Latest Posts

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

जन्म कुंडली में विष योग क्या है? प्रभाव, लक्षण और शांति के उपाय

Vedic Astro Care
विष योग के लक्षण
जिन जातकों की जन्म कुंडली में विष योग बनता है, उनके जीवन में कुछ सामान्य लक्षण देखे जाते हैं। ऐसा व्यक्ति भीतर से अत्यधिक चिंतित रहता है और छोटी-छोटी बातों पर भी मानसिक दबाव महसूस करता है। उसे बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है, चाहे वह पूरी मेहनत ही क्यों न करे। नींद में बाधा, अनावश्यक भय, आत्मविश्वास की कमी और अकेलापन इसके प्रमुख लक्षण माने जाते हैं। कई बार जातक को बिना स्पष्ट कारण के उदासी और निराशा घेर लेती है।

किन राशियों पर विष योग का प्रभाव अधिक होता है
विष योग का प्रभाव सभी राशियों पर समान नहीं होता। विशेष रूप से कर्क, मकर, कुंभ और वृश्चिक राशि के जातकों पर इसका प्रभाव अधिक देखा जाता है। चंद्र प्रधान राशियों में यह योग मानसिक स्तर पर अधिक कष्ट देता है, जबकि शनि प्रधान राशियों में यह योग संघर्ष, देरी और जीवन की कठोर परिस्थितियों को बढ़ाता है। हालांकि कुंडली में अन्य शुभ ग्रहों की स्थिति होने पर इसके प्रभाव में कमी भी आ सकती है।

विष योग कब निष्फल हो जाता है
यदि जन्म कुंडली में शनि या चंद्र अपनी उच्च राशि, स्वगृही अथवा केंद्र-त्रिकोण में स्थित हों, तो विष योग का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है। इसके अतिरिक्त यदि गुरु की दृष्टि शनि-चंद्र युति पर हो, या लग्न मजबूत हो, तो यह योग पूर्ण रूप से अशुभ फल नहीं देता। कई बार शुभ दशा या अनुकूल गोचर के समय यह योग लगभग निष्फल भी हो जाता है।

विवाह, करियर और धन पर विष योग का प्रभाव
विवाह के क्षेत्र में विष योग देरी, गलत निर्णय या वैवाहिक तनाव उत्पन्न कर सकता है। पति-पत्नी के बीच भावनात्मक दूरी देखी जाती है। करियर में यह योग संघर्ष, बार-बार नौकरी बदलना, कार्यस्थल पर मानसिक दबाव और अपेक्षित सफलता में विलंब कराता है। धन के मामले में व्यक्ति मेहनत तो करता है, लेकिन धन टिक नहीं पाता। अचानक खर्चे और आर्थिक अस्थिरता बनी रहती है।

वास्तविक जीवन के उदाहरण
अनेक ऐसे जातक देखे गए हैं जिनकी कुंडली में विष योग होने के कारण प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। पढ़ाई में बाधा, नौकरी में अस्थिरता और पारिवारिक तनाव उनके जीवन का हिस्सा रहे। लेकिन जैसे ही उन्होंने सही समय पर ग्रह शांति, दान और आत्मअनुशासन अपनाया, धीरे-धीरे परिस्थितियों में सुधार आया। इससे यह स्पष्ट होता है कि विष योग कष्टदायक अवश्य है, लेकिन अटल नहीं।

विष योग के शांति के 5 प्रभावी उपाय
नियमित रूप से सोमवार को शिवलिंग पर जल या दूध अर्पित करें।
प्रत्येक शनिवार को शनि देव के लिए सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
पूर्णिमा के दिन सफेद वस्त्र, चावल या दूध का दान करें।
हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करें और जीवन में संयम बनाए रखें।
यथासंभव मांस, मदिरा और नकारात्मक संगति से दूरी बनाए रखें।
इन उपायों को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से विष योग के दुष्प्रभावों में निश्चित रूप से कमी आती है।

Disclaimer (अस्वीकरण)
यह लेख सामान्य वैदिक ज्योतिषीय सिद्धांतों और ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी प्रकार के उपाय या निर्णय को अपनाने से पूर्व योग्य ज्योतिषाचार्य से व्यक्तिगत कुंडली परीक्षण अवश्य कराएं। यह जानकारी केवल सामान्य मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

ज्योतिष के पांच अशुभ योग

Vedic Astro Care
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
कुंडली में बनने वाले कुछ ऐसे योग होते हैं जो जीवन को बदल देने का सामर्थ्य रखते हैं। इनमें कुछ योग राजयोग कहलाते हैं जो जीवन में सफलता देते हैं, तो कुछ योग जीवन में असफलता और समस्याओं को जन्म देते हैं। इन्हें दुर्योग या अशुभ योग अथवा दोष कहा जाता है। 

वैदिक ज्योतिष में ग्रहों और नक्षत्रों के आधार पर अनेक प्रकार के संयोग देखने को मिलते हैं, जो व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखते हैं। अच्छे योगों के बारे में आपने सदैव पढ़ा होगा। आज हम आपको कुछ ऐसे विशेष ग्रह योगों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें ज्योतिष शास्त्र में अशुभ योगों में गिना जाता है और, किसी व्यक्ति की कुंडली में इनकी उपस्थिति उसके जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। 

व्यक्ति के जीवन में अनेक समस्याएं उसे पीड़ित करती हैं।आइए जानते हैं क्या है वैदिक ज्योतिष में उपस्थित ऐसे पाँच सबसे खतरनाक योग, जो किसी भी व्यक्ति के जीवन में समस्याओं का अंबार लगा देते हैं। साथ ही जानेंगे उन योगों का आप के जीवन पर प्रभाव और उनकी शांति के उपाय, आप वीडियो को अंत तक ध्यान पूर्वक पूरा देखें, तथा साथ ही अपने इस वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट करना न् भूलें।
आइए सर्वप्रथम बात करते हैं केमद्रुम योग के बारे में।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार केमद्रुम दोष चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण निर्मित होता है। जन्म कुंडली में चंद्र जिस भाव अथवा राशि में स्थित होता है, उससे दूसरे और बारहवें भाव में सूर्य के अतिरिक्त कोई भी ग्रह न हो अर्थात चंद्रमा जिस राशि में हो उससे दूसरे और बारहवें (दोनों) भाव में कोई भी ग्रह उपस्थित ना हो तो केमद्रुम दोष का निर्माण होता है। यदि इन भावों में राहु अथवा केतु में से कोई भी ग्रह स्थित हो तो उनकी उपस्थिति होने से भी केमद्रुम दोष माना जाएगा।
वराहमिहिर ने अपने मुख्य ग्रंथ बृहद्जातक में तथा मंत्रेश्वर महाराज ने भी केमद्रुम योग के बारे में बहुत कुछ बताया है। उनके अनुसार इस योग का फल यह है कि, व्यक्ति मलिन, दुखी, निर्धन और दूसरों के अधीन काम करने वाला होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि किसी की कुंडली में केमद्रुम दोष विद्यमान हो, तो भले ही वह राजा के घर में जन्मा हो, उसके जीवन में कठिनाइयाँ और समस्याएं आती रहती हैं। यह योग जीवन में गरीबी, कठिनाइयाँ, संघर्ष और मानसिक तनाव देता है। ऐसा व्यक्ति संघर्षों का सामना करते हुए बड़ा होता है। 
चंद्रमा का संबंध भगवान शिव से होता है, इसलिए भगवान शिव की उपासना करें और उनका प्रतिदिन जल अथवा गाय के दूध से अभिषेक करना सर्वोत्तम उपाय माना जाता है।
शिव सहस्त्रनाम स्त्रोत्र का पाठ करना और रुद्राभिषेक करना तथा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना भी केमद्रुम योग के दुष्प्रभावों को समाप्त करने का श्रेष्ठ उपाय माना गया है।
केमद्रुम योग वाले जातकों को पूर्णिमा के दिन व्रत रखना चाहिए और यदि यह पूर्णिमा सोमवार से शुरू हो तो अत्यंत उत्तम होता है।
ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी कुंडली में केमद्रुम योग बन रहा है, श्री यंत्र की स्थापना करके विधिवत उसकी पूजा अर्चना करनी चाहिए और श्री सूक्त का नियमित पाठ करना चाहिए।
केमद्रुम दोष वाली स्थिति में आपको अपनी माताजी का पूरा सम्मान करना चाहिए और उन्हें तनिक भी कष्ट नहीं देना चाहिए तथा उनकी सेवा करनी चाहिए।
एक अन्य उपाय के रूप में घर में दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना करके नियमित जल भरकर उस जल से माता महालक्ष्मी की मूर्ति को स्नान कराएं तथा सूर्य देव को अर्घ्य दें।
चंद्र देव के बीज मंत्रों का जाप करना भी अत्यंत अनुकूल होता है।

अब बात करते हैं चांडाल दोष के बारे में।
चांडाल योग किसी भी कुंडली में तब निर्मित होता है, जब किसी एक राशि अथवा भाव में बृहस्पति और राहु एक साथ स्थित होते हैं, या कुंडली में इनका एक दूसरे से किसी भी प्रकार से संबंध स्थापित होता है। इन दोनों का संयोग गुरु चांडाल योग या चांडाल दोष को जन्म देता है, जो कि कुंडली में एक बहुत बड़ा कुयोग माना जाता है।
गुरु चांडाल योग का प्रभाव काफी व्यापक होता है। यह अपना प्रभाव मुख्य रूप से चेतना और ज्ञान पर डालता है, जिससे व्यक्ति के व्यवहार में नकारात्मकता आती है और वह असफलताओं से घिर जाता है। 

इस योग के कारण जीवन में अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं में तथा जीवन में आगे बढ़ने में परेशानियां उठानी पड़ती हैं। इस योग से प्रभावित जातक काफी अधिक भौतिकतावादी होता है, और वह अपने जीवन में नकारात्मकता की ओर बढ़ता है। वह अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, और धन कमाने की तीव्र इच्छा रखता है, जिससे सही और गलत में भेद करना उसे पसंद नहीं आता। ऐसे में व्यक्ति चारित्रिक रूप से पतन का शिकार होता है तथा कुछ विशेष परिस्थितियों में हिंसक एवं कट्टरवादी भी हो सकता है।

चांडाल योग को शांत करने का सबसे अच्छा उपाय है गुरु चांडाल दोष निवारण पूजा। वास्तव में यह एक ऐसी पूजा है, जिससे गुरु चांडाल योग का असर बहुत कम हो जाता है, इसलिए आपको गुरु चांडाल योग शांति पूजा किसी योग्य ब्राह्मण से करवानी चाहिए।
आपको कुंडली में बृहस्पति की शुभ स्थिति हो तो ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा देनी चाहिए तथा गुरु समान लोगों का आदर करना चाहिए।
ऐसे लोगों को बृहस्पतिवार के दिन केले का वृक्ष लगाना चाहिए तथा उसकी पूजा करनी चाहिए।
यदि आपकी कुंडली में चांडाल योग बन रहा है तो आपको बृहस्पतिवार के दिन भगवान विष्णु की उपासना करनी चाहिए और उन्हें पीला चंदन अर्पित करना चाहिए।
राहु ग्रह की शांति करानी चाहिए तथा राहु के बीज मंत्रों का जाप करना चाहिए।
बृहस्पतिवार के दिन विद्यार्थियों को शिक्षा से संबंधित सामग्री का दान करना चाहिए।
यदि यह चांडाल योग आपकी कुंडली में अत्यधिक अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आपको परिवार के किसी वृद्ध व्यक्ति की सलाह लेकर ही जीवन में कोई कार्य करना चाहिए।
गौ माता की नियमित रूप से सेवा करें और उन्हें गेहूं तथा हरी घास खिलाएं।
वटवृक्ष अर्थात बरगद के पेड़ की जड़ में कच्चा दूध अर्पित करें।
भगवान श्री गणेश तथा माता सरस्वती की नियमित आराधना भी चांडाल योग के दुष्प्रभावों से आपको बचाती है।

अब बात करते हैं मांगलिक दोष के बारे में
मांगलिक दोष को अधिकतर लोग पहचानते हैं क्योंकि यह वैवाहिक जीवन में समस्याओं को जन्म देने वाला योग माना जाता है। जब किसी जातक की कुंडली में मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, अथवा द्वादश भाव में स्थित होता है तब वो मांगलिक दोष का निर्माण करता है। 
इस योग की उपस्थिति से व्यक्ति का दांपत्य जीवन पीड़ित अवस्था में रहता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के विवाह में विलंब होता है, बात होकर अटक जाती है या रिश्ता टूट जाता है अथवा विवाह होने के बाद भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से दांपत्य जीवन के सुख का ह्रास होता है। 
इस दोष का परिहार करने के लिए व्यक्ति की मांगलिक दोष की शांति कराई जाती है।
विशेष स्थिति में कुंभ अथवा अर्क विवाह किया जाता है।
ऐसे व्यक्ति को मंगल चंडिका स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करना चाहिए।
केसरिया रंग के गणपति घर लाकर प्रतिदिन उनकी पूजा करनी चाहिए।
बंदरों व कुत्तों को गुड़ व आटे से बनी मीठी रोटी खिलाएँ। 
चाँदी का बिना जोड़ का कड़ा अपने हाथ में पहनना चाहिए।
महामृत्युजय मंत्र का जाप करें। 
माँ मंगला गौरी की आराधना से भी मंगल दोष दूर होता है
कार्तिकेय जी की पूजा से मंगल दोष के दुष्प्रभाव कम होते हैं
यदि कन्या मांगलिक है तो विवाह से पूर्व कन्या का विवाह शास्त्रीय विधि द्वारा प्राण प्रतिष्ठित श्री विष्णु प्रतिमा से करे, तत्पश्चात विवाह करें।
आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिलाएँ। 
मांगलिक जातक को मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए।

अब बात करते हैं अंगारक दोष के बारे में।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष का निर्माण किसी भी कुंडली में उस स्थिति में होता है, जब एक ही भाव में मंगल ग्रह के साथ राहु अथवा केतु उपस्थित हों। इसके अलावा, यदि मंगल का दृष्टि सम्बन्ध भी राहु अथवा केतु से हो रहा हो तो भी इस योग का निर्माण हो सकता है। आमतौर पर अंगारक दोष को एक बुरा और अशुभ योग माना जाता है और इससे जीवन में समस्याओं की बढ़ोतरी होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष बुरे योगों में सम्मिलित किया गया है। अंगारक की प्रकृति से समझें तो अंगारे जैसा फल देने वाला योग बनता है। यह जिस भी भाव में बनता है, उस भाव के कारकत्वों को नष्ट करने की क्षमता रखता है। 

इस योग के प्रभाव से व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन आते हैं, और उसमें गुस्से की अधिकता हो सकती है। यह योग व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है और वह अपने क्रोध तथा दुर्घटना आदि के कारण समस्याओं को निमंत्रण देता है। मंगल को भाई का कारक कहा जाता है, इसलिए इस योग के प्रभाव से कई बार व्यक्ति की अपने भाइयों से नहीं बनती तथा दुर्घटना होने की संभावना रहती है। इस प्रकार के योग वाले व्यक्तियों पर शत्रुओं का प्रभाव भी अधिक पड़ता है और वे मानसिक तनाव में बने रहते हैं।
किसी योग्य विद्वान से अंगारक योग निवारण पूजा कराना सबसे उपयुक्त उपाय माना जाता है क्योंकि इससे ग्रह शांत हो जाते हैं और उनके नकारात्मक प्रभाव कम हो जाते हैं।
मंगल राहु अंगारक योग अथवा मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में इन ग्रहों की शांति मंत्र जाप तथा हवन द्वारा कराना भी उत्तम परिणाम देता है। 
मंगल केतु अंगारक योग उपाय के रूप में मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में लाल रंग का झंडा लगाना चाहिये। 
अंगारक योग निवारण के लिए जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित हो तब माता महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। 
मंगलवार के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की आराधना करने से भी अंगारक दोष से मुक्ति मिलती है।
अंगारक योग निवारण के लिए आप बजरंग बाण का नियमित पाठ कर सकते हैं और हनुमान जी को चोला चढ़ा सकते हैं।
यदि मंगल और राहु दोनों ही अशुभ परिणाम दे रहे हों तो मंगल और राहु का दान करना चाहिए। 
अपने शरीर पर चाँदी धारण करें क्योंकि इससे इन दोनों ही ग्रहों को शांत करने में मदद मिलती है।
समय-समय पर अपने भाइयों की मदद करें और अपने ससुराल पक्ष से अपने संबंध सुधारें।
राह के कुत्तों को मीठी रोटी खिलानी चाहिए।
अंगारक योग का उपाय यह भी है कि आप अपने दाहिने हाथ में तांबे का कंगन पहनें और ॐ अं अंगारकाय नमः मंत्र का 108 बार प्रतिदिन जाप करें।
आप रात को सोते समय अपने सिरहाने या तकिए के निकट तांबे के जग अथवा लोटे में पानी भर कर रखें और सुबह किसी काँटे वाले पौधे या कैक्टस में इस पानी को डाल दें।
अनामिका उंगली में मंगलवार के दिन तांबे की अंगूठी पहनना भी अच्छा परिणाम देता है।

अब बात करते हैं विष योग के बारे में
किसी भी जातक की कुंडली में विष योग तब निर्मित होता है जब कुंडली में शनि और चंद्रमा का दृश्य अथवा युति संबंध बनता है, चंद्रमा को अमृत समान माना जाता है जबकि  चंद्रमा पर शनि की दृष्टि से विष योग का निर्माण कर देती है।

विष योग के बारे में कहा गया है कि ऐसा जातक जीवन से निराश हो जाता है। निराशा तब आती है जब मनोमस्तिष्क सही ढंग से साथ नहीं देता, ज्ञान बाधित हो जाता है। तात्पर्य यह कि विष योग विचारशून्यता देता है। यह कुंडली के जिस भाव में निर्मित होता है उस भाव से संबंधित फलों को क्षीण कर देता है और उससे संबंधित रिश्तो में भी दरार आ सकती है व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करता है और इस वजह से मानसिक तनाव और डिप्रेशन में भी जा सकता है।
विष योग के उपाय के लिए चंद्रमा और शनि के जाप करने चाहिए।
भगवान शिव का रुद्राभिषेक समय-समय पर कराते रहना चाहिए। जातक के जन्म दिवस के अवसर पर  अभिषेक अवश्य कराना चाहिए।
जातक को रात्रि में दूध पीने से बचना चाहिए।
अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।
ध्यान एवं योग का सहारा लेना चाहिए जिससे मानसिक स्थिति मजबूत बन सके।
विकट स्थिति होने पर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए। 
ग्रहशांति एवं जन्मपत्रिका के विश्लेषण हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है नमस्कार।

नक्षत्र: विवाह और नामकरण में नक्षत्रों का महत्व और जीवन पर प्रभाव

Vedic Astro Care
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जितना महत्व सूर्य आदि नौ ग्रहों का है उतना ही महत्व नक्षत्रों का भी है। 
नक्षत्र क्या और कितने प्रकार के होते हैं? उनकी विशेषताएं क्या होती हैं? वैदिक ज्योतिष में नक्षत्रों का इतना महत्व क्यों हैं? और मुहूर्त नामकरण और गुण मिलान में नक्षत्रों की क्या उपादेयता है? आज इन सभी विषयों पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। सम्पूर्ण जानकारी के लिए आप वीडियो को पूरा अवश्य देखें, और साथ ही वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। 
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 27 नक्षत्र दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां हैं। जिनका विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ था। चंद्रमा इन सभी में सबसे अधिक प्रेम रोहिणी से करते थे। ऐसे में कुछ ही समय में चंद्रमा को रानी रोहिणी के साथ समय व्यतीत करना सबसे अधिक अच्छा लगने लगा। रोहिणी नक्षत्र में ही चंद्रमा को उच्च का माना जाता है। इस बात से अप्रसन्न चंद्रमा की अन्य 26 पत्नियों ने अपने पिता दक्ष प्रजापति से चंद्रमा की शिकायत कर दी, जिसके बाद राजा दक्ष ने बार-बार चंद्रमा को समझाया और उनसे अनुरोध किया कि, वह अपनी सभी 27 पत्नियों को समान रूप से प्रेम करें, लेकिन चंद्रमा का प्रेम रानी रोहिणी की ओर ही अधिक रहा। 
जब बहुत बार समझाने पर भी चंद्रमा ने राजा दक्ष की बात नहीं मानी तो क्रोध में आकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को श्राप दे दिया। राजा के श्राप से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गए और उनका तेज क्षीण होने लगा। धीरे-धीरे समय के साथ साथ उनका तेज बिल्कुल ही समाप्त हो गया, जिससे पृथ्वी की गति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा। ऐसी स्थिति में सभी ऋषि-मुनि देवता व्याकुल होकर पितामह ब्रह्मा जी की शरण में गए। देवताओं सहित ब्रह्मा जी ने दक्ष प्रजापति से चन्द्रमा को दिए गए श्राप को वापस लेने के लिए अनुरोध किया गया। 
देवताओं ने राजा को वचन दिया कि, एक बार यदि आप चंद्रमा को दिया गया श्राप वापस ले लेते हैं तो, चंद्रमा अपनी सभी पत्नियों के साथ एक समान समय बिताएंगे और सभी को एक समान प्रेम करेंगे। इस विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अलग है। यहाँ यह ध्यान रखें कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह प्रसंग लिया गया है। अतः दक्ष प्रजापति के श्राप से ही चंद्रमा की स्थिति में बदलाव देखने को मिलते हैं। एक माह में दो पक्ष होते हैं, उनमें से शुक्ल पक्ष में चंद्रमा वरदान के प्रभाव से निखरता है तो वहीं, कृष्ण पक्ष में राजा दक्ष के श्राप से चंद्रमा क्षीण होता है। देवताओं के वरदान से चंद्रमा शुक्ल पक्ष में अपने तेज पर होता है और कृष्ण पक्ष में चंद्रमा धूमिल नजर आता है, दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो या पौराणिक किन्तु चंद्रमा 1 महीने की अवधि में सभी 27 नक्षत्रों के माध्यम से अपने चक्र को पूरा करता है, जिससे कभी पूर्णिमा की स्थिति बनती है तो कभी अमावस्या की और इसी दौरान चंद्रमा का आकार बढ़ता और कम होता नजर आता है।

सामान्य भाषा में समझें तो नक्षत्र शब्द दो अक्षरों से मिलकर बन रहा है, पहला नक्शा जिसका अर्थ होता है मानचित्र या मैप, और दूसरा तारा। ऐसे में इन दोनों शब्द को जोड़ने पर बनता है नक्षत्र जिसका भावार्थ है तारों का मानचित्र। आसमान में तारों के समूह को नक्षत्र कहते हैं, और वैदिक ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। चंद्रमा अपनी कक्षा पर चलता हुआ पृथ्वी की एक परिक्रमा को लगभग 27 दिन में पूरा करता है। ऐसे में माना जाता है कि चंद्रमा प्रतिदिन लगभग एक नक्षत्र की यात्रा करता है। ज्योतिष शास्त्र में सबसे सटीक और सही भविष्यवाणी करने के लिए नक्षत्रों का ही उपयोग किया जाता है। इन नक्षत्रों को विभिन्न प्रकार के वर्गों के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है जैसे, इनकी मूलभूत विशेषताएँ, इन की प्राथमिक प्रेरणा, धर्म-मोक्ष इत्यादि।

सनातन धर्म में बालक के जन्म के समय ग्रहों की चाल और नक्षत्र की गणना के आधार पर निर्मित जन्मपत्रिका का ही विश्लेषण किया जाता है। क्योंकि प्रत्येक जातक का व्यक्तित्व नक्षत्रों पर ही आधारित होता है क्योंकि आपके पूरे जीवन में नक्षत्रों की चाल आपके जन्म, व्यक्तित्व, आपकी शक्ति और कमज़ोरियों से संबंधित संपूर्ण जानकारी प्रदान करने की क्षमता रखती हैं।
आपका जन्म नक्षत्र क्या होता है? दरअसल आपके जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है उसे ही आपका जन्म नक्षत्र माना जाता है।
हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार बताया जाता है कि, ऋषि-मुनियों ने पृथ्वी को प्रभावित करने वाले आकाश को बारह हिस्सों में विभाजित किया है। और इन्हीं 12 हिस्सों को अलग-अलग राशियों के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसके बाद इसके और सूक्ष्म अध्ययन के लिए इसे 27 अन्य भागों में बांट दिया गया, जिसे हम नक्षत्र कहते हैं। राशि बड़ी होती है और नक्षत्र छोटे, प्रत्येक नक्षत्र को भी चार चरणों में विभाजित किया गया है। अतः एक राशि के अंदर लगभग सवा दो नक्षत्र आते हैं। 
एक व्यक्ति की जन्म कुंडली में विभिन्न ग्रहों को अलग-अलग राशियों में रखा जाता है। इन ग्रहों को विभिन्न नक्षत्रों में भी तदनुसार रखा जाता है। राशि के भीतर नक्षत्र में ग्रह के साथ या उससे जुड़ा एक महत्व माना गया है। इन 27 नक्षत्रों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। 
पहला शुभ नक्षत्र इसे देव-गण भी माना जाता है। इस श्रेणी में आने वाले नक्षत्रों को देव-दूत माना जाता है, और वह भगवान की तरह सूक्ष्म और परिष्कृत होते हैं। 
इसके बाद दूसरी श्रेणी आती है मनुष्य गण की, जिसे मध्यम नक्षत्र माना जाता है। इस श्रेणी में आने वाले नक्षत्र इंसानों की ही तरह माने जाते हैं और इंसानों की ही तरह काम करते हैं। 
अंतिम और तीसरी श्रेणी होती है राक्षस गण, जिन्हें अशुभ नक्षत्र भी माना जाता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक राक्षस तो नहीं होते हैं, लेकिन उनके अंदर कुछ हद तक बुरी और विध्वंसक प्रवृत्ति अवश्य होती है।
पहला नक्षत्र है अश्विनी नक्षत्र जो देव-गण के अंतर्गत आता है। इस नक्षत्र में 3 तारे एक साथ चमकते हुए अश्व के मुंह की तरह प्रतीत होते हैं। अश्विनी नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक सुंदर होते हैं, उन्हें अच्छी तरह से तैयार होना बेहद पसंद होता है, साथ ही स्वभाव में वह शांत होते हैं और आमतौर पर उन्हें आभूषण और दवा/चिकित्सा का शौक होता है। 
दूसरा नक्षत्र है भरिणी नक्षत्र यह मनुष्य-गण के अंतर्गत आता है। भरणी नक्षत्र की आकृति गर्भ की तरह प्रतीत होती है। इस नक्षत्र में भी प्रमुख रूप से तीन सितारे होते हैं। भरणी नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक अपने जीवन के प्रति बेहद उत्साहित होते हैं। इसके अलावा उन्हें उनके जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है और यह कभी भी झूठ नहीं बोलते हैं।
तीसरा नक्षत्र है कृत्तिका नक्षत्र इसका राक्षस-गण होता है। कृत्तिका नक्षत्र एक घोड़े की नाल के आकार में सात सितारों का एक नक्षत्र होता है। कृत्तिका नक्षत्र में पैदा हुए जातक जन्म-जात स्वाभिमानी होते हैं। इसके साथ ही उन्हें जीवन में शक्ति या सत्ता में रहने की हमेशा भूख रहती है। शारीरिक रूप से मजबूत और स्वास्थ्य सदैव उत्तम रहता है। हालाँकि इनके अंदर गुस्सा बेहद होता है। 
चौथा है रोहिणी नक्षत्र। इसका मनुष्य-गण है।
रोहिणी नक्षत्र बैलगाड़ी के आकार में होता है। रोहिणी नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक सुंदर होते हैं। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग ईमानदार, सच्चे, बेहद ही उदार स्वभाव के और चरित्रवान होते हैं। 
पांचवा है मृगशिरा नक्षत्र यह देव-गण के अंतर्गत आता है। मृगशिरा नक्षत्र हिरण के चेहरे के आकार में होता है और इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग स्वभाव से अंतर्मुखी होते हैं। यह साधारण जीवन जीने में विश्वास रखते हैं और इन्हें आर्थिक पक्ष के लिहाज से कभी परेशानियां नहीं झेलनी पड़ती हैं। धन इनके पास आराम से आता है, लेकिन आमतौर पर इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग डरपोक होते हैं और हीन भावना से ग्रस्त माने जाते हैं। 
छठा है आर्द्रा नक्षत्र । यह मनुष्य-गण के अंतर्गत है।
आर्द्रा नक्षत्र एक रत्न के आकार में होता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक बेहद ही भावनात्मक होते हैं, लेकिन ईमानदार और भरोसेमंद बिल्कुल भी नहीं होते हैं। इसके अलावा यह हमेशा स्वाभिमानी इनके अंदर गुस्सा बहुत होता है और यह हमेशा आत्म केंद्रित ही नजर आते हैं। 
सातवां है पुनर्वसु नक्षत्र। इसका देव-गण है।
पुनर्वसु नक्षत्र तरकश की तरह प्रतीत होता है। महाभारत वन पर्व के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र में ही भगवान राम का जन्म हुआ था। पुनर्वसु का अर्थ होता है पुनः शुभ। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक स्वभाव से विनम्र और चपल होते हैं। इसके साथ ही वह बेहद ही चतुर और व्यापारिक सौदेबाजी में पक्के होते हैं।
आठवां है पुष्य नक्षत्र यह भी देव-गण के अंतर्गत है।
पुष्य नक्षत्र एक चक्र या पहिये की तरह नजर आता है। इसे सबसे पवित्र सितारा माना गया है और इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक परम सत्य के चाहने वाले होते हैं। साथ ही यह ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होते हैं। यूं तो उनके पास एक संतुलित और शांत दिमाग होता है लेकिन अपने दृष्टिकोण में अक्सर वे डरपोक और सतर्क माने जाते हैं।
आश्लेषा नक्षत्र नौवां नक्षत्र होता है। यह नक्षत्र सुदर्शन चक्र के आकार में होता है। सुदर्शन चक्र जिसे दिव्य चक्र माना जाता है। आश्लेषा नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक खलनायक की तरह होते हैं और दूसरों को यातना देना इन्हें बेहद पसंद होता है। इसके अलावा स्वभाव से कपटी और स्वार्थी होते हैं, लेकिन वहीं दूसरी तरफ इनका स्वभाव हंसमुख भी होता है और यह भोजन के प्रेमी होते हैं। 
दसवां है मघा नक्षत्र। जो कि राक्षस-गण के अंतर्गत है।
मघा नक्षत्र में कुल 5 तारे होते हैं। यह नक्षत्र एक घर के तरह दिखाई देता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग स्वाभिमानी होते हैं साथी इन्हें कड़ी मेहनत करने वाला नहीं माना जा सकता  है। हालांकि जीवन में सुख-समृद्धि इनके पास बेहद ही आसानी से आ जाती है और वह जीवन सुख-सुविधाओं और विलासिता से परिपूर्ण होकर जीते हैं। इन्हें खूबसूरत चीजें और फूल बहुत पसंद होते हैं। 
ग्यारहवां है पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र जिसका मनुष्य-गण है।
पूर्वा-फाल्गुनी नक्षत्र झूले की तरह प्रतीत होता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक स्वभाव से परोपकारी होते हैं और इनमें जन्म-जात सहानुभूति की भावना होती है। साथ ही इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग अच्छे व्यवसाई बनते हैं क्योंकि इनकी भाषण देने की शैली बेहद ही शानदार होती है। साथ ही किसी भी काम का परिणाम का इन्हें पूर्वाभास हो जाता है। 
बारहवां है उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र यह मनुष्य-गण के अंतर्गत आता है। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र बिस्तर या चारपाई के पिछले पाये की तरह प्रतीत होता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक स्वाभिमानी होने के साथ-साथ तुनक मिज़ाज के होते हैं। इसके अलावा स्वभाव से यह सच्चे, ईमानदार और बड़े दिलवाले होते हैं। हालांकि इन्हें अ-पर्याप्त भूख की शिकायत रहती है। 
तेरहवां है हस्त नक्षत्र यह देव-गण के अंतर्गत आता है।
हस्त नक्षत्र में कुल पांच सितारे होते हैं जो एक इंसान के हाथ की आकृति बनाते हैं। इस नक्षत्र में चंद्रमा के चलते इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक परोपकारी, कृतग्य और धर्मार्थ स्वभाव के होते हैं। इसके अलावा इस नक्षत्र के तहत जन्मे लोग लालची स्वभाव के भी होते हैं। इन्हें शराब और संगीत का शौक होता है। 
चौदहवां है चित्रा नक्षत्र, जो कि राक्षस-गण में है।
चित्रा नक्षत्र में मोती के आकार में दिखने वाला एक बेहद ही चमकीला सितारा होता है। यह नक्षत्र कन्या और तुला राशि तक फैली हुई है। चित्रा नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग की काया बेहद ही अच्छी होती है। सुडौल फिगर और आकर्षक विशेषताएँ और आँख इनकी प्रमुखता मानी जाती है। 
पन्द्रहवां है स्वाति नक्षत्र जिसका देव-गण है।
स्वाति नक्षत्र में सिर्फ एक सितारा होता है यह तलवार या मूंगा की तरह प्रतीत होता है। स्वाति नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग अपने परिष्कृत, प्रतिष्ठित और शिष्टाचार के लिए जाने जाते हैं। स्वभाव में थोड़े शर्मीले होते हैं और इनका आत्म नियंत्रण बेहद ही शानदार होता है। हालांकि वे जिद्दी स्वभाव के भी हो सकते हैं।
सोलहवां है विशाखा नक्षत्र इसका राक्षस-गण है।
विशाखा नक्षत्र पांच सितारों से मिलकर बना है और यह कुम्हार के चाक की तरह प्रतीत होता है। यह तुला और वृश्चिक राशि तक फैला हुआ है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातकों को हमेशा ईश्वर का भय रहता है साथ ही ये स्वभाव में बेहद ही ईमानदार होते हैं। कभी-कभी आक्रामक, ईर्ष्यालु और कंजूस और तुनक मिज़ाज भी हो सकते हैं।
सत्रहवां है अनुराधा नक्षत्र इसका देव-गण है।
अनुराधा नक्षत्र में कुल 4 सितारे होते हैं जो एक हल की पंक्ति या कमल की तरह प्रतीत होता है। चंद्रमा यहां विभाजन में लेकिन देवघर नक्षत्र में है। ऐसे में अनुराधा नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक शांत स्वभाव के सुंदर और ईश्वर भक्त होते हैं विदेशी भूमि में यह बेहद ही भाग्यशाली साबित होते हैं।
अठारहवाँ है ज्येष्ठा नक्षत्र यह राक्षस-गण के अंतर्गत आता है।
ज्येष्ठा नक्षत्र एक लटकते हुए झुमके या छाते की तरह प्रतीत होता है। इसमें तीन प्रमुख सितारे होते हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक विपरीतलिंगी के जातकों के लिहाज से बेहद ही आकर्षक साबित होते हैं। साथ ही इन्हें दान-पुण्य इत्यादि करना बेहद पसंद होता है।
उन्नीसवां है मूल नक्षत्र इसका राक्षस-गण है।
मूल नक्षत्र में शेर के आकार के 11 तारे होते हैं। मूल नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक अपने विचारों और ख्यालातों में दृढ़ होते हैं। इसके अलावा स्वभाव से यह बेहद ही चतुर चालाक होते हैं और करीबी रिश्तेदारों से दूरी बना कर रखना इन्हें पसंद होता है।
बीसवां है पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र यह मनुष्य-गण के अंतर्गत आता है।
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में कुल 4 सितारे होते हैं जो हाथी दांत, पंखे या डलिया की तरह दिखाई देते हैं। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक आत्मा स्वाभिमानी होने के साथ-साथ बेहद ही उदार स्वभाव,  दयालु और धर्मार्थ स्वभाव के होते हैं।
इक्कीसवां है उत्तराषाढ़ा नक्षत्र इसका मनुष्य-गण है।
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में कुल 3 सितारे होते हैं जो हाथी दाँत या छोटी चारपाई की तरह प्रतीत होते हैं। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातकों का शारीरिक संरचना बेहद ही शानदार होती है। लंबी नाक और शानदार विशेषताएँ इनके व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देती हैं। इन्हें अच्छा भोजन, कोमल और दयालु स्वभाव बेहद ही पसंद होता है।
बाइसवां है श्रवण नक्षत्र इसका देव-गण है।
श्रवण नक्षत्र में तीन तारे होते हैं। चंद्रमा इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातकों को अत्यधिक बुद्धि और महान नेक-दिल बनाता है। साथ ही इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातकों का स्वभाव बेहद ही विनम्र और गरिमा पूर्ण होता है। 
तेइसवां है धनिष्ठा नक्षत्र यह भी राक्षस-गण के अंतर्गत आता है। धनिष्ठा नक्षत्र ड्रम के आकार का होता है और इसमें चार तारे होते हैं। धनिष्ठा नक्षत्र में पैदा हुए लोग बेहद ही महत्वाकांक्षी और स्वतंत्र स्वभाव के होते हैं। इसके अलावा इनमें वीरता और साहस कूट-कूट कर भरी होती है।
चौबीसवाँ है शतभिषा नक्षत्र इसका राक्षस-गण है।
शतभिषा नक्षत्र में यूँ तो सौ तारे होते हैं लेकिन देखा केवल एक को ही जा सकता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक गुणी और बेहद ही सच्चे होते हैं और आमतौर पर इन्हें सभी लोग प्यार करते हैं। 
पच्चीसवां है पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र इसका मनुष्य-गण होता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र केवल दो सितारों से मिलकर बना है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक खुद को कम आंकते हैं। अक्सर उदास रहने वाले इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक स्वभाव से ईर्ष्यालु और लालची होते हैं।
छब्बीसवाँ है उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र इसका मनुष्य-गण होता है।उत्तराभाद्रपद नक्षत्र दो सितारों से मिलकर बना है और इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातक कला और विज्ञान के शौकीन होते हैं। आमतौर पर यह धर्मार्थ और दयालु स्वभाव के होते हैं।
सत्ताईसवाँ है रेवती नक्षत्र यह देव-गण के अंतर्गत आता है। 32 सितारों से मिलकर बना रेवती नक्षत्र एक ढोल या मछली के जोड़े की तरह प्रतीत होता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए जातकों की शारीरिक संरचना बेहद ही अच्छी होती है और इन्हें मजबूत और आकर्षक शरीर का वरदान प्राप्त होता है। इस नक्षत्र के तहत पैदा हुए लोग कूटनीतिक रूप से भी चतुर होते हैं साथ ही इनके पास शिष्टाचार, शिक्षा और धन परिपूर्ण रहता है।
किसी भी मुहूर्त का चयन भी नक्षत्रों के आधार पर ही होता है।
मृगशिरा, अनुराधा और रेवती नक्षत्र वित्त, सीखने, समाजीकरण, कामुक सुख, इवेंट बिज़नेस, नए वस्त्र और परिधान पहनने, शादी के उद्देश्य, कलात्मक चीजों, कृषि और यात्राओं के लिए बहुत अच्छे माने जाते हैं।
अश्विनी, पुष्य और हस्त नक्षत्र किसी भी तरह के खेल के लिए अच्छे माने गए हैं इसके अतिरिक्त विलासिता का आनंद लेना, नए उद्योग कार्यालय का उद्घाटन करना, कौशल मजदूर, चिकित्सा उपचार, सामाजिकता, कुछ भी खरीदना या बेचना, किसी भी पूजा या आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए, ऋण देने और प्राप्त करने के लिए या नई यात्राएँ शुरू करने के लिए भी उत्तम माना गया है।
आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र युद्ध में सफलता प्राप्त करने के लिए, आत्माओं को बुलाने के लिए, विरह/अलगाव के लिए,  विनाश के कार्य करने और गठबंधन तोड़ने के लिए उपयुक्त हैं।
पुनर्वसु,  स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा चर नक्षत्र माने गए हैं। ये नक्षत्र छोटी यात्राओं के लिए लाभदायक माने गए हैं इसके साथ ही कन्वेक्शन, बागवानी, किसी यात्रा में जाना या समाजीकरण और कुछ भी ऐसा काम  जो छोटे समय के के लिए हो, इन नक्षत्रों में किया जाना चाहिए।
भरिणी, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा और पूर्वाभाद्रपद ये नक्षत्र बुराईयों के लिए, जैसे किसी को धोखा देने या टकराव के लिए उपयुक्त हैं। ये नक्षत्र लड़ाई, आग लगाने, या विनाश के किसी भी कार्य के लिए दुश्मनों के विनाश के लिए भी उपयोगी हैं। कृत्तिका और विशाखा मिश्रित नक्षत्र हैं और दैनिक मजदूरी और पेशेवर जिम्मेदारियों के लिए अच्छे माने गए हैं।
हिन्दू धर्म में नवजात बालक का नामकरण संस्कार एक प्रमुख संस्कार है। इस संस्कार के अंतर्गत जातक का नाम भी जन्म नक्षत्र के आधार पर ही रखा जाता है। अर्थात जिस नक्षत्र के जिस चरण में बालक का जन्म हुआ है उसी नक्षत्र के नामाक्षर के आधार पर ही बालक का नाम रखा जाता है।
उदाहरण के तौर पर समझें तो मान लीजिये किसी बच्चे का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में हुआ है, तो ऐसे में बच्चे का नाम “चू” अक्षर से रखा जायेगा। ऐसे ही दूसरे चरण में हुआ है तो बच्चे का नाम “चे” अक्षर से रखा जायेगा क्योंकि अश्विनी नक्षत्र के चार चरणों के चार अक्षर क्रमशः चू चे चो ला हैं। इसी से आप समझ सकते हैं कि सनातन परंपरा में नाम अक्षर हेतु नक्षत्रों का क्या महत्व है। 
नक्षत्रों से ही पंचक काल का भी निर्माण होता है।
पंचक का अर्थ होता है पांच दिन। प्रत्येक चंद्र माह में, पांच दिनों की एक ऐसी अवधि होती है जब चंद्रमा कुंभ राशि से होकर पांच नक्षत्रों, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों के ऊपर से गुजरता है। इस अवधि को पंचक कहा जाता है। किसी भी शुभ समारोह जैसे विवाह आदि को आयोजित करने के लिए इस अवधि को अच्छा नहीं माना जाता है।
प्रत्येक नक्षत्र का अलग अलग स्वभाव होता है और उनके फल भी अलग अलग होते हैं। कुछ नक्षत्र कोमल होते हैं कुछ कठोर और कुछ उग्र होते हैं। उग्र और तीक्ष्ण स्वभाव वाले नक्षत्रों को ही मूल नक्षत्र या गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है। इस प्रकार हमारे पास गण्ड मूल नक्षत्र आश्लेषा मघा, ज्येष्ठा मूल, रेवती और अश्विनी हैं। माना जाता है कि, जब किसी शिशु का जन्म इन नक्षत्रों में होता है तो इससे बालक के स्वास्थ्य की स्थिति, या फिर उसकी माँ की स्थिति या परिवार की स्थिति संवेदनशील हो जाती है। इन नक्षत्रों के सबसे महत्वपूर्ण चरणों की बात करें तो, आश्लेषा नक्षत्र का चौथा चरण, ज्येष्ठा नक्षत्र का चौथा चरण और  रेवती नक्षत्र का चौथा चरण माना गया है। इसके अलावा मघा नक्षत्र का पहला चरण, मूल नक्षत्र का पहला चरण, और अश्विनी नक्षत्र का पहला चरण होता है। ये शिशु के जन्म के समय दोष का कारण बनते हैं, जिसे आमतौर पर गंड – मूल में जन्म कहा जाता है।

इन नक्षत्रों के अंतर्गत जन्म लेने वाले जातकों को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक समस्याओं से जूझना पड़ता है।  क्योंकि मूल नक्षत्र बहुत ही अशुभ फल देने वाले होते हैं। यदि शिशु का जन्म मूल नक्षत्र के पहले चरण में हुआ है तो ये बच्चे के पिता के लिए हानिकारक सिद्ध होता है, और यदि दूसरे चरण में हुआ है तो ये माँ के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। अगर तीसरे चरण में हुआ है तो, इससे माता-पिता को धन हानि होती है। ऐसी स्थिति में नक्षत्रों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए ग्रह शांति के लिए पूजा-पाठ इत्यादि अवश्य ही करवानी चाहिए।
इसके साथ ही विवाह हेतु अष्टकूट गुणों के मिलान के लिए वर वधु की जन्मकुंडली के आधार पर नक्षत्रों को देखते हुए ही नाड़ी दोष का विचार किया जाता है। 

एक विवाह को सुखी और संपन्न बनाने के लिए कम-से-कम 18 गुणों का मिलना आवश्यक होता है। यानि इससे 
अधिक गुण मिलें तो यह अच्छा माना जाता है, लेकिन इससे कम को कुंडली मिलान में अच्छा नहीं माना गया है। यदि लड़का और लड़की दोनों के नक्षत्र और गुण अनुकूल होते हैं तो उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है, लेकिन वहीं अगर दोनों के नक्षत्र प्रतिकूल होते हैं तो उनका वैवाहिक जीवन कष्टमय और क्लेश भरा गुजरता है। एक बार नक्षत्र राशि में होने के बाद, गुण मिलान किया जा सकता है। देव गण नक्षत्र दोनों अन्य नक्षत्रों अर्थात मनुष्य और राक्षस गण नक्षत्रों के साथ तालमेल बैठा सकते हैं, हालाँकि मनुष्य और राक्षस गुण नक्षत्र कभी एक साथ तालमेल नहीं बिठा सकते हैं। इसे गण-महादोष कहा जाता है और अमूमन तौर पर मनुष्य गण और राक्षस गण के व्यक्तियों के बीच शादी ना किये जाने की सलाह दी जाती है।

निष्कर्ष 
नक्षत्र प्रतिदिन हमारे मन को प्रभावित करते हैं, क्योंकि चंद्रमा 1 महीने में रोजाना राशि चक्र के एक नक्षत्र से होकर गुजरता है। ऐसे में स्वाभाविक है इसका हमारे जीवन पर प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। हमारी जन्म नक्षत्रों का निश्चित स्वभाव और जन्म के समय उनमें स्थित ग्रह हमारी आत्मा का मार्गदर्शन करते हैं जो हमारे पूरे जीवन काल में हमारे विकास को प्रेरित करती है। अतः नक्षत्रों का सम्पूर्ण रूप से ज्ञान होने पर अनेक प्रकार की शारिरिक, मानसिक, आर्थिक समस्याओं से स्वयं को बचाया जा सकता है। क्योंकि समस्याओं का सही कारण ज्ञान होने पर उनसे बचने के सही उपाय करना भी सम्भव होता है।
वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

कालसर्प योग : कितना सच, कितना झूठ

Vedic Astro Care
कालसर्प योग : कितना सच, कितना झूठ
 
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
वर्तमान समय में कालसर्प योग की शांति के नाम पर आम जनमानस में अनेक भ्रांतियां प्रचलित हैं। हालांकि कालसर्प नाम से कोई भी योग किसी भी पुरातन ज्योतिषीय ग्रन्थों में लिखित में नहीं है, किन्तु वर्तमान काल में, जन्मकुंडली में उपस्थित राहु और केतु छाया ग्रहों के मध्य अन्य सूर्यादि ग्रहों की उपस्थिति को ही कालसर्प योग नाम दिया गया है।
विषय थोड़ा जटिल है, अतः वीडियो को ध्यान पूर्वक पूरा देखने पर ही समझ आएगा। और हमारा प्रयास भी यही है कि आप कालसर्प दोष के नाम पर अपने समय, और पैसे का अपव्यय करने से बच जाएं।
आगे बढ़ने से पूर्व आपके अपने इस वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
राहु एवं केतु को ग्रहों की संज्ञा वर्तमान में ही दी गई है ।पुरातन ज्योतिष शास्त्रों में सात ग्रहों को ही माना गया है। राहु और केतु जिस राशि में स्थित हों उसी राशि उसी ग्रह के अनुसार ही इनका फल कथन है। यदि इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो राहु उत्तरी ध्रुव को माना जाता है व केतु दक्षिणी ध्रुव को। राहु-केतु दो सम्पात बिन्दू हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बाँटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से ही कालसर्प योग बनता है। यह सभी जानते हैं कि कालसर्प योग या दोष का कारण राहु और केतु होते हैं। लेकिन क्यों? इस बात को समझें। छाया ग्रह राहु के अधिदेवता काल एवं प्रत्यधिदेवता सर्प हैं। राहु एवं केतु दोनों ग्रहों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है। और जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह, राहु और केतु के मध्य फँस जाते हैं तब ग्रहों की उसी स्थिति को कालसर्प योग कहते हैं।
कुछ लोग कालसर्प योग के प्रभाव को नकारते हैं और तर्क देते हैं कि राहु केतु छाया ग्रह हैं अतः इनका मानव जीवन पर कोई प्रभाव नहीं है। किन्तु आप स्वयं विचार करें। 
धरती पर हम धूप में खड़े हैं तो हमारी छाया भी बन रही है। इसी तरह प्रत्येक ग्रह और नक्षत्रों की छाया भी इस धरती पर पड़ती रहती है। हमारी छाया तो बहुत छोटी होती है लेकिन इन महाकाय ग्रहों की छाया का धरती पर असर गहरा होता है। इसे इस प्रकार समझें।
जैसे पीपल या बरगद के वृक्ष की छाया हमें शीतलता प्रदान करती है। नीम की छाया रोग का निदान करती है तथा बबूल की छाया में सोने से स्किन प्रॉब्लम हो सकती है उसी तरह राहु और केतु यह दो तरह की विशालकाय छाया हैं। जातक की ग्रह स्थिति के आधार पर इनका अच्छा और बुरा प्रभाव व्यक्ति के जीवन को अवश्य ही प्रभावित करता है।
विद्वानों के मतानुसार पितृदोष या प्रारब्ध के कारण कुंडली में कालसर्प योग बनता है। शास्त्रों के अनुसार, पूर्व जन्म कृतं पापं व्याधि रूपेण दृश्यते। अर्थात पूर्वजन्मों में किए गए पाप इस जन्म में व्याधियों के रूप में प्रकट होते हैं। 
यह अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि जिस किसी जातक की जन्मकुंडली में कालसर्प योग रहता है वह व्यक्ति आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से सदा पीड़ित रहता है। शिक्षा , व्यापार, नौकरी, स्वास्थ्य, विवाह, सन्तान आदि सभी क्षेत्रों में कालसर्प योग के कारण सदैव बाधा उत्पन्न होती ही रहती हैं। अनावश्यक तनाव, अशांति, घबराहट, मानसिक विक्षिप्तता, दुश्मनी, धोखेबाजी, नशा, अति सम्भोग की प्रवृत्ति, यह सब जन्मकुंडली में कालसर्प योग या राहु के अशुभ होने के चिन्ह हैं।
कालसर्प योग एक ऐसा योग है जो व्यक्ति को आसमान पर पहुँचाकर पुन: जमीन पर गिराने की शक्ति रखता है। किन्तु यह भी समझने वाली बात है कि कालसर्प योग से वही व्यक्ति डरता है जिसे इसकी शांति का उपाय ज्ञात न हो। अतः इस योग से डरने के बजाय इसके वैदिक उपाय किसी श्रेष्ठ वैदिक कर्मकांडी ब्राह्मण द्वारा ठीक से शुभ मुहूर्त में करवाने चाहिए। 
कालसर्प योग शांति के लिए नागपंचमी के दिन व्रत रखकर, रुद्राभिषेक तथा नाग पूजन करवाना चाहिए।
काले नाग-नागिन का जोड़ा सपेरे से मुक्त करके जंगल में छोड़ें। चांदी के नाग-नागिन के जोड़े को बहते हुए पानी में बहाने से इस दोष का शमन होता है।
उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर के शीर्ष पर स्थित नागचन्द्रेश्वर मंदिर (जो केवल नागपंचमी के दिन ही खुलता है) के दर्शन करें। अष्टधातु या कांसे का बना नाग शिवलिंग पर चढ़ाने से भी इस दोष से मुक्ति मिलती है।
पंचमी तिथि के दिन 11 नारियल सिर से उतारते हुए बहते हुए पानी में प्रवाहित करने से काल सर्पदोष दूर होता है , यह उपाय श्रवण माह की पंचमी अर्थात नाग पंचमी को करना बहुत फलदायी होता है। तांबे का बना सर्प श्रावण माह के सोमवार को शिवलिंग पर चढाने से कालसर्प योग का दुष्प्रभाव समाप्त होता है। 
श्रावण या माघ मास में रूद्राभिषेक कराए एवं महामृत्युंजय मंत्र की एक माला का जाप प्रतिदिन करें।
 जिस भी जातक पर काल सर्प दोष हो उसे कभी भी नाग की आकृति वाली अंगूठी, कड़ा लॉकेट नहीं पहनना चाहिए ।
कालसर्प योग से प्रभावित व्यक्ति को सर्प सूक्त का पाठ प्रतिदिन सुनना चाहिए। साथ ही जो लोग पाठ कर सकते हैं, उन्हें नियमित रूप से सर्पसूक्त का पाठ करना चाहिए।
 सर्प सूक्त इस प्रकार है।
।।श्री सर्प सूक्त।।
ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।1।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखाद्य:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।
कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।
पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।
समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।
रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

कालसर्प योग शांति,एवं जन्मपत्रिका के विश्लेषण हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

अस्त ग्रहों के फल व उसके उपाय

Vedic Astro Care
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में अस्त ग्रह के परिणामों की विशद व्याख्या मिलती है। अस्तग्रहों के बारे में यह कहा जाता है कि: “त्रीभि अस्तै भवे ज़डवत”,अर्थात् किसी जन्मपत्रिका में तीन ग्रहों के अस्त हो जाने पर व्यक्ति ज़ड पदार्थ के समान हो जाता है। ज़ड से तात्पर्य यहां व्यक्ति की निष्क्रियता और आलसीपन से है अर्थात् ऎसा व्यक्ति स्थिर बना रहना चाहता है, उसके शरीर, मन और वचन सभी में शिथिलता आ जाती है। अस्त ग्रहों के बारे में आज हम विस्तार से चर्चा करेंगे, अतः आप विषय को समझने हेतु वीडियो को अंत तक पूरा अवश्य देखें, साथ ही वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें। 
कहा जाता है कि ग्रहों के निर्बल होने में उनका अस्त होना ही सबसे ब़डा दोष होता है। अस्त ग्रह अपने नैसर्गिक गुणों को खो देते हैं, बलहीन हो जाते हैं और यदि वह मूल त्रिकोण या उच्च राशि में भी हों तो भी अच्छे परिणम देने में असमर्थ रहते हैं।वैदिक ज्योतिष शास्त्र में एक अस्त ग्रह की वही स्थिति बन जाती है जो एक बीमार, बलहीन और अस्वस्थ राजा की होती है। यदि कोई अस्त ग्रह नीच राशि, दु:स्थान, बालत्व दोष या वृद्ध दोष, शत्रु राशि या अशुभ ग्रह के प्रभाव में हो तो ऎसा अस्त ग्रह, कोढ़ में खाज का काम करने लगता है। उसके फल और भी निकृष्ट मिलने लगते हैं।
अत: किसी कुण्डली के फल निरूपण में अस्तग्रह का विश्लेषण करना परमावश्यक होता है। अस्त ग्रह की दशान्तर्दशा में अवश्य ही कोई गंभीर दुर्घटना, दु:ख या बीमारी आदि हो ही जाती है। जब किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में कोई शुभ ग्रह जैसे बृहस्पति, शुक्र, चंद्र, बुध आदि अस्त होते हैं तो अस्त होने के परिणाम और भी गंभीर रूप से मिलने लगते हैं। कई कुण्डलियों में तो देखने को मिलता है कि किसी एक शुभ ग्रह के पूर्ण अस्त हो जाने मात्र से व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही अभावग्रस्त हो जाता है और परिणाम अनेक रूपों में दृश्यमान होते हैं। जैसे, किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाना, किसी पैतृक संपत्ति का नष्ट हो जाना, शरीर का कोई अंग-भंग हो जाना या किसी परियोजना में भारी हानि होने के कारण भारी धनाभाव हो जाना आदि। यह भी देखा जाता है कि यदि कोई ग्रह अस्त हो परंतु वह शुभ भाव में स्थित हो जाए अथवा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो अस्तग्रह के दुष्परिणामों में कमी भी आ जाती है।
यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में लग्नेश अस्त हो और इस अस्त ग्रह पर से कोई पाप ग्रह संचार करे तो फल अत्यंत प्रतिकूल मिलते हैं। यदि कोई ग्रह अस्त हो और वह पाप प्रभाव में भी हो तो ऎसे ग्रह के दुष्परिणामों से बचने के लिए दान करना श्रेष्ठ उपाय होता है। किसी ग्रह के अस्त होने पर ऎसे ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में अनावश्यक विलंब, किसी कार्य को करने से मना करना अथवा अन्य प्रकार के दु:खों का सामना करना प़डता है। यदि व्यक्ति की कुण्डली में कोई ग्रह सूर्य के निकटतम होकर अस्त हो जाता है तो ऎसा ग्रह बलहीन हो जाता है। उदाहरण के लिए विवाह का कारक ग्रह यदि अस्त हो जाए और नवांश लग्नेश भी अस्त हो तो ऎसा व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, सुंदर हो या कुरूप, ल़डका हो या ल़डकी निस्संदेह विवाह में विलंब कराता है। यदि इन ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा आ जाए तो व्यक्ति जीवन के यौवनकाल के चरम पर विवाह में देरी कर देता है और वैवाहिक सुखों (दांपत्य सुख) से वंचित हो जाता है जिसके कारण उसे समय पर संतान सुख भी नहीं मिल पाता और वैवाहिक जीवन नष्ट सा हो जाता है। प्रत्येक ग्रह सूर्य के निकट एक निश्चित अंश के भीतर ही अस्त होता है। जैसे चन्द्रमा, सूर्य से 12 अंश के भीतर रहने पर अस्त रहता है। मंगल, सूर्य से 17 अंश के अंदर रहने पर अस्त होता है। बुध, सूर्य से 13 अंश के भीतर रहने पर अस्त होता है। वक्री अवस्था में है तो 12 अंश पर अस्त होता है। गुरु, सूर्य से 11 अंश के भीतर अस्त होता है
शुक्र, सूर्य से 9 अंश के भीतर अस्त होता है। और वक्री हो तो 8 अंश के भीतर अस्त होता है। शनि, सूर्य से 15 अंश के भीतर अस्त होता है। अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से चलने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है। यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ स्वभाव से शुभ फलदायी है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करने का सबसे आसान तथा प्रभावशाली उपाय है, कुंडली धारक के उस ग्रह विशेष के वैदिक विधि पूर्वक जप दान औषधि स्नान आदि करके ग्रहशांति करवाना। इस प्रकार उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है जिससे वह अपना कार्य सुचारू रूप से करने में सक्षम हो जाता है। यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त होने के साथ साथ अशुभ फलदायी है तो ऐसे ग्रह को उसके रत्न के द्वारा अतिरिक्त बल नही दिया जा सकता क्योंकि किसी ग्रह के अशुभ होने की स्थिति में उसके रत्न का प्रयोग सर्वथा वर्जित है, भले ही वह ग्रह कितना भी बलहीन हो। ऐसी स्थिति में किसी भी अस्त ग्रह को बल देने का सबसे अच्छा तथा प्रभावशाली उपाय उस ग्रह के वैदिक या बीज मंत्र के जप बहुत अच्छे उपाय सिद्ध होते हैं जिनके उचित प्रयोग से कुंडली के अशुभ ग्रहों को शांत किया जा सकता है तथा उनसे लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उस ग्रह के मंत्र का स्वयं निरंतर जाप करने से या उस ग्रह के मंत्र का संकल्प सहित ब्राह्मणों द्वारा निश्चित संख्या में जप करवाकर, ग्रह पूजा करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता ही है, साथ ही साथ उसका स्वभाव भी अशुभ से शुभ की ओर बदलना प्रारम्भ हो जाता है। मंत्रों के प्रयोग की प्रक्रिया कठोर नियमों तथा अनुशासन का पालन करने की मांग करती है जिसके चलते जन साधारण के लिए इस प्रक्रिया का अभ्यास अति कठिन है। अतः ग्रहशांति हेतु जप पूजन दान आदि कार्य सदा ही श्रेष्ठ वैदिक ब्राह्मणों द्वारा ही करवाना उचित रहता है। प्रत्येक ग्रह के अस्त होने का तथा उनकी महादशा अंतर्दशा का परिणाम भी अलग अलग होता है। जैसे, चंद्रमा के अस्त होने पर तमाम तरह की मानसिक समस्याएं होने लगती है. कभी-कभी मिर्गी या मानसिक दौरे की बीमारी हो जाती है। व्यक्ति को स्त्री और माता का सुख नहीं मिल पाता। महिलाओं में विशेष तरह के रोग हो जाते है। द्वादशेश का प्रभाव हो तो जातक किसी लंबी बीमारी या नशे आदि का शिकार हो जाता है। यदि जातक की जन्मकुंडली में चन्द्रमा अष्टमेश के पापों के प्रभाव में हो तो व्यक्ति दीर्घकाल तक अवसादग्रस्त रहता है। चन्द्रमा के अस्त होने पर जातक की मां का अस्वस्थ होना, पैतृक संपत्ति का नष्ट होना, मानसिक अशांति आदि घटनाएं घटित होती रहती हैं। उपाय के तौर पर यदि चंद्रमा अस्त है तो महिलाओं का विशेष सम्मान करे। चांदी किसी न किसी रूप में अवश्य पहने। नियमित रूप से शिव जी की उपासना करे।
मंगल के अस्त होने पर उसकी अंतर्दशा में जातक को नसों में दर्द , उच्च अवसाद, खून का दूषित होना आदि बीमारियां हो सकती हैं। अस्त मंगल ग्रह पर, षष्ठेश के पाप का प्रभाव होने पर जातक को कैंसर, विवाद में हानि ,चोटग्रस्त आदि कष्ट होते हैं और यदि अष्टमेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक भ्र्ष्टाचारी, घोटाले करने वाला बन जाता है। अस्त मंगल पर राहु-केतु का प्रभाव होना जातक को किसी मुकदमें आदि में फंसा सकता है। मंगल के अस्त होने पर आत्मविश्वास और साहस में कमी आ जाती है. व्यक्ति के संबंध परिवारवालों के साथ अच्छे नहीं रहते. व्यक्ति के अंदर कभी-कभी अपराध की प्रवृति आ जाती है. उपाय के तौर पर मंगल अस्त है तो जमीन पर सोए या लो फ्लोर के पलंग पर सोए. तांबा किसी न किसी रूप में जरूर पहने. हनुमान जी की उपासना करे।
जातक की कुंडली में बुध अष्टमेश के पाप के प्रभाव में हो तो जातक को दमा, मानसिक अवसाद, किसी प्रिय की मृत्यु का दुःख आदि से गुजरना पड़ता है। अस्त बुध की अंतर्दशा में जातक को धोखे का शिकार होता है। जिससे वह तनावग्रस्त रहता है, मानसिक अशांति बनी रहती है तथा जातक को चर्म रोग आदि भी हो सकता है। बुध के अस्त होने पर व्यक्ति की बुद्धि तीव्र नहीं होती. व्यक्ति सही फैसला नहीं ले पाता. व्यक्ति हमेशा वहम और दुविधा से घिरा रहता है. व्यक्ति नकारात्मक विचार रखने लगता है.उपाय के तौर पर नियमति रूप से गायत्री मंत्र का जाप करे. बिना तेल मसाले के हरी सब्जियों का प्रयोग करे. आप भगवान गणेश या माँ दुर्गा की उपासना कर सकते है।
अस्त बृहस्पति की अंतर्दशा आने पर जातक का मन अध्ययन में नहीं लगता वह लीवर की बीमारी से भी ग्रसित हो सकता है अन्य दूषित ग्रहों का प्रभाव होने पर जातक संतान सुख से वंचित रह जाता है। यदि कुंडली में अस्त बृहस्पति पर षष्ठेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक को मधुमेह, ज्वर आदि हो सकता है वह किसी मुकदमें आदि में भी फंस सकता है। अष्टमेश का प्रभाव होने पर किसी प्रियजन का वियोग होता है और द्वादशेश के पाप का प्रभाव हो तो जातक अनैतिक संबंधों में फंस जाता है। बृहस्पति के अस्त होने पर व्यक्ति तामसिक वृतियों का शिकार हो जाता है. व्यक्ति को पेट की गंभीर समस्याएं हो सकती है. महिला है तो विवाह होने में और चलाने में बड़ी मुश्किल आती है। उपाय के तौर पर सूर्य को नियमति रूप से हल्दी मिलाकर जल चढ़ाएं . किसी न किसी रूप में स्वर्ण जरुर धारण करे. बुजुर्गो की सेवा और सहायता करे। 
कुंडली में अस्त शुक्र ग्रह की अंतर्दशा में जातक का जीवनसाथी रोगग्रस्त हो सकता है। जातक को किडनी आदि से सम्बंधित परेशानी हो सकती है। संतानहीन हो जाने का भय रहता है। अस्त शुक्र का राहु-केतु के प्रभाव में होना जातक की समाज में प्रतिष्ठा के कम होने का संकेत देता है। यदि अस्त शुक्र अष्टमेश के पाप के प्रभाव में दाम्पत्य जीवन में कटुता आती है। द्वादशेश के पाप के प्रभाव में हो तो नशे का आदि होता है। शुक्र के अस्त होने पर व्यक्ति को किसी भी प्रकार का सुख नहीं मिलता. दाम्पत्य सुख नहीं मिलता. व्यक्ति का व्यक्तित्व भी प्रभावशाली नहीं रहता. व्यक्ति को आँखों और मधुमेह की समश्या होने की सम्भावना बन जाती है. उपाय के तौर पर नियमति रूप से दही का सेवन करे. सुबह स्नान करने के बाद हलकी सी सुगंध जरूर लगाये. माँ लक्ष्मी की उपासना करें।
अस्त शनि ग्रह का षष्ठेश की पापछाया में होना रीढ़ की हड्डी में परेशानी, जोड़ों में दर्द आदि समस्या उत्पन्न करता है। अष्टमेश के प्रभाव में रोजगार हीन हो जाता है और द्वादशेश के प्रभाव में जातक किसी भयंकर बीमारी से ग्रसित हो जाता है जिससे मानसिक अशांति रहती है। अस्त शनि ग्रह की अंतर्दशा आने पर जातक की सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आती है, उसे अत्यधिक श्रम करना पड़ता है। उसका कार्य व्यवहार नीच प्रकृति के लोगों में रहता है। शनि के अस्त होने पर व्यक्ति के जीवन में कदम-कदम पर संघर्ष होता है. व्यक्ति को रोजगार के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है. व्यक्ति को कभी-कभी घोर दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। उपाय के तौर पर शनिवार की शाम को पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाये. एक लोहे का छल्ला मध्यमा उंगली में पहने. वृद्ध और अपने से नीचे स्तर के लोगो की सहायता करे।
यदि जातक की कुंडली में कोई भी ग्रह अस्त होने के साथ-साथ अशुभ फलदायी हो तो जातक को उस ग्रह के अशुभ प्रभाव को कम करने हेतु उस ग्रह के मन्त्रों का सही संख्या में जप बहुत अच्छा उपाय सिद्ध होता है।इस उचित प्रयोग से कुंडली के अशुभ ग्रहों को शांत किया जा सकता है तथा उनसे लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। जन्मपत्रिका के पूर्ण विश्लेषण एवं ग्रहों की शांति के श्रेष्ठ वैदिक उपायों हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है,  नमस्कार

विवाह हेतु कुंडली मिलान में मंगलीक योग विचार एवं परिहार

Vedic Astro Care
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
विवाह योग्य लड़के-लड़की की जन्म कुण्डली में वर्ण, वश्य, तारा, ग्रहमैत्री, नाड़ी आदि अष्टकूट
सम्बन्धी गुण मिलान के पश्चात् कुण्डली में मंगल एवं मंगलीक दोष पर विशेष रूप से विचार किया
जाता है। मंगलीक दोष का आधार सामान्यतः निम्न श्लोक माना जाता है।
लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे। कन्या भर्तृविनाशाय भर्ता कन्या विनाशदः।
अर्थात् जिस कन्या की कुण्डली में लग्न चतुर्थ सप्तम अष्टम या द्वादश स्थान में मंगल स्थित हो, तो वह कन्या वर अर्थात अपने (पति) के लिए हानिकारक तथा इसी भान्ति जिस लड़के की कुण्डली में इन्हीं स्थानों में मंगल हो वह कन्या के लिए हानिकारक होता है। इसी भांति लग्न, चन्द्र और कभी-कभी शुक्र की राशि से भी मंगल की उपर्युक्त स्थितियों का विचार किया जाता है। आज हम इस विषय पर विशद रूप से चर्चा करेंगे। आप विषय को अच्छे से समझने के लिए वीडियो को ध्यान पूर्वक पूरा अवश्य देखें, साथ ही वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
यह अनेकों बार देखने को मिला है कि यदि कुंडली मिलान में मांगलिक दोष होने पर, किसी प्रकार का परिहार ना होने पर भी विवाह कर दिया गया तो उसके परिणामस्वरूप दाम्पत्य जीवन में अनिष्ट का, अथवा हानि का सामना करना पड़ा। अतः विवाह पूर्व किसी दैवज्ञ ज्योतिषी से कुंडली मिलान अवश्य ही करवा लेना उचित रहता है। और सनातन धर्म संस्कृति के अनुसार ब्रह्म विवाह में तो सदा से ही यही परम्परा रही है। जिसका अनुसरण प्रत्येक सनातन धर्म को मानने वाले सुधिजन करते ही हैं। कुंडली मिलान के अंतर्गत मांगलिक दोष के अनेकों परिहार ज्योतिषीय ग्रन्थों में बतलाए गए हैं। जिनमें से कुछ श्रेष्ठ परिहारों को हम यहाँ बता रहे हैं। सर्वप्रथम मंगल दोष वाली कन्या का विवाह मंगलीक दोष वाले वर के साथ करने से मंगल
का अनिष्ट दोष नहीं होता तथा वर-वधू के मध्य दाम्पत्य सुख बढ़ता है- कुज दोष वती देया कुजदोषवते किल। नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्योः सुखवर्धनम्॥
इसके अलावा यदि लड़की की कुण्डली में जिस स्थान पर मंगल स्थित (मंगलीक कारक) हो, और लड़के की कुण्डली में उसी स्थान पर शनि, मंगल, सूर्य, राहु आदि कोई पाप ग्रह स्थित हों, तो भौमदोष भंग हो जाता है। इसी प्रकार लड़के की कुण्डली में भौम दोष होने पर कन्या की कुण्डली में उसी भाव में कोई पाप ग्रह होने से भी भौमदोष नहीं रहता- फलित संग्रह के अनुसार
शनि भौमोऽथवा कश्चित् पापो वा तादृशो भवेत्।
तेष्वेव भवनेष्वेव भौमदोष विनाश कृत्॥-
भौमेन सदृशो भौम पापो व तादृशो भवेत्। विवाहः शुभदः प्रोक्तश्चिरायुः पुत्रपौत्रदः॥ 
अर्थात् एक की कुण्डली में मंगल दोष हो, तो दूसरे की कुण्डली में भी उन्हीं स्थानों में शनि आदि पाप ग्रह होने से मंगलीक दोष का प्रभाव क्षीण होकर विवाह में शुभ होता है। 
यामित्रे च यदा सौरि लग्ने वा हिबुके तथा। अष्टमे द्वादशे चैव भौमदोषो न विद्यते॥
इस श्लोक का भी यही तात्पर्य है।
(३) मेष राशि का मंगल लग्न में, वृश्चिक राशि का चौथे भाव में, मकर का सातवें, कर्क राशि का आठवें, एवं धनु राशि का मंगल १२वें भाव में हो, तो मंगल दोष नहीं होता। मुहूर्त पारिजात ग्रन्थ के अनुसार
अजे लग्ने व्यये चापे पाताले वृश्चिके कुजे।
द्यूने मृगे कर्किचाष्टौ भौमदोषो न विद्यते॥ 
प्रकारान्तर से, मीन का मंगल ७वें भाव तथा कुम्भ राशि का मंगल अष्टम में हो, तो भौम दोष नहीं होता। मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार
द्यूने मीने घटे चाष्टौ भौम दोषो न विद्यते 
(४) यदि द्वितीय भाव में चन्द्र-शुक्र का योग हो, या मंगल गुरु द्वारा दृष्ट हो, केन्द्र भावस्थ राहु हो, अथवा केन्द्र में राहु-मंगल का योग हो, तो मंगल दोष नहीं रहता- मुहूर्त दीपक के अनुसार
न मंगली चन्द्र भृगु द्वितीये, न मंगली पश्यति यस्य जीवा।
न मंगली केन्द्रगते च राहुः, न मंगली मंगल-राहु योगे॥
(५) बलान्वित गुरु वा शुक्र लग्न में हो, तो वक्री, नीचस्थ, अस्तंगत अथवा शत्रुक्षेत्री मंगल उपरोक्त दुष्ट स्थानों में होने पर भी भौम दोष नहीं होता- मुहूर्त दीपक के अनुसार, 
सबले गुरौ भृगौ वा लग्ने द्यूनेऽथवाभौमे।
वक्रे नीचारि गृहस्थे वाऽस्तेऽपि न कुजदोषः॥
(६) इसी भांति केन्द्र व त्रिकोण में यदि शुभ ग्रह हों, तथा ३, ६, ११वें भावों में पाप-ग्रह हों तथा
सप्तमेश ग्रह सप्तम में ही हो, तो मंगल दोष नहीं होता- मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार,
केन्द्र कोणे शुभादये च त्रिषडायेऽप्यसद्ग्रहाः।
तदा भौमस्य दोषो न मदने मदपस्तथा ॥
(७) यद्यपि लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम,एकदशवें  और द्वादशवें भावों में स्थित मंगल वर-वधू के वैवाहिक जीवन में विघटन उत्पन्न करता है, परन्तु यदि मंगल अपने घर का हो, उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री हो तो मंगल, दोष कारक नहीं होता-
मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार ही
तनु धन सुख मदनायुर्लाभ व्ययगः कुजस्तु दाम्पत्यम्।
विघट्यति तद् गृहेशो न विघटयति तुंगमित्रगेहेवा॥
(८) यदि वर-कन्या की कुण्डलियों में परस्पर राशिमैत्री हो, गणैक्य हो, २७ गुण या अधिक मिलान होता हो, तो भी भौम दोष अविचारणीय है। मुहूर्त दीपक नामक ग्रन्थानुसार - 
राशिमैत्रं यदा याति गणैक्यं वा यदा भवेत्। अथवा गुण बाहुल्ये भौम दोषो न विद्यते॥
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मुहूर्त संग्रह दर्पण में दिए गए मंगलीक सम्बन्धी इस श्लोक लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे। कन्या भर्तृविनाशाय भर्ता कन्या विनाशदः। के परिहारस्वरूप कुछ अर्वाचीन ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं, जिनमें परस्पर विरोध वाक्यता भी मिलती है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन सैद्धान्तिक एवं प्रतिष्ठित मुहूर्त्त ग्रंथों जैसे-विवाह वृन्दावन, मुहूर्त मार्तण्ड, सारावली, मुहूर्त चिन्तामणि के प्राचीन संस्करण, तथा ज्योतिर्निबन्ध आदि में मंगलीक सम्बन्धी उपर्युक्त श्लोक एवं तत्सम्बन्ध विभिन्न परिहार वाक्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। अतः वर-कन्या की कुण्डली में मंगलीक दोष एवं उसके परिहार का निर्णय अत्यन्त सावधानी पूर्वक अवश्य ही करना चाहिए। केवल लग्न,चतुर्थ, अष्टम द्वादश आदि भावों में मंगल को देखकर दाम्पत्य जीवन के सुख-दुःख का निर्णय कर देना उपयुक्त नहीं। मंगलीक वाले स्थानों में मंगल के अतिरिक्त कोई अन्य क्रूर ग्रह
भी लग्न द्वितीय चतुर्थ सप्तम एवं द्वादशवें, स्थानों में हो, तो वह भी परिवारिक एवं वैवाहिक जीवन के लिए अनिष्टकारी होता है। मुहूर्त संग्रह दर्पण के अनुसार
लग्ने क्रूरा व्यये क्रूरा धने कूराः कुजस्तथा।
सप्तमे भवने क्रूराः परिवार क्षयंकराः॥
मंगल अथवा मंगलीक दोष का निर्णय कुण्डली विशेष में सभी ग्रहों के पारस्परिक अनुशीलन के पश्चात् ही करना चाहिए। मिलान करते समय केवल मंगल या मंगलीक पर ही अत्यधिक बल न देते हुए मेलापक सम्बन्धी अन्य तत्त्वों का भी सर्वाङ्ग रूप से विवेचन करना चाहिए। जैसे-चलित भाव कुण्डली, सप्तमेश की उच्च-नीच स्थिति,सप्तम भाव पर गुरु, शुक्र की दृष्टि आदि तत्त्वों का सम्यक विचार किसी विद्वान ज्योतिषी से अवश्य करवाना चाहिए। तभी विवाह हेतु निर्णय लेना श्रेयस्कर होता है। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

गण्डमूल नक्षत्र एवं उनका मानव जीवन पर प्रभाव

Vedic Astro Care
नमस्कार। वैदिक ऐस्ट्रो केयर में आपका हार्दिक अभिनंदन है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार भचक्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं। इन सत्ताईस नक्षत्रों में कुछ नक्षत्र ऎसे होते हैं जिनका क्षेत्र अति संवेदनशील होता है और इन्हीं नक्षत्रों को गण्डमूल नक्षत्र कहा जाता है। सभी नक्षत्रों का अपना मूल स्वभाव होता है। कोई नक्षत्र शुभ तो कोई अशुभ की श्रेणी में आता है. इन्हीं नक्षत्रों में से छ: नक्षत्र ऎसे हैं जो राशि संधि पर मिलते हैं। यह नक्षत्र केतु तथा बुध के होते हैं। जब केतु का नक्षत्र समाप्त होकर बुध का नक्षत्र आरम्भ होता है तब यह गण्डमूल नक्षत्र कहलाता है।
आज हम गण्डमूल नक्षत्रों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। आप बनें रहें वीडियो के अंत तक हमारे साथ, एवं वैदिक ऐस्ट्रो केयर चैनल को सब्सक्राइब कर नए वीडियो के नोटिफिकेशन की जानकारी के लिए वैल आइकन दबाकर ऑल सेलेक्ट अवश्य करें।
स्कन्द पुराण, नारद पुराण जैसे ग्रंथों में भी अनेक स्थानों पर गंडांत अर्थात गण्डमूल नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है। रेवती नक्षत्र की अंतिम चार घड़ियाँ और अश्वनी नक्षत्र की पहली चार घड़ियाँ गंडांत कही जाती हैं. मघा, आश्लेषा ,ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र भी गंडांत हैं.  मुख्यत: ज्येष्ठा तथा मूल के मध्य का एक प्रहर अत्यंत अशुभ फल देने वाला माना गया है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र  में गण्डमूल नक्षत्र के विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है। जातक पारिजात ,बृहत् पराशर होरा शास्त्र ,जातकाभरणं इत्यादि सभी  प्राचीन ग्रंथों में गण्डमूल नक्षत्रों तथा उनके प्रभावों का वर्णन विस्तार से दिया गया है।
गण्डमूल नक्षत्रों के विषय में बहुत सी भ्रांतियाँ भी फैली हुई हैं। अधिकाँश व्यक्ति गण्डमूल नक्षत्र में पैदा हुए बच्चे को पिता पर ही कष्टकारी मानते हैं, लेकिन ऎसा नहीं है। गण्डमूल नक्षत्रों के सभी चरणों का फल अलग-अलग होता है और किसी किसी चरण में इसका फल अच्छा भी होता है। पहला गण्डमूल नक्षत्र है अश्विनी नक्षत्र। मेष राशि एवं केतु के इस नक्षत्र में उत्पन्न हुए बच्चे का जीवन प्रायः संघर्षशील होता है। इस नक्षत्र में प्रथम चरण में जन्म होने से पिता के लिए कष्टकारी,
दूसरे चरण में फिजूलखर्ची, तीसरे चरण में भ्रमणशील तथा चतुर्थ नक्षत्र में कृश शरीर अर्थात (अपने 
शरीर के लिए) कष्ट रहता है। दूसरा है आश्लेषा नक्षत्र।कर्क राशि एवं बुध के नक्षत्र के जातक प्रायः चंचल एवं चतुर बुद्धि वाले तथा परिवर्तनशील प्रकृति के होते हैं। आश्लेषा के प्रथम चरण में जन्म हो तो विशेष दोष नहीं होता। दूसरे चरण में पैतृक धन की हानि होती है, तीसरे चरण में माता-पिता के लिए गण्डान्त शूल तथा चतुर्थ चरण में पिता के लिए अनिष्टकारी होता है।
आश्लेषाद्ये न गण्डं स्यातंधनगण्डं द्वितीयके। तृतीये मातृगण्डं तु पितृगण्डं चतुर्थके।।
तीसरा है मघा नक्षत्र। सूर्य राशि और केतु के नक्षत्र में उत्पन्न जातक स्पष्टवादी, शीघ्र क्रुद्ध
होने वाले, उद्यमी और धनवान होते हैं। इसके प्रथम चरण में बालक उत्पन्न हो तो माता-पिता को कष्ट या
मातृ पक्ष की हानि होती है, दूसरे चरण में पिता को अनेक परेशानी होती हैं , तीसरे चरण में जन्म हो तो शुभ
फलदायक, और चतुर्थ चरण में जन्म हो तो विद्या, धनादि के लिए शुभ होता है। चतुर्थ है ज्येष्ठा नक्षत्र। मंगल की राशि वृश्चिक एवं बुध के नक्षत्र में उत्पन्न जातक
सरल हृदय, तीक्ष्ण बुद्धि, धर्म परायण तथा उन्नति के कार्यों में अनेक बाधाओं से युक्त होते हैं।
ज्येष्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न बच्चा ज्येष्ठ अर्थात बड़ों के लिए अरिष्टकर होता है। दूसरे चरण में जन्म हो तो छोटे भाई के लिए नेष्ट, तीसरे चरण में पिता के लिए अरिष्टकर तथा यदि चतुर्थ चरण में जन्म हो जातक स्वयं अपने एवं पिता के लिए अनिष्टकारी होता है। जातक पारिजात के अनुसार
ज्येष्ठाद्यपादेऽग्रजमाशुं हन्याद् द्वितीयपादे यदि तत्कनिष्ठम्।
तृतीयपादे पितरं निहन्ति स्वयं चतुर्थे मृतिमेति जातः॥ 
ज्येष्ठा नक्षत्र और मंगलवार के योग में उत्पन्न कन्या बड़े भाई के लिए अरिष्टकारक होती है। अभुक्त मूल नक्षत्र अर्थात ज्येष्ठा नक्षत्र की अन्तिम २ घटियाँ तथा मूल नक्षत्र के आरम्भ की २ घटियाँ, कुल चार घड़ियाँ अभुक्त मूल गण्ड नक्षत्र कहलाते हैं। इनमें उत्पन्न कन्या, पुत्र, पशु कुल के लिए अनिष्टकारी होते हैं। इनमें उत्पन्न बच्चे को बिना
शान्ति कराये देखना भी नहीं चाहिए। शास्त्र प्रमाण के अनुसार
अभुक्त मूलं गठिका चतुष्टयं ज्येष्ठान्त्यमूलादि भवं हि नारदः।
जातं शिशुं तत्र परित्यजेत् वा मुखं पिताऽस्याष्ट समा न पश्येत्॥
अभुक्त मूल-नक्षत्रों की आद्यान्त घटियों के बारे में विद्वान आचार्यों में मतान्तर भी पाया जाता है। जैसे-नारद के अनुसार ज्येष्ठा, मूल नक्षत्र की चार घटियाँ, वशिष्ठ के अनुसार २ घड़ियाँ तथा बृहस्पति के मतानुसार केवल १-१ अभुक्त-मूल संज्ञक है। अभुक्तमूलोत्पन्न बालक यदि
जीवित रहे, तो अपने वंश की वृद्धि करने वाला, धनवान् एवं सम्पत्तिवान होता है। पंचम है मूल नक्षत्र। केतु के नक्षत्र और गुरु की राशि (धनु) में उत्पन्न जातक धार्मिक रुचि वाला, उदार हृदय, मिलनसार, परोपकारी, धन-वाहनादि सुखों से युक्त होता है। चरण भेदानुसार
मूल के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक पिता की हानि करता है। दूसरे चरण में माता की हानि, तीसरे चरण में धन का नाश तथा चौथा चरण इसका शुभ होता है। यहां यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि नक्षत्रों की वैदिक विधिपूर्वक शान्ति करवा लेने से अनिष्ट का भय नहीं रहता। जातक पारिजात के अनुसार
मूलाद्यपादे पितरं निहन्याद् द्वितीयके मातरमांशु हन्ति।
तृतीयजो वित्तविनाशकः स्यात् चतुर्थपादे समुपैति सौख्यम्॥ 
मूल नक्षत्र और रविवार दोनों के योग में उत्पन्न कन्या श्वसुर के लिए अनिष्टकारी होती है।
भौमवासरे योगेन ज्येष्ठाजा ज्येष्ठ सोदरम्॥ भानुवासरयोगेन मूलजा श्वसुरं हरेत्॥ 
सूक्ष्म विश्लेषण हेतु मूल नक्षत्र की सम्पूर्ण घटियों को 15 द्वारा भाग देकर 15 खण्ड बना लेने चाहिए। प्रत्येक खण्ड का फल इस प्रकार होता है। प्रथम भाग हो तो पिता के लिए अनिष्टकर, दूसरे में चाचा की हानि, तीसरे में बहनोई की हानि, चौथे में पितामह अर्थात (दादा) की हानि, आठवें में चाची के लिए अनिष्टकर, नवम में सबके लिए अनिष्टकर, दसवें अंश में पशु का नाश, ग्यारहवें में नौकर का नाश होता है। बारहवें अंश में स्वयं जातक का नाश होता है। तेरहवें अंश में हो तो उसके ज्येष्ठ भाई का नाश, चौदहवें अंश में जातक की बहिन का अनिष्ट होता है। अगर पन्द्रहवें में हो तो नाना को कष्ट (अनिष्ट) होता है।
उदाहरणार्थ यदि मूल का सर्वक्ष योग ६४ घड़ी १८ पल है, तो इसमें १५ द्वारा भाग देने से
लब्ध प्रथम भाग में ४ घड़ी, १७ पल हुए। मान लो कि जन्मकालीन भयात् २८।४५ है। ४।१७
घट्यादि को ९ से गुणा करने पर पता चला कि ३८।३३ पर नौवां खण्ड (भाग) समाप्त होकर
३८४५ पर दसवां भाग पड़ता है। तदनुसार फल चौपाय आदि पशु के लिए अनिष्ट रहेगा।
षष्ठ है रेवती नक्षत्र। बुध के नक्षत्र और गुरु की राशि (मीन) में उत्पन्न जातक सर्वप्रिय, विद्यावान, सुन्दर आकृति, तर्कशील एवं धनवान् होता है। रेवती के प्रथम चरण में जन्म हो तो राजा के समान वैभवशाली, दूसरे में मन्त्री के समान सुख साधनों से युक्त, तीसरे में जन्म होने
से धनवान तथा चतुर्थ में जन्म होने से माता-पिता के लिए अरिष्टकारी होता है।
दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ तु जननी तथा। आत्मानं संध्ययोर्हन्ति ततो गण्डं विवर्जयेत्॥
गण्डमूल नक्षत्र शान्ति के लिए आप स्क्रीन पर दिए गए नम्बरों के माध्यम से हमसे संपर्क कर सकते हैं। वैदिक ऐस्ट्रो केयर आपके मंगलमय जीवन हेतु कामना करता है, नमस्कार।

Our Team

  • आचार्य हिमांशु ढौंडियालExpert/Astrologer