चेष्टा बल (Cheṣṭā Bala) — उदाहरण सहित पूर्ण विश्लेषण
चेष्टा बल (Cheṣṭā Bala) षड्बल (Ṣaḍbala) का तीसरा प्रमुख अंग है। "चेष्टा" का अर्थ है गति, प्रयास या सक्रियता। अतः चेष्टा बल वह शक्ति है जो ग्रह को उसकी गति (Motion) के आधार पर प्राप्त होती है।
जब कोई ग्रह पृथ्वी से देखने पर अपनी सामान्य गति से भिन्न व्यवहार करता है—विशेषकर वक्री (Retrograde), स्थिर (Stationary) या अत्यंत तीव्र दिखाई देता है—तो उसके चेष्टा बल में परिवर्तन होता है।
चेष्टा बल क्यों महत्वपूर्ण है?
आकाश में सभी ग्रह समान गति से नहीं चलते। कभी वे—
तेज चलते हैं,
धीमे चलते हैं,
स्थिर प्रतीत होते हैं,
या वक्री (उल्टी दिशा में चलते हुए प्रतीत) होते हैं।
इन अवस्थाओं के अनुसार ग्रह की प्रभावशीलता बदलती है।
महत्वपूर्ण: चेष्टा बल सूर्य और चन्द्रमा के लिए नहीं निकाला जाता। इसका मुख्य प्रयोग मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के लिए किया जाता है।
वक्री ग्रह और चेष्टा बल
पराशर के अनुसार वक्री ग्रह सामान्यतः अधिक चेष्टा बल प्राप्त करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि वे सदैव शुभ फल देंगे, बल्कि यह कि वे अधिक शक्तिशाली होकर अपने स्वभाव और कारकत्व के फल अधिक प्रभाव से देंगे।
उदाहरण
यदि गुरु—
स्वराशि में हो,
वक्री हो,
केन्द्र में स्थित हो,
तो उसका चेष्टा बल अत्यंत अच्छा होगा और वह ज्ञान, संतान, धर्म तथा भाग्य के फल प्रभावी रूप से देगा।
चेष्टा की आठ अवस्थाएँ
पराशर एवं प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में ग्रहों की गति के आधार पर आठ अवस्थाएँ बताई गई हैं—
अवस्था
अर्थ
वक्र (Vakra)
वक्री गति
अतिवक्र (Ativakra)
अत्यधिक वक्री
विकल (Vikala)
लगभग स्थिर
मन्द (Manda)
धीमी गति
मन्दतर (Mandatara)
अत्यन्त धीमी
सम (Sama)
सामान्य गति
शीघ्र (Śīghra)
तेज गति
अतिशीघ्र (Atiśīghra)
अत्यधिक तेज
इन अवस्थाओं के अनुसार ग्रह को अलग-अलग चेष्टा बल प्राप्त होता है।
सर्वाधिक चेष्टा बल कब मिलता है?
वक्री (Vakra) अवस्था में ग्रह को सर्वाधिक चेष्टा बल प्राप्त होता है।
इस समय ग्रह पृथ्वी के सबसे निकट प्रतीत होता है और उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट माना जाता है।
चेष्टा बल का फल
यदि चेष्टा बल अधिक हो
ग्रह सक्रिय होता है।
अपनी दशा में प्रभावशाली फल देता है।
ग्रह का कारकत्व उभरकर आता है।
शुभ ग्रह अधिक शुभ तथा पाप ग्रह अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
यदि चेष्टा बल कम हो
ग्रह का प्रभाव मंद पड़ जाता है।
फल मिलने में विलम्ब हो सकता है।
कारकत्व कमजोर हो सकता है।
उदाहरण 1 — वक्री गुरु
मान लीजिए—
गुरु धनु राशि में है।
वक्री है।
नवम भाव में है।
फल
उच्च चेष्टा बल
धर्म में रुचि
उच्च शिक्षा
गुरुजन का सहयोग
भाग्य की प्रबलता
दशा में उत्कृष्ट परिणाम
उदाहरण 2 — वक्री शनि
मान लीजिए—
शनि दशम भाव में है।
वक्री है।
फल
अत्यधिक कर्मशीलता
कार्यों में गहराई
विलम्ब के बाद बड़ी सफलता
कठोर परिश्रम
जिम्मेदारी का बोझ
यदि शनि पापग्रस्त हो, तो वही प्रबलता नौकरी में तनाव, देरी या भारी दायित्व के रूप में भी प्रकट हो सकती है।
उदाहरण 3 — बुध सामान्य गति में
यदि बुध—
सामान्य गति में हो,
कन्या राशि में हो,
दशम भाव में हो,
तो उसे चेष्टा बल सामान्य मिलेगा।
फल—
अच्छी बुद्धि
व्यापारिक कौशल
संवाद क्षमता
शिक्षा में सफलता
उदाहरण 4 — शुक्र वक्री
यदि शुक्र—
वृषभ राशि में हो,
वक्री हो,
तो—
कला
संगीत
सौंदर्य
प्रेम
विलासिता
से संबंधित फल अत्यधिक प्रभावी हो सकते हैं। यदि शुक्र पीड़ित हो, तो यही शक्ति संबंधों में जटिलता या भोग-विलास की अधिक प्रवृत्ति भी दे सकती है।
चेष्टा बल और वक्री ग्रह
एक सामान्य भ्रम यह है कि वक्री ग्रह अशुभ होता है।
यह शास्त्रीय रूप से सही नहीं है।
सही सिद्धांत यह है—
वक्री ग्रह = अधिक चेष्टा बल
अधिक चेष्टा बल = अधिक प्रभाव
वह प्रभाव शुभ होगा या अशुभ, यह ग्रह की—
राशि,
भाव,
दृष्टि,
युति,
नवांश,
षड्बल,
दशा
पर निर्भर करेगा।
चेष्टा बल का फलादेश में महत्व
यदि किसी ग्रह को—
उच्च स्थान बल,
अच्छा काल बल,
अधिक चेष्टा बल,
तीनों प्राप्त हों, तो वह ग्रह अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है और अपनी दशा-अन्तर्दशा में प्रबल परिणाम देता है।
निष्कर्ष
चेष्टा बल ग्रह की गतिशील शक्ति का सूचक है। यह बताता है कि ग्रह जन्म समय पर कितना सक्रिय था। विशेष रूप से मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के लिए इसका अत्यधिक महत्व है। वक्री ग्रहों को सामान्यतः अधिक चेष्टा बल प्राप्त होता है, जिससे वे अपने कारकत्व को अधिक प्रभाव के साथ व्यक्त करते हैं। किन्तु अंतिम फलादेश के लिए चेष्टा बल को स्थान बल, काल बल, दिग्बल, नैसर्गिक बल, दृष्टि बल तथा ग्रह की राशि, भाव, दृष्टि, युति और दशा के साथ समन्वित करके ही देखना चाहिए।
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