बुधवार, 31 दिसंबर 2025

गण्डमूल नक्षत्र एवं उनका मानव जीवन पर प्रभाव

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वैदिक ज्योतिष के अनुसार भचक्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं। इन सत्ताईस नक्षत्रों में कुछ नक्षत्र ऎसे होते हैं जिनका क्षेत्र अति संवेदनशील होता है और इन्हीं नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है। सभी नक्षत्रों का अपना मूल स्वभाव होता है। कोई नक्षत्र शुभ तो कोई अशुभ की श्रेणी में आता है. इन्हीं नक्षत्रों में से छ: नक्षत्र ऎसे हैं जो राशि संधि पर मिलते हैं। यह नक्षत्र केतु तथा बुध के होते हैं। जब केतु का नक्षत्र समाप्त होकर बुध का नक्षत्र आरम्भ होता है तब यह गण्डमूल नक्षत्र कहलाता है।
आज हम गण्डमूल नक्षत्रों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। आप बनें रहें वीडियो के अंत तक हमारे साथ, एवं वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
स्कन्द पुराण, नारद पुराण जैसे ग्रंथों में भी अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है। रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं. मघा, आश्लेषा ,ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र भी गंडांत हैं.  मुख्यत: ज्येष्ठा तथा मूल के मध्य का एक प्रहर अत्यंत अशुभ फल देने वाला माना गया है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र  में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है। जातक पारिजात ,बृहत् पराशर होरा शास्त्र ,जातकाभरणं इत्यादि सभी  प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन विस्तार से दिया गया है।
गण्डमूल नक्षत्रों के विषय में बहुत सी भ्रांतियाँ भी फैली हुई हैं। अधिकाँश व्यक्ति गण्डमूल नक्षत्र में पैदा हुए बच्चे को पिता पर ही कष्टकारी मानते हैं, लेकिन ऎसा नहीं है। गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल अलग-अलग होता है और किसी किसी चरण में इसका फल अच्छा भी होता है। पहला गण्डमूल नक्षत्र है अश्विनी नक्षत्र। मेष राशि एवं केतु के इस नक्षत्र में उत्पन्न हुए बच्चे का जीवन प्रायः संघर्षशील होता है। इस नक्षत्र में प्रथम चरण में जन्म होने से पिता के लिए कष्टकारी,
दूसरे चरण में फिजूलखर्ची, तीसरे चरण में भ्रमणशील तथा चतुर्थ नक्षत्र में कृश शरीर अर्थात (अपने 
शरीर के लिए) कष्ट रहता है। दूसरा है आश्लेषा नक्षत्र।कर्क राशि एवं बुध के नक्षत्र के जातक प्रायः चंचल एवं चतुर बुद्धि वाले तथा परिवर्तनशील प्रकृति के होते हैं। आश्लेषा के प्रथम चरण में जन्म हो तो विशेष दोष नहीं होता। दूसरे चरण में पैतृक धन की हानि होती है, तीसरे चरण में माता-पिता के लिए गण्डान्त शूल तथा चतुर्थ चरण में पिता के लिए अनिष्टकारी होता है।
आश्लेषाद्ये न गण्डं स्यातंधनगण्डं द्वितीयके। तृतीये मातृगण्डं तु पितृगण्डं चतुर्थके।।
तीसरा है मघा नक्षत्र। सूर्य राशि और केतु के नक्षत्र में उत्पन्न जातक स्पष्टवादी, शीघ्र क्रुद्ध
होने वाले, उद्यमी और धनवान होते हैं। इसके प्रथम चरण में बालक उत्पन्न हो तो माता-पिता को कष्ट या
मातृ पक्ष की हानि होती है, दूसरे चरण में पिता को अनेक परेशानी होती हैं , तीसरे चरण में जन्म हो तो शुभ
फलदायक, और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो विद्या, धनादि के लिए शुभ होता है। चतुर्थ है ज्येष्ठा नक्षत्र। मंगल की राशि वृश्चिक एवं बुध के नक्षत्र में उत्पन्न जातक
सरल हृदय, तीक्ष्ण बुद्धि, धर्म परायण तथा उन्नति के कार्यों में अनेक बाधाओं से युक्त होते हैं।
ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न बच्चा ज्येष्ठ अर्थात बड़ों के लिए अरिष्टकर होता है। दूसरे चरण में जन्म हो तो छोटे भाई के लिए नेष्ट, तीसरे चरण में पिता के लिए अरिष्टकर तथा यदि चतुर्थ चरण में जन्म हो जातक स्वयं अपने एवं पिता के लिए अनिष्टकारी होता है। जातक पारिजात के अनुसार
ज्येष्ठाद्यपादेऽग्रजमाशुं हन्याद् द्वितीयपादे यदि तत्कनिष्ठम्।
तृतीयपादे पितरं निहन्ति स्वयं चतुर्थे मृतिमेति जातः॥ 
ज्येष्ठा नक्षत्र और मंगलवार के योग में उत्पन्न कन्या बड़े भाई के लिए अरिष्टकारक होती है। अभुक्त मूल नक्षत्र अर्थात ज्येष्ठा नक्षत्र की अन्तिम २ घटियाँ तथा मूल नक्षत्र के आरम्भ की २ घटियाँ, कुल चार घड़ियाँ अभुक्त मूल गण्ड नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें उत्पन्न कन्या, पुत्र, पशु कुल के लिए अनिष्टकारी होते हैं। इनमें उत्पन्न बच्चे को बिना
शान्ति कराये देखना भी नहीं चाहिए। शास्त्र प्रमाण के अनुसार
अभुक्त मूलं गठिका चतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादि भवं हि नारदः।
जातं शिशुं तत्र परित्यजेत् वा मुखं पिताऽस्याष्ट समा न पश्येत्॥
अभुक्त मूल-नक्षत्रों की आद्यान्त घटियों के बारे में विद्वान आचार्यों में मतान्तर भी पाया जाता है। जैसे-नारद के अनुसार ज्येष्ठा, मूल नक्षत्र की चार घटियाँ, वशिष्ठ के अनुसार २ घड़ियाँ तथा बृहस्पति के मतानुसार केवल १-१ अभुक्त-मूल संज्ञक है। अभुक्तमूलोत्पन्न बालक यदि
जीवित रहे, तो अपने वंश की वृद्धि करने वाला, धनवान् एवं सम्पत्तिवान होता है। पंचम है मूल नक्षत्र। केतु के नक्षत्र और गुरु की राशि (धनु) में उत्पन्न जातक धार्मिक रुचि वाला, उदार हृदय, मिलनसार, परोपकारी, धन-वाहनादि सुखों से युक्त होता है। चरण भेदानुसार
मूल के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक पिता की हानि करता है। दूसरे चरण में माता की हानि, तीसरे चरण में धन का नाश तथा चौथा चरण इसका शुभ होता है। यहां यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि नक्षत्रों की वैदिक विधिपूर्वक शान्ति करवा लेने से अनिष्ट का भय नहीं रहता। जातक पारिजात के अनुसार
मूलाद्यपादे पितरं निहन्याद् द्वितीयके मातरमांशु हन्ति।
तृतीयजो वित्तविनाशकः स्यात् चतुर्थपादे समुपैति सौख्यम्॥ 
मूल नक्षत्र और रविवार दोनों के योग में उत्पन्न कन्या श्वसुर के लिए अनिष्टकारी होती है।
भौमवासरे योगेन ज्येष्ठाजा ज्येष्ठ सोदरम्॥ भानुवासरयोगेन मूलजा श्वसुरं हरेत्॥ 
सूक्ष्म विश्लेषण हेतु मूल नक्षत्र की सम्पूर्ण घटियों को 15 द्वारा भाग देकर 15 खण्ड बना लेने चाहिए। प्रत्येक खण्ड का फल इस प्रकार होता है। प्रथम भाग हो तो पिता के लिए अनिष्टकर, दूसरे में चाचा की हानि, तीसरे में बहनोई की हानि, चौथे में पितामह अर्थात (दादा) की हानि, आठवें में चाची के लिए अनिष्टकर, नवम में सबके लिए अनिष्टकर, दसवें अंश में पशु का नाश, ग्यारहवें में नौकर का नाश होता है। बारहवें अंश में स्वयं जातक का नाश होता है। तेरहवें अंश में हो तो उसके ज्येष्ठ भाई का नाश, चौदहवें अंश में जातक की बहिन का अनिष्ट होता है। अगर पन्द्रहवें में हो तो नाना को कष्ट (अनिष्ट) होता है।
उदाहरणार्थ यदि मूल का सर्वक्ष योग ६४ घड़ी १८ पल है, तो इसमें १५ द्वारा भाग देने से
लब्ध प्रथम भाग में ४ घड़ी, १७ पल हुए। मान लो कि जन्मकालीन भयात् २८।४५ है। ४।१७
घट्यादि को ९ से गुणा करने पर पता चला कि ३८।३३ पर नौवां खण्ड (भाग) समाप्त होकर
३८४५ पर दसवां भाग पड़ता है। तदनुसार फल चौपाय आदि पशु के लिए अनिष्ट रहेगा।
षष्ठ है रेवती नक्षत्र। बुध के नक्षत्र और गुरु की राशि (मीन) में उत्पन्न जातक सर्वप्रिय, विद्यावान, सुन्दर आकृति, तर्कशील एवं धनवान् होता है। रेवती के प्रथम चरण में जन्म हो तो राजा के समान वैभवशाली, दूसरे में मन्त्री के समान सुख साधनों से युक्त, तीसरे में जन्म होने
से धनवान तथा चतुर्थ में जन्म होने से माता-पिता के लिए अरिष्टकारी होता है।
दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ तु जननी तथा। आत्मानं संध्ययोर्हन्ति ततो गण्डं विवर्जयेत्॥
गण्डमूल नक्षत्र शान्ति के लिए आप स्क्रीन पर दिए गए नम्बरों के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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