जन्म कुंडली में षष्ठेश और स्वास्थ्य पर उसका प्रभाव
भूमिका
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जन्म कुंडली का छठा भाव रोगों का भाव माना गया है। इसके अधिपति ग्रह को षष्ठेश कहा जाता है।
यदि किसी जातक पर षष्ठेश की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो, तो वह व्यक्ति रोगों से प्रभावित हो सकता है। जन्मपत्रिका में षष्ठेश को रोग का मुख्य कारक ग्रह माना जाता है।
षष्ठेश की महादशा और रोग
यदि जन्मपत्रिका के अनुसार किसी जातक पर षष्ठेश की महादशा या अंतर्दशा चल रही है, तो रोगग्रस्त होने की संभावना अधिक रहती है।
यदि षष्ठेश जन्मपत्रिका के शुभ या लाभ भाव में स्थित है, तो रोग की संभावना और भी बढ़ जाती है। ऐसे जातक शीघ्र रोगमुक्त नहीं हो पाते।
जन्मकुंडली में लग्न और षष्ठ भाव
जन्मकुंडली का प्रथम भाव लग्न कहलाता है।
इसमें एक से बारह तक की संख्या लिखी होती है, जो राशि का निर्धारण करती है:
संख्या
लग्न राशि
1
मेष
2
वृष
3
मिथुन
4
कर्क
5
सिंह
6
कन्या
7
तुला
8
वृश्चिक
9
धनु
10
मकर
11
कुंभ
12
मीन
जन्मकुंडली में षष्ठ भाव रोग का भाव होता है।
इस भाव का स्वामी ग्रह यानी षष्ठेश रोग का प्रमुख कारक माना जाता है।
कभी-कभी षष्ठेश, व्ययेश या अष्टमेश की दशा-अंतर दशा भी मारक प्रभाव डालती है।
लग्न अनुसार मारकेश और षष्ठेश ग्रह
अगला चरण है यह जानना कि आपके लग्न अनुसार कौन सा ग्रह षष्ठेश (रोग कारक) है और कौन सा मारकेश (मारक ग्रह) है।
लग्न
मारकेश ग्रह
षष्ठेश ग्रह
मेष
शुक्र, मंगल
बुध
वृषभ
बुध, मंगल
शुक्र
मिथुन
चंद्र, गुरु
मंगल
कर्क
सूर्य, शनि
गुरु
सिंह
बुध, शनि
शनि
कन्या
शुक्र, गुरु
शनि
तुला
मंगल
गुरु
वृश्चिक
गुरु, शुक्र
मंगल
धनु
शनि, बुध
शुक्र
मकर
शनि, चंद्र
बुध
कुंभ
गुरु, सूर्य
चंद्र
मीन
मंगल, बुध
सूर्य
ध्यान दें: अक्सर देखा जाता है कि रोग प्रायः षष्ठेश ग्रह से संबंधित ही प्रतीत होते हैं।
निष्कर्ष
जन्म कुंडली में षष्ठेश ग्रह का अध्ययन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
किसी भी ग्रह की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा में यदि षष्ठेश सक्रिय हो, तो स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना आवश्यक है।
व्यक्तिगत और सशुल्क कुंडली विश्लेषण करवा कर ग्रह योगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना करता है।
नमस्कार 🙏

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें