदिक ज्योतिष में संतान विचार के लिए मुख्य रूप से पंचम भाव को देखा जाता है। पंचम भाव को संतान भाव और पूर्व पुण्य का भाव माना गया है। इसके साथ-साथ पंचम भाव के स्वामी (पंचमेश), गुरु बृहस्पति और चंद्रमा की स्थिति भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
यदि पंचम भाव और पंचमेश मजबूत हों, उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तथा देव गुरु बृहस्पति अनुकूल स्थिति में हों, तो संतान प्राप्ति के उत्तम योग बनते हैं। इसके विपरीत यदि पंचम भाव या पंचमेश पीड़ित हों, पाप ग्रहों का प्रभाव हो या नीच राशि में स्थित हों, तो संतान प्राप्ति में विलंब या बाधाएं आती हैं।

पति और पत्नी दोनों की कुंडली का महत्व
संतान योग का सही मूल्यांकन केवल एक कुंडली से नहीं किया जाता। इसके लिए पति और पत्नी दोनों की कुंडली का अध्ययन आवश्यक होता है। दोनों की कुंडली में पंचम भाव, पंचमेश, गुरु और संबंधित ग्रहों की स्थिति देखकर ही सही निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
कई बार ऐसा देखा जाता है कि एक कुंडली में संतान योग अच्छा होता है और दूसरी में कमजोर। ऐसी स्थिति में संतान प्राप्ति के लिए विशेष उपाय, अनुष्ठान अथवा चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है।

संतान प्राप्ति में विलंब के ज्योतिषीय कारण
यदि पंचमेश छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, नीच राशिगत हो, शत्रु ग्रह की राशि में हो, या पंचम भाव स्वयं पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो संतान प्राप्ति में विलंब और कष्ट संभव है।
राहु, केतु या शनि का अत्यधिक प्रभाव भी संतान सुख में बाधा उत्पन्न कर सकता है। कुछ विशेष योगों में दत्तक संतान के संकेत भी मिलते हैं।

बीज स्फुट और क्षेत्र स्फुट का महत्व
वैदिक ज्योतिष में संतानोत्पत्ति की क्षमता जानने के लिए पुरुष का बीज स्फुट और स्त्री का क्षेत्र स्फुट देखा जाता है।
पुरुष के लिए सूर्य, शुक्र और गुरु तथा स्त्री के लिए चंद्र, मंगल और गुरु के आधार पर यह गणना की जाती है। इनके सम और विषम होने से संतान क्षमता का आकलन किया जाता है। यदि दोनों में अक्षमता दिखाई दे और पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो संतान की संभावना कम हो जाती है। ऐसे में उपाय, चिकित्सा और ईश्वर भक्ति का सहारा लिया जाता है।

गुरु बृहस्पति की भूमिका
देव गुरु बृहस्पति को संतान का मुख्य कारक ग्रह माना गया है। कुंडली में बृहस्पति की मजबूत और शुभ स्थिति संतान सुख प्रदान करती है। यदि बृहस्पति कमजोर, नीच या पीड़ित हों, तो संतान प्राप्ति में कठिनाई आती है। पंचम भाव या पंचमेश से बृहस्पति का शुभ संबंध संतान योग को बल देता है।

दशा और गोचर का प्रभाव
जैसे किसी भी घटना के लिए ग्रह दशा महत्वपूर्ण होती है, वैसे ही संतान प्राप्ति के लिए भी अनुकूल दशा और गोचर आवश्यक होते हैं। पंचमेश, बृहस्पति या पंचम भाव से संबंधित शुभ ग्रहों की दशा में संतान योग सक्रिय होता है। यदि उसी समय गोचर भी अनुकूल हो, तो संतान सुख सहज रूप से प्राप्त होता है।

निष्कर्ष
संतान योग केवल एक ग्रह या एक भाव पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पूरी कुंडली, ग्रहों की स्थिति, दशा और गोचर के समन्वय से फलित होता है। इसलिए संतान संबंधी किसी भी समस्या में अनुभवी और योग्य ज्योतिषी द्वारा पति-पत्नी दोनों की कुंडली का विश्लेषण करवाना अत्यंत आवश्यक है। जहां आवश्यकता हो, वहां ज्योतिषीय उपायों के साथ चिकित्सीय उपचार भी अवश्य करना चाहिए।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर का यही उद्देश्य है कि सही ज्ञान के माध्यम से लोगों को मार्गदर्शन दिया जाए, ताकि वे जीवन में आने वाली समस्याओं को समझ सकें और उचित समाधान की ओर बढ़ सकें।
आगामी लेख में हम संतान सुख में बाधा उत्पन्न करने वाले विशेष ग्रह योगों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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