6. दृक् बल (Drik Bala / दृष्टि बल) — सम्पूर्ण शास्त्रीय विश्लेषण
दृक् बल (Drik Bala) षड्बल (Shadbala) का छठा और अंतिम बल है। इसे दृष्टि बल भी कहा जाता है। यह बताता है कि किसी ग्रह पर अन्य ग्रहों की दृष्टियों (Aspects) का क्या प्रभाव पड़ रहा है।
सरल शब्दों में—
किसी ग्रह को शुभ ग्रह जितनी अधिक शुभ दृष्टि देंगे, उसका दृक् बल उतना ही बढ़ेगा।
और जितनी अधिक पाप ग्रहों की अशुभ दृष्टि होगी, उसका दृक् बल उतना ही घटेगा।
अर्थात् दृक् बल ग्रह के बाहरी सहयोग या विरोध को दर्शाता है।
शास्त्रीय आधार
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार ग्रह अकेले फल नहीं देते, बल्कि अन्य ग्रहों के साथ उनके संबंध (दृष्टि, युति आदि) भी उनके फल को प्रभावित करते हैं।
दृक् बल इन्हीं दृष्टियों के प्रभाव का परिमाण है।
दृक् बल क्या होता है?
कल्पना कीजिए कि एक विद्यार्थी पढ़ाई में अच्छा है।
यदि—
अच्छे शिक्षक उसका मार्गदर्शन करें,
माता-पिता सहयोग करें,
अच्छे मित्र हों,
तो उसकी सफलता की संभावना बढ़ जाती है।
यदि—
बुरी संगति हो,
विरोध करने वाले लोग हों,
तो उसकी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
इसी प्रकार ग्रहों पर भी अन्य ग्रहों की दृष्टियाँ पड़ती हैं।
शुभ दृष्टि = सहयोग
अशुभ दृष्टि = बाधा
इन्हीं का योग दृक् बल कहलाता है।
किन ग्रहों को शुभ माना जाता है?
सामान्यतः
शुभ ग्रह
गुरु
शुक्र
शुभ बुध (जब पाप ग्रहों से दूषित न हो)
शुक्ल पक्ष का बलवान चन्द्र
इनकी दृष्टियाँ ग्रह का दृक् बल बढ़ाती हैं।
किन ग्रहों को पाप ग्रह माना जाता है?
सामान्यतः
सूर्य
मंगल
शनि
राहु
केतु
कृष्ण पक्ष का निर्बल चन्द्र
पाप बुध (यदि पाप ग्रहों से युक्त हो)
इनकी दृष्टियाँ ग्रह का दृक् बल घटाती हैं।
दृक् बल कैसे देखते हैं?
क्रम इस प्रकार है—
चरण 1
जिस ग्रह का दृक् बल देखना हो, उसे चुनें।
मान लीजिए—
बुध
चरण 2
देखिए उस बुध पर कौन-कौन से ग्रह दृष्टि डाल रहे हैं।
उदाहरण—
गुरु की दृष्टि
शुक्र की दृष्टि
मंगल की दृष्टि
शनि की दृष्टि
चरण 3
अब शुभ और अशुभ दृष्टियों का प्रभाव जोड़ते हैं।
यदि शुभ दृष्टियाँ अधिक हैं
→ दृक् बल बढ़ेगा।
यदि पाप दृष्टियाँ अधिक हैं
→ दृक् बल घटेगा।
उदाहरण 1
मान लीजिए
बुध पर
गुरु की सप्तम दृष्टि
शुक्र की दृष्टि
दोनों पड़ रही हैं।
यह अत्यन्त शुभ स्थिति है।
फल
बुद्धि बढ़ेगी।
शिक्षा अच्छी होगी।
व्यापार सफल होगा।
निर्णय क्षमता बढ़ेगी।
दृक् बल अच्छा होगा।
उदाहरण 2
बुध पर
मंगल की चतुर्थ दृष्टि
शनि की दशम दृष्टि
दोनों पड़ रही हैं।
फल
मानसिक तनाव
निर्णय में विलम्ब
वाणी में कठोरता
व्यापारिक संघर्ष
दृक् बल कम हो जाएगा।
उदाहरण 3
गुरु पर
शुक्र की दृष्टि
चन्द्र की दृष्टि
फल
ज्ञान
धर्म
सम्मान
सदाचार
और अधिक बढ़ेंगे।
उदाहरण 4
गुरु पर
शनि
मंगल
राहु
तीनों की दृष्टि हो।
फल
ज्ञान होने पर भी बाधाएँ
गुरुजनों से मतभेद
निर्णय में भ्रम
धार्मिक जीवन में उतार-चढ़ाव
दृक् बल कम होगा।
उदाहरण 5
सूर्य पर केवल गुरु की दृष्टि हो।
फल
पिता का सहयोग
सरकारी सफलता
नेतृत्व क्षमता
सम्मान
दृक् बल बढ़ेगा।
उदाहरण 6
सूर्य पर
शनि
राहु
मंगल
तीनों की दृष्टि हो।
फल
पिता से मतभेद
सरकारी कार्यों में बाधा
आत्मविश्वास में कमी
प्रतिष्ठा पर प्रभाव
दृक् बल घट जाएगा।
क्या सभी दृष्टियाँ समान होती हैं?
नहीं।
दृक् बल निकालते समय केवल यह नहीं देखा जाता कि दृष्टि है या नहीं, बल्कि—
दृष्टि पूर्ण है या आंशिक?
ग्रह की दृष्टि कितने अंश की है?
ग्रह शुभ है या पाप?
ग्रह स्वयं बलवान है या निर्बल?
इन सभी बातों को ध्यान में रखकर गणना की जाती है।
ग्रहों की विशेष दृष्टियाँ भी प्रभाव डालती हैं
जैसे—
मंगल की 4, 7, 8 दृष्टि
गुरु की 5, 7, 9 दृष्टि
शनि की 3, 7, 10 दृष्टि
ये सभी दृक् बल में सम्मिलित होती हैं।
क्या युति भी देखी जाती है?
दृक् बल मुख्यतः दृष्टियों पर आधारित होता है।
यद्यपि फलादेश करते समय युति और दृष्टि दोनों का संयुक्त प्रभाव देखा जाता है, परन्तु शास्त्रीय षड्बल में दृक् बल का आधार ग्रह-दृष्टियाँ हैं।
दृक् बल का फलादेश में महत्व
यदि ग्रह—
उच्च का है,
स्वराशि में है,
दिग्बली है,
किन्तु उस पर शनि, राहु और मंगल की तीव्र पाप दृष्टि है,
तो ग्रह की वास्तविक फल देने की क्षमता घट सकती है।
दूसरी ओर,
यदि ग्रह सामान्य स्थिति में हो, पर उस पर गुरु और शुक्र जैसी शुभ दृष्टियाँ हों, तो वह अपेक्षा से अधिक अच्छे परिणाम दे सकता है।
दृक् बल कहाँ प्रयोग होता है?
षड्बल की गणना में।
ग्रह की वास्तविक कार्यक्षमता जानने में।
शुभ और अशुभ प्रभावों के मूल्यांकन में।
दशा एवं गोचर के फल का सूक्ष्म विश्लेषण करने में।
ग्रह के सहयोगी एवं विरोधी प्रभावों का आकलन करने में।
दृक् बल बनाम नैसर्गिक बल
नैसर्गिक बल
दृक् बल
जन्मजात शक्ति
अन्य ग्रहों से प्राप्त शक्ति
सदैव स्थिर
प्रत्येक कुण्डली में बदलता है
गणना नहीं करनी पड़ती
दृष्टियों के आधार पर गणना होती है
ग्रह की स्वाभाविक क्षमता
ग्रह को मिलने वाला सहयोग या विरोध
महत्वपूर्ण बातें
दृक् बल षड्बल का अंतिम घटक है।
यह ग्रह पर पड़ने वाली शुभ एवं अशुभ दृष्टियों से निर्धारित होता है।
शुभ दृष्टियाँ दृक् बल बढ़ाती हैं।
पाप दृष्टियाँ दृक् बल घटाती हैं।
ग्रह की पूर्ण एवं विशेष दृष्टियाँ भी इसमें सम्मिलित होती हैं।
किसी ग्रह के अंतिम फल का निर्णय केवल दृक् बल से नहीं, बल्कि स्थान बल, दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, नैसर्गिक बल और दृक् बल—इन सभी के संयुक्त अध्ययन से किया जाता है।
निष्कर्ष
दृक् बल ग्रह को अन्य ग्रहों से मिलने वाले सहयोग या विरोध का माप है। यह बताता है कि कोई ग्रह अपने स्वाभाविक एवं स्थितिजन्य बल के अतिरिक्त, अन्य ग्रहों की दृष्टियों से कितना समर्थ या प्रभावित हुआ है। यदि किसी ग्रह पर गुरु, शुक्र अथवा अन्य शुभ ग्रहों की दृष्टियाँ हों, तो उसका प्रभाव अधिक संतुलित और फलदायक हो जाता है; जबकि शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रहों की तीव्र दृष्टियाँ उसकी शुभता को कम कर सकती हैं। इसलिए किसी भी ग्रह के वास्तविक फलादेश में दृक् बल का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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