अध्याय – ग्रह दृष्टि (Graha Dṛṣṭi)
एकपाद, द्विपाद, त्रिपाद एवं पूर्ण दृष्टि का शास्त्रीय विवेचन
प्रस्तावना
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के फलनिर्णय के तीन प्रमुख आधार माने गए हैं— ग्रह की स्थिति (स्थिति), ग्रह का बल (बल) तथा ग्रह की दृष्टि (दृष्टि)। यदि किसी ज्योतिषी को ग्रह दृष्टि का यथार्थ ज्ञान न हो, तो वह किसी भी जन्मकुण्डली का सूक्ष्म एवं शास्त्रीय फलादेश नहीं कर सकता।
'दृष्टि' शब्द संस्कृत की "दृश्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है— देखना, अवलोकन करना अथवा अपनी चेतना का किसी वस्तु पर केन्द्रित होना। जैसे मनुष्य जिस वस्तु को देखता है, उससे उसका सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, उसी प्रकार ग्रह भी जिस भाव अथवा ग्रह को देखते हैं, उसे प्रभावित करते हैं। इसीलिए ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होते हैं उसी का फल नहीं देते, बल्कि जिन भावों एवं ग्रहों पर उनकी दृष्टि पड़ती है, उनके फल में भी परिवर्तन कर देते हैं।
अतः किसी भाव का फल केवल उसके स्वामी या उसमें स्थित ग्रहों से ही निर्धारित नहीं होता, बल्कि उस भाव पर पड़ने वाली शुभ अथवा अशुभ दृष्टियों से भी निर्धारित होता है।
दृष्टि का शास्त्रीय सिद्धान्त
प्राचीन आचार्यों ने ग्रह-दृष्टि को अत्यन्त सूक्ष्म विज्ञान माना है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र में ग्रह-दृष्टि का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। पराशर मुनि के अनुसार ग्रहों की दृष्टि समान नहीं होती। कुछ दृष्टियाँ पूर्ण प्रभाव वाली होती हैं, जबकि कुछ आंशिक प्रभाव प्रदान करती हैं।
जैसे सूर्य की किरणें प्रातःकाल तिरछी होने के कारण कम ताप देती हैं, मध्याह्न में वही किरणें सीधी पड़ने पर अत्यधिक उष्णता प्रदान करती हैं। ठीक उसी प्रकार ग्रह की पूर्ण दृष्टि सर्वाधिक प्रभाव उत्पन्न करती है, जबकि आंशिक दृष्टियाँ क्रमशः कम प्रभाव प्रदान करती हैं।
क्या ग्रह केवल पूर्ण दृष्टि ही रखते हैं?
अधिकांश विद्यार्थी केवल मंगल की चतुर्थ एवं अष्टम दृष्टि, गुरु की पंचम एवं नवम दृष्टि तथा शनि की तृतीय एवं दशम दृष्टि तक ही सीमित ज्ञान रखते हैं। परन्तु यह ज्ञान पूर्ण नहीं है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार प्रत्येक ग्रह की चार प्रकार की दृष्टियाँ मानी गई हैं—
एकपाद दृष्टि
द्विपाद दृष्टि
त्रिपाद दृष्टि
पूर्ण दृष्टि
यद्यपि व्यवहारिक फलित में मुख्यतः पूर्ण दृष्टि का ही अधिक प्रयोग किया जाता है, तथापि सूक्ष्म फलादेश में आंशिक दृष्टियों का भी विचार किया जाता है।
एकपाद दृष्टि (¼ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का केवल एक-चतुर्थांश (25%) प्रभाव डालता है, उसे एकपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
तृतीय भाव
दशम भाव
पर एकपाद दृष्टि डालता है।
अर्थात यदि कोई ग्रह लग्न में स्थित हो तो वह तृतीय तथा दशम भाव को लगभग 25% शक्ति से प्रभावित करेगा।
द्विपाद दृष्टि (½ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का अर्ध भाग (50%) प्रदान करता है, उसे द्विपाद दृष्टि कहा जाता है।
सामान्य रूप से प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से—
पंचम भाव
नवम भाव
पर द्विपाद दृष्टि रखता है।
यदि गुरु लग्न में स्थित हो तो सामान्य नियम से पंचम एवं नवम पर आधी दृष्टि होनी चाहिए, किन्तु गुरु की विशेष दृष्टि होने से वहाँ पूर्ण प्रभाव उत्पन्न होता है।
त्रिपाद दृष्टि (¾ दृष्टि)
जिस भाव पर ग्रह अपनी शक्ति का तीन-चतुर्थांश (75%) प्रभाव देता है, उसे त्रिपाद दृष्टि कहते हैं।
सामान्यतः प्रत्येक ग्रह—
चतुर्थ भाव
अष्टम भाव
पर त्रिपाद दृष्टि डालता है।
यदि मंगल इन भावों को देखे तो उसकी विशेष दृष्टि के कारण यह त्रिपाद न रहकर पूर्ण दृष्टि बन जाती है।
पूर्ण दृष्टि (100%)
जिस भाव पर ग्रह अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रभाव डालता है, उसे पूर्ण दृष्टि कहा जाता है।
सभी ग्रह अपने स्थान से सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि सप्तम भाव को ग्रह-दृष्टि का सर्वाधिक प्रभाव प्राप्त होता है।
विशेष पूर्ण दृष्टियाँ
सामान्य नियम से सभी ग्रहों की केवल सप्तम दृष्टि पूर्ण होती है, किन्तु तीन ग्रहों को विशेष दृष्टियाँ प्राप्त हैं।
मंगल की विशेष दृष्टि
मंगल अपने स्थान से—
चतुर्थ
सप्तम
अष्टम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
मंगल अग्नितत्त्व प्रधान ग्रह है। इसलिए जहाँ उसकी दृष्टि पड़ती है वहाँ ऊर्जा, साहस, संघर्ष, पराक्रम तथा कभी-कभी क्रोध एवं दुर्घटना की सम्भावना भी बढ़ जाती है।
गुरु की विशेष दृष्टि
गुरु अपने स्थान से—
पंचम
सप्तम
नवम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
गुरु ज्ञान, धर्म, सद्बुद्धि एवं संरक्षण का कारक ग्रह है। अतः उसकी दृष्टि सामान्यतः जिस भाव पर पड़ती है वहाँ वृद्धि, संरक्षण एवं शुभता प्रदान करती है।
शनि की विशेष दृष्टि
शनि अपने स्थान से—
तृतीय
सप्तम
दशम
भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
शनि कर्म, अनुशासन, धैर्य, विलम्ब एवं परीक्षा का ग्रह है। इसलिए उसकी दृष्टि जीवन में संघर्ष अवश्य देती है, किन्तु परिश्रम के माध्यम से स्थायी सफलता भी प्रदान करती है।
ग्रहों की दृष्टि सारणी
भाव
सामान्य ग्रह
विशेष ग्रह
तृतीय
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
चतुर्थ
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
पंचम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
सप्तम
पूर्ण
सभी ग्रह
अष्टम
त्रिपाद (75%)
मंगल – पूर्ण
नवम
द्विपाद (50%)
गुरु – पूर्ण
दशम
एकपाद (25%)
शनि – पूर्ण
क्या दृष्टि सदैव शुभ अथवा अशुभ होती है?
यह भी एक सामान्य भ्रान्ति है कि शुभ ग्रह की दृष्टि सदैव शुभ तथा पाप ग्रह की दृष्टि सदैव अशुभ होती है।
वास्तव में दृष्टि का फल निम्न बातों पर निर्भर करता है—
ग्रह का स्वभाव
ग्रह का बल
ग्रह की अवस्था
ग्रह की मित्रता एवं शत्रुता
ग्रह का भावाधिपत्य
दृष्ट भाव का स्वभाव
ग्रह की दशा
योग एवं राजयोग
सम्पूर्ण कुण्डली का सन्तुलन
उदाहरणार्थ—
यदि शनि षष्ठ भाव को देखे तो शत्रुओं पर विजय दिला सकता है।
यदि मंगल तृतीय भाव को देखे तो पराक्रम एवं साहस बढ़ा सकता है।
यदि गुरु अष्टम भाव पर दृष्टि डाले तो आयु की रक्षा तथा गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति करा सकता है।
अतः केवल ग्रह के शुभ या पाप होने से फल का निर्णय नहीं किया जाता।
ग्रह की दृष्टि ग्रहों पर भी पड़ती है
ग्रह केवल भावों को ही नहीं देखते, बल्कि अन्य ग्रहों को भी प्रभावित करते हैं।
यदि गुरु शनि को देखे तो शनि के कठोर स्वभाव में संतुलन आता है।
यदि मंगल चन्द्रमा को देखे तो जातक में शीघ्र क्रोध, मानसिक उत्तेजना अथवा रक्त सम्बन्धी विकारों की सम्भावना बढ़ सकती है।
यदि शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो तो भोग के साथ सदाचार एवं संयम भी उत्पन्न होता है।
दृष्टि और युति में अन्तर
जब दो ग्रह एक ही भाव में स्थित होते हैं तो उसे युति कहते हैं।
जब ग्रह अलग-अलग भावों में स्थित होकर एक-दूसरे को देखते हैं, तो उसे दृष्टि सम्बन्ध कहते हैं।
युति में ग्रहों की शक्तियाँ परस्पर मिश्रित होती हैं, जबकि दृष्टि में दूरस्थ प्रभाव उत्पन्न होता है।
फलित ज्योतिष में दृष्टि का प्रयोग
व्यवहारिक फलित में सामान्यतः—
सप्तम दृष्टि
मंगल की 4 एवं 8 दृष्टि
गुरु की 5 एवं 9 दृष्टि
शनि की 3 एवं 10 दृष्टि
का अधिक प्रयोग किया जाता है।
परन्तु सूक्ष्म अनुसन्धान एवं गहन फलनिर्णय में एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद दृष्टियों का भी विचार करना चाहिए।
उपसंहार
ग्रह-दृष्टि वैदिक ज्योतिष का अत्यन्त गूढ़ एवं वैज्ञानिक विषय है। ग्रह केवल जिस भाव में स्थित होता है उसी का फल नहीं देता, बल्कि जिन भावों तथा ग्रहों पर उसकी दृष्टि पड़ती है, उनके स्वभाव, शक्ति एवं परिणामों को भी परिवर्तित कर देता है। बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार सभी ग्रहों की आंशिक दृष्टियाँ (एकपाद, द्विपाद एवं त्रिपाद) तथा पूर्ण दृष्टि होती हैं। मंगल, गुरु एवं शनि को विशेष पूर्ण दृष्टियाँ प्राप्त हैं। एक कुशल ज्योतिषी को ग्रह की स्थिति, बल, दृष्टि, भावाधिपत्य, दशा तथा सम्पूर्ण कुण्डली का समन्वित अध्ययन करके ही फलादेश करना चाहिए। यही शास्त्रीय एवं प्रमाणिक ज्योतिष का आधार है।
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