रविवार, 23 मई 2021

किन कारणों से होता है गृह कलह,उपद्रव,पतन,धन हानि:-

नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। सनातन धर्म संस्कृति आदि अनादि अनन्त काल से चली आ रही है। आदि ग्रन्थ वेदों में मानव जीवन को श्रेष्ठ विधि से जीने का मार्ग बतलाया गया है। यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि वेदों में कहे गए वचनों को पिता के वचन तुल्य माना गया है। अर्थात, वेदों में जो कुछ भी लिखा है, उसे बिना किसी प्रश्नचिन्ह के स्वीकार करना चाहिए। पुराण के वचनों को मित्रवत कहा गया है। अतः पुराण के किसी भी विषय पर तर्क किया जा सकता है। किंतु वेदों के नहीं। यह सदैव ध्यान रखें कि हमारी बुद्धि वेदों में दिए गए संकेतों को समझने में पूर्णतः सक्षम नहीं है। अतः वेद वाक्यों को समझने हेतु किसी विद्वान का संग करना चाहिए। वेदों में मानव जीवन के समस्त दैविक दैहिक भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए आहार व्यवहार आदि के लिए भी निर्देश दिए गए हैं,  किन्तु जब हम इसके विरुद्ध आचरण करते हैं, तब हमें अनेकों प्रकार के दुःखों का भी सामना करना पड़ता है। बहुत बार देखने को मिलता है कि भगवदकृपा से उत्तम स्वास्थ्य, भरा पूरा परिवार, आजीविका के उत्तम साधन आदि सभी कुछ उपलब्ध होने पर भी परिवार में कलह ही होता रहता है। परिवार के सदस्यों के बीच बिना कारण के भी झगड़ा, मनमुटाव होता रहता है। इसका मुख्य कारण है, वेदों में वर्णित उस परमपिता परमात्मा का विस्मरण, जिसे सामान्य भाषा में हम इष्ट देव कहते हैं। अपने इष्टदेव की अवज्ञा ही पारिवारिक कलह का मुख्य कारण होता है। इस विषय में आज हम पूर्ण रूप से चर्चा करेंगे। आप बने रहें वीडियो के अंत तक हमारे साथ, एवं वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें। ईष्ट देव अर्थात कुल देवता या कुलदेवी की पूजा छोड़ने के पश्चात कुछ वर्षों तक तो कोई विशेष अंतर नहीं समझ में आता ,किन्तु उसके बाद जब देवताओं द्वारा प्रदत्त सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं ,नकारात्मक ऊर्जा ,वायव्य बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश प्रारम्भ हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है। पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पाती ,संस्कारों का क्षय ,नैतिक पतन ,कलह, उपद्रव ,अशांति प्रारम्भ हो जाती हैं , फिर व्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता है, लेकिन कारण जल्दी नहीं पता चलता। वह भटकता ही रहता है।
कुल देवी, देवता और पित्र हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा, नकारात्मक ऊर्जा के, परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैं ,यह पारिवारिक संस्कारों और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैं ,यही किसी भी देवता, ग्रह आदि को दी जाने वाली पूजा को उन तक पहुचाते हैं,यदि इन्हें पूजा नहीं मिल रही होती है तो यह असन्तुष्ट होकर क्रोधित भी होते हैं और निर्लिप्त भी हो सकते हैं। ऐसे में आप किसी भी देवता की आराधना करे वह उस देवता तक नहीं पहुँचता, क्योकि इनके बीच का सेतु, कार्य करना बंद कर देता है,बाहरी बाधाये, अभिचार आदि , नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुचने लगती कारण, हमारा रक्षा कवच समाप्त हो चुका होता है। कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही देवताओं की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है ,अर्थात पूजा न देवताओं तक जाती है न उसका लाभ हमें मिलता है| ऐसा हमारे इष्टदेवता, कुलदेवता और पित्रों की निर्लिप्तता अथवा उनके कम शशक्त होने से होता है। कुल देवी, देवता व पित्र, सम्बंधित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति ,उलटफेर ,विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं ,सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती है ,यह परिवार के अनुसार भिन्न समय होता है और भिन्न विशिष्ट पद्धति होती है, शादी-विवाह-संतानोत्पत्ति आदि होने पर इन्हें विशिष्ट पूजाएँ भी दी जाती हैं,यदि यह सब बंद हो जाए तो या तो यह नाराज होते हैं या कोई मतलब न रख मूकदर्शक हो जाते हैं और परिवार बिना किसी सुरक्षा आवरण के पारलौकिक शक्तियों के लिए खुल जाता है ,परिवार में विभिन्न तरह की परेशानियां प्रारम्भ हो जाती हैं, अतः प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपने कुल देवी देवता को जानना चाहिए तथा यथा योग्य समय समय पर उन्हें पूजा प्रदान करनी चाहिए, जिससे परिवार की सुरक्षा -उन्नति होती रहे। और यदि किसी कारण विशेष से, इष्टदेवता, कुलदेवता या कुलदेवी का वार्षिक विशिष्ट पूजन, न हो पाए, तो भी नियमित रूप से प्रतिदिन उनका नित्य पूजन अवश्य ही करना चाहिए। आजकल की इस पीढ़ी में तो ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिन्हें की अपने कुलदेवी कुलदेवता का पता ही नहीं है। अतः यदि आप भी नहीं जानते कि आपके इष्टदेव कौन हैं, कुलदेवता कौन हैं, कुलदेवी कौन हैं तो आप भगवान नारायण की पूजा इष्टकुल देवता के रूप में कर सकते हैं। माँ भगवती पराम्बा पराशक्ति दुर्गा जी का पूजन अपनी कुलदेवी के रूप में कर सकते हैं। किंतु वर्ष में एक बार सम्पूर्ण परिवार के साथ मिलकर, अपने मूल स्थान में जाकर अपने इष्ट का पूजन अवश्य ही करें। ऐसा करने से इष्टदेवताओं, कुलदेवताओं कुलदेवी की कृपा आशीर्वाद बना रहता है। हमें एक सुरक्षा कवच की प्राप्ति होती है। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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