गण्डमूल (गण्डान्त) नक्षत्र का सम्पूर्ण विश्लेषण
(वैदिक ज्योतिष कक्षा)
भूमिका
जब भी किसी बालक का जन्म अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल अथवा रेवती नक्षत्र में होता है तो अधिकांश परिवारों में यह कहा जाता है कि "बच्चा मूल नक्षत्र में जन्मा है।"
कई लोग इसे अत्यन्त अशुभ मान लेते हैं, जबकि कई लोग इसे बिल्कुल महत्व नहीं देते।
दोनों ही दृष्टिकोण पूर्णतः उचित नहीं हैं।
शास्त्रों के अनुसार गण्डमूल का अपना महत्व है, किन्तु उसका निर्णय केवल नक्षत्र देखकर नहीं किया जाता।
इस विषय को समझने के लिए हमें पहले "गण्ड" और "मूल" का वास्तविक अर्थ समझना होगा।
गण्ड का अर्थ
संस्कृत में "गण्ड" का अर्थ है—
गाँठ, संधि, जोड़ अथवा संक्रमण बिन्दु (Transition Point)।
जहाँ एक अवस्था समाप्त होकर दूसरी अवस्था प्रारम्भ होती है, उसे गण्ड कहा जाता है।
मूल का अर्थ
"मूल" का अर्थ है—
आरम्भ, जड़ अथवा प्रारम्भिक बिन्दु।
अर्थात जहाँ नई राशि अथवा नया नक्षत्र प्रारम्भ हो रहा हो।
गण्डान्त क्या है?
जब
एक जल राशि समाप्त होती है,
और अग्नि राशि प्रारम्भ होती है,
तब उस संधि क्षेत्र को
गण्डान्त (Gandanta)
कहा जाता है।
इसी संधि पर स्थित नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है।
केवल छह नक्षत्र ही गण्डमूल क्यों?
पूरे राशि चक्र में केवल तीन स्थान ऐसे हैं जहाँ
जल तत्व समाप्त होता है और अग्नि तत्व प्रारम्भ होता है।
यही परिवर्तन अत्यन्त संवेदनशील माना गया है।
पहला गण्डान्त
कर्क → सिंह
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
यहाँ
आश्लेषा समाप्त
मघा प्रारम्भ
दूसरा गण्डान्त
वृश्चिक → धनु
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
ज्येष्ठा समाप्त
मूल प्रारम्भ
तीसरा गण्डान्त
मीन → मेष
जल समाप्त
अग्नि प्रारम्भ
रेवती समाप्त
अश्विनी प्रारम्भ
इस प्रकार
गण्ड नक्षत्र
आश्लेषा
ज्येष्ठा
रेवती
मूल नक्षत्र
मघा
मूल
अश्विनी
इसे समझने का सरल उदाहरण
मान लीजिए
एक व्यक्ति समुद्र से निकलकर अचानक अग्नि के बीच पहुँच जाए।
या
ठण्ड से निकलकर अचानक तीव्र गर्मी में आ जाए।
शरीर पर प्रभाव पड़ेगा।
इसी प्रकार
जल तत्व से अग्नि तत्व में संक्रमण
ऊर्जा का अत्यन्त तीव्र परिवर्तन माना गया है।
ऋतु परिवर्तन का उदाहरण
जैसे
सर्दी से गर्मी
या
गर्मी से वर्षा
के बीच लोग अधिक बीमार पड़ते हैं।
इसी प्रकार
राशियों का यह परिवर्तन
ऊर्जा परिवर्तन का समय माना गया है।
गण्डमूल नक्षत्र
अश्विनी
आश्लेषा
मघा
ज्येष्ठा
मूल
रेवती
इनके स्वामी
केतु
अश्विनी
मघा
मूल
बुध
आश्लेषा
ज्येष्ठा
रेवती
बड़े मूल एवं छोटे मूल
बड़े मूल
आश्लेषा
ज्येष्ठा
मूल
छोटे मूल
अश्विनी
मघा
रेवती
परम्परा में बड़े मूल की शान्ति को अधिक महत्त्व दिया गया है।
क्या केवल गण्डमूल में जन्म अशुभ है?
नहीं।
यही सबसे बड़ी भ्रान्ति है।
यदि ऐसा होता तो
इन छह नक्षत्रों में जन्म लेने वाले सभी व्यक्ति दुःखी होते।
जबकि
असंख्य राजा
संत
महापुरुष
उद्योगपति
वैज्ञानिक
इन्हीं नक्षत्रों में जन्मे हैं।
अतः
केवल नक्षत्र देखकर फलादेश करना शास्त्रसम्मत नहीं है।
वास्तव में किन बातों को देखना चाहिए?
चन्द्रमा की शक्ति
चन्द्रमा पर शुभ या पाप दृष्टि
नक्षत्र स्वामी की स्थिति
लग्न
नवांश
दशा
षड्बल
चन्द्रबल
अभुक्त मूल है या नहीं
गण्डान्त के कितने समीप जन्म है
गण्डान्त का वास्तविक क्षेत्र
शास्त्रों में
केवल पूरा नक्षत्र ही नहीं
बल्कि
विशेष रूप से
जल राशि के अन्तिम अंश
और
अग्नि राशि के प्रारम्भिक अंश
को अधिक प्रभावी माना गया है।
अर्थात
सभी चार चरण समान प्रभाव नहीं देते।
छह नक्षत्रों के चरणफल
अश्विनी
प्रथम चरण — पिता के लिए कष्ट
द्वितीय — सुख
तृतीय — उच्च पद
चतुर्थ — सम्मान
आश्लेषा
प्रथम — शान्ति होने पर शुभ
द्वितीय — धन हानि
तृतीय — माता कष्ट
चतुर्थ — पिता कष्ट
मघा
प्रथम — माता
द्वितीय — पिता
तृतीय — शुभ
चतुर्थ — शिक्षा एवं सम्पत्ति
ज्येष्ठा
प्रथम — बड़ा भाई
द्वितीय — छोटा भाई
तृतीय — माता
चतुर्थ — स्वयं
मूल
प्रथम — पिता
द्वितीय — माता
तृतीय — सम्पत्ति
चतुर्थ — शान्ति के बाद शुभ
रेवती
प्रथम — सम्मान
द्वितीय — उच्च पद
तृतीय — धन
चतुर्थ — स्वयं
महत्वपूर्ण टिप्पणी: ये चरणफल विभिन्न ज्योतिषीय ग्रन्थों एवं परम्पराओं में कुछ भिन्न भी मिलते हैं। अतः इन्हें अंतिम एवं सार्वभौमिक सत्य न मानकर परम्परागत मत के रूप में पढ़ाना चाहिए।
अभुक्त मूल
सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय
इसे समझे बिना गण्डमूल अधूरा है।
अभुक्त मूल क्या है?
ज्येष्ठा नक्षत्र का अन्तिम भाग
और
मूल नक्षत्र का प्रारम्भिक भाग
अत्यन्त संवेदनशील माना गया है।
इसे
अभुक्त मूल
कहते हैं।
परम्परा में
इसे अत्यन्त कष्टकारी माना गया है।
इसी कारण
विशेष शान्ति कराई जाती है।
ध्यान दें: कुछ परम्पराओं में पिता द्वारा कुछ समय तक बालक का मुख न देखने का उल्लेख मिलता है, किन्तु वर्तमान समय में अधिकांश विद्वान इसे प्रतीकात्मक एवं परम्परागत विधान मानते हैं। इसका उद्देश्य शान्ति संस्कार की महत्ता बताना है, न कि परिवार में भय या दूरी उत्पन्न करना।
लग्न गण्डान्त
तीन स्थान
मीन–मेष
कर्क–सिंह
वृश्चिक–धनु
यदि लग्न इन संधियों के अत्यन्त समीप हो
तो
लग्न गण्डान्त।
तिथि गण्डान्त
५–६
१०–११
१५–१
तिथियों की संधि।
यदि तीनों एक साथ हों
यदि
लग्न
चन्द्र
तिथि
तीनों गण्डान्त में हों
तो प्रभाव अधिक माना गया है।
गण्डान्त दोष कब कम हो जाता है?
यदि
चन्द्रमा बलवान हो
गुरु की दृष्टि हो
लग्नेश समर्थ हो
शुभ ग्रह केन्द्र-त्रिकोण में हों
नक्षत्र स्वामी शुभ हो
तो दोष अत्यधिक कम हो जाता है।
गण्डमूल शान्ति
परम्परा अनुसार
जन्म नक्षत्र पुनः आने पर
अर्थात लगभग
२७वें दिन
मूल शान्ति की जाती है।
कुछ परम्पराओं में छोटे मूल की शान्ति १०वें अथवा १९वें दिन भी कराई जाती है।
शान्ति में क्या किया जाता है?
गणेश पूजन
कलश स्थापना
नवग्रह पूजन
नक्षत्र देवता पूजन
नक्षत्र स्वामी पूजन
महामृत्युंजय जप
रुद्राभिषेक
हवन
ब्राह्मण भोजन
दान
क्या मूल शान्ति आवश्यक है?
यदि परिवार शास्त्रीय परम्परा का पालन करता है तो मूल शान्ति कराना उचित माना गया है। यह एक वैदिक संस्कारात्मक उपाय है, जिसका उद्देश्य मानसिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक संतुलन स्थापित करना है। परन्तु यह समझना चाहिए कि केवल गण्डमूल के कारण किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन अशुभ हो जाएगा—ऐसा निष्कर्ष शास्त्रसम्मत नहीं है। सम्पूर्ण जन्मकुण्डली का समग्र परीक्षण आवश्यक है।
परीक्षा में याद रखने योग्य बिंदु
कुल गण्डमूल नक्षत्र – ६
गण्ड नक्षत्र – आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
मूल नक्षत्र – अश्विनी, मघा, मूल
बड़े मूल – आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूल
छोटे मूल – अश्विनी, मघा, रेवती
केतु स्वामी – अश्विनी, मघा, मूल
बुध स्वामी – आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
गण्डान्त संधियाँ – कर्क–सिंह, वृश्चिक–धनु, मीन–मेष
विशेष गण्डान्त – अभुक्त मूल (ज्येष्ठा के अन्त एवं मूल के आरम्भ का संधिकाल)
निष्कर्ष
गण्डमूल कोई "शाप" नहीं है, बल्कि यह संधि (Transition) का सूचक है। संधियाँ सदैव संवेदनशील होती हैं—चाहे वे काल की हों, ऋतु की हों, तिथि की हों, लग्न की हों या नक्षत्र की। अतः गण्डमूल में जन्मे जातक का निर्णय केवल नक्षत्र देखकर नहीं, बल्कि चन्द्रमा की शक्ति, नक्षत्र स्वामी, लग्न, दशा, योग, ग्रहबल तथा सम्पूर्ण जन्मकुण्डली के समन्वित अध्ययन से ही करना चाहिए। यही वैदिक ज्योतिष का शास्त्रीय और संतुलित दृष्टिकोण है।
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