दुर्योधन को छोड़कर उसके सभी भाई मर चुके थे।
गदा युद्ध में उसका भी आधा धड़ बेकार हो चुका था।
मौत के काले आँचल में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा के लिये कोई
स्थान न था, पर महासमर में पराजित हो जाने की
विभीषिका ने उसे किसी के समक्ष मुख दिखाने योग्य न
रख छोड़ा था। उसके विवेक का सूर्य अस्त हो चुका
था। उसका युद्ध-कौशल तथा पितृ-चरणों की स्वाभाविक
कृपासे प्राप्त दिव्य अस्त्र उसके पास थे। अब वह बिना
सेना का सेनापति और बिना रथका महारथी था। वह
अन्धकारमयी रात्रिमें पाण्डव-शिविरमें पहुँच साध्वी
द्रौपदीके पाँचों पुत्रों की हत्याकर पुनः दुर्योधनद्वारा तिरस्कृत हो अस्त-व्यस्त हो चुका था। उसके कलुषित जीवनका दुःखान्त नाटक अभी समाप्त होने वाला न था अतः वह वीरवर अर्जुन द्वारा पकड़ा जाकर शोकातुरा कृष्णा के समक्ष उपस्थित किया गया। साध्वी द्रौपदीके सौजन्य ने उसकी दहकती हृदयाग्नि में घी का काम किया। भीमसेन की भर्त्सना तथा अर्जुन द्वारा मणि-मूर्धजों के लुंचन ने उसके धैर्य को तिरोहित कर उसे
अधीर ही नहीं, प्रत्युत किंकर्तव्यविमूढ़ बना दिया। वह
पाण्डवों से प्रतिशोध के लिये चंचल हो उठा। उस समय अर्जुन की पुत्रवधू उत्तरा गर्भवती थी। उसके गर्भपर ही पाण्डव-वंश की पवित्र परम्परा अवलम्बित थी।अश्वत्थामा ने गर्भस्थ शिशु को लक्ष्य बनाकर अमोघ ब्रह्मास्त्र का,जिसका प्रतीकार वह स्वयं नहीं जानता था, प्रयोग कर दिया। इस घटना से विश्वजननी प्रकृति काँप उठी। वायुमण्डल क्षुब्ध हो उठा। दिशा और विदिशाओंसे त्राहि-त्राहिके शब्द सुनायी पड़ने लगे। द्वारकेश भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों से विदा हो अपने रथके पवित्र पावदान पर चरणकमल रख चुके थे। इसी समय भय प्रकम्पिता अनन्याश्रिता उत्तरा ने आर्तनाद किया। श्रीहरि का दयालू हृदय द्रवित हो उठा, उन्होंने उसके गर्भस्थ शिशुकी रक्षा करते हुए भविष्य के लिये भी गर्भ-रक्षाकी एक समीचीन प्रणाली प्रदर्शित और प्रचलित कर दी। इस विज्ञान के युग में, जबकि ईश्वर और ईश्वरीय सत्ता पर लोगों को अविश्वास ही नहीं, प्रत्युत सन्देह भी होने लग गया है, मन्त्रों और मन्त्र शक्तियों पर प्रकाश डालना निरर्थक श्रम ही प्रतीत होता है, किंतु नहीं ईश्वर नित्य, सत्य, सर्वशक्तिमान् और सम्पूर्ण विश्वके नियामक हैं। उन्हीं विभूतिमान्, सत्, चित्, आनन्द के द्वारा विश्व विकसित और प्रकाशित होता है। ये विभुरूप से वैज्ञानिकों के
विज्ञान में, अन्धविश्वासियों के अन्धविश्वास में, भक्तों के
अनुराग भरे भावों में, प्रेमियों के प्रेम में तथा नास्तिकों के
नास्तिकवाद में भी भ्रमण करते रहते हैं। वे सर्वशक्तिमान्
एवं कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ हैं। सर्वगुणसम्पन्न, वेद और वेदांगों के मर्माधिकारी ज्ञाता, भगवान् महाविष्णुके अंशावतार, पुराणेतिहासके रचयिता, मुनिपुंगव कृष्ण द्वैपायन व्यास द्वारा लिखित प्रत्येक अक्षर अपना विशेष महत्त्व रखता है। श्रीमद्भागवत-महापुराण ऐसे चमत्कारी मन्त्रों-स्तोत्रोंका एक महान् ग्रन्थ है। उसके श्रवणसे राजा परीक्षित को, जो दिव्यगति प्राप्त हुई, वह प्रायः सर्वविदित है। इस पुराणसे जहाँ अलभ्य पारमार्थिक लाभकी प्राप्ति होती है, वहाँ इसके प्रभावसे कोई क्षुद्र सांसारिक विपत्ति टल जाय, इसमें आश्चर्य ही क्या है। श्रीमद्भागवत में भगवान् कृष्णद्वैपायन व्यास ने सांसारिक त्रिविध तापों से छुड़ाकर परम-पथ-प्रदर्शन का सर्वोच्च तथा सर्वजन सुलभ उपदेश किया है।
सन्त-मुखोद्गीर्ण प्रत्येक अक्षर महामन्त्रवत् होता
है और उन्हीं महामन्त्रों से लोक का कल्याण सम्भव है।
वैसे ही एक महामन्त्रको आज दर्शकों के समक्ष उपस्थित
करने का प्रयास कर रहा हूँ। जिस मन्त्र के प्रभाव से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई थी। आप विषय की सम्पूर्ण जानकारी के लिए वीडियो को अंत तक अवश्य देखें, साथ ही वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट करना न भूलें।
श्रीमद्भागवत महापुराण के अंतर्गत प्रथम स्कंध के अष्टम अध्याय का चौदहवां श्लोक, श्रीवासुदेवसूत्र-प्रतिपादक महामन्त्र इस प्रकार है-
अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरिः।
स्वमाययावृणोद् गर्भ वैराट्याः कुरुतन्तवे॥
(१।८।१४) अर्थात, समस्त प्राणियोंके हृदयमें आत्मारूपसे स्थित योगेश्वर श्रीहरि ने कुरुवंशकी वृद्धि के लिये उत्तरा के गर्भ को अपनी माया के कवच से ढक दिया।
इस मन्त्र में उन कुल वधुओं के लिये सच्चा आश्वासन सन्निहित है, जिन्हें गर्भ तो रहता है, किंतु पूर्ण प्रसव नहीं हो पाता, बीच में ही खण्डित हो जाता है। यह उन महिलाओंके लिये भी कल्पवृक्ष के समान प्रत्यक्ष फलदाता है, जिनको बच्चा सर्वांग पूर्ण पैदा
होता है, किंतु जीवित नहीं रहता। इस महामन्त्रका
गर्भस्थ शिशुके मन पर भी बड़ा चमत्कारी प्रभाव पड़ता
है। उसके संस्कार बदल जाते हैं। उसको ऊपरी बाधा-
जैसे स्कन्दादिक पुरुषसंज्ञक ग्रह, पूतनादिक मातृग्रह,
भूत-प्रेत तथा जादू-टोने आदिका भय नहीं रहता। जितने
भी प्रकारकी बाधा मानव-बुद्धि अनुमान कर सकती है,
वे सब-की-सब भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के ईश्वरीय तेज के
समक्ष अकिंचित्कर हो जाती हैं। इस महामन्त्र के
प्रभावसे सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णके दिव्यातिदिव्य
आयुध उस महिला के गर्भ की रक्षा करते हैं, जो
श्रद्धा पूर्वक श्रीवासुदेव-सूत्रको धारण करती हैं। यह सूत्र
बड़ा ही उग्र, अतः सद्यः फलदाता है। इसका रहस्य
अत्यन्त गोपनीय एवं प्रभावोत्पादक है। अमोघ ब्रह्मास्त्र, जिसके निवारण का कोई भी उपाय न था, भगवान् श्रीकृष्णके तेजके सामने आकर शान्त हो गया। उनकी अहैतुकी कृपा ने जिस प्रकार विराट-पुत्री उत्तरा के गर्भ की रक्षा करते हुए कुरुतन्तु की रक्षा की, उसी प्रकार वह श्रीवासुदेव-सूत्र को धारण करनेवाली नारियों के गर्भ और उनके गर्भस्थ शिशुओं की भी रक्षा करती है।
श्रीवासुदेव-सूत्रकी निर्माण-विधि को ध्यान पूर्वक समझें।इस महाभाग वैष्णव-सूत्रको जिस भाग्यवतीके लिये बनाना हो, उसे और बनाने वाले को भी अच्छी तरह ज्ञात हो जाना चाहिये कि, ना देवो ह्यर्चयेद्देव मिति देवविदो विदुः। अर्थात, देववत् हुए बिना देवताकी अर्चना नहीं करनी चाहिये, ऐसा वेदज्ञों का कथन है। इसलिये साधकको देव की उपासना प्रारम्भ करने के पूर्व
उचित है कि वह अपनेको भी देववत् बना ले अर्थात् नित्य- नैमित्तिक कर्मों एवं आहाराचारादिकों का विधिवत् सुधार कर ले। इस सूत्रको धारण कर मनमाना स्वार्थानुकूल आहाराचार करते रहने से सूत्र और उसके अधिदेव का उपहास होता है, फलत वांछित फलकी प्राप्ति नहीं होती। भगवान् यद्यपि उपहासानुपहास की ओर ध्यान नहीं देते, फिर भी सच्चे आत्मनिवेदनकी अपेक्षा तो है ही। सूत्र-निर्माण-कर्ता यदि श्रीकृष्ण-मन्त्रका जापक, अप्रतिग्रही, कर्मनिष्ठ द्विज हो तो सफलता अवश्यम्भावी समझी जाती है। जिस महिलाके लिये सूत्रका निर्माण करना हो, उसे सुधौत शुद्ध वस्त्र पहनाकर भगवान का चरणोदक और तुलसीदल की प्रसादी दे, तत्पश्चात् श्रीगणेश- गौरीका पूजन और नवग्रहोंकी यथाशक्ति शान्ति कराकर पूर्वाभिमुखी खड़ी कर दे। केसरिया रेशमके डोरे इसके अभाव में कुमारी कन्या द्वारा काते केसरिया रंग में रँगे हुए कच्चे सूत से उसको सात बार आपादमस्तक नाप ले। ध्यान रहे कि डोरा इतना लम्बा होना चाहिये कि बीच में गाँठ न पड़ने पाये। कच्चा सूत अपेक्षाकृत अधिक कोमल होता है,
टूटनेका भय रहता है अत: बहुत सावधानी अपेक्षित
होती है। समूचे तागे की सात तह कर लेनी चाहिये।
उपर्युक्त मन्त्र के आदि में प्रणव अर्थात (ॐ) तथा अन्तमें
अग्निप्रिया अर्थात (स्वाहा) बीज लगाकर इक्कीस बार जप करके माला की गाँठकी भाँति गाँठें लगाता जाय। इस प्रकार इक्कीस गाँठ लगाकर सूत्र की विधिवत् वेद- मन्त्रों से प्राण-प्रतिष्ठा और उसका पूजन करे। तत्पश्चात् शुभग्रहावलोकित वेला में भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका ध्यान करते हुए उनसे गर्भिणी और गर्भकी रक्षाकी प्रार्थनाकर उस सूत्रको वामहस्तमूल, गले अथवा अत्यन्त पीड़ा के समय नाभिके नीचे कमरमें बाँध दे। यदि इस वैष्णव श्रीवासुदेव-सूत्रका निर्माण और बन्धन विधिवत् हो गया तो गर्भ नष्ट नहीं हो सकता। यह अनुभूत प्रयोग है। सूत्रको बाँधकर किसी भी अशौच जैसे जनन- मरण से सम्बन्धित घरोंमें नहीं जाना चाहिये।सूत्र को नित्यशः भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए सुगन्धित धूपसे धूपित-सुवासित करते रहना चाहिये।
भगवच्चरणों की कृपा से प्रसव का समय सकुशल प्राप्त
होने पर सूत्र को कमर से खोलकर बाहुमूल या गलेमें
बाँध देना चाहिये। बच्चे का नाल-छेदन और स्नान हो
जाने के पश्चात् सूत्र को धूप देकर बच्चे के गलेमें पहना
देना चाहिये। सवा महीने के पश्चात् बच्चे के लिये
नवीन सूत्रका निर्माण कराकर बाँध देना चाहिये।
पुराने सूत्र का आभार मानना चाहिये और भगवन्नाम-
कीर्तन करते हुए अपराध के लिये क्षमा याचना करके
उसे किसी तीर्थ या देवसरिता में विसर्जित कर देना
चाहिये। गर्भवती तथा गर्भस्थ शिशु की रक्षाके लिये
श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध के आठवें अध्यायमें वर्णित
श्रीनारायणवर्म का नित्यशः पाठ करना चाहिये। यदि
यह न हो सके तो शुद्ध हृदय से किसी भी श्रीकृष्ण-
मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिये। बाल-कृष्ण
(भगवान्)-का चरणोदक तथा नैवेद्योपहार गर्भवती,
परिवारवालों तथा पास-पड़ोसके बाल-गोपालों में सस्नेह
वितरण करना चाहिये। श्रीवासुदेव-सूत्र गर्भपीड़ित महिलाओं का कष्ट हरता है। यह एक अक्षय वैष्णव-कवच है। गर्भ रक्षा हेतु श्री वासुदेव सूत्र निर्माण हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।
0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें