रविवार, 25 जनवरी 2026

षटतिला एकादशी व्रत क्यों है विशेष? जानिए तिल दान का महत्व और व्रत कथा


🌼 षटतिला एकादशी व्रत का महत्व, विधि और कथा | वैदिक ऐस्ट्रो केयर

भूमिका
नमस्कार।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है।
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत विशेष महत्व है। प्रत्येक माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में दो एकादशी तिथियाँ आती हैं, इस प्रकार वर्ष में कुल 24 एकादशी व्रत होते हैं। किंतु अधिकमास या मलमास आने पर इनकी संख्या बढ़कर 26 भी हो जाती है।
शास्त्रों में सभी एकादशी का महत्व बताया गया है, लेकिन षटतिला एकादशी को विशेष रूप से दान-पुण्य और पाप नाशक व्रत माना गया है। आज हम इसी पावन व्रत के महत्व, विधि और कथा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
🌿 षटतिला एकादशी का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा, उपवास और दान करता है, तो उस पर लक्ष्मीपति विष्णु जी की विशेष कृपा होती है।
इस दिन तिल (तिलहन) का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि व्यक्ति छह प्रकार से तिल का प्रयोग करता है, तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
🌾 षटतिला एकादशी पर तिल के 6 प्रकार के प्रयोग
ऋषियों द्वारा बताए गए छह प्रकार के तिल प्रयोग इस प्रकार हैं:
1️⃣ तिल मिश्रित जल से स्नान
2️⃣ तिल का उबटन लगाना
3️⃣ तिल से तिलक करना
4️⃣ तिल मिश्रित जल का सेवन
5️⃣ तिल का भोजन करना
6️⃣ तिल से हवन करना
इन सभी का स्वयं उपयोग करना और सामर्थ्य अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
🙏 षटतिला एकादशी व्रत की विधि
🔹 एकादशी व्रत के नियम दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाते हैं।
दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
यदि स्वास्थ्य कारणों से आवश्यक हो, तो सात्विक फलाहार या दूध का सेवन किया जा सकता है।
🔹 एकादशी के दिन प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठें।
स्नान आदि नित्यकर्म से निवृत्त होकर सूर्य देव को तिल मिश्रित जल से अर्घ्य दें।
भगवान विष्णु का पूजन करें और व्रत का संकल्प लें।
दिनभर निराहार व्रत रखें।
संध्या समय पुनः पूजन कर षटतिला एकादशी की कथा श्रवण करें।
आरती के पश्चात भगवान को भोग अर्पित करें।
📖 षटतिला एकादशी व्रत कथा
देवर्षि नारद जी त्रिलोक भ्रमण करते हुए वैकुण्ठ पहुंचे और भगवान विष्णु से षटतिला एकादशी की कथा पूछी।
भगवान विष्णु ने बताया—
प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी, जो अत्यंत भक्तिपूर्ण थी और मेरे लिए अनेक व्रत करती थी। उसने एक महीने तक उपवास कर मेरी आराधना की, किंतु उसने कभी ब्राह्मणों और देवताओं को अन्न दान नहीं किया।
एक दिन मैं स्वयं भिक्षा मांगने गया। उस स्त्री ने मुझे अन्न के स्थान पर मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उसे लेकर अपने धाम लौट आया। कुछ समय बाद उस स्त्री ने देह त्याग किया और वैकुण्ठ पहुंची, लेकिन उसे वहां केवल एक खाली कुटिया मिली।
जब उसने कारण पूछा, तो मैंने बताया कि अन्न दान न करने के कारण उसे यह फल मिला। बाद में देव कन्याओं के उपदेश से उसने षटतिला एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न और धन से भर गई।
भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा—
“जो व्यक्ति षटतिला एकादशी का व्रत करता है और तिल तथा अन्न का दान करता है, उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है।”
🌺 निष्कर्ष
षटतिला एकादशी व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि दान, भक्ति और आत्मशुद्धि का महापर्व है। इस दिन तिल का प्रयोग और दान करने से मनुष्य के मानसिक और शारीरिक पाप नष्ट होते हैं तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन की कामना करता है।
🙏 नमस्कार
 

Vedic Astro Care

Author & Editor

आचार्य हिमांशु ढौंडियाल

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