गुरुवार, 8 जनवरी 2026

कुंडली मे गुरु चंडाल योग

नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में अनेक शुभ अशुभ योग बताए गए हैं। शुभ योग जहां व्यक्ति को उसके सम्पूर्ण जीवन काल में विद्या बुद्धि धन संपदा स्वास्थ्य परिवार कार्यक्षेत्र आदि में लाभ प्रदान करते हैं वहीं जन्मकुंडली में उपस्थित अशुभ योग व्यक्ति के जीवन को अनेक प्रकार से कष्टमय भी बना देते हैं। ऐसा ही एक अशुभ योग है गुरु चांडाल योग। आज हम गुरु चांडाल योग के बारे में चर्चा करेंगे, आप इस योग की सम्पूर्ण जानकारी के लिए बने रहें वीडियो के अंत तक हमारे साथ, एवं नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
जन्मकुंडली के किसी भी भाव में जब गुरु और राहु की युति हो तो यह योग गुरु चांडाल योग कहलाता है।

चांडाल योग के कारण जातक के जीवन में हमेशा अस्थिरता बनी रहती है। उसका चरित्र भ्रष्ट हो जाता है और ऐसा व्यक्ति अनैतिक अथवा अवैध कार्यों में संलग्न हो जाता है। इस दोष के निर्माण में बृहस्पति को गुरु कहा गया है तथा राहु को चांडाल माना गया है। किसी कुंडली में राहु का गुरु के साथ संबंध जातक को बहुत अधिक भौतिकवादी बना देता है जिसके चलते वह जातक अपनी हर इच्छा को पूरा करने के लिए गलत कार्यों से धन अर्जित करने में भी परहेज नहीं करता।

गुरु -राहु युति शब्द से ही दो विपरीत स्वभाव के ग्रहो की युति का बोध होता है। देवगुरु ग्रह बृहस्पति जहाँ ज्ञान , विवेक , अध्यात्म , न्याय , शुचिता का कारक -सूचक है , वहीँ माया पुत्र राहु असुर ग्रह , मायावी , सर्वाधिक भौतिकबादी , न्याय -धर्म को न मानने बाला , धूर्त , अविश्वसनीय , दूषित , अविवेकी ग्रह माना जाता है। गुरु और राहु का साथ एक धीर -गंभीर , ज्ञानी , आदर्शवादी गुरुजन और एक भौतिकबादी ,मान्यताओँ को न मानने बाले व्यक्ति का साथ है , जो गुरु को अपनी तरह मोड़ लेने में समर्थ है। 
सर्व विदित है , विवेक , अध्यात्म , न्याय ,ज्ञान की राह कठिन है , यह और भी कठिन हो जाती है जब एक शक्ति हर युक्ति से अभिलाषित ध्येय पाने का आश्वाशन दे रही हो।
गुरु -राहु युति में गुरु की जातक को अपने स्वभाव के अनुसार फल प्रदान करने की क्षमता पर कुछ सीमा तक विराम अवश्य लगता है क्योंकि सीमायें पार कर के स्वच्छंद ,अपरंपरागत तरीक़ों से वांछित फल प्राप्त कर लेने की शक्ति -प्रेरणा राहु प्रदान कर रहा होता है। 
राहु सर्वाधिक भौतिकबादी , न्याय -धर्म - परम्परा को न मानने बाला , धूर्त ,युक्तियों से निग्रह न करने वाला ग्रह है , अतः गुरु -राहु युति जिस भाव में होती है उस भाव के फल बहुत सीमा तक कुछ अलग तरह से प्राप्त होते हैं। राहु छाया ग्रह है , जिस राशि में स्थित होता है उसके गुण -स्वभाव के अनुसार फल देता है , गुरु जिस राशि में स्थित होता है उसे अधिकतम विस्तार देता है , गुरु -राहु युति जिस भाव -राशि में होती है , उसे गुरु के स्वभाव के अनुसार विस्तार तो मिलता है पर राहु के भौतिकबादी , अपरम्परागत रूप से मिलता है।
जन्म कुंडली के प्रथम भाव यानी लग्न में गुरु और राहु एक साथ बैठकर गुरु चांडाल योग बना रहे हों तो व्यक्ति संदिग्ध चरित्र वाला होता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अनैतिक संबंधों में रुचि लेता है बल्कि हर सच्चे-झूठे कार्य करके धन अर्जित करता है। ऐसा व्यक्ति धर्म को ज्यादा महत्व नहीं देता।
द्वितीय भाव धन स्थान में गुरु चांडाल योग बन रहा हो और गुरु बलवान हो तो व्यक्ति धनवान तो होता है, लेकिन यह पैसों का बुरी तरह अपव्यय करता है। यदि गुरु कमजोर हो तो जातक नशे का आदी होता है। ऐसे व्यक्ति की अपने परिवार से नहीं बनती है।
तृतीय भाव में गुरु व राहु के होने से जातक साहसी व पराक्रमी होता है। गुरु के बलवान होने पर जातक लेखन कार्य में प्रसिद्ध पाता है और राहु के बलवान होने पर व्यक्ति गलत कार्यों में कुख्यात हो जाता है। वह जुएं जैसे कार्यों में धन गंवाता है।
कुंडली के चौथे भाव में गुरु चांडाल योग बनने से व्यक्ति बुद्धिमान व समझदार होता है। लेकिन यदि गुरु कमजोर हो तो व्यक्ति पारिवारिक कार्यों में रुचि नहीं लेता। सुख शांति अभाव होता है और व्यक्ति मानसिक रूप से विचलित रहता है।
यदि पंचम भाव में गुरु चांडाल योग बन रहा हो और बृहस्पति नीच का है तो संतान को कष्ट होता है। ऐसे व्यक्ति की संतानें पथभ्रष्ट होकर अनैतिक कार्यों में संलग्न हो जाती है। उनकी शिक्षा में रूकावटें आती हैं। राहु यदि गुरु से अधिक बलवान है तो व्यक्ति अस्थिर विचारों वाला होता है।
षष्ठम भाव में यह योग बन रहा हो और गुरु प्रबल हो तो व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य का मालिक होता है। छठा भाव स्वास्थ्य का स्थान होता है। यदि राहु बलवान है तो व्यक्ति कई तरह की शारीरिक परेशानियों से जूझता रहता है। उसे कमर के नीचे के रोग परेशान करते हैं।
सातवां भाव दांपत्य सुख का स्थान होता है। यदि इस भाव में गुरु चांडाल योग बना हुआ है और गुरु पर अन्य शत्रु ग्रहों की दृष्टि है तो व्यक्ति का वैवाहिक जीवन कष्टकर होता है। यदि इस योग में राहु बलवान है तो जीवनसाथी से तालमेल का अभाव रहता है।
यदि अष्टम भाव में गुरु चांडाल योग बन रहा हो और गुरु कमजोर है तो जीवनभर दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। बार-बार चोट लगती है और इलाज में खर्च अधिक होता है। राहु अत्यंत प्रबल हो तो ऐसा व्यक्ति आत्महत्या तक का कदम उठा सकता है।
यदि नवम भाव में गुरु चांडाल योग बन रहा हो और गुरु कमजोर हो तो व्यक्ति नास्तिक किस्म का होता है। अपने माता-पिता से इसका विवाद बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को सामाजिक जीवन में अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
दशम भाव कर्म स्थान होता है। यदि इस भाव में गुरु चांडाल योग बन रहा हो तो व्यक्ति में नैतिक साहस की कमी होती है और इसे पद, प्रतिष्ठा पाने में बाधाएं आती हैं। बिजनेस और जॉब में बार-बार बदलाव होता है। गुरु बलवान होने पर परेशानियों से कुछ हद तक राहत मिल जाती है।
एकादश भाव में गुरु चांडाल योग बने और राहु बलवान हो तो व्यक्ति गलत तरीके से धन अर्जित करता है। धन पाने के लिए ऐसा व्यक्ति कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे व्यक्ति के मित्रों की संगत अच्छी नहीं रहती और खुद भी गलत कार्य करने लगता है।
द्वादश भाव में बनने वाला गुरु चांडाल योग व्यक्ति को धोखेबाज बनाता है। ऐसा व्यक्ति धर्म की आड़ में लोगों को धोखा देता है। खर्च करने की प्रवृत्ति अधिक रहती है। गुरु के बलवान होने पर व्यक्ति अति कंजूस प्रकृति का होता है।
गुरु चांडाल योग में राहु के कारण गुरु अपना शुभ प्रभाव नहीं दिखा पाता है। यदि चांडाल योग गुरु या इसके मित्र ग्रह की राशि में बन रहा हो तो राहु को शांत करने के उपाय करने होते हैं ताकि राहु का बुरा प्रभाव कम हो और गुरु का शुभ प्रभाव बढ़े। इसके लिए वैदिक विधि से राहु के वैदिक मंत्रों का जाप कर ग्रह शांति करवाई जाती है। इसके बाद कुल मंत्र संख्या का दशांश हवन करवाना होता है। यदि यह दोष गुरु की शत्रु राशि में बन रहा हो तो राहु और गुरु दोनों की शांति के उपाय किए जाते हैं। अपनी जन्मकुंडली का विश्लेषण करवाने हेतु एवं अरिष्ट निवारण हेतु ग्रह शांति करवाने के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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