🌞 बुधादित्य योग: सूर्य और बुध की युति से बनने वाला राजयोग
✨ भूमिका
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, किसी भी जन्मकुंडली में सूर्य और बुध की युति होने पर बनने वाले योग को बुधादित्य योग कहा जाता है। इसे राजयोग भी कहा गया है क्योंकि यह जातक को मान-सम्मान, यश, धन और सफलता प्रदान करता है।
बुधादित्य योग का निर्माण तब होता है जब सूर्य और बुध एक ही भाव में स्थित होते हैं। सूर्य आत्मा, पिता, सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और सरकारी सेवा में उन्नति के कारक हैं, जबकि बुध ज्ञान, बुद्धि, वाणी, व्यापार, तर्क और संचार के कारक हैं।
🌟 बुधादित्य योग कैसे बनता है?
जब जन्मकुंडली में सूर्य और बुध एक ही भाव में स्थित होते हैं।
यह योग लगभग 80% लोगों की जन्मकुंडली में पाया जाता है।
सभी जातकों को इसका शुभ फल नहीं मिलता। इसके लिए आवश्यक है कि:
सूर्य और बुध बली हों
किसी पाप ग्रह से प्रभावित न हों
उच्च या नीच राशि का सही स्थान हो
15 डिग्री से अधिक अंतर न हो
⚖️ शुभ भावों में बुधादित्य योग
बुधादित्य योग के शुभ फल प्राप्त करने के लिए सूर्य और बुध की युति केंद्र, त्रिकोण या लाभ भावों में होनी चाहिए।
🔹 केंद्र भाव:
लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम
🔹 त्रिकोण भाव:
लग्न, पंचम, नवम
🔹 लाभ भाव:
द्वितीय, एकादश
🌟 बुधादित्य योग का श्रेष्ठ फल
सूर्य और बुध दोनों योगकारक ग्रह हों (जैसे सिंह लग्न वाले जातक)
दोनों ग्रह बली अवस्था में हों
किसी भी मारक या क्रूर ग्रह की दृष्टि न हो
सूर्य-बुध के बीच अंशात्मक दूरी कम हो (15° से अधिक अंतर न हो)
गुरु की दृष्टि हो तो उत्तम फल प्राप्त होता है
यदि योग लग्न और नवमांश दोनों में बनता है तो इसे सर्वोत्तम फल देने वाला माना जाता है।
⚠️ किन परिस्थितियों में फल नहीं मिलता
सूर्य या बुध 6, 8, 12 भाव के स्वामी हों
नवमांश में नीच राशि
मारक ग्रह की दृष्टि या प्रभाव
📌 निष्कर्ष
बुधादित्य योग मान-सम्मान, बुद्धि, वाणी, व्यापार और सरकारी प्रतिष्ठा प्रदान करता है।
यह योग कुंडली के शुभ भावों में बनने पर ही पूर्ण फल देता है।
हम अगले लेख में जन्मकुंडली के अलग-अलग भावों में बुधादित्य योग के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
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